शेयर बाज़ार का जुआ

अब मान लीजिए कि आप थोड़े-बहुत जुआरी भी हैं. आप जुए से अत्यंत नफरत करते हों तो भी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था के ढांचे को समझने के लिए जुए की जानकारी भी आवश्यक है. शेयर बाज़ार में व्यापार के अलावा एक विशेष खेल खेला जाता है, जिसे सट्टा कहते हैं. इसमें खयाली शेयरों की खयाली क़ीमतें दी-ली जाती हैं. यह खेल किस तरह से खेला जाता है, इसका थोड़ा दिग्दर्शन आपको करा देता हूं. बाद में आप इसे पसंद करें या इससे घृणा करें, आपकी मर्जी की बात है. पूंजीवाद का चलाया हुआ यह जुआ संसार भर में बहुत ज़्यादा परिमाण में चलता है. इसको समझने के लिए आपको जान लेना चाहिए कि बंबई शेयर बाज़ार या कलकत्ता शेयर बाज़ार में आप किसी कंपनी के शेयर बिना क़ीमत दिए ही ख़रीद सकते हैं या आपके पास कोई शेयर न हो तो भी आप चाहे जितने शेयर बेच सकते हैं, आपको शेयर सर्टिफिकेट देने की आवश्यकता नहीं पड़ती. जब तक कि दूसरा बलण या निपटान का दिन न आ जाए. हर सेटलमेंट का दिन क़रीब 15 दिन में एक बार आता है. आप सहसा सोचेंगे कि इसमें क्या फर्क़ पड़ता है, लेकिन 15 दिन में बहुत-कुछ फर्क़ पड़ सकता है. ज़रा विचार कीजिए कि मुश्त रकमों की ज़्यादती या कमी किस तरह से शेयरों के भावों में कमी या वृद्धि करती है और किस तरह से आशा और भय से बाज़ार के भावों पर असर पड़ता है, किस तरह से ये समाचार कि कपड़े पर जगात लगने वाली है या जूट का निर्यात बंद होने वाला है या चाय के भावों में अमेरिका में कमी हुई है या कोयला खानों से ज़्यादा निकलने लग गया है, बाज़ार पर असर डालते हैं. असर यह होता है कि उन-उन कंपनियों के पास शेयर होल्डरों को बांटने के लिए मुना़फा कम या ज़्यादा हो जाता है. फलस्वरूप शेयरों की क़ीमत साल भर में 1 बार बदलती हो, वह बात नहीं है, रोज़ाना भावों में परिवर्तन होता रहता है. जो शेयर आपने कई वर्षों पहले एक हज़ार रुपये में ख़रीदे थे, उनसे संभव है आपको पांच हज़ार रुपये सालाना की आमदनी होने लगी हो या पांच ही रुपयों की या बिल्कुल नहीं. इसी के फलस्वरूप वे शेयर, जो आपने एक हज़ार रुपये में ख़रीदे थे, संभव है 50 हज़ार रुपयों में एक समय आप उन्हें बेच सकें या कुल 100 रुपये में ही बेचने पड़ें या शायद कुछ भी न मिले. ज्यों ही आप सुबह समाचारपत्र खोलकर देखते हैं कि कल शाम को शेयरों के क्या-क्या भाव रहे, तो आपको फौरन पता लगता है कि आपकी संपत्ति में क्या वृद्धि हुई या क्या ह्रास हुआ. वह ज्यों की त्यों रहे, यह कदाचित ही संभव है. हां, अगर आपने सरकारी सिक्युरिटी या नगरपालिका के बांड लिए हैं, शेयर नहीं ले रखे हैं तो बात दूसरी है.

अब आप ध्यान दीजिए कि हर रोज या हर क्षण शेयरों के भावों में परिवर्तन होता रहता है. स्टॉक एक्सचेंज पर आप शेयर ख़रीदें तो 15 दिन तक रुपये नहीं देने पड़ते और बेचें तो शेयर नहीं देने पड़ते. फौरन आपके ध्यान में आ जाना चाहिए कि अगर आप किसी हिसाब की गिनती से यह अंदाज़ लगा सकें कि किसी कंपनी के शेयरों की स्थिति 15 दिन में कैसी होगी तो आप शेयर ले या बेच सकते हैं और निपटान या सेटलमेंट के दिन उसका हिसाब कर सकते हैं. अगर आपने अनुमान सही लगाया और बाज़ार आपके अनुमान के अनुसार ही 15 दिन में घटा है या बढ़ा है, तो निश्चय ही आप बिना रुपये लगाए और बिन शेयर पास में हुए, उस दिन के भावों का और सेटलमेंट के दिन के भावों का फर्क़ नफे के रूप में पा सकेंगे. यही खेल है, जिसे सट्टा कहते हैं. इस तरह के खेल को करने से आपको कोई दोष नहीं देगा. अगर आप शेयर ख़रीदते हैं तो आप तेजड़िए कहे जाते हैं, बेच देते हैं तो मंदड़िए कहलाते हैं. सेटलमेंट के दिन उन-उन शेयरों का जैसा भाव होता हैं, उस दिन तक का नफा या नुक़सान आपको मिलता है या आप चुकाते हैं. उसके बाद फिर आगे के 15 दिन के लिए आप अपने व्यापार का बदला भी कर सकते हैं, यह अनिवार्य नहीं है कि उस दिन आपको हिसाब बराबर करना ही पड़े. इस तरह के बदला करने में या तो कुछ फीस लग जाती है या कुछ प्राप्त हो जाता है. यहां भी वही बात है, जब एक कंपनी के शेयर तेजी वाले ज़्यादा संख्या में होंगे तो उन्हें बदले की कुछ फीस चुकानी पड़ेगी. अगर मंदी वालों की संख्या अधिक होगी तो वह भी उन्हें चुकानी पड़ेगी. इस तरह हर 15वें दिन यह खेल होता रहता है. एक और परिस्थिति बन जाती है.

कभी-कभी कोई पूंजीपति, जो बड़ा भारी सट्टेबाज़ हो, इतनी ज़्यादा संख्या में शेयर ख़रीद लेता है या बेच देता है, जितनी बड़ी संख्या उस कंपनी के कुल शेयरों की भी नहीं होती. ऐसी परिस्थिति को खेला कहते हैं. इस तरह की परिस्थितियों में कोई भी हिसाब-किताब या गणना वाला आदमी कुछ भी अंदाज़ा नहीं लगा सकता. अत: हमेशा सतर्क रहना पड़ता है कि कोई सट्टेबाज़, बड़ा पूंजीवादी खेला तो नहीं कर लेगा.

चूंकि यह सब खेल सही अंदाज़ लगाने पर आधारित बुद्धि गणना या प्राइवेट सूचना कर खेलें होता है, इसीलिए कई सट्टे वाले, जो सही अंदाज़ा इन्हीं कारणों से लगा पाते हैं, करोड़ों रुपये कमा लेते हैं. वे इस खेल को समझ लेते हैं और बाज़ार के शेयर दलालों की मार्फत ही व्यापार करते रहते हैं. कभी-कभी बाहरी कच्चे सौरेया या खंडी के सौदे में प्रलोभन में भी आ जाते हैं. इनके अलावा तेजी-मंदी के सौदे, जो क़ानूनन अवैध हैं, भी बड़े परिणाम में होते रहते हैं. तेजी-मंदी के सौदों का अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति अमुक फीस या प्रीमियम देकर अमुक भाव में शेयर लेने या बेचने का विकल्प चुन लेता है. उदाहरण स्वरूप मान लीजिए, आज एक कंपनी के शेयरों का भाव 160 रुपये प्रति शेयर है. आपका अनुमान है कि भाव 200 रुपये का हो जाना चाहिए. आप शेयर ख़रीद कर यह जोखिम नहीं लेना चाहते कि कहीं भाव घटकर 100 रुपये या 125 रुपये न हो जाए और क्षति उठानी पड़े. इसलिए आप 10 रुपये या 5 रुपये प्रति शेयर जो प्रीमियम (फी) है, देकर यह विकल्प ले लेते हैं, जिसके द्वारा आपको इसी भाव में 1 महीने बाद भी शेयर ख़रीदने का अधिकार है. अगर बाज़ार भाव घट गए तो आपकी हानि दिए हुए प्रीमियम (फी) की ही है और अगर भाव उस महीने में बढ़ गया तो भाव जितना बढ़ा होगा, उतना ही आपका मुना़फा होगा, पर आपका भरा हुआ प्रीमियम अब चला गया. इसी तरह से प्रीमियम भर कर बेचने का विकल्प होता है. इसी तरह ख़रीदने-बेचने दोनों का विकल्प होता है. आप दोनों विकल्प ले सकते हैं, जिसे तेजी-मंदी लगाना कहते हैं. ये सौदे अवैध हैं, ज़्यादा घट-बढ़ भावों में हो जाए तो वह व्यापारी जिससे आपने तेजी-मंदी के सौदे किए हैं, मुकर सकता है और क़ानून से दावा करके आप उससे रुपये वसूल नहीं कर सकते.

शेयर बाज़ार ही नहीं, बल्कि रुई बाज़ार, चांदी-सोना बाज़ार, गुड़-खांड बाज़ार, बीजों के जैसे अरंडा, सींगदाना (मूंगफली) का बाज़ार अनेक वायदे के सौदों के बाज़ार हैं, जिनमें इसी प्रकार के सट्टे होते हैं. इन बाज़ारों में बिना माल पास में हुए आप करोड़ों रुपयों का माल बेच सकते हैं. रुपये न होते हुए करोड़ों का माल बड़े मजे से ख़रीद सकते हैं. स़िर्फ सेटलमेंट के दिन आपको भावों में जो फर्क़ हो, उसका भुगतान लेन-देन करना पड़ेगा. सारे संसार में वायदों के ये कई सौदे (फारवर्ड सौदे) रोजाना करोड़ों रुपयों के होते हैं और भारत में भी बंबई, कलकत्ता, दिल्ली, कानपुर आदि बड़े-बड़े शहरों में लाखों रुपयों के सट्टे के ये सौदे रोज़ाना होते रहते हैं. सट्टे का मूल स्वरूप यही है कि अगर आपका अंदाज़ सही निकला तो आप कमाएंगे. यह भी ज़रूरी है कि दूसरा कोई नुक़सान उठाएगा. इन व्यापारों में धन पैदा नहीं होता. यह कमाई हुई संपत्ति तो है नहीं, खाली एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को इसका अंतरण होता है. राष्ट्र के धन की वृद्धि इन सट्टों से कदापि नहीं हो सकती. देखा गया है कि महान बुद्धिमान या प्रज्ञावान या अंदर की सारी बातें जानने वाला, सारी ख़बरें रखने वाला व्यापारी भी सट्टे में कई बार ग़लती कर बैठता है और असफल होकर भारी क्षति उठाता है. आपने जान लिया होगा कि सट्टा क्या चीज है, इसके संपूर्ण विवेचन के लिए तो कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं, पर जानकारी के लिए इसका संक्षिप्त रूप यही है. जो प्रज्ञा बुद्धि, शक्ति और धैर्य सट्टे के इन बाज़ारों के खेलों में व्यय होता है, उसका आधा अंश भी कहीं निर्माण में या अन्य किसी प्रकार के सदुपयोग में लगता, तो भारत के सब शहरों की गंदी बस्तियां कभी की दूर हो गई होतीं. दरिद्रता में काफी कमी आ गई होती. जो महामारी के रोग बार-बार फैलते हैं, वे कभी फैलने नहीं पाते, क्योंकि पूंजीवादी योग्यता में वह तासीर है कि वर्षों में पूरे होने वाले काम कुछ ही दिनों में पूरे हो सकते हैं. भारत का दुर्भाग्य है कि अच्छे प्रज्ञावान व्यक्ति भी सट्टे यानी सभ्य जुए के व्यसन में इस तरह से आसक्त हैं कि उन्हें अपने वास्तविक कर्तव्य का बोध ही नहीं रहता.

महावीर प्रसाद आर मोरारका

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

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