प्रणब मुखर्जी सफल राष्ट्रपति साबित होंगे

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हिंदुस्तान की राजनीति में इंदिरा जी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी का एक विशेष स्थान रहा. जब इंदिरा जी की हत्या हुई तो प्रणब मुखर्जी और राजीव गांधी दोनों दिल्ली से बाहर थे. न केवल बाहर थे, बल्कि दोनों साथ थे. वापस लौटते हुए जब बातचीत हुई कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा, क्योंकि इंदिरा जी की हत्या हो गई है और उनकी लाश दिल्ली में रखी हुई है तो प्रणब मुखर्जी ने लोगों से कहा कि मैं ही सबसे वरिष्ठ हूं और मुझे ही प्रधानमंत्री बनना चाहिए. यह बात उन्होंने एक बार कही और यह बात उसी समय राजीव गांधी के सामने पहुंचा दी गई. राजीव गांधी के साथ प्रणब मुखर्जी दिल्ली आए. दिल्ली में राजीव गांधी को देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ज्ञानी जैल सिंह ने दिला दी, क्योंकि अरुण नेहरू को यह लगा कि अगर अभी शपथ नहीं दिलाई गई तो कांग्रेस में कई दावेदार पैदा हो जाएंगे.

आशा करनी चाहिए कि अब जब देश पर कोई संकट आएगा तो प्रणब मुखर्जी गंभीर भूमिका अदा करेंगे. प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री के नाते कैसे थे, अगर हम कहें कि प्रणब मुखर्जी एक असफल वित्त मंत्री थे, पर वह सबसे सफल राष्ट्रपति होंगे तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा. प्रणब मुखर्जी को कई अच्छे सलाहकार मिले हैं, उन्होंने अपनी सलाहकार ओमिता पॉल को लेकर कई कटाक्ष भी सुने हैं. यह राजनीति ऐसी हरजाई चीज़ है, जहां किसी भी राजनेता के साथ जब किसी महिला का नाम आता है तो निम्न-मध्यमवर्गीय मानसिकता का प्रस्फुटन वहां हो जाता है.

राजीव गांधी ने जब अपना मंत्रिमंडल बनाया तो उन्होंने प्रणब मुखर्जी को नहीं लिया, क्योंकि वह यह बात नहीं भूल पाए कि प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री बनने की इच्छा ज़ाहिर कर दी थी. राजीव गांधी की हत्या के बाद चुनाव हुए और कांग्रेस ने सरकार बनाई. प्रणब मुखर्जी को उस समय भी लगा कि वह प्रधानमंत्री बन सकते हैं, लेकिन उनकी जगह नरसिम्हाराव को कांग्रेस के नेताओं, विशेषकर सीताराम केसरी ने प्रधानमंत्री बना दिया. जब तीसरा मौक़ा आया 2004 में, प्रधानमंत्री बनने का, तो सबके सामने सा़फ था कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनेंगी. सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए आगे करने और विपक्ष को तैयार करने में अगर किसी एक शख्स की भूमिका थी, तो वह वी पी सिंह थे. सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया और अपनी जगह वह चाहतीं तो सबसे वरिष्ठ, सबसे समझदार प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया. प्रणब मुखर्जी इस स्थिति को भूल नहीं पाए. मनमोहन सिंह को रिजर्व बैंक का गवर्नर प्रणब मुखर्जी ने नियुक्त किया था. प्रणब मुखर्जी समझ में, वरिष्ठता में मनमोहन सिंह से आगे हैं. प्रणब मुखर्जी की ज़िंदगी में चौथा मौक़ा आया, जब कांग्रेस को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुनना था. प्रणब मुखर्जी को हामिद अंसारी के साथ अपना नाम लिया जाना बहुत अखरा. उन्होंने अपने कुछ अत्यंत विश्वसनीय दोस्तों से कहा कि दो नाम लेने की क्या ज़रूरत थी, उसमें भी पहले हामिद अंसारी और बाद में उनका खुद का नाम.

प्रणब मुखर्जी के लिए यह एक ऐसा आघात था, जिसने उन्हें चोट खाए हुए नाग की तरह खड़ा कर दिया. उन्होंने सबसे सीधे संपर्क करना शुरू कर दिया. कांग्रेस पार्टी ने अपना उम्मीदवार घोषित किया भी नहीं था कि प्रणब मुखर्जी ने देश के नेताओं से वोट के लिए बातचीत शुरू कर दी. जब ममता बनर्जी सोनिया गांधी से मिलने गईं तो सोनिया गांधी ने यह सोचकर उनके सामने दो नाम रखे कि ममता बनर्जी हामिद अंसारी का नाम स्वीकार कर लेंगी, प्रणब मुखर्जी का नाम स्वीकार नहीं करेंगी और वह हामिद अंसारी का नाम घोषित कर देंगी, लेकिन ममता बनर्जी ने दोनों नाम बाहर आकर घोषित कर दिए और कहा कि वह किसी का समर्थन नहीं करेंगी. यहां पर कांग्रेस के सामने सांप-छछूंदर की स्थिति पैदा हो गई. कांग्रेस के अपने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, जिनका नाम सोनिया गांधी ने ममता बनर्जी के सामने रखा, अगर अब उनका कांग्रेस नाम नहीं लेती तो वह कांग्रेस में बग़ावत कर सकते थे.

13 जून को प्रणब मुखर्जी नाराज़गी में अपने घर पर बैठे थे और अहमद पटेल बातचीत करने के लिए उनके घर पहुंचे. यह सोनिया गांधी के प्रतिनिधि एवं उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल और देश में अपने को सबसे ज़्यादा समर्थ एवं बुद्धिमान मानने वाले नेता के बीच की बातचीत  थी. उस बातचीत में प्रणब मुखर्जी ने सा़फ कर दिया कि या तो मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाया जाए, जैसा ममता बनर्जी एवं मुलायम सिंह ने सुझाव दिया और उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाए या मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनें तो उन्हें राष्ट्रपति बनाया जाए.

प्रणब मुखर्जी यह कभी नहीं भूल पाए कि वित्त मंत्री रहते हुए जिन्हें उन्होंने आरबीआई का गवर्नर बनाया, उनके आने पर उन्हें खड़ा होना पड़ता है और उन्होंने इसलिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद की पसंद सामने रख दी कि दोनों में से जो भी मिलेगा, वह उसे स्वीकार करेंगे और अगर नहीं मिला तो शायद वह कांग्रेस में बग़ावत कर देंगे. अहमद पटेल यह बात सुनकर फिर सीधे सोनिया गांधी के पास पहुंचे और उन्हें प्रणब मुखर्जी की मन:स्थिति और रणनीति के बारे में बताया. अब सोनिया गांधी के सामने सिवाय प्रणब मुखर्जी का नाम घोषित करने के कोई चारा नहीं था. मनमोहन सिंह राष्ट्रपति नहीं बनना चाहते थे. उन्होंने एक नई परंपरा शुरू की है. वह जो कहना चाहते हैं, उसे प्रधानमंत्री कार्यालय के ज़रिए कहलवाते हैं. ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय उनसे ज़्यादा शक्तिशाली है. प्रधानमंत्री का बयान नहीं आता है, प्रधानमंत्री कार्यालय का बयान आता है और प्रधानमंत्री कार्यालय के बयान का मतलब है, पुलक चटर्जी का बयान. प्रधानमंत्री कार्यालय ने बयान दिया कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने रहेंगे. यह बयान अगर आना था तो कांग्रेस अध्यक्ष की ओर से आना था, लेकिन उन्होंने यह बयान नहीं दिया. जिस बैठक में प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया गया, उसके किसी भी टीवी फुटेज में सोनिया गांधी एवं प्रणब मुखर्जी एक-दूसरे की तऱफ देखकर न मुस्कराते नज़र आए, न एक-दूसरे को बधाई देते नज़र आए और न स्टिल फोटोग्राफ में. प्रणब की पहली प्रतिक्रिया में कांग्रेस अध्यक्ष को भी कोई धन्यवाद नहीं दिया गया. अगले दिन प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष को खुद को उम्मीदवार चुने जाने के लिए धन्यवाद दिया.

प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति बनना इस देश के लिए सौभाग्य की बात है, क्योंकि एक ऐसा नेता राष्ट्रपति भवन में जा रहा है, जिसे सारी राजनीतिक परंपराओं का ज्ञान है, जिसे राजनीति के सारे गूढ़ार्थ मालूम हैं और जो यह भी जानता है कि कौन सी चीज़ करने से देश में उसका कैसा परिणाम निकलेगा. प्रणब मुखर्जी रबर स्टांप राष्ट्रपति की तरह शायद व्यवहार न करें. यही डर उन लोगों को है, जो राष्ट्रपति भवन का इस्तेमाल अब तक अपनी मनमर्ज़ी से करते आए हैं, चाहे वे कांग्रेस के लोग रहे हों या फिर भाजपा के. प्रणब मुखर्जी ने राजनीति में शालीनता का परिचय दिया है. उन्होंने विपक्ष के सुझावों की, सलाह की उतनी ही इज्ज़त की, जितनी कांग्रेस के लोगों द्वारा दिए गए सुझावों की और यही चीज़ कांग्रेस के सत्ताधारी गुट को समझ में नहीं आ रही थी. हालांकि इसका एक दूसरा पहलू भी है. जब प्रणब मुखर्जी कांग्रेस से बाहर निकले तो उन्होंने अपनी पार्टी बनाई. एक संयोग की बात है कि उसकी उद्घाटन बैठक में मुख्य अतिथि मेनका गांधी थीं. यह खुलासा बाद में हुआ कि वह सोनिया गांधी के आशीर्वाद के साथ कांग्रेस से बाहर निकले थे और अपनी पार्टी बनाई थी. बाद में वह कांग्रेस में वापस चले आए, सोनिया गांधी के साथ पार्टी भी चलाई और सरकार में अपना योगदान दिया.

प्रणब मुखर्जी को यह दु:ख है कि वह प्रधानमंत्री नहीं बने, लेकिन अब राष्ट्रपति बनने के बाद प्रणब मुखर्जी का यह दु:ख दूर हो जाएगा. वह देश के सर्वोच्च पद पर होंगे, देश के प्रथम नागरिक होंगे और अब उन्हें मनमोहन सिंह के आने पर खड़ा नहीं होना पड़ेगा. बल्कि वह जब आएंगे, तब मनमोहन सिंह खड़े होंगे. उन्हें जो सही लगेगा, उसकी सलाह वह अधिकार पूर्वक दे सकेंगे. अभी तक उनकी सलाह आर्थिक मामलों में तो मानी ही जाती थी. वह अकेले ऐसे आदमी थे, जो कांग्रेस के संकट मोचक के रूप में जाने जाते थे, क्योंकि जब कभी कांग्रेस पर राजनीतिक संकट आया, उसके पास कोई ऐसा आदमी नहीं था, जो इस संकट को दूर कर सकता. स़िर्फ और स़िर्फ प्रणब मुखर्जी ने इस ज़िम्मेदारी को निभाया. आशा करनी चाहिए कि अब जब देश पर कोई संकट आएगा तो प्रणब मुखर्जी गंभीर भूमिका अदा करेंगे. प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री के नाते कैसे थे, अगर हम कहें कि प्रणब मुखर्जी एक असफल वित्त मंत्री थे, पर वह सबसे सफल राष्ट्रपति होंगे तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा. प्रणब मुखर्जी को कई अच्छे सलाहकार मिले हैं, उन्होंने अपनी सलाहकार ओमिता पॉल को लेकर कई कटाक्ष भी सुने हैं. यह राजनीति ऐसी हरजाई चीज़ है, जहां किसी भी राजनेता के साथ जब किसी महिला का नाम आता है तो निम्न-मध्यमवर्गीय मानसिकता का प्रस्फुटन वहां हो जाता है. लेकिन जिस तरह ओमिता पॉल ने कटाक्षों की परवाह किए बिना प्रणब मुखर्जी का साथ दिया, वह स्वागत योग्य है. वित्त मंत्रालय में रहते हुए प्रणब मुखर्जी के ज़्यादातर फैसले ओमिता पॉल की सलाह पर लिए गए या जो फैसले उन्होंने नहीं लिए, उनके पीछे सबसे बड़ा योगदान ओमिता पॉल का था. ओमिता पॉल के बारे में भी यही कहा जा सकता है कि वह असफल वित्त मंत्री की असफल सलाहकार थीं, लेकिन शायद वह सफल राष्ट्रपति की सफल सलाहकार बनेंगी, ऐसा विश्वास है.

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