सच का सिपाही मारा गया

सच जीतता ज़रूर है, लेकिन कई बार इसकी क़ीमत जान देकर चुकानी पड़ती है. सत्येंद्र दुबे, मंजूनाथ,  यशवंत सोणावने एवं नरेंद्र सिंह जैसे सरकारी अधिकारियों की हत्याएं उदाहरण भर हैं. इस फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ गया है इंजीनियर संदीप सिंह का. संदीप एचसीसी (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी) में हो रहे घोटाले को उजागर करना चाहते थे. इसकी शिकायत उन्होंने कंपनी के मुख्यालय में भी कर दी थी. यही बात भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों को नागवार गुज़री. नतीजतन, एक युवा और होनहार इंजीनियर को मौत की नींद सुला दिया गया. हत्या के एक महीने बाद भी पश्चिम बंगाल पुलिस संदीप के हत्यारे को गिरफ्तार नहीं कर पाई है. इस मामले में सरकार और प्रशासन की भूमिका पर प्रस्तुत है चौथी दुनिया की ख़ास पड़ताल…

सालुगाड़ा, ज़िला दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) में बीते 22 मई को दिनदहाड़े एचसीसी (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी) में कार्यरत इंजीनियर संदीप सिंह की हत्या ने सबको हैरान कर दिया. दार्जिलिंग में जिस तरह सरेआम इंजीनियर संदीप सिंह की हत्या हुई, उससे ममता राज की हक़ीक़त परत-दर-परत सामने आ रही है. प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह है कि संदीप की हत्या हुए एक महीने से ज़्यादा व़क्त ग़ुजर गया, लेकिन पुलिस इस हत्या की गुत्थी सुलझाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है. जिस जगह पर इंजीनियर संदीप की हत्या की गई, वह एक रिहायशी इलाक़ा है, जहां अक्सर लोगों की आवाजाही बनी रहती है. भीड़भाड़ वाली उस जगह पर हत्यारे बेख़ौ़फ आते हैं और अपना मक़सद पूरा करके रिवाल्वर लहराते हुए आसानी से निकल जाते हैं. स्थानीय पुलिस को जब इसकी सूचना मिली तो बजाय शहर की नाकेबंदी करने के वह स्थानीय लोगों से बेतुके सवाल करती रही, जिनका इस हत्या से कोई संबंध नहीं था. इंजीनियर संदीप के परिवारीजनों और स्थानीय लोगों का कहना था कि अगर सही समय पर पुलिस मौक़े पर पहुंच जाती तो शायद हत्यारे उसकी गिरफ्त में होते. इतना ही नहीं, अगर पुलिस एचसीसी (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी), जहां संदीप बतौर इंजीनियर कार्यरत थे, वहां के ठेकेदारों और अधिकारियों पर दबाव बनाती तो मुमकिन था कि उसे कोई सुराग़ ज़रूर मिलता, लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया. इससे स्पष्ट होता है कि पुलिस किसी के इशारे पर धीमी गति से कार्रवाई कर रही है.

इंजीनियर संदीप सिंह के पिता देवेंद्र सिंह चौथी दुनिया को बताते हैं कि उनके बेटे को अपनी ईमानदारी की क़ीमत चुकानी पड़ी है. उनके मुताबिक़, संदीप एचसीसी के बजट/ प्रोजेक्ट के सिलसिले में हेड ऑफिस मुंबई गया था. संदीप वहां क़रीब एक महीने से ज़्यादा समय तक रहा. वहां बजट/प्रोजेक्ट पर हस्ताक्षर करने के लिए उसके ऊपर का़फी दबाव था, जैसा कि संदीप ने घटना से पहले मुझे बताया था. उक्त बातों एवं कंपनी के रवैये से वह मानसिक दबाव और उलझन में था. संदीप बार-बार यही कह रहा था कि एचसीसी, जहां वह काम कर रहा है, वहां का़फी घोटाला हो रहा है. संदीप के पिता देवेंद्र सिंह के अनुसार, जिस तरह इंजीनियर सत्येंद्र दुबे भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों की साज़िश के शिकार बने, उसी तरह उनके ईमानदार पुत्र संदीप की साज़िशन हत्या कर दी गई, क्योंकि घोटाले में शामिल लोगों को यह डर था कि कहीं संदीप सिंह उनकी काली करतूतों का पर्दा़फाश न कर दे.

युवा इंजीनियर संदीप सिंह की हत्या के बाद उसके पैतृक गांव भलुही, ज़िला बलिया (उत्तर प्रदेश) में कोहराम मच गया. संदीप अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे. न्यू जलपाई गुड़ी में तीस्ता नदी पर डैम निर्माण का कार्य चल रहा था, वहां की निगरानी इंजीनियर संदीप कर रहे थे. संदीप की हत्या के बाद उनके परिवारीजनों का रो-रोकर बुरा हाल था. संदीप की शादी लगभग दो वर्ष पूर्व ही हुई थी. ग्रामीणों के अनुसार, वह स्वभाव से का़फी विनम्र थे. उनके अंदर ईमानदारी पूर्वक कार्य करने एवं देशभक्ति का जज्बा कूट-कूटकर भरा था. संदीप को क़रीब से जानने वालों का कहना है कि भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों ने मिलकर एक होनहार और ईमानदार इंजीनियर छीन लिया. इस मसले पर जलपाईगुड़ी के एसपी जेम्स कुजूर ने चौथी दुनिया से बातचीत में बताया कि इंजीनियर संदीप सिंह के हत्यारों को पकड़ने के लिए पुलिस सघन जांच अभियान चला रही है. इस बाबत पुलिस ने संदीप का लैपटॉप और घटनास्थल पर मौजूद वस्तुएं फोरेंसिक जांच के लिए एक्सपट्‌र्स के पास भेज दी हैं. इसके अलावा संदीप के मोबाइल फोन की कॉल डिटेल की भी जांच की जा रही है. हालांकि जब उनसे यह पूछा गया कि हत्या के इतने दिनों बाद भी पुलिस को इस मामले में कोई सुराग़ हाथ क्यों नहीं लगा है, तो उन्होंने वही रटा-रटाया जवाब दिया, जो अमूमन पुलिस महकमे में दिया जाता है कि पुलिस मामले की जांच कर रही है वग़ैरह-वग़ैरह. पुलिस के इस रवैये से यह ज़ाहिर होता है कि वह इस घटना को गंभीरता से नहीं ले रही है.

हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी (एचसीसी) के प्लानिंग इंजीनियर संदीप सिंह की हत्या से सभी शोकमग्न हैं, लेकिन उनकी पत्नी गुंजा पर मानो मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा हो. संदीप और गुंजा की शादी दो साल पहले ही हुई थी. गुंजा को समझ में नहीं आ रहा है कि देखते ही देखते यह क्या हो गया. संदीप की मौत के बाद वह पूरी तरह टूट चुकी हैं. अपनी पथराई आंखों से वह शून्य की तऱफ देखती रहती हैं, जैसे यह कहना चाहती हों कि संदीप तुम जहां भी हो वापस चले आओ. वहीं संदीप की मां इस घटना के बाद गहरे सदमे में हैं, क्योंकि संदीप उनका इकलौता बेटा था. इस दु:ख की घड़ी में जो भी संदीप के घर जाता है, उसकी आंखें नम हो जाती हैं. मगर अ़फसोस, मां की उम्मीदों और पत्नी के ख्वाबों पर पानी फिर चुका है. इंजीनियर संदीप सिंह के पिता देवेंद्र सिंह चौथी दुनिया को बताते हैं कि उनके बेटे को अपनी ईमानदारी की क़ीमत चुकानी पड़ी है. उनके मुताबिक़, संदीप एचसीसी के बजट/प्रोजेक्ट के सिलसिले में हेड ऑफिस मुंबई गया था. संदीप वहां क़रीब एक महीने से ज़्यादा समय तक रहा. वहां बजट/प्रोजेक्ट पर हस्ताक्षर करने के लिए उसके ऊपर का़फी दबाव था, जैसा कि संदीप ने घटना से पहले मुझे बताया था. उक्त बातों एवं कंपनी के रवैये से वह मानसिक दबाव और उलझन में था. संदीप बार-बार यही कह रहा था कि एचसीसी, जहां वह काम कर रहा है, वहां का़फी घोटाला हो रहा है. इस सूरत में वहां काम करने का कोई माहौल मेरे लिए नहीं रह गया है.

इंजीनियर संदीप सिंह की हत्या के मामले में पुलिस की धीमी कार्रवाई से उनके परिवार वाले संतुष्ट नहीं हैं. संदीप के नज़दीकी रिश्तेदारों का कहना है कि हत्या के एक महीने बाद भी पश्चिम बंगाल पुलिस के हाथ कुछ भी नहीं लगा है. पुलिस अंधेरे में तीर चला रही है. लोगों को बरगलाने के लिए वह इधर-उधर फोन करती है, टीम भेजने का भरोसा देती है, लेकिन उसे जहां कड़ाई से पूछताछ करनी चाहिए, वहां वह कोई कार्रवाई नहीं करती.

संदीप के पिता देवेंद्र सिंह के अनुसार, जिस तरह इंजीनियर सत्येंद्र दुबे भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों की साज़िश के शिकार बने, उसी तरह उनके ईमानदार पुत्र संदीप की साज़िशन हत्या कर दी गई, क्योंकि घोटाले में शामिल लोगों को यह डर था कि कहीं संदीप सिंह उनकी काली करतूतों का पर्दा़फाश न कर दे. संदीप सिंह के पिता देवेंद्र सिंह बिहार के सीवान ज़िले में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में अधिकारी हैं. अपने बेटे को खोने का ग़म वह कभी नहीं भूल सकते. उनका यही कहना है कि उन्हें न्याय चाहिए. इस बाबत उन्होंने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, पश्चिम बंगाल और बिहार के मुख्यमंत्रियों समेत राज्य के सभी पुलिस अधिकारियों से लिखित रूप में आग्रह किया है कि प्रशासन जल्द से जल्द संदीप के हत्यारों को गिरफ्तार करे. बहरहाल, संदीप सिंह की हत्या ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि इस देश में भ्रष्टाचार किस क़दर फैल चुका है. क्या देश की न्यायपालिका भी उन लोगों को सज़ा देने में अक्षम हो चुकी है, जो भ्रष्टाचार में शामिल हैं, क्या हमारी न्यायिक व्यवस्था में ही ऐसी ख़ामियां पैदा हो गई हैं कि अपराधी खुलेआम ईमानदार अधिकारियों की हत्या कर रहे हैं, लेकिन क़ानून का फंदा उन तक नहीं पहुंच पाता? इंजीनियर संदीप सिंह की हत्या ने सरकार, प्रशासन और देश की न्यायिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है. यह घटना ममता बनर्जी के राज में अपराधियों के बढ़ते प्रभाव की ओर भी इशारा करती है. यह वही ममता बनर्जी हैं, जिन्होंने वामदलों की तीन दशक पुरानी सरकार को भ्रष्ट, अराजक और अपराधियों को संरक्षण देने वाली सरकार क़रार देकर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जनता से वोट मांगे थे. सूबे की सत्ता संभालने के बाद ममता बनर्जी ने प्रदेश की जनता को भय और अपराध मुक्त शासन देने का भरोसा दिलाया था. हालांकि उनके तमाम दावे खुद-ब-खुद ध्वस्त हो रहे हैं.

सीबीआई जांच की मांग

इंजीनियर संदीप सिंह की हत्या के मामले में पुलिस की धीमी कार्रवाई से उनके परिवार वाले संतुष्ट नहीं हैं. संदीप के नज़दीकी रिश्तेदारों का कहना है कि हत्या के एक महीने बाद भी पश्चिम बंगाल पुलिस के हाथ कुछ भी नहीं लगा है. पुलिस अंधेरे में तीर चला रही है. लोगों को बरगलाने के लिए वह इधर-उधर फोन करती है, टीम भेजने का भरोसा देती है, लेकिन उसे जहां कड़ाई से पूछताछ करनी चाहिए, वहां वह कोई कार्रवाई नहीं करती. इससे सा़फ ज़ाहिर होता है कि एचसीसी में मौजूद भ्रष्ट अधिकारी और ठेकेदार पुलिस-प्रशासन की आंख में धूल झोंक रहे हैं. इस बीच संदीप सिंह की हत्या के विरोध में कई सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों ने रैलियां निकालीं. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने स्थानीय पुलिस प्रशासन को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि अगर जल्द ही इंजीनियर हत्याकांड का ख़ुलासा नहीं हुआ तो सालुगाड़ा में व्यापक आंदोलन किया जाएगा. माकपा दार्जिलिंग ज़िला कमेटी की ओर से भी पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) को मामले की जानकारी देते हुए उचित कार्रवाई की मांग की गई है.

फेसबुक पर न्याय की मांग भी उठी 

युवा इंजीनियर संदीप सिंह के हत्यारों की गिरफ्तारी और उनके परिवार को न्याय दिलाने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर भी मांग तेज़ हो गई है. जस्टिस फॉर सेंडी: एन अपील टू बीआईटीयंस पेज पर संदीप के साथ पढ़ाई करने वाले उनके दोस्तों और इंजीनियरिंग क्षेत्र में आने के बाद उन्हें जानने वाले लोगों ने सरकार से न्याय की मांग की है. फेसबुक के इस पेज को देश-विदेश के हज़ारों लोगों ने पसंद किया है. उतनी ही संख्या में लोगों ने उसके वॉल पर कमेंट लिखे हैं. सभी लोगों का यही कहना है कि इस देश में ईमानदार अधिकारियों का काम करना मुश्किल हो गया है. जो ईमानदार हैं, उनकी सुरक्षा के लिए न तो सरकार कोई क़दम उठाती है और न प्रशासन. ऐसे में देश का भविष्य क्या होगा, यह कह पाना मुश्किल है. आज इंजीनियर संदीप की हत्या हुई है, कल किसी और संदीप की हत्या होगी. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) नई दिल्ली के छात्र एवं इंजीनियर संदीप सिंह के बचपन के दोस्त रश्वेत श्रृंखल का कहना है कि संदीप बचपन के दिनों से ही शांत स्वभाव का था. स्कूल में सबसे उसकी मित्रता थी. वह दोस्तों के साथ बातचीत में हमेशा ईमानदारी और देश के लिए कुछ बेहतर करने की बात करता था. बीआईटी बैच 2000-04 में संदीप के सहपाठी रहे धीरज पांडेय का कहना है कि संदीप की हत्या सुनियोजित तरीक़े से की गई है. इस हत्या में एचसीसी के अधिकारियों एवं ठेकेदारों की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता. धीरज के अनुसार, इस मामले में पुलिस ईमानदारी से जांच नहीं कर रही है.

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

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