मध्य प्रदेश का कटनी ज़िला भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण बेशक़ीमती खनिज संपदा के प्रचुर भंडारण सहित जल संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा अपने इस्पात उद्योगों हेतु आवश्यक गुणवत्ता पूर्ण कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले चूना पत्थर (लाईम स्टोन) की खदानें यहां के ग्राम कुटेश्वर में स्थापित की गई थीं. इसके बाद भी ज़िले में खनिज आधारित कई छोटे-बड़े उद्योगों की स्थापना का दौर निरंतर जारी है. नतीजतन ज़िले में उद्योगों की स्थापना के लिए हज़ारों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि का ग़ैरकानूनी एवं अवैध रूप से बलपूर्वक अधिग्रहण किया जा रहा है, जिससे ज़िले में मज़दूरों-किसानों के परंपरागत जीवन एवं आजीविका का संकट खड़ा हो गया है. उद्योगों की स्थापना के पूर्व मज़दूर-किसान एवं क्षेत्रीय जनता के जीवन की रक्षा, पुनर्वास करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है, लेकिन ज़िले में बिना पुनर्वास की योजना के मज़दूरों-किसानों को उनकी पीढ़ी दर पीढ़ी के आजीविका संसाधनों से बलपूर्वक उजाड़े जाने का दौर थमने का नाम ही नहीं ले रहा है.
कंपनी में कार्यरत मज़दूरों द्वारा नियमित करने तथा न्यूनतम वेतन प्रदान करने की मांग करने पर कंपनी द्वारा बिना कारण बताओ नोटिस दिए वर्ष 1996 से 5000 मज़दूरों को बलपूर्वक नौकरी से निकाल दिया गया. मज़दूरों द्वारा कंपनी के निर्णय के विरुद्ध निचली अदालत से लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ी गई. न्यूनतम वेतन अथॉरिटी से लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की डिवीजन बैंच ने मज़दूरों को न्यनूतम वेतन का भुगतान किए जाने एवं नियमित किए जाने का आदेश दिया. इसके बावजूद सेल, केंद्र सरकार एवं विधि मंत्रालय की अनुमति के बिना ग़ैर क़ानूनी ढंग से वर्ष 1996 से लेकर आज 2012 तक विगत 17 वर्षों से मज़दूरों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहा है.
स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) की कुटेश्वर लाईम स्टोन माइंस का उदाहरण ही देखें तो आज अपने आपको देश का महारथी प्रचारित करने वाले इस उद्योग के रॉ मटेरियल डिवीजन के अंतर्गत आने वाली खदानों में अपने स्थापना काल से ही केंद्रीय श्रमिक क़ानूनों का पालन नहीं किया जा रहा है. इन खदानों की स्थापना हेतु क्षेत्रीय किसानों की अधिग्रहित भूमि का भी आज तक पर्याप्त मुआवज़ा, ज़मीन के बदले नौकरी एवं समुचित पुनर्वास आदि योजनाओं को लगभग 40 वर्षों में भी पूरा नहीं किया गया है. सेल में 17.01.1993 से ठेका प्रथा प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद माइंस में आज भी ठेका प्रथा से कार्य करवाया जा रहा है. न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत न्यूनतम वेतन अथॉरिटी के निर्णय 02.12.2003 के अनुसार, सेल की कुटेश्वर माइंस में निर्धारित न्यूनतम मज़दूरी का भुगतान भी नहीं किया जाना अमानवीय एवं दंडनीय अपराध है. सेल भारत सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की भारी-भरकम लाभ प्रदान करने वाली कंपनी है. इसलिए कंपनी के कार्यरत मज़दूरों को भारत सरकार के श्रम क़ानूनों के अनुसार लाभ प्रदान करना कंपनी का दायित्व है, लेकिन कंपनी अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने में कोताही बरत रही है. कंपनी में कार्यरत मज़दूरों द्वारा नियमित करने तथा न्यूनतम वेतन प्रदान करने की मांग करने पर कंपनी द्वारा बिना कारण बताओ नोटिस दिए वर्ष 1996 से 5000 मज़दूरों को बलपूर्वक नौकरी से निकाल दिया गया. मज़दूरों द्वारा कंपनी के निर्णय के विरुद्ध निचली अदालत से लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ी गई. न्यूनतम वेतन अथॉरिटी से लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की डिवीजन बैंच ने मज़दूरों को न्यनूतम वेतन का भुगतान किए जाने एवं नियमित किए जाने का आदेश दिया. इसके बावजूद सेल, केंद्र सरकार एवं विधि मंत्रालय की अनुमति के बिना ग़ैर क़ानूनी ढंग से वर्ष 1996 से लेकर आज 2012 तक विगत 17 वर्षों से मज़दूरों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहा है. वह न्यूनतम वेतन जैसी संवैधानिक अधिकार की लड़ाई को निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मज़दूरों को न्याय से वंचित करने के लिए ग़ैर क़ानूनी ढंग से करोड़ों रुपये वकीलों की फीस के रूप में भुगतान कर मुक़दमे पर मुक़दमा लगाकर उन्हें उलझाए हुए है. इसी का नतीजा है कि इस दौरान न्याय-रोज़गार एवं जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित लगभग 1000 मज़दूर अपनी जान गंवा चुके हैं. इस पूरे मामले की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र आयोग बनाकर उच्च स्तरीय जांच कराए जाने पर दोषियों के चेहरे बेनक़ाब हो सकते हैं और उन्हें दंडित कराया जा सकता है. चूंकि सेल की इन खदानों से जुड़े हज़ारों मज़दूर और उनके परिवार आज भी भुखमरी-बेरोज़गारी के कारण ज़िंदगी और मौत से संघर्ष कर रहे हैं. इसी का एक उदाहरण गत 18 अप्रैल की दोपहर 12 बजे क़रीब उस समय सामने आया, जब खन्ना बंजारी रेलवे स्टेशन की साईडिंग में सेल की कुटेश्वर माइंस से निकलकर रेलवे रैक के ज़रिये बाहर भेजी जाने वाली गिट्टी लोड करते 45 वर्षीय ठेका श्रमिक सीताराम पिता मगलिया कोल निवासी ग्राम करौंदी कला की बेहद असुरक्षित स्थितियों में काम करते हुए अचानक मौत हो गई. मौक़े पर मौजूद 884 मज़दूरों ने श्रमिकों को आवश्यक सुरक्षा एवं सुविधा प्रदान न किए जाने को ज़िम्मेदार बताते हुए आवाज़ उठार्ई, मगर पूर्व के कई मौक़ों की तरह इस मौके को भी प्रबंधन ने अपने ठेकेदार एसएस एंड कंपनी पर सारी ज़िम्मेदारी डालते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया.
उल्लेखनीय है कि सेल प्रबंधन द्वारा अपनी खदानों से पत्थर निकाल कर गिट्टी बनाकर बोकारो भेजने का काम हैदराबाद, दिल्ली आदि बड़े शहरों के ठेकेदारों को दे दिया गया. कटनी शहर से 60 किलोमीटर सुदूर ग्रामीण अंचल में होने के कारण ठेकेदारों द्वारा मज़दूरों का शोषण किया जाता था. मज़दूर को गिट्टी का 1 चट्टा बनाने पर एक दिन की मज़दूरी दी जाती थी, वह भी सरकारी-न्यूनतम वेतन से कम. मज़दूर दिहा़डी पर आता था, परंतु इसको मज़दूरी उस दिन की मिलती थी, जिस दिन रेलवे साइडिंग पर रैक आ जाता था. मतलब मज़दूर गर्मी, बरसात, ठंड में रोज आता था, परंतु इसको मज़दूरी मात्र एक माह के दस दिन मिलती थी, वह भी सरकारी रेट से कम. इस अन्याय के खिला़फ मज़दूर इकट्ठे होकर जय प्रकाश नारायण आंदोलन के दौरान उभरकर आई छात्र राजनीति और फिर जनता पार्टी के माध्यम से विधायक बनकर समूचे अंचल में ज़मीनी राजनीति की पहचान बने नेता बच्चन नायक (अब स्वर्गीय) के पास आए. उन्होंने ठेकेदारों से मज़दूरों को न्यूनतम वेतन देने के लिए कहा. ठेकेदारों ने वेतन देने से मना कर दिया. बच्चन नायक द्वारा इस संबंध में सेल प्रबंधन से बातचीत की. उन्होंने कहा कि वह इस बारे में कुछ नहीं कर सकते हैं. बच्चन नायक द्वारा इस्पात खदान जनता मज़दूर यूनियन बनाकर जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसमें राहत चाही गई कि प्रिंसिपल इम्प्लॉयर ही न्यूनतम मज़दूरी के लिए उत्तरदायी है.
सेल द्वारा कलकत्ता हाई कोर्ट से इस तर्क पर स्थगन प्राप्त किया गया. उनका मुख्यालय कलकत्ता में है. इसलिए जबलपुर कोर्ट इसकी सुनवाई नहीं कर सकता. जबलपुर हाई कोर्ट की डबल बैंच ने स्टे वैकेट करते हुए व्यवस्था दी कि मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी देने के लिए प्रिंसिपल इम्प्लायर ही उत्तरदायी है.
सेल द्वारा इस आदेश के खिला़फ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई. सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी अपने आदेश में कहा गया कि प्रिंसिपल इम्प्लॉयर ही न्यूनतम वेतन के लिए उत्तरदायी है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एयर इंडिया, सेल एवं कई अन्य द्वारा पुनर्निरीक्षण याचिका दायर की गई. पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला दिया कि प्रिंसिपल इम्प्लॉयर की जवाबदारी मेरिट के आधार पर तय होगी. सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले के आधार पर जबलपुर हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि मेरिट के आधार पर सेल को ही न्यूनतम मज़दूरी देनी होगी. रीजनल लेबर कमिश्नर जबलपुर ने अपने फैसले में सेल प्रबंधन को राशि मज़दूरों को देने का निर्णय दिया. सेल इस फैसले के खिला़फ हाई कोर्ट गया. हाई कोर्ट की सिंगल बैंच ने भी सेल को भुगतान का निर्णय दिया. सेल द्वारा जबलपुर हाई कोर्ट में फिर पुनर्निरीक्षण याचिका लगा दी गई. इस तरह सेल द्वारा जानबूझ कर मामला लटकाने से नाराज़ होकर जबलपुर हाई कोर्ट ने सेल से कहा कि तीन दिन के अंदर 1.50 करोड़ रुपये न्यायालय में जमा कराए, जिससे मज़दूरों को अंतरिम राहत दी जा सके. सेल द्वारा पैसा जमा कर दिया गया. रजिस्ट्रार जबलपुर हाईकोर्ट द्वारा सभी मज़दूरों के नाम पर चेक बनवाकर वितरित करा दिए गए. मगर अभी मज़दूर अपना खाता बैंक में खाता खुलवा ही रहे थे कि सेल द्वारा सुप्रीम कोर्ट से स्टे प्राप्त कर लिया. जबलपुर हाईकोर्ट की डबल बैंच ने भी अपने आदेश में मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी देने के साथ ही साथ सरकारी नौकरी देने का आदेश दिया. सेल उक्त आदेश के खिला़फ सुप्रीम कोर्ट चली गई है और वहां उसने बड़े अधिवक्ताओं के माध्यम से अपने पक्ष में इतनी सफलता ज़रूर हासिल कर रखी है कि एक सुनवाई के बाद स्पेशल लीव ग्रांट कराकर मामले में निर्णय को एक लंबे अंतराल के लिए लटका दिया गया. बरसों से चले आ रहे अपने अहिंसक संघर्ष के साथ इस तरह होते बर्ताव और इस दौरान अन्याय से जूझते मज़दूरों की आए दिन मरते जाने से मज़दूरों का धीरज जवाब देने लगा है. इसी की चेतावनी देते हुए 18 अप्रैल को आंदोलित मज़दूरों ने तपती दोपहर में कुटेश्वर लाईम स्टोन माइंस प्रबंधन के समक्ष धरना-प्रदर्शन देकर अपनी बात रखी तथा संबंधी ज्ञापन प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, विधिमंत्री, इस्पात मंत्री सहित स्थानीय शासन-प्रशासन को भी प्रेषित किया है, जिसमें निकट भविष्य में अपनी मांगे पूरी न होने पर जेल भरो आंदोलन के साथ ही कुटेश्वर माइंस में तालेबंदी जैसे उग्र क़दम उठाए जाने हेतु अपनी विवशता का उल्लेख किया है. ज्ञापन में मांग की गई है कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के 10963/2009 दिनांक 06.09.2010 डिवीजन बैंच के निर्णय के अनुसार, कुटेश्वर लाईम स्टोन माइंस, गैरतलाई, बरही, कटनी (मध्य प्रदेश) के वर्ष 1996 से निकाले गए सभी मज़दूरों को काम पर लेकर नियमित किया जाए एवं केंद्र सरकार सेल प्रबंधक को सर्वोच्च न्यायालय में दायर-याचिका 34218-34219/2010 को तुरंत वापस लेने का निर्देश दे. सेल प्रबंधन की 1996 से 2012 तक 17 वर्षों में की गई असंवैधानिक कार्यवाही के कारण मारे गए 1000 श्रमिकों के आश्रितों की मृत्यु का आयोग बनाकर सीबीआई जांच की जाए एवं दोषियों को दंडित किया जाए. मृतकों के परिवारों को पांच लाख रुपये प्रति परिवार के हिसाब से मुआवज़ा दिया जाए. न्यूनतम वेतन अथॉरिटी जबलपुर मध्य प्रदेश के दिनांक 02.12.2003 निर्णय अनुसार सेल प्रबंधन द्वारा मज़दूरों के न्यूनतम वेतन दो अरब इकहत्तर करोड़ एक लाख पांच हज़ार छह सौ अस्सी रुपये का ब्याज़ सहित भुगतान किया जाए. कुटेश्वर लाईम स्टोन माइंस, बरही, कटनी मध्य प्रदेश के लिए किसानों की अधिग्रहित ज़मीन का पर्याप्त मुआवज़ा, नौकरी एवं पुनर्वास की व्यवस्था की जाए.
उपरोक्त आशय का एक विस्तृत चेतावनी युक्त ज्ञापन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, विधिमंत्री तथा इस्पात मंत्री की को प्रेषित किया गया. इसके साथ ही ज़िले के कुटेश्वर स्थित सेल की रॉ मटेरियल डिवीजन की खदानों के स्थानीय प्रबंधन को महाप्रबंधक कार्यालय के समक्ष बड़ी संख्या में मज़दूरों एवं किसानों की एक रैली के साथ धरना दिया गया. इसके उपरांत जनता दल यू एवं हिंद मज़दूर सभा तथा लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के नेताओं पूर्व विधायक, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष जदयू एवं इस्पात खदान जनता मज़दूर यूनियन अध्यक्ष सरोज बच्चन नायक, महामंत्री बुद्धूलाल सोनी, उपाध्यक्ष द्वय कोदूलाल कोल, प्रमोद पांडे मौजूदा जदयू प्रदेशाध्यक्ष गोविंद राजपूत, उपाध्यक्ष रानी शरद कुमारी देवी लोजपा नेता बिंदेश्वरी पटेल सहित पिछड़ा वर्ग संगठन के डॉ. केएल सोनी सहित इसी क्षेत्र में जबरिया भू-अधिग्रहण के ज़रिये किसानों की ज़मीन हथियाने हेतु तत्पर वेलस्पन कंपनी के विरुद्ध आंदोलनरत बुजबुजा एवं डोकरिया ग्रामों के कृषकों विशेषकर महिलाओं ने कुटेश्वर श्रमिकों के वर्षां पुराने आंदोलन के प्रति परस्पर समर्थन के आदान-प्रदान से कृषकों, श्रमिकों के एक वृहद जनांदोलन को आगे बढ़ाने हेतु प्रथम बार अपना समर्थन प्रदान करते हुए क्षेत्रीय तहसीलदार को भी ज्ञापन प्रस्तुत किया.
|
|
|