बिहार : भूमिहीन किसानों के साथ धोखाधड़ी

सुशासन में क्या किसानों एवं ग़रीबों को लूटा जाता है, सामान्य तौर पर तो ऐसा नहीं माना जाता है, पर कुछ तथ्य एवं दस्तावेज़ बताते हैं कि बिहार में यही हो रहा है. भूमिहीन किसानों को पावर टिलर काग़ज़ों पर दे दिया जाता है और बदले में उसे बैंक का नोटिस पहुंचा दिया जाता है. सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों की मिलीभगत के चलते दलाल मरे हुए लोगों के नाम पर जाली काग़ज़ात पेश कर और फर्ज़ी हस्ताक्षर कर फसल क्षतिपूर्ति की राशि निकाल रहे हैं. सबसे दु:खद पहलू यह है कि ऐसी घटनाएं रुकने की बजाय बढ़ती जा रही हैं. नतीजा यह कि सुशासन का चेहरा दाग़दार हो रहा है. सरकारी मिलीभगत से कैसे किसानों और ग़रीबों का हक़ लूट लिया जाता है, इसकी बानगी देखने को मिली नालंदा ज़िले के बेन प्रखंड में. वहां के किसानों को जब बैंक के नोटिस के माध्यम से जानकारी मिली कि उनके माथे साठ हज़ार रुपये का क़र्ज़ है और वह भी पावर टिलर लेने का, तो वे स्तब्ध रह गए. किसानों ने यहां-वहां गुहार भी लगाई, पर कहीं सुनवाई नहीं हुई. जिलाधिकारी के जनता दरबार में मामला जाने के बाद पुलिस जागी और उसने चार दलालों को रंगे हाथों गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इस पूरे मामले में दलाल, बैंक और सीओ की मिलीभगत सामने आई. जिसके पास एक धुर ज़मीन नहीं है, उसके नाम पर भी पावर टिलर का लोन निकल गया. अब तक इस तरह के पचास मामलों का खुलासा हो चुका है. कई मामलों की जांच जारी है और उनमें और भी बड़े घोटाले का पर्दा़फाश होने की संभावना है.

पुलिस ने इस मामले में बिहार शरी़फ के हर्ष पावर टिलर एजेंसी के कर्मचारी शशि कुमार, परनामा, सरमेरा, चंदन कुमार, लोहड़ी, नूरसराय, राजीव रंजन कुमार एवं श्रीकांत प्रसाद को चार पावर टिलरों के साथ दबोच लिया. इसमें बिहार शरी़फ के एसबीआई (एडीबी) और पीएनबी की रहुई एवं नालंदा शाखा के साथ-साथ मध्य बिहार ग्रामीण बैंक के कर्मचारियों की मिलीभगत भी खुलकर सामने आ रही है. डीएसपी फरेश राम ने कहा कि बेन के तत्कालीन सीओ एवं बैंककर्मियों की मिलीभगत से दलालों ने ग़लत एलपीसी बनाकर पावर टिलर के नाम पर फर्ज़ी निकासी कर ली. बताया जाता है कि बेन के सीओ कार्यालय में तैनात कर्मचारियों मनोज कुमार एवं शाहिद की भूमिका सबसे संदिग्ध है और मोटी रक़म लेकर दलालों को उन्होंने ही फर्ज़ी एलपीसी उपलब्ध कराई.

बेन के महेशपुरा गांव निवासिनी सुशीला देवी विधवा हैं और भूमिहीन भी, लेकिन दलालों ने उन्हें भी नहीं बख्शा. गांव के दलाल कैलु प्रसाद ने पहले उनसे सादे काग़ज़ पर अंगूठा लगवा लिया और फिर उनके नाम पर पावर टिलर की राशि निकाल ली. इसी तरह बलींद्र पासवान, उमेश पासवान, चंद्रकला देवी, दिनेश पासवान, धर्मेंद्र पासवान, हरिहर पासवान, पवित्र ठाकुर, डब्लू पासवान, सरयू पासवान, महेंद्र पासवान, इंद्रदेव पासवान और कैलाश ठाकुर के नाम पर राशि निकाल ली गई, जबकि उनके पास एक धुर ज़मीन नहीं है. जिलाधिकारी संजय अग्रवाल ने कहा कि मामले को गंभीरता से लेकर गहन जांच की जा रही है और किसानों को ठगने वालों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा. ज़िला कृषि पदाधिकारी सुदामा महतो ने बताया कि कृषि पदाधिकारी की स्वीकृति के बिना बैंक ने लोन दे दिया, यही सबसे बड़ी गड़बड़ी है और उसे अनुदान नहीं मिलना चाहिए. इस तरह की घटनाएं केवल नालंदा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे बिहार में कृषि यंत्रों पर अनुदान के नाम पर लूट का खेल जारी है, जिसका शिकार ग़रीब एवं भूमिहीन किसान हो रहे हैं.

फसल क्षतिपूर्ति का पैसा मृतकों को मिला

ज़िला मधेपुरा और इलाक़ा कुमार खंड. 2008 की बाढ़ में तबाह हुए इस इलाक़े के लोगों की बदक़िस्मती खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. पहले तो क़ुदरत ने यहां के ग़रीब किसानों को तबाह कर दिया और जो कसर बाक़ी रह गई, उसे सुशासन के अधिकारियों ने दलालों के साथ मिलीभगत करके पूरा कर दिया. फसल क्षतिपूर्ति के नाम पर पैसों की आपस में बंदरबांट कर ली गई और प्रभावित किसान ताकते रह गए. सरकारी जांच रिपोर्ट बताती है कि अंचल कार्यालय के कर्मचारियों, पदाधिकारियों एवं अनुश्रवण सह निगरानी समिति के सदस्यों की मिलीभगत से फसल क्षति के लाभार्थियों की ग़लत सूची बनाकर फर्ज़ी तरीक़े से सरकारी राशि निकाल कर उसकी बंदरबांट कर ली गई. अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी मधेपुरा विजय कुमार की जांच रिपोर्ट बताती है कि सूची में ऐसे लोगों के नाम भी शामिल कर लिए गए, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. उनके नाम से भी पैसा निकाल लिया गया. जहां लाभार्थी हस्ताक्षर करते हैं, वहां उनके नाम के सामने अंगूठे का निशान लगाकर राशि की निकासी कर ली गई. जांच रिपोर्ट कहती है कि एक-एक वास्तविक लाभार्थी के नाम से तीन-तीन चेक बनाए गए, जिनमें से दो चेकों का भुगतान फर्ज़ी लोगों द्वारा प्राप्त कर लिया गया. जो वास्तविक लाभार्थी सरकारी नौकरी में बाहर कार्यरत हैं, उनके नाम पर भी पैसा निकाल लिया गया, जबकि वे पैसा लेने आए ही नहीं.

धान खरीद में घोटाला

शेखपुरा ज़िले में सरकार समर्थित मूल्य पर धान खरीद में बड़े पैमाने पर घोटाले की बात सामने आई है. ज़िले में सहकारिता विभाग ने केवल 78 किसानों से 11,584 क्विंटल धान की खरीद कर ली. इतना ही नहीं, जिस किसान के पास 4 एकड़ खेत है, उससे 500 क्विंटल धान की खरीद कर ज़िले के किसानों के नाम विश्व रिकॉर्ड भी बना दिया गया यानी प्रति कट्ठा किसानों ने बीस मन धान की उपज दी. यह खुलासा शेखपुरा के खंडपर निवासिनी एवं बिहार राज्य किसान सभा की सदस्य राजकुमारी महतो द्वारा आरटीआई के माध्यम से मांगी गई सूचना के बाद हुआ. एक खुलासा यह भी हुआ कि ज़िले में मात्र 78 किसान हैं, जिनके घर एक करोड़ अट्ठारह लाख रुपये चले गए. इससे यह बात सामने आती है कि पदाधिकारी किस तरह किसानों को मिलने वाले पैसों की बंदरबांट कर लेते हैं. निश्चित तौर पर इन किसानों के घर यह धनराशि नहीं गई और पदाधिकारियों ने फाइलों पर धान की खरीद कर ली. भाजपा नेता अजय कुमार अक्षय इसे बिहार का सबसे बड़ा घोटाला मानते हैं. अक्षय की मानें तो यह महज़ बानगी है. यदि जांच की जाए तो पूरे सूबे में यह घोटाला सामने आएगा. ज़िले में इतना बड़ा घोटाला हो गया, पर निगरानी विभाग के सचिव एवं ज़िला प्रभारी पदाधिकारी अशोक कुमार चौहान को इसकी भनक तक नहीं है. वह केवल जांच कराने की बात कहते हैं. उन्होंने जांच की बात तो कही, पर अभी तक किसी तरह की कोई पहल नहीं की गई. धान खरीद को लेकर पहले भी घोटाले होने की खबरें आती रही हैं, पर कभी कोई कार्यवाई नहीं हुई. यदि गहनता से जांच की जाए तो इस तरह के कई मामले सामने आ सकते हैं कि अधिकारी एवं कर्मचारी मिलीभगत करके किस तरह किसानों एवं मज़दूरों को मिलने वाले पैसों से अपनी तिजोरियां भर लेते हैं.

– अरुण साथी

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