सरकार आदिवासियों की सुध कब लेगी

छत्तीसगढ़ को क़ुदरत ने अपार संपदा से नवाज़ा है, जिसका उपयोग यदि सही ढंग से किया जाए तो यह क्षेत्र के विकास में का़फी सहायक सिद्ध हो सकता है. इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नाममात्र विकास हो पा रहा है. मौजूदा हालात में सरकारी कर्मचारी खौ़फ के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य नहीं करना चाहते हैं, जिससे समूचा क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ता जा रहा है. सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए योजनाएं तो बनाती है, परंतु उन्हें कार्यान्वित करने वाले कर्मचारी उनसे स्वयं को दूर रखते हैं. ऐसे में विकास का कार्य कैसे पूरा हो सकता है. इसके लिए ज़रूरत है सरकार द्वारा प्रस्तावित योजना और कार्य प्रणाली में सुधार करने की. ऐसे लोगों को जोड़ने की ज़रूरत है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर काम कर सकें. इस कार्य के लिए ग़ैर सरकारी संगठन अधिक कारगर साबित हो सकते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जहां सरकारी कर्मचारी ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने से कतराते हैं, वहीं दूसरी ओर ग़ैर सरकारी संगठनों को केवल इसलिए वहां कार्य करने की इजाज़त नहीं मिलती, क्योंकि वे सरकार की कार्य प्रणाली की आलोचना करते हैं. कुछ ताक़तें ऐसी हैं, जो ग्रामीणों को सशस्त्र बलों के रहमोकरम पर छोड़ देना चाहती हैं. लगता है कि छत्तीसगढ़ समेत विभिन्न आदिवासी क्षेत्रों में एक ऐसा समूह सक्रिय है, जो इस तनाव को खत्म नहीं होने देना चाहता, क्योंकि इसके पीछे उसके अपने फायदे छिपे हुए हैं.

आज छत्तीसगढ़ में पुलिस शिविर बनाने के नाम पर अधिक से अधिक ज़मीनों पर कब्जा किया जा रहा है. जबकि फॉरेस्ट राइट एक्ट के तहत स्थानीय लोगों को ज़मीनें नहीं दी जा रही हैं. 1978-79 में जब मैंने इस क्षेत्र में काम करना शुरू किया था तो वह एक अलग छत्तीसगढ़ की छवि थी.

ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में ग़ैर सरकारी संगठन सक्रिय नहीं हैं. सच तो यह है कि उनके प्रति सरकार की नीयत सा़फ नहीं है. शंकर गुहा नियोगी एक बड़े यूनियन नेता थे, जिन्होंने ट्रेड यूनियन को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं. मज़दूरों को एक सूत्र में बांधने के साथ-साथ उन्होंने उनके उत्थान के लिए कई कार्य किए. भिलाई क्षेत्र की कोयला खदानों में कार्यरत मज़दूरों को चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने अस्पताल का निर्माण कराया, शराब़खोरी के खिला़फ जागरूकता अभियान चलाया. मुझे 1995 की उन दो बड़ी रैलियों में से एक आज भी याद है, जिन्हें ग़ैर सरकारी संगठनों, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा एवं एकता परिषद ने रायपुर में आयोजित किया था. नियोगी जी ट्रेड यूनियन एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को आपस में जोड़ने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन उसी बीच उनकी हत्या कर दी गई. नियोगी जी को मज़दूरों से बहुत प्यार था और उनके अधिकारों के लिए उन्होंने अपना जीवन न्यौछावर कर दिया. आज हम छत्तीसगढ़ में जो कुछ देख रहे हैं, वह उनके सपनों और विचारधारा के विपरीत है. ट्रेड यूनियन से बचने के लिए मज़दूरों को देश के अलग-अलग हिस्सों से लाया जाता है. यही कारण है कि जब उन्हें न्यूनतम से भी कम मज़दूरी दी जाती है तो कोई उसके खिला़फ आवाज़ बुलंद नहीं करता. कई बार तो काम के दौरान हादसे का शिकार हुए मज़दूर की लाश को महज़ पांच हज़ार रुपये के साथ उसके घर यानी उड़ीसा या बिहार भेज दिया जाता है, जो कि मानवाधिकारों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है. यह इस बात का एहसास दिलाता है कि अब शंकर गुहा नियोगी की विचारधारा पर चलने वाले लोगों की संख्या का़फी कम है, जो मज़दूरों के हक़ के लिए जीते और मरते हैं. आज छत्तीसगढ़ में पुलिस शिविर बनाने के नाम पर अधिक से अधिक ज़मीनों पर क़ब्ज़ा किया जा रहा है. जबकि फॉरेस्ट राइट एक्ट के तहत स्थानीय लोगों को ज़मीनें नहीं दी जा रही हैं. 1978-79 में जब मैंने इस क्षेत्र में काम करना शुरू किया था तो वह एक अलग छत्तीसगढ़ की छवि थी. उन दिनों समस्याएं भी छोटी-छोटी होती थीं, जैसे वृद्धावस्था पेंशन, जन वितरण प्रणाली में खामियां, पंचायत भवन का निर्माण एवं शराब़खोरी आदि. एकता परिषद का गठन भी उसी समय किया गया था, जब ग्रामीणों ने महसूस किया कि इन समस्याओं से निजात पाने के लिए एक साझा मंच की आवश्यकता है. एकता परिषद की यात्रा के दौरान छत्तीसगढ़ से गुज़रते समय मुझे माडा गांव की असलियत से रूबरू होने का अवसर मिला. इस गांव में क़रीब 32 परिवार रहते हैं, जिनकी रोज़ी-रोटी का एकमात्र साधन जंगल की ज़मीन है, परंतु यह गांव वन विभाग के अंतर्गत आता है, इसलिए ज़मीन पर आदिवासियों का दावा खारिज कर दिया गया. वर्तमान में आदिवासी वन विभाग के लिए बतौर मज़दूर कार्य कर रहे हैं. अ़फसोस की बात यह है कि जिस ज़मीन से उनके घर का चूल्हा वर्षों से जलता आ रहा था, उसके वे कभी मालिक नहीं बन सकते. स़िर्फ इसलिए, क्योंकि क़ानूनी रूप से उनके पास ज़मीन से संबंधित कोई प्रमाण नहीं है. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद अब भी कई गांवों को जंगल दर्शाया जाता है. उम्मीद है कि सरकार आदिवासियों की इस समस्या को ज़रूर हल करेगी. इस कार्य में यहां सक्रिय ग़ैर सरकारी संगठन सरकार का सहयोग कर सकते हैं, बशर्ते सरकार की मंशा सा़फ हो. (चरखा)

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