कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा

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उर्दू के मशहूर कवि एवं व्यंग्यकार इब्ने इंशा का असली नाम शेर मुहम्मद खान था. उनका जन्म 15 जून, 1927 को पंजाब के जालंधर ज़िले के फिल्लौर में हुआ था. उनकी शुरुआती शिक्षा लुधियाना में हुई. उन्होंने 1946 में पंजाब यूनिवर्सिटी से बीए किया, लेकिन आज़ादी के बाद 1949 में उनका परिवार पाकिस्तान चला गया. उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए 1953 में कराची यूनिवर्सिटी से एमए की डिग्री हासिल की. उन्होंने रेडियो में भी काम किया. बाद में वह क़ौमी किताब घर के निदेशक बने. इब्ने इंशा इंग्लैंड स्थित पाकिस्तान दूतावास में सांस्कृतिक मंत्री और फिर पाकिस्तान में यूनेस्को के प्रतिनिधि रहे.

इब्ने इंशा ने बहुत कम उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था. वह अपने असली नाम की बजाय इब्ने इंशा नाम से लिखते थे और इसी नाम से उन्हें ख्याति मिली. वह उर्दू की रचनाओं में हिंदी शब्दों का खासा इस्तेमाल करते थे. उन्हें यात्रा लेखक और स्तंभकार के तौर पर भी जाना जाता है. उनकी रचनाओं के कई संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें कविता संग्रह-इस बस्ती के इक कूचे में, चांद नगर, दिले-वहशी, यात्रा वृतांत-आवारा गार्ड की डायरी, दुनिया गोल है, इब्ने बबूता के ताक़ुब, चलते हों तो चीन को चलिए, नगरी-नगरी फिरा मुसा़फिर और हास्य व्यंग्य कुमार-ए-गंदम, खत इंशा जी के शामिल हैं. उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ. कैंसर से जूझते हुए 11 जनवरी, 1978 को लंदन में उनका निधन हो गया. उनका शव पाकिस्तान लाया गया और कराची में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया. इब्ने इंशा की किताब-उर्दू की आखिरी किताब की व्यंग्य कथाएं बहुत मशहूर हुईं.

हमारा मुल्क

ईरान में कौन रहता है?

ईरान में ईरानी क़ौम रहती है.

इंगलिस्तान में कौन रहता है?

इंगलिस्तान में अंग्रेजी क़ौम रहती है.

फ्रांस में कौन रहता है?

फ्रांस में फ्रांसीसी क़ौम रहती है.

ये कौन सा मुल्क है?

ये पाकिस्तान है.

इसमें पाकिस्तानी क़ौम रहती होगी?

नहीं, इसमें पाकिस्तानी क़ौम नहीं रहती. इसमें सिंधी क़ौम रहती है, इसमें पंजाबी क़ौम रहती है, इसमें बंगाली क़ौम रहती है, इसमें यह क़ौम रहती है, इसमें वह क़ौम रहती है. लेकिन पंजाबी तो हिंदुस्तान में भी रहते हैं, सिंधी तो हिंदुस्तान में भी रहते हैं, फिर यह अलग मुल्क क्यों बनाया?

ग़लती हुई, मा़फ कीजिए, आइंदा नहीं बनाएंगे.

भारत

यह भारत है. गांधी जी यहीं पैदा हुए थे, यहां उनकी बड़ी इज़्ज़त होती थी, उन्हें महात्मा कहते थे. चुनांचे मारकर उन्हें यहीं द़फन कर दिया और समाधि बना दी. दूसरे मुल्कों के बड़े लोग आते हैं तो इस पर फूल चढ़ाते हैं. अगर गांधी जी नहीं मारे जाते तो पूरे हिंदुस्तान के श्रद्धालुओं के लिए फूल चढ़ाने के लिए कोई जगह ही न थी. यह मसला हमारे यानी पाकिस्तान वालों के लिए भी था. हमें क़ायदे आज़म जिन्ना साहब का एहसानमंद होना चाहिए कि वह खुद ही मर गए और टूरिस्टों के लिए फूल चढ़ाने की एक जगह पैदा कर दी, वरना शायद हमें भी उनको मारना ही पड़ता. भारत का पवित्र जानवर गाय है. भारतीय उसी का दूध पीते हैं, उसी के गोबर से लीपा करते हैं, लेकिन आदमी को भारत में पवित्र जानवर नहीं माना जाता.

कछुआ और खरगोश

एक था कछुआ, एक था खरगोश. दोनों ने आपस में शर्त लगाई. कोई कछुए से पूछे कि तूने शर्त क्यों लगाई, क्या सोचकर लगाई? बहरहाल, तय यह हुआ कि जो पहले नीम वाले टीले पर पहुंचेगा, उसे हक़ होगा कि दूसरे के कान काट ले. दौड़ शुरू हुई तो कछुआ रह गया और खरगोश तो यह जा कि वह जा. कछुआ अपनी परंपरागत रफ्तार से चलता रहा. कुछ देर चला तो ख्याल आया कि थोड़ा आराम कर लिया जाए, बहुत चल लिए. आराम करते-करते नींद आ गई. न जाने कितना ज़माना सोते रहे. आंख खुली तो सुस्ती बाक़ी थी. बोले, अभी क्या जल्दी है. इस खरगोश के बच्चे की क्या औक़ात कि मुझसे जीत सके. वाह भाई वाह, मेरे क्या कहने. का़फी ज़माना सुस्ता लिए तो फिर मंज़िल की तऱफ चल पड़े. वहां पहुंचे तो देखा खरगोश न था. बेहद खुश हुए. अपनी मुस्तैदी की दाद देने लगे. इतने में उनकी नज़र खरगोश के एक पिल्ले पर पड़ी. उससे खरगोश के बारे में पूछने लगे. खरगोश का बच्चा बोला, जनाब वह मेरे वालिद साहब थे और मुद्दतों आपका इंतज़ार करने के बाद मर गए

और वसीयत कर गए कि कछुए मियां यहां आ जाएं तो उनके कान काट लेना. लिहाज़ा लाइए इधर कान…

कछुए ने फौरन कान और अपना सिर खोल के अंदर कर लिया और आज तक छिपाए फिरता है.

इब्ने इंशा ने गद्य ही नहीं, पद्य में भी अच्छी खासी लोकप्रियता हासिल की. उनकी एक रचना:-

कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा

कुछ ने कहा ये चांद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा

हम भी वहीं मौजूद थे, हमसे भी सब पूछा किए

हम हंस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था पर्दा तेरा

इस शहर में किससे मिलें, हमसे तो छूटी महफ़िलें

हर शख्स तेरा नाम ले, हर शख्स दीवाना तेरा

कूचे को तेरे छोड़कर, जोगी ही बन जाएं मग़र

जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा

तू बेव़फा, तू मेहरबां, हम और तुझसे बदगुमां

हमने तो पूछा था ज़रा, ये व़क्त क्यूं ठहरा तेरा

हां, हां तेरी सूरत हसीं, लेकिन तू ऐसा भी नहीं

इस शख्स के अश्आर से, शोहरा हुआ क्या-क्या तेरा

बेशक उसी का दोष है, कहता नहीं खामोश है

तू आप कर ऐसी दवा, बीमार हो अच्छा तेरा

बेदर्द सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल

आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, इंशा तेरा.

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