आबादी पर काबू पाने में सरकार नाकाम

विश्व जनसंख्या दिवस 11 जुलाई पर विशेष

वर्ष 2000 में बनी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का मुख्य उद्देश्य 2045 तक स्टेबल पॉपुलेशन की स्थिति हासिल कर करना था, जिससे आर्थिक और सामाजिक विकास हो और सबके लिए समान रूप से स्वच्छ वातावरण उपलब्ध हो सके. लेकिन जो स्थिति है, उससे हम 2060 तक भी पॉपुलेशन स्टेबलाइजेशन की स्थिति तक नहीं पहुंच पाएंगे. हालांकि 2045 तक पॉपुलेशन स्टेबिलाइजेशन की स्थिति तक पहुंचने के लिए कई तरह की सरकारी योजनाएं बनाई गईं और कार्यक्रम चलाए गए, जिसके अनुसार देश की जनसंख्या 2010 में 1107.0 मिलियन होनी चाहिए थी, जबकि 2008 में ही हमारे देश की जनसंख्या इससे भी ज़्यादा 1149.3 मिलियन थी.

देश  की वर्तमान जनसंख्या 1.22 बिलियन है. विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या 1.35 बिलियन चीन की है, और भारत दूसरे नंबर पर है. आंक़डों के अनुसार, हमारे देश की जनसंख्या विश्व की कुल आबादी का 17.31 प्रतिशत है यानी विश्व में हर छठा आदमी भारतीय है. जिस तेज़ी से भारत की जनसंख्या ब़ढ रही है, उम्मीद है कि 2030 तक भारत जनसंख्या के मामले में विश्व में पहले नंबर पर आ ख़डा होगा. देश की वार्षिक वृद्धि दर 1.58 प्रतिशत के साथ 2030 तक भारत की अनुमानित जनसंख्या 1.53 बिलियन होगी. हर साल भारत में विश्व के दूसरे देशों की तुलना में सबसे ज़्यादा जनसंख्या वृद्धि होती है. दरअसल, हमारे देश के कुछ राज्यों की जनसंख्या कुछ देशों की जनसंख्या के बराबर है. महाराष्ट्र की जनसंख्या मैक्सिको के बराबर यानी 104 मिलियन है. वियतनाम की आबादी पश्चिम बंगाल के बराबर 85 मिलियन, झारखंड की आबादी युगांडा जितनी 29 मिलियन और ओडिशा की आबादी अर्जेंटीना के बराबर 39 मिलियन है. फिलहाल 50 प्रतिशत से ज़्यादा जनसंख्या 25 साल से कम उम्र के आयु वर्ग में आती है, जबकि 65 प्रतिशत 35 साल के कम उम्र के आयु वर्ग में है. अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2025 में 64 प्रतिशत युवा होंगे, 11 प्रतिशत 60 वर्ष की आयु से ज़्यादा और 14 वर्ष तक की आयु वाले बच्चे 25 प्रतिशत होंगे. देश की 58 प्रतिशत जनसंख्या जननीय आयु वर्ग में हैं. इनमें से 53 प्रतिशत गर्भ निरोधक का इस्तेमाल करते हैं, जबकि ब़डी मात्रा में इसका इस्तेमाल करने की ज़रूरत अब भी है. 2025 तक विश्व में 50 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धि के ज़िम्मेदार केवल देश के पूर्वी राज्य होंगे, जबकि केवल 13 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धि पश्चिमी देशों के हिस्से में आएगी.
वर्ष 2000 में बनी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का मुख्य उद्देश्य 2045 तक स्टेबल पॉपुलेशन की स्थिति हासिल कर करना था, जिससे आर्थिक और सामाजिक विकास हो और सबके लिए समान रूप से स्वच्छ वातावरण उपलब्ध हो सके. लेकिन जो स्थिति है, उससे हम 2060 तक भी पॉपुलेशन स्टेबलाइजेशन की स्थिति तक नहीं पहुंच पाएंगे.

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के कुछ लक्ष्य जो 2010 में पूरे होने थे, जिससे 2045 तक जनसंख्या स्थिरीकरण में
लाभ होता-

  • शिशु मृत्यु दर प्रति हज़ार जन्म लेने वाले बच्चों में 30 बच्चों की मृत्यु हो.
  • बच्चे को जन्म देने वाली माता की मत्यु दर प्रति एक लाख में 100 से कम हो.
  • पूरे देश में होने वाले 80 प्रतिशत प्रसव अस्पतालों और केयर सेंटर्स में हों और 100 प्रतिशत प्रशिक्षित दाइयों द्वारा हों.
  • शादी, गर्भधारण, जन्म लेने वाला बच्चा और बच्चे की मृत्यु का 100 प्रतिशत रजिस्ट्रेशन हो.
  • सही उम्र में विवाह को ब़ढावा देना, जिसमें महिला के विवाह की उम्र कम से कम 18 वर्ष हो और बेहतर हो यदि 20 वर्ष हो.

अगर देश में शिशु मृत्यु दर का लक्ष्य पूरा होता तो 2010 में देश की जनसंख्या 1107.0 मिलियन होती है, जबकि वर्ष 2008 में ही हमारे देश की जनसंख्या इससे भी ज़्यादा 1149.3 मिलियन थी.
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के तहत टोटल फर्टीलिटी रेट यानी एक महिला द्वारा पैदा किए गए बच्चों की संख्या 2 हो, लेकिन आंकड़ों को देखें तो देश की प्रगति के साथ यहां के लोगों का स्वास्थ्य के प्रति नज़रिया कुछ नकारात्मक ही रहा है. अब भी देश के राज्यों के फर्टीलिटी रेट को देखकर कह सकते हैं कि निर्धारित किए गए लक्ष्य से हम अभी बहुत पीछे हैं. इस आंकड़े को छूने के लिए तमिलनाडु को छोड़कर बाक़ी राज्यों को लंबा स़फर तय करना पड़ेगा. उत्तर प्रदेश को अभी 18 वर्ष और लगेंगे. मध्य प्रदेश को 16 वर्ष, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड को 13 वर्ष, बिहार एवं राजस्थान को 12 वर्ष, असम और झारखंड को नौ से दस वर्ष लगेंगे. 2007-08 की रिपोर्ट के मुताबिक़, देश के ग्रामीण इलाक़ों में 40-45 आयु वर्ग की महिलाएं सबसे ज़्यादा 6 और सबसे कम दो बच्चों को जन्म देती हैं. इस मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे प्रति महिला 6 बच्चे है, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान में प्रति महिला पांच बच्चे और सबसे कम केरल में प्रति महिला दो बच्चे है.
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के लक्ष्य में यह भी शामिल था कि सही उम्र में विवाह को ब़ढावा दिया जाए, जिसमें महिला के विवाह की उम्र कम से कम 18 वर्ष हो और बेहतर हो यदि 20 वर्ष हो. वर्ष 2007-08 की रिपोर्ट के मुताबिक़, 18 वर्ष से कम उम्र की विवाहित महिलाएं बिहार में सबसे ज़्यादा 70 प्रतिशत, राजस्थान में 62, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में 59, झारखंड और पश्चिम बंगाल में 58 और सबसे कम हिमाचल प्रदेश में नौ प्रतिशत हैं. इसके साथ यह जान लेना भी ज़रूरी है कि एक महिला द्वारा पैदा किए गए बच्चों की संख्या का उसके और बच्चे के जीवन पर कैसा असर प़डता है. राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के तहत यह लक्ष्य रखा गया था कि बच्चे को जन्म देने वाली महिला की मत्यु दर प्रति एक लाख में 100 या इससे कम हो. आमतौर पर विकसित देशों में बच्चे को जन्म देने के समय प्रति 2800 में से एक महिला की मौत होती है, जबकि हमारे देश में प्रति 100 डिलीवरी में एक महिला की मृत्यु होने की आशंका रहती है और बाक़ी जो 99 प्रतिशत महिलाएं बच जाती हैं, वे या तो किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाती हैं या किसी प्रकार के शारीरिक विकार की चपेट में आ जाती हैं.

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के 2010 में पूरे होने वाले लक्ष्यों के तहत यह निधार्रित किया गया था कि पूरे देश में होने वाले 80 प्रतिशत प्रसव अस्पतालों और केयर सेंटर्स में हों और 100 प्रतिशत प्रशिक्षित दाइयों द्वारा हों. लेकिन 2006 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, 15-45 वर्ष की उम्र में मां बनने के दौरान उत्तर प्रदेश में 517, असम में 490, राजस्थान में 445, मध्य प्रदेश में 379, बिहार में 371, ओडिशा में 358, कर्नाटक में 228, आंध्र प्रदेश में 195, पश्चिम बंगाल में 194, पंजाब में 178, गुजरात में 172, हरियाणा में 162, महाराष्ट्र में 149, तमिलनाडु में 134 और केरल में सबसे कम 110 महिलाओं की मृत्यु होती है, जबकि विकसित देशों में यह संख्या औसतन 20 से अधिक नहीं होती है.

महिलाओं के साथ बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति भी गंभीर नज़र आती है. अपनी उम्र के हिसाब से प्रति 100 बच्चों में बिहार में 56 बच्चे कमज़ोर और कम वज़न के हैं, झारखंड में 57, मध्य प्रदेश में 60 और पूरे देश में 43 प्रतिशत बच्चे कम वज़न के हैं. वर्ष 2006 में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर प्रति हज़ार 57 बच्चे है. राज्यों के अनुसार देखें तो मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में सबसे ज़्यादा प्रति हज़ार 79 कमज़ोर और कम वज़न के हैं और केरल के ग्रामीण इलाक़ों में सबसे कम 16 है. बिहार, आंध्र प्रदेश, गुजरात में प्रति हज़ार 62, ओडिशा में 76, उत्तर प्रदेश में 75, राजस्थान में 74 और असम में 70 बच्चे कमज़ोर और कम वज़न के हैं. राज्यों के शहरी इलाक़ों में सबसे अधिक ओडिशा और उत्तर प्रदेश में प्रति हज़ार 53 बच्चे कम वज़न के हैं, जबकि सबसे कम केरल में 12 कमज़ोर और कम वज़न के हैं. पांच वर्ष से कम उम्र में बच्चों की मृत्यु दर के आंक़डे भी दुखी करते हैं. बच्चों की मृत्यु दर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में सबसे ज़्यादा 25 प्रतिशत, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में 20 और केरल में सबसे कम तीन प्रतिशत है. प्रति वर्ष 24 मिलियन बच्चे पैदा होते हैं. पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग 50 प्रतिशत बच्चे उम्र के हिसाब से कमज़ोर हैं, 40 प्रतिशत बच्चे कम वज़न वाले हैं. मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड में हर 5 में से 3 बच्चे कम वज़न के हैं. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 25 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु हो जाती है, जबकि राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के तहत वर्ष 2010 तक पूरे किए जाने वाले लक्ष्यों में एक यह था कि शिशु मृत्यु दर प्रति हज़ार जन्म लेने वाले बच्चों में 30 बच्चों की मृत्यु हो. कम उम्र में विवाह, कम उम्र में बच्चे पैदा करना, बच्चों के जन्म के बीच में कम अंतर, प्रजनन अधिकारों की कमी आदि बच्चे के जीवनकाल और मां के स्वास्थ्य पर ग़लत असर डालते हैं. राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के इन अनुमानित आंक़डों के आधार पर देश में कल्याण के लिए दूसरी राष्ट्रीय योजनाएं बनाई गईं तो उनके नुक़सान की भरपाई कैसे होगी. 2010 में होने वाली जनसंख्या 1107.0 मिलियन से ज़्यादा की जनसंख्या बहुत पीछे छूट चुकी है. ऐसे में देश को क्या दूसरी
योजनाओं की ज़रूरत नहीं है? अगर ज़रूरत है तो इन योजनाओं की घोषणा होने के बावजूद केवल काग़ज़ों तक ही सीमित क्यों रह जाती है? क्या ऐसे में ठोस क़दम उठाने से सरकार इनकार करेगी और अनुमानित आंक़डों से ब़ढी हुई जनसंख्या को इसकी मौलिक ज़रूरतों से वंचित रहने देगी?

रीतिका सोनाली

युवा वर्ग की नब्ज़ को पढ़ने में माहिर और उनकी आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दे पाने में कुशल रीतिका सोनाली हमेशा कुछ हट कर करने में जुटी रहती हैं।
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रीतिका सोनाली

युवा वर्ग की नब्ज़ को पढ़ने में माहिर और उनकी आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दे पाने में कुशल रीतिका सोनाली हमेशा कुछ हट कर करने में जुटी रहती हैं।