फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया. प्रणब मुखर्जी, जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे, एक ऐसे जीओएम के भी अध्यक्ष बन गए, जिसका काम था बाक़ी सारे जीओएम से काम कराना, क्योंकि मंत्री जीओएम के लिए समय नहीं देते थे. मुझे नहीं पता कि ऐसे किसी भी जीओएम ने कोई अनुशंसा की हो, जिसके अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी रहे हों, क्योंकि उनके पास स्वयं जीओएम की बैठकों को किसी तार्किक अंत तक ले जाने का समय नहीं था. प्रणब मुखर्जी के अपने मंत्रालय में कितने हल्के ढंग से विचार होता था और जिसके ऊपर समय देना प्रणब मुखर्जी मुनासिब नहीं समझते थे, उसका एक उदाहरण मुद्रास्फीति है. प्रणब मुखर्जी का मानना था कि इन्फ्लेशन इज़ ए सिस्टमेटिक अप्रोच. इट्‌स ए बास्केट ऑफ गुड्‌स. उन्होंने कभी मुद्रास्फीति पर हमला नहीं किया, व्यवस्था पर हमला किया. वित्त मंत्रालय यह समझ नहीं पाया कि मुद्रा आपूर्ति ज़्यादा होने से मुद्रास्फीति बढ़ी है या फिर वस्तुओं की कमी की वजह से. हक़ीक़त यह थी कि औद्योगिक विकास कम हो रहा था. भारत के अपने औद्योगिक विकास की दर नीचे जा रही थी. आवश्यक वस्तुओं की कमी हो रही थी, जिसकी वजह से मुद्रास्फीति बढ़ी. सरकार अपनी महान बुद्धिमानी से महंगाई कैसे बढ़ाती है, इसका उदाहरण है आयरन ओर (लौह अयस्क) और स्टील. हमारा आयरन ओर ज़्यादा से ज़्यादा चीन जा रहा था. सरकार ने तय किया कि उसे चीन नहीं भेजना है तो उसके लिए उसने सीधा रास्ता न लेकर रेलवे के किराए में 300 प्रतिशत की वृद्धि कर दी. इससे आयरन ओर चीन जाने से तो रुक गया, लेकिन सरकार ने यह नहीं सोचा कि इसकी वजह से आयरन ओर हिंदुस्तान की फैक्ट्रियों में भी नहीं जाएगा. इसका असर टाटा, राउरकेला आदि जगहों में स्थित हिंदुस्तान की सारी स्टील फैक्ट्रियों पर पड़ा और इसकी वजह से आयरन ओर का काम करने वाले, खासकर खनन में लगे लोगों की कमर टूट गई. अब हिंदुस्तान में स्टील बनना कम हो गया, स्टील अब चीन से आ रहा है, जो महंगा है और हम वही महंगा स्टील खरीद रहे हैं. हमने एक उद्योग को मारा. कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि सरकार प्याज़ भी खा रही है और जूते भी. ठीक यही उदाहरण सीमेंट का है. 50 रुपये की बोरी 400 रुपये तक बिक गई. कारणों को वित्त मंत्रालय ने दूर नहीं किया.

अजीब चीज़ यह कि जो स्टैंडिग कमेटी लोकपाल को हैंडिल कर रही थी, उसके चेयरमैन अभिषेक मनु सिंघवी एक महिला को जज बनाने की सुपारी लेते हुए कमेटी से बाहर हो गए. उन्होंने इस्ती़फा दे दिया. इस उठापटक में प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक कौशल दिखाई देता है. आर्थिक मामलों में उनकी पहल बहुत छोटी और भ्रमित यानी कन्फ्यूज्ड दिखाई देती है.

वित्त मंत्रालय से जुड़ी हुई संस्थाएं, चाहे वह आरबीआई हो या दूसरी संस्थाएं, किसी के पास भी सही आंकड़ा नहीं है कि कुल काला धन कितना है. कोई 4 लाख करोड़ रुपये कह रहा है तो कोई 8 लाख करोड़ तो कोई 10 लाख करोड़ और आरबीआई इसे 30 लाख करोड़ बता रहा है. सरकारी एजेंसियों के अलग-अलग आंकड़े बताते हैं कि वित्त मंत्रालय काले धन के ऊपर गंभीर नहीं है. वित्त मंत्रालय का सबसे मज़ेदार विरोधाभास नक़ली नोटों को लेकर है. वैसे तो एक कमाल यह हुआ कि नक़ली नोट हिंदुस्तान के रिजर्व बैंक की ट्रेजरी में पाए गए. उसकी सीबीआई जांच हुई, छापे पड़े, लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन उसके बाद क्या कार्रवाई हुई, कुछ पता नहीं. यह भी पता चला कि रिजर्व बैंक से नक़ली नोट बैंकों में भेजे गए. इसके ऊपर वित्त मंत्रालय ने कितना ध्यान दिया, हमें नहीं पता, लेकिन हमें इतना पता है कि वित्त मंत्रालय ने इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया. हालांकि हमारी बातें विरोधाभासी लग सकती हैं, पर सच यही है. दूसरी चीज़ यह कि नक़ली नोट के बारे में पी चिदंबरम जब वित्त मंत्री थे तो उन्होंने बयान दिया था कि हिंदुस्तान में जितनी करेंसी मौजूद है, उसमें हर तीसरा नोट नक़ली है. सरकार जब ऐसा बयान देती है तो हमें जान लेना चाहिए कि हमारा अर्थतंत्र, हमारा वित्त मंत्रालय कितना सजग है. उसने इसे रोकने के लिए कुछ क्यों नहीं किया.

आपके सामने एक घटना रखते हैं. आपके सामने इम्तिहान पास करने के दो तरीक़े हैं. दोनों ही तरीक़ों से नंबर बराबर आते हैं. पहला तरीक़ा है कि आप रट्टा मारें और इतने ज़्यादा जवाब रट लें कि आपके सवाल का उत्तर सही हो और आपके 90 नंबर आ जाएं. दूसरा तरीक़ा है कि आपके पास ज्ञान इतना हो कि आपके पास जो सवाल आए, उसका समझ कर उत्तर दें. जवाब वही होगा और आपको भी 90 नंबर ही मिलेंगे. पर गाड़ी तब फंसती है, जब कहीं पर मुश्किल सवाल आ जाए. ऐसा सवाल, जिसका रट्टा नहीं मारा गया हो और तब ज्ञान वाला आदमी पास हो जाता है और रट्टे वाला रुक जाता है. अब तक हमारे देश में साधारण सवाल थे, साधारण समस्याएं थीं, तो हमारे आईएएस एवं मंत्रीगण रट्टा मारकर उनका हल निकालते रहे (चूंकि रट्टा मारकर पास हुए थे), लेकिन अब समस्या टेढ़ी हो गई और सवाल टेढ़ा हो गया, तो अब वे बग़लें झांक रहे हैं. मैं यह नहीं कहता कि वित्त मंत्री भी रट्टा मारकर पास हुए हैं, पर उनकी गतिविधियां यह बताती हैं या उनके तरीक़े यह बताते हैं कि वह भी रट्टा मारकर पास हुए, इसलिए इस समय लड़खड़ा रहे हैं. अजीब फैसले लेते हैं, सीआरआर कम करते हैं, मुद्रा प्रवाह बढ़ जाता है. ज़्यादा पैसे आ जाते हैं, महंगाई बढ़ जाती है. उसे संभालने के लिए एसएलआर कम करते हैं. ज्वैलरी पर एक प्रतिशत टैक्स लगा दिया. फैसला ऐसा किया कि उस एक प्रतिशत का असेसमेंट आपने इंस्पेक्टर पर छोड़ दिया. सारे देश में आंदोलन हुआ. किसी को एक प्रतिशत टैक्स देने में ऐतराज़ नहीं था, लेकिन उसके असेसमेंट के लिए आपने जो इंस्पेक्टर लगा दिया, उस पर ऐतराज़ था.

उसी तरह से लोकसभा में पहली बार, शायद विश्व में पहली बार एक शब्द आया, सेंस ऑफ हाउस. जब अन्ना हजारे के अनशन के समय लोकसभा बुलाई गई तो दादा ने सेंस ऑफ हाउस की रणनीति बनाई और कहा कि लोकपाल बिल पास करेंगे. सदन की उस महत्वपूर्ण बैठक को मुख्यतय: प्रणब मुखर्जी ने ही संभाला. पहली बार या तो सरकार ने लोकसभा की बात यानी सेंस ऑफ हाउस को नहीं माना या लोकसभा ने देश की जनता के साथ धोखाधड़ी की, अपने ही सेंस को एक्शन में ट्रांसलेट नहीं किया. अजीब चीज़ यह कि जो स्टैंडिग कमेटी लोकपाल को हैंडिल कर रही थी, उसके चेयरमैन अभिषेक मनु सिंघवी एक महिला को जज बनाने की सुपारी लेते हुए कमेटी से बाहर हो गए. उन्होंने इस्ती़फा दे दिया. इस उठापटक में प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक कौशल दिखाई देता है. आर्थिक मामलों में उनकी पहल बहुत छोटी और भ्रमित यानी कन्फ्यूज्ड दिखाई देती है. लेकिन यह देश का सौभाग्य है कि वित्त मंत्रालय से प्रणब मुखर्जी को मुक्ति मिल गई. अब प्रणब मुखर्जी देश की तंदुरुस्ती के ऊपर नज़र रखेंगे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके जाते ही यह बयान दिया कि आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए एनिमल स्पिरिट की ज़रूरत है. इस बयान का भाष्य अभी तक प्रधानमंत्री की तऱफ से नहीं आया है. हम उस भाष्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *