प्राकृतिक संपदा अस्तित्व के लिए खतरा बनी

झारखंड की कोयला खदानों में लगी आग धीरे-धीरे उसके अस्तित्व के लिए खतरा बनती जा रही है. कोयले के लगातार दोहन और तस्करी ने इस प्राकृतिक संपदा को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया. गोड्डा जिले में स्थापित ललमटिया कोल परियोजना झारखंड में उत्तम कोयला उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है. यहां से निकलने वाले कोयले से विद्युत उत्पादन कर बिहार एवं पूर्वी बंगाल को रोशनी प्रदान की जाती है, लेकिन वर्षों से धू-धू कर जल रहे इस क्षेत्र के कोयले पर केंद्र अथवा राज्य सरकार की निगाह अभी तक नहीं गई और न नष्ट हो रही इस राष्ट्रीय संपत्ति को बचाने का कोई सार्थक प्रयास किया जा रहा है. आग की वजह से आसपास के इलाकों से लोगों का पलायन हो रहा है. कोयला माफिया इसका जमकर फायदा उठा रहे हैं.

हजारों टन कोयला प्रतिदिन बाहर भेजा जा रहा है. जिला मुख्यालय गोड्डा से महज 30 किमी की दूरी पर राजमहल परियोजना अंतर्गत ईसीएल ललमटिया से प्रति वर्ष लाखों टन कोयला निकाला जाता है, जिसे बिहार (कहलगांव विद्युत परियोजना) और पश्चिम बंगाल (फरक्का विद्युत परियोजना) को भेजा जाता है. 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय में दक्षिण बिहार (अब झारखंड) के तीन स्थानों यानी तत्कालीन गोड्डा (अनुमंडल) धनबाद एवं रांची के आसपास मिलने वाली प्राकृतिक संपदा के राष्ट्रीयकरण को स्वीकृति प्रदान की गई थी. इन स्थलों पर भूगर्भशास्त्रियों द्वारा सर्वे कराने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया था कि राजमहल में दो सौ वर्षों तक कोयला खत्म नहीं हो सकता. इस निष्कर्ष ने क्षेत्र के विकास पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डाला, अलबत्ता निजी कंपनियों ने यहां अपना डेरा ज़रूर डाल दिया.

ललमटिया में पहली बार एशिया की सबसे बड़ी ओपन कास्ट माइंस कनाडा सरकार को पांच वर्ष की लीज पर दे दी गई. जिले के भादो टोला ग्राम के समीप कोयला खुदाई का काम जोर-शोर से किया जा रहा है. उक्त स्थल पर पिछले डेढ़-दो वर्षों से जबरदस्त आग की लपटें उठ रही हैं, लेकिन उसे बुझाने के कोई उपाय नहीं किए जा रहे हैं. इतने बड़े क्षेत्र में लगी आग को बुझाने के लिए यह दावा किया जा रहा है कि आग को मिट्टी डालकर बुझाने का प्रयास जारी है. पिछले माह कोल इंडिया के अध्यक्ष राजमहल परियोजना के औचक निरीक्षण पर थे. कोयले में लगी आग से संबंधित कई सवाल उनसे किए गए, लेकिन उन्होंने किसी का संतोषजनक जवाब नहीं दिया. खदानों में लगी आग सत्ता के गलियारे को भी तपा रही है. राजनीतिक दल इसे राष्ट्रीय संपत्ति के नुकसान के तौर पर तो अवश्य देख रहे हैं, परंतु इससे होने वाले फायदे को देखते हुए कोई भी इसके खिला़फ सड़कों पर आवाज बुलंद करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. खदान में लगी आग के कारण आसपास के ग्रामीणों का जीना दूभर होता जा रहा है. इससे निकलने वाले धुएं से वातावरण प्रदूषित हो रहा है और लोगों के स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ रहा है. ललमटिया कोल प्रबंधन जमीन के अंदर लगी आग पर काबू पाने के लिए कोयला मंत्रालय से लगातार संपर्क में है. आग की वजह से कोयला उत्पादन लगातार प्रभावित हो रहा है. यही हाल उप राजधानी दुमका का है, जहां माफियाओं द्वारा प्रतिदिन कोयला निकाल कर बाहर भेजा जा रहा है. दुमका में शिकारीपाड़ा प्रखंड अंतर्गत सरसाजोल एवं आसपास के गांवों में स्थित लुटिया पहाड़ और खड़ीजोल में एक दर्जन से ज़्यादा अवैध खदानें हैं. हाल में फेडरेशन ऑफ इंडियन चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) ने कोल इंडिया लिमिटेड के निजीकरण का मुद्दा उठाकर एक बार फिर इस बहस को जन्म दे दिया कि क्या सरकारी उद्यम काम के लायक नहीं रह गए हैं?

विश्व कोयला एसोसिएशन के अनुसार, भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक देश है. तीसरा सबसे बड़ा कोयला उपभोक्ता और चौथा सबसे बड़ा कोयला आयातक देश है. भारत विश्व के उन देशों में है, जो विद्युत उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भर हैं. देश में 69 प्रतिशत विद्युत उत्पादन कोयले पर आधारित है. भारत विश्व में कोयले के सबसे बड़े उत्पादक देशों में शुमार किया जाता है, फिर भी हमें विद्युत उत्पादन के लिए कोयला आयात करना पड़ता है. यदि हम इस संपदा का सही इस्तेमाल करें तो हमारी कई समस्याओं का हल संभव हो जाएगा. आवश्यकता है एक ठोस नीति को सख्ती से अमल में लाने की, अन्यथा काला हीरा के नाम से मशहूर इस राष्ट्रीय संपदा को धू-धू कर जलते देखना हमारी नियति बन जाएगी. (चरखा)