मदरसों के बच्चे आधुनिक शिक्षा से वंचित हैं

मुसलमान चाहते हैं कि उनके बच्चे आधुनिक शिक्षा ग्रहण करें, ताकि आज के प्रतिस्पर्द्धा के दौर में वे किसी से पीछे न रहें. सरकार भी चाहती है कि कुछ ऐसा हो, लेकिन समुदाय के बुद्धिजीवियों एवं उलेमाओं को यह म़ंजूर नहीं है. शायद इसीलिए वे मदरसा बोर्ड के गठन के प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं. यूं तो राजनीतिक एवं दीगर मंचों पर वे आधुनिक शिक्षा की वकालत करते हैं, क़ौम की तऱक्क़ी के लिए बड़ी-बड़ी तक़रीरें करते हैं, लेकिन जब बात देश के लगभग साढ़े सात लाख मदरसों को आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा से जोड़ने के लिए बोर्ड के गठन की आती है तो सबको सांप सूंघ जाता है. ऐसा नहीं है कि मुस्लिम बच्चे व्यवसायिक एवं तकनीकी शिक्षा से वंचित हैं, लेकिन वे समुदाय के विशिष्ट यानी संपन्न वर्ग के हैं. मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे आज भी उसी पुरानी पद्धति के तहत शिक्षा हासिल कर रहे हैं, जो सरकारी, अर्द्ध सरकारी एवं निजी क्षेत्र की नौकरियां हासिल करने में उनकी कोई मदद कर पाने में असमर्थ है.

सच्चर समिति की रिपोर्ट के अनुसार, मुसलमानों के 4 प्रतिशत बच्चे देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित मदरसों में पढ़ते हैं.केंद्र सरकार चाहती है कि इन लगभग 7.5 लाख मदरसों को आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा से जोड़ने के लिए एक बोर्ड का गठन किया जाए और इन मदरसों की डिग्रियों को सरकारी मान्यता मिले, ताकि शिक्षा पूरी करने के बाद इन मदरसों के बच्चों को सरकारी, अर्द्ध सरकारी या निजी क्षेत्र की नौकरियां पाने के लिए दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें. अगर सरकार के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाए तो मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की क़िस्मत संवर सकती है. मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे भी बुद्धिमान एवं क्षमतावान होते हैं, लेकिन आधुनिक शिक्षा एवं तकनीक से वंचित होने के कारण उन्हें रोज़गार तलाशने में नाकों चने चबाने पड़ते हैं. नौकरी न मिलने से वे कुंठाग्रस्त हो जाते हैं. मदरसा बोर्ड के गठन से उनकी इस समस्या का समाधान निकल सकता है, लेकिन उलेमाओं एवं बुद्धिजीवियों को न जाने कौन सा डर सता रहा है कि वे सरकार द्वारा केंद्रीयकरण के इस प्रस्ताव का लगातार सख्त विरोध कर रहे हैं. जमीअत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी कहते हैं कि उनकी जमीअत खास तौर पर धार्मिक शिक्षा के लिए काम करती है. वह देश के हज़ारों मदरसों की देखभाल करते हैं. उनका कहना है कि जहां तक आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा का सवाल है तो उसके लिए वह अलग से एक संस्थान खोल रहे हैं और भविष्य में भी ऐसे कई संस्थान खोलने का इरादा रखते हैं.

सच्चर समिति की रिपोर्ट के अनुसार, मुसलमानों के 4 प्रतिशत बच्चे देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित मदरसों में पढ़ते हैं.केंद्र सरकार चाहती है कि इन लगभग 7.5 लाख मदरसों को आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा से जोड़ने के लिए एक बोर्ड का गठन किया जाए और इन मदरसों की डिग्रियों को सरकारी मान्यता मिले, ताकि शिक्षा पूरी करने के बाद इन मदरसों के बच्चों को सरकारी, अर्द्ध सरकारी या निजी क्षेत्र की नौकरियां पाने के लिए दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें. अगर सरकार के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाए तो मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की क़िस्मत संवर सकती है.

महमूद मदनी का इशारा सा़फ है कि वह देश के मदरसों में धार्मिक शिक्षा हासिल करने वाले बच्चों के लिए आधुनिक शिक्षा ज़रूरी नहीं समझते. कहने का आशय यह कि आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा के लिए छात्रों की एक दूसरी खेप तैयार की जाएगी, जो नई तकनीक का लाभ उठाएगी और मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे मदरसों और मस्जिदों तक ही सीमित रहेंगे. और तो और, दारूल उलूम देवबंद जैसा प्रतिष्ठित संस्थान भी उसी रास्ते पर चल रहा है. वह भी मदरसों के बच्चों को आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा से अलग रखने के लिए सरकार के केंद्रीयकरण के प्रस्ताव का विरोध कर रहा है. पिछले दिनों दारूल उलूम का एक प्रतिनिधि मंडल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला, जिसमें दारूल उलूम के प्रबंधक एवं जमीअत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी समेत कई दूसरे उलेमा शामिल थे. प्रतिनिधि मंडल ने प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन देकर मांग की कि मदरसा बोर्ड के गठन का प्रस्ताव वापस लिया जाए. दरअसल, बुद्धिजीवियों एवं उलेमाओं को यह डर सता रहा है कि अगर मदरसों को केंद्रीयकृत कर दिया गया तो सरकार उनके प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप करेगी, लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं है. सरकार कई बार कह चुकी है कि अगर मदरसों के केंद्रीयकरण के प्रस्ताव पर सभी मुस्लिम बुद्धिजीवी एवं उलेमा सहमत हो जाते हैं तो वह मदरसों के बुनियादी ढांचे में किसी भी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी.

अब सवाल यह पैदा होता है कि उलेमाओं एवं समाज के बुद्धिजीवियों को सरकार की बात पर भरोसा क्यों नहीं है? अगर सरकार की बातें सचमुच भरोसे के लायक़ नहीं हैं तो दारूल उलूम के उन प्रतिनिधियों को प्रधानमंत्री के वादे पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए, जो उनसे मिलने गए थे और जिन्होंने प्रधानमंत्री से बातचीत के बाद मीडिया को यह बयान दिया कि प्रधानमंत्री ने उनकी मांग पर विचार करने का वादा किया है. अगर प्रधानमंत्री की बात पर भरोसा है तो सरकार की बात पर क्यों नहीं? सरकार भी तो कह चुकी है कि मदरसों का केंद्रीयकरण किया जाएगा, लेकिन उनके बुनियादी ढांचे में कोई द़खलंदाज़ी नहीं की जाएगी. तो फिर मदरसा बोर्ड के गठन की राह में रोड़े क्यों अटकाए जा रहे हैं. सच तो यह है कि मदरसों को आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा से जोड़ देने से वहां पढ़ने वाले बच्चे अच्छी समझ-बूझ हासिल कर सकेंगे, राजनीति एवं धर्म में संतुलन बनाए रखते हुए देश और क़ौम की सेवा करने की क्षमता हासिल कर सकेंगे और यही बात उन लोगों के गले नहीं उतर रही है, जो मुसलमानों को अपने इशारों पर नचाने के आदी हो चुके हैं. समझ में नहीं आता कि लोग इतनी जल्दी कैसे भूल गए कि दारूल उलूम की स्थापना का मक़सद क्या था? दरअसल, दारूल उलूम जैसे संस्थान की स्थापना ही इसीलिए हुई थी कि वह एक ऐसा वर्ग तैयार करे, जो देश और क़ौम की हर तरह से सेवा कर सके. दारूल उलूम की विचारधारा यह नहीं है कि धर्म को राजनीति से अलग रखा जाए. इसके कई प्रतिनिधियों ने राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं. इस क्रम में मौलाना क़ासिम नानौतवी, मौलाना महमूद हसन एवं मौलाना हुसैन अहमद मदनी जैसे बुज़ुर्गों के नाम लिए जा सकते हैं. उलेमाओं को इन बुज़ुर्गों का अनुसरण करना चाहिए.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा से वंचित रखा जाएगा तो वे राजनीति की जटिलताओं को कैसे समझेंगे, समुदाय की समस्याओं का समाधान कैसे खोजेंगे?ज़माना बदल गया है, यह विज्ञान का दौर है और ऐसे में वे अंग्ऱेजी, गणित एवं कंप्यूटर के ज्ञान से वंचित रहेंगे तो उनके लिए तऱक्क़ी का हर रास्ता बंद रहेगा. आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है. मौलाना वली रहमान एवं मौलाना सलीम कासमी जैसे वरिष्ठ उलेमा भी आधुनिक शिक्षा की वकालत करते हैं और इसके लिए नए संस्थान खोलने की बात करते हैं. वे कहते हैं कि सरकार ने अल्पसंख्यक संस्थाओं को शिक्षा का अधिकार अधिनियम यानी राइट टू एजूकेशन एक्ट से मुक्त रखा है, इसका फायदा उठाया जाना चाहिए. देश के सभी मदरसों को आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए. वे कहते हैं कि अगर सरकार ने बोर्ड का गठन करके मदरसों को आधुनिक बनाने का मन बनाया है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. आधुनिकीकरण होने से वहां पढ़ने वाले बच्चे नए ज़माने के उतार-चढ़ाव को समझ सकेंगे. जो लोग सरकार के प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं, जिन्हें सरकार का हस्तक्षेप पसंद नहीं है, वे कोई और विकल्प पेश करें, जिससे मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की समस्याओं का समाधान हो सके.

देश के हर ज़िले में मदरसे हैं. जिस क़ौम के पास शिक्षा देने के लिए इतना बड़ा चैनल हो, बावजूद इसके उस क़ौम के लोग शैक्षिक पिछड़ेपन का शिकार हों, यह बड़े अ़फसोस की बात है. सच्चर समिति ने मुसलमानों का शैक्षिक स्तर दु:खद हद तक पिछड़ा बताया है. देश के उलेमा इस पिछड़ेपन को दूर करने के लिए मदरसों की ओर ध्यान क्यों नहीं दे रहे हैं? इन मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की उम्र का एक बड़ा हिस्सा मंतीक (तर्कशास्त्र), फलस़फा, अरबी और फारसी सीखने में गुज़र जाता है. ये बच्चे बहुत बुद्धिमान होते हैं और इन विषयों में महारथ हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब वे पेशेवर ज़िंदगी में क़दम रखते हैं तो उनके सामने स़िर्फ और स़िर्फ अंधेरा होता है. आम तौर पर कहा जाता है कि धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा को जोड़ देने से बच्चों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, लेकिन अगर उलेमा एवं बुद्धिजीवी चाहें तो वे मदरसों के पाठ्यक्रम में संशोधन करके बच्चों को अतिरिक्त बोझ से बचा सकते हैं. अरबी भाषा की शिक्षा तो समझ में आने वाली बात है, क्योंकि क़ुरआन और हदीस इसी भाषा में हैं और इसे सीखने से धर्म को समझने में आसानी होती है, लेकिन फारसी, मंतीक और फलस़फे पर कराई जाने वाली मेहनत समझ से बाहर है. हां, किसी ज़माने में देश में फारसी सरकारी भाषा थी और पेशेवर ज़िंदगी में उसकी ज़रूरत थी, पर आज इस भाषा का महत्व समाप्त हो चुका है. अगर इन सबकी जगह पाठ्यक्रम में अंग्ऱेजी, गणित या अन्य विषय शामिल कर लिए जाएं तो किसी को क्या परेशानी है? उलेमा फारसी और अन्य पारंपरिक विषयों को तो इसमें आसानी से स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन नई ज़रूरतों को पाठ्यक्रम में शामिल करने से कतरा रहे हैं. हालांकि कुछ मदरसों में अंग्रेजी को पाठ्यक्रम में शामिल करके खुद को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की कोशिश की गई है, लेकिन क्या एक या दो विषय मदरसे के बच्चों को इस योग्य बना सकते हैं कि वे मौजूदा प्रतियोगिता के दौर में बाक़ी बच्चों के साथ क़दम से क़दम मिला सकें? अक्सर कहा जाता है कि मदरसों के पास इतने संसाधन नहीं होते कि वहां अंग्ऱेजी, वाणिज्य, गणित, विज्ञान, भूगोल एवं राजनीति शास्त्र आदि के शिक्षकों की नियुक्ति की जा सके, कंप्यूटर आदि खरीदे जा सकें. संसाधनों की कमी की बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन जब सरकार खुद इस समस्या को दूर करने की मंशा रखती है और बोर्ड का गठन करके केंद्रीयकरण का प्रस्ताव कर रही है तो उलेमाओं एवं बुद्धिजीवियों को आखिर क्या परेशानी है?

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