कौन बनेगा राष्ट्रपति

अमेरिका के जनक को लोगों पर विश्वास नहीं था. उन लोगों ने इसे इस बात से दर्शाया कि न तो अमेरिकी राष्ट्रपति और न सीनेटर मतदाताओं द्वारा चुना जा सकेगा. अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव एक इलेक्टोरल कॉलेज द्वारा किया जाता है और यह कॉलेज स्वयं लोगों द्वारा चुना जाता है. इसी तरह बीसवीं सदी की शुरुआत में सीनेटर चुना जाना शुरू किया गया. फ्रांसीसी राष्ट्रपति के चुनाव के दूसरे दौर के परिणाम की प्रतीक्षा की जा रही है. फ्रांस के पांचवें गणराज्य ने चौथे गणराज्य की जगह ली है, जिसमें एक कमज़ोर राष्ट्रपति और मजबूत प्रधानमंत्री की व्यवस्था थी. फ्रांस का चौथा गणराज्य तत्कालीन समस्याओं के समाधान में विफल रहा था, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न हुई थीं. पांचवें गणराज्य में राष्ट्रपति दो दौर के चुनाव के बाद निर्वाचित होते हैं और वहां का प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सभा में बहुमत के आधार पर चुना जाता है. इसका मतलब है कि वहां के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अलग-अलग दलों के हो सकते हैं. संविधान न तो शाश्वत है और न ऐसा है, जिसे सुधारा नहीं जा सकता है.

भारत में राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है. इस चुनाव में कुछ अलग देखने को मिल सकता है. सामान्यत: भारत के राष्ट्रपति का चुनाव परोक्ष होता है, लेकिन किसे राष्ट्रपति बनाया जा सकता है, इसके बारे में कोई ज़्यादा शंका नहीं होती है, क्योंकि जिस पार्टी की सरकार होती है, राष्ट्रपति भी उसी दल का होता है. इसका अपवाद 1969 में देखा गया, जब इंदिरा गांधी ने अपने दल के उम्मीदवार के बदले किसी दूसरे को समर्थन दिया था. उस समय इंदिरा गांधी ने अपने दल को विभाजित कर दिया था.

भारत में राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है. इस चुनाव में कुछ अलग देखने को मिल सकता है. सामान्यत: भारत के राष्ट्रपति का चुनाव परोक्ष होता है, लेकिन किसे राष्ट्रपति बनाया जा सकता है, इसके बारे में कोई ज़्यादा शंका नहीं होती है, क्योंकि जिस पार्टी की सरकार होती है, राष्ट्रपति भी उसी दल का होता है. इसका अपवाद 1969 में देखा गया, जब इंदिरा गांधी ने अपने दल के उम्मीदवार के बदले किसी दूसरे को समर्थन दिया था. उस समय इंदिरा गांधी ने अपने दल को विभाजित कर दिया था. देखा जाए तो भारतीय राजनीति पिछले 65 सालों में इतनी कमज़ोर कभी नहीं रही, जितनी अभी दिखाई पड़ रही है. इसका कारण है कि भारतीय राष्ट्रपति के लिए किसी भी उम्मीदवार पर अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया है. किसी दल या गठबंधन को विश्वास नहीं है कि वह जिसे अपना उम्मीदवार बनाएगा, उसे बहुमत मिल ही जाएगा. यूपीए और एनडीए दोनों को ही अपनी कमज़ोरी मालूम है. दूसरी तरफ छोटे दल जैसे सपा, बसपा, टीएमसी एवं एआईडीएमके अपना अलग राग अलाप रहे हैं. वे किसी भी गठबंधन की ओर जा सकते हैं. ऐसे में किसी एक उम्मीदवार पर सहमति जताने की चाहत रहना ही सबसे बड़ी भूल है. इस समय की राजनीतिक स्थिति ऐसी नहीं है कि किसी एक उम्मीदवार पर सहमति जताई जा सके. अगर राष्ट्रपति के चुनाव में एक से अधिक उम्मीदवार होंगे तो दोनों बड़ी पार्टियों को अपनी पोल खुलने का डर है. इस परेशानी को दूर करने का सबसे अच्छा रास्ता तो यही है कि राष्ट्रपति के चुनाव में कई उम्मीदवार हों और सभी को स्वतंत्र रूप से मतदान करने को कहा जाए. ऐसे में किसी दल को इस बात की परेशानी नहीं होगी कि उसका उम्मीदवार जीता या फिर हार गया. इस व्यवस्था में सबसे अच्छा यही होगा. इस देश के लिए यह सबसे अच्छा विकल्प है. ऐसे भी राष्ट्रपति के चुनाव में सामान्य जनता मूकदर्शक बनी रहती है.

लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण भारत पर गर्व किया जाता है. इस लोकतांत्रिक व्यवस्था से ही यहां सरकार चलाई जाती है, लेकिन लोगों को मालूम है कि इसका परिणाम क्या निकलता है. सरकार अपना काम ठीक ढंग से करने में असफल रही है. लोग मतदान की व्यवस्था को पसंद करते हैं, लेकिन उन्हें यह भी पता है कि उनके मतदान का परिणाम निराशाजनक ही होगा. लोगों के लिए बेहतर यही है कि राजनीतिक नेतृत्व पर भरोसा करने के बजाय स्वयं पर भरोसा करें. अगर राजनीतिक नेतृत्व राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया के लिए नया रास्ता नहीं खोलता है तो लोगों को आगे बढ़ना होगा. सिविल सोसाइटी को लोगों का नेतृत्व करना चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि लोग किस तरह का राष्ट्रपति चाहते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद राष्ट्रपति को ही यह तय करना पड़ेगा कि किस गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए. ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वह किसी का पक्ष न लें. अगर राष्ट्रपति किसी दल या गठबंधन से संबंधित नहीं होंगे तो वह पक्षपात रहित फैसला ले सकेंगे.

यूरोप का हाल-फिलहाल का अनुभव भी यही बताता है कि जिस देश में संसदीय व्यवस्था है, वहां फैसला लेने में उस सरकार से ज़्यादा समय लगता है, जहां कोई एक व्यक्ति बहुमत का नेतृत्व करता है यानी जहां जनता राष्ट्र प्रमुख का चुनाव करती है. बेल्जियम को फैसला लेने में एक साल से अधिक का समय लग गया. ऐसी स्थिति में इस बात की ज़रूरत महसूस की जा रही है कि सिविल सोसाइटी एकजुट होकर इस बात के लिए आवाज़ उठाए कि राष्ट्रपति का चुनाव जनता द्वारा किया जाएगा. यह एक राष्ट्रीय मुद्दा है और इसके लिए मतदान राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए, जिसमें राज्य और उसकी एसेंबली की भूमिका हो. लोगों को यह तय करने का अधिकार हो कि उनका राष्ट्रपति कौन होगा. हो सकता है, इसके लिए तीन या चार नाम सामने आएं, लेकिन इससे इतना तो पता चल ही जाएगा कि जनता क्या चाहती है. इसके साथ-साथ नेताओं को भी इस बात की जानकारी हो जाएगी कि जनता क्या चाहती है.

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One thought on “कौन बनेगा राष्ट्रपति

  • May 23, 2012 at 7:00 PM
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    sirf yahi jaroori nahi ki president ke liye do char candidates ho,jarurat is baat ki hai ki election ke tarike me badlao kiya jaye aur chunao ke liye president kaisa ho,iski minimum elligibility nirdharit ki jaye.president ke powers increase kiye jayen aur cbi,judiciary ke appointments,lokpal aur defence president ke adhikar kshetra me hona chahiye bhale hi iske liye samvidhan me sansodhan karna pade.

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