गांव की मिट्टी और देश का गौरव

हाल में दीपिका कुमारी ने तीरंदाज़ी विश्वकप में स्वर्ण पदक जीता. वह भी लंदन ओलंपिक खेलों के आयोजन के कुछ महीने पहले. देशवासी दीपिका से ओलंपिक मेडल की आस लगाने लगे हैं. आस लगाने वालों में हमारी सरकार भी शामिल है. खिलाड़ी पदक जीतते ही देश के लाल हो जाते हैं, सरकार कुछ दिन तक खिलाड़ियों का गुणगान करती है. खिलाड़ियों और खेल के विकास के लिए दीर्घकालिक योजनाओं की बात होती है और फिर वही ढाक के तीन पात वाली हालत हो जाती है. परिणामस्वरूप खिलाड़ी गुमनामी में अपना जीवन ग़ुजारने लगते हैं.

स्वतंत्र भारत के लिए पहला व्यक्तिगत ओलंपिक मेडल केडी जाधव ने जीता था. महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के गांव कराद के रहने वाले जाधव ने 1952 में हेलंसिकी ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था, लेकिन तब भी जाधव को भेदभाव पूर्ण चयन और पैसे की कमी से जूझना पड़ा था. तब जाधव 7000 रुपये में अपना मकान गिरवी रखकर ओलंपिक में भाग लेने गए थे और पदक जीतकर देश को गौरान्वित किया था. जाधव ने महाराष्ट्र पुलिस में इंसपेक्टर के रूप में काम किया. उनका बु़ढापा बदहाली में गुज़रा और गुमनामी में ही वह पंचतत्व में विलीन हो गए.

1951 में भारत में पहले एशियाई खेलों का आयोजन हुआ. आज़ादी मिलने के बाद पहली बार देश कोई आयोजन कर रहा था. इस आयोजन के बाद देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान तो मिली, लेकिन खेलों के विकास के लिहाज़ से कुछ नहीं हो सका और न ही देश में स्पोट्‌र्स कल्चर डेवलप हो पाया. जाधव के ओलंपिक पदक जीतने के 44 साल बाद लिएंडर पेस देश के लिए व्यक्तिगत पदक जीतने में कामयाब हुए. ऐसा नहीं था कि भारतीय एथलीट अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में मेडल जीतने में कामयाब नहीं हो पा रहे थे. खिलाड़ी अपने दम पर एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे आयोजनों में पदक जीत रहे थे, मगर वे ओलंपिक में पदक जीतने में कामयाब नहीं हो सके, क्योंकि खेल के अलावा तब खिलाड़ियों को रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था. आज़ादी के 65 साल बाद भी भारत सरकार खेलों के विकास में जीडीपी का लगभग आधा प्रतिशत भी निवेश नहीं करती है, जबकि अन्य देश अपनी जीडीपी का लगभग दो प्रतिशत खेलों के विकास में लगाते हैं. आज़ादी के बाद भारत में ओलंपिक में भाग लेने को ही सम्मान का विषय समझा जाता था. जीत को वरीयता नहीं दी जाती थी, लेकिन इससे पहले हम जीतने से ज़्यादा हारने की तैयारी रखते थे. हमारे पास हारने के कई बहाने होते थे. कभी हम अपनी कमज़ोर शारीरिक बनावट का बहाना बनाते थे, तो कभी संसाधनों की कमी का, तो कभी पैसों और प्रायोजकों की कमी का.

2008 में बीजिंग में हुए ओलंपिक खेल भारत के लिए सबसे अच्छे परिणाम लेकर आए. भारत को कुल तीन पदक मिले. पदक जीतने वालों में अभिनव बिंद्रा को छोड़ दिया जाए तो अन्य दो पदक जीतने वाले खिलाड़ी गांव से जुड़े हुए हैं. सरकार शहरों में तो खेलों के मैदान बना रही है, मगर गांवों और छोटे शहरों में संसाधनों की कमी है. न ही गांवों और छोटे शहरों में समतल खेल के मैदान हैं और न वे संसाधन, जिनसे शारीरिक क्षमता को ब़ढाया जा सके. इन बातों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने 2008 में पंचायत युवा खेल एवं क्री़डा अभियान की शुरुआत की थी. खेल के मैदान के समतलीकरण की योजना को मनरेगा से भी जोड़ा गया. इस अभियान के तहत गांवों की खेल प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए पंचायत से लेकर राज्य स्तर तक खेल प्रतियोगिताओं के आयोजन का प्रावधान है. मगर पंचायत युवा खेल एवं क्री़डा अभियान को भी भ्रष्टाचार का कीड़ा लग गया और चार साल बाद भी अच्छे परिणाम नहीं आए. गांवों में न ही खेल के मैदानों का निर्माण हो सका और न ही प्रतियोगिताओं का आयोजन हो सका. एक ओर गांवों में सरकारी ज़मीनों पर क़ब्ज़े की वजह से मैदानों के निर्माण के लिए ज़मीन उपल्ब्ध नहीं हो पा रही है, दूसरी ओर दस हज़ार रुपये में खरीदे जाने वाले सामानों की गुणवत्ता किसी से छिपी नहीं है. इस योजना में भी अन्य सरकारी योजनाओं की तरह पैसे की बंदरबांट हो रही है. सरकार काग़ज़ों में तो योजना बना रही है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कुछ ऩहीं कर पा रही है.

संवैधानिक रूप से खेल राज्य सूची का विषय है. राज्य भी खेलों के विकास के लिए कोई विशेष काम करते नहीं दिख रहे हैं. राज्य हमेशा पैसों की कमी को लेकर रोने बैठ जाते हैं. केंद्र से खेलों के विकास के लिए पैसे मिलने के बाद भी राज्य कोई काम करते नहीं दिखाई देते हैं. वे राष्ट्रीय खेलों के आयोजन में वर्षों लगा देते हैं. इन सभी की वजह से नुक़सान देश को ही होता है. हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में सरकारें खेलों पर ध्यान दे रही हैं. दूसरे राज्यों को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए, नहीं तो हमेशा की तरह ओलंपिक में सवा अरब की आबादी वाला देश कुछ मेडलों केलिए भी तरसता नज़र आएगा. चीन और अमेरिका जैसे देशों के सामने खेलों के मामले में आर्थिक ताक़त बनकर भी भारत बौना ही नज़र आएगा.

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