अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं. क्या थी वह अतृप्त इच्छा, जो पूरी नहीं हुई? अगर ध्यान से देखें तो समझ में आएगा कि अतृप्त इच्छा थी अन्ना हजारे या उनकी टीम के किसी सदस्य, विशेषकर अरविंद केजरीवाल का अनशन करते हुए मर जाना. मीडिया के लोगों की यह वैसी ही इच्छा थी, जैसे कुछ जगहों पर घटनाएं कराकर उसकी रिपोर्टिंग करना. और राजनीतिक दलों की इच्छा थी कि अगर ये दोनों निबट जाएं तो उनका रास्ता आसान हो जाए. इन दोनों ही इच्छाओं का पूरा न हो पाना मीडिया के एक वर्ग और राजनीतिक दलों की बौखलाहट का मुख्य कारण रहा. सवाल भी जो पूछे गए, वे अजीब थे, जैसे उम्मीदवार का कैसे चयन करेंगे, बिना पैसे कैसे चुनाव लड़ेंगे, जातिवाद का कैसे मुक़ाबला करेंगे तथा जनता को अपनी बात कैसे समझाएंगे. साथ ही यह भी कि उनकी विदेश नीति क्या होगी, उनकी अर्थ नीति क्या होगी, वे लोकपाल के अलावा कुछ जानते भी हैं या नहीं. 24 घंटे के भीतर मीडिया द्वारा उठाए गए उक्त सवाल बताते हैं कि हमारे देश का मीडिया कितना खोखला हो गया है. इन सवालों पर किसी भी संवाददाता या समाचार विश्लेषक ने अन्ना हजारे या उनके साथियों से एक बार भी बात नहीं की और नकारात्मक निष्कर्ष निकाल कर लोगों के सामने रखने शुरू कर दिए. यह उन चैनलों पर भी हो रहा था, जिन्होंने अन्ना हजारे के राजनीति में आने को लेकर सर्वे कराए थे और लगातार यह बता रहे थे कि उनके सर्वे में 96 प्रतिशत से ज़्यादा लोग अन्ना हजारे के राजनीति में आने के पक्ष में हैं. शायद मीडिया की इन्हीं बुद्धिमानियों की वजह से लोग अब न्यूज चैनलों को मनोरंजन का साधन ज़्यादा मानने लगे हैं, दिमाग़ बनाने का साधन कम. वे टेलीविजन पर होने वाली बहसों को मनोरंजन की उसी श्रेणी में रखते हैं, जिसमें मनोरंजन कार्यक्रमों को रखते हैं.

हाल में रिटायर हुए सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने जब देश को संबोधित करते हुए यह कहा कि सरकारें हमारे संविधान के तय दिशानिर्देशों के खिला़फ जा रही हैं, तो स़िर्फ दिल्ली में उनका भाषण सुन रहे लोगों ने तालियां नहीं बजाईं, बल्कि सारे देश में जो भी उन्हें देख रहा था और सुन रहा था, उसने तालियां बजाईं. अपने भाषण में उन्होंने कहा कि देश में 1975 जैसे हालात पैदा हो गए हैं, जब लोकनायक जय प्रकाश ने नारा दिया था कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है… उन्होंने कहा कि यह बहुत खुशी में दिया गया नारा नहीं था, बल्कि लोगों के दु:ख, तकली़फ और पीड़ा से निकला हुआ नारा था. जनरल ने यह भी कहा कि संविधान का पालन न करने वाली संपूर्ण व्यवस्था को बदल कर दोबारा संविधान का पालन करने वाली व्यवस्था बनाना है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि अन्ना हजारे और उनकी टीम से ग़लतियां हुई हैं, पर ग़लतियों के अलावा अन्ना हजारे ने पिछले साल भर में देश में जनता के बीच जो आशा जगाई, वह पिछले 20 सालों की अद्भुत, ऐतिहासिक घटना है. हिंदुस्तान के अभिजात्य वर्ग, राजनीतिक दलों के समझदार लोगों और सरकार चला रहे लोगों को यह समझना चाहिए कि अन्ना हजारे ने देश में एक ऐसी खतरनाक आशा का संचार किया है, जिसके पूरा न होने का परिणाम एक भयंकर निराशा के रूप में निकलेगा, जो अपराध, नक्सलवाद और अराजकता की तऱफ लोगों को खींचेगा. यह खतरनाक आशा इसीलिए पैदा हुई, क्योंकि देश के 120 करोड़ लोगों में से 90 करोड़ लोगों को विकास का लाभ नहीं मिला, अवसर समाप्त होते गए और इस वजह से पैदा हुए शून्य को भी नहीं भरा जा सका. इसलिए लोग सारे देश में खड़े हो गए और एक ऐसा अद्भुत जन उभार देखने को मिला, जिसने नई आशाओं का संचार किया. एक छोटा जुलूस निकलता है तो उसे संभालने के लिए पुलिस और पैरा मिलिट्री की व्यवस्था करनी पड़ती है, लेकिन अन्ना के पूरे साल भर हुए आंदोलन में कहीं पुलिस की ज़रूरत ही नहीं पड़ी. इन संकेतों को न राजनीतिक दल समझ रहे हैं, न देश का कॉरपोरेट सेक्टर समझ रहा है, न सरकार समझ रही है और न मीडिया समझ रहा है. शायद इसका एक सामान्य कारण हो सकता है कि ये चारों वर्ग जनता से कट गए हैं और पूरी तरह देश एवं प्रदेश की राजधानियों में सिमट गए हैं.

अन्ना हजारे और उनकी टीम की सबसे बड़ी ग़लती यह रही कि पिछले वर्ष रामलीला मैदान में अनशन समाप्ति के बाद वे देश भर में कहीं नहीं गए. इसका कारण अन्ना हजारे का बीमार होना ज़रूर था, लेकिन वह स्ट्रेचर पर ही सही, स़िर्फ चार जगह देश में सभाएं कर लेते और लोगों से कहते कि सरकार ने इतना वक़्त दिया है, अगर सरकार वायदा पूरा करती है तो उसका स्वागत करेंगे और अगर वायदा पूरा नहीं करती है तो संघर्ष करेंगे. अगर अन्ना हजारे यह करते तो सारे देश के लोग उनके साथ खड़े हो गए होते. अब अन्ना हजारे और उनके साथियों के सामने एक बड़ी चुनौती है और वह चुनौती है देश के लोगों के सामने एक ऐसा खाका पेश करना, जिसमें आम जनता की हिस्सेदारी हो. हमारे राजनीतिक दल, सरकार और कॉरपोरेट सेक्टर के लोग उस अंधे की तरह हैं, जो सावन में अंधा हो गया था और सोचता था कि हमेशा हरियाली ही हरियाली रहती है. उन्हें नहीं मालूम कि कभी भी उनके नीचे की ज़मीन खिसक सकती है. इसलिए अन्ना हजारे के विचारों और कार्यशैली की आलोचना करने की जगह उन्हें चाहिए कि वे अपनी कार्य प्रणाली में बदलाव करें, पार्टी में कार्यकर्ता नाम के जीव को फिर से सम्मानित जगह दें और लोगों की समस्याओं के लिए आवाज़ उठाना शुरू करें. देश के लगभग 272 ज़िले नक्सलवादी प्रभाव में आ गए हैं और इन ज़िलों के लोगों का मौजूदा राजनीतिक प्रक्रिया से विश्वास उठने लगा है. इन ज़िलों की संख्या कम नहीं हो रही है, बढ़ रही है और यह खतरनाक है. कॉरपोरेट सेक्टर और सरकार के प्रभाव में आकर मीडिया ने राजधानी से निकलना बंद कर दिया है. टेलीविजन चैनलों की रिपोर्ट और दिल्ली सहित प्रदेश की राजधानियों से निकलने वाले अ़खबारों की रिपोर्ट एक तरह की होती हैं और उन 272 ज़िलों से निकलने वाले अ़खबारों की रिपोर्ट दूसरे तरह की होती है. लोगों में जब राजनीतिक दलों और सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ता है तो उसका सीधा मतलब होता है लोकतंत्र के प्रति अविश्वास का बढ़ना. इस ज़िम्मेदारी को न समझना राजनीतिक दलों का लोकतंत्र को खत्म करने की प्रक्रिया में सहारा देने जैसा माना जा सकता है.

अब अन्ना हजारे और उनके साथियों के सामने एक बड़ी चुनौती है और वह चुनौती है देश के लोगों के सामने एक ऐसा खाका पेश करना, जिसमें आम जनता की हिस्सेदारी हो. हमारे राजनीतिक दल, सरकार और कॉरपोरेट सेक्टर के लोग उस अंधे की तरह हैं, जो सावन में अंधा हो गया था और सोचता था कि हमेशा हरियाली ही हरियाली रहती है. उन्हें नहीं मालूम कि कभी भी उनके नीचे की ज़मीन खिसक सकती है. इसलिए अन्ना हजारे के विचारों और कार्यशैली की आलोचना करने की जगह उन्हें चाहिए कि वे अपनी कार्य प्रणाली में बदलाव करें, पार्टी में कार्यकर्ता नाम के जीव को फिर से सम्मानित जगह दें और लोगों की समस्याओं के लिए आवाज़ उठाना शुरू करें.

इसीलिए हाल में रिटायर हुए सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने जब देश को संबोधित करते हुए यह कहा कि सरकारें हमारे संविधान के तय दिशानिर्देशों के खिला़फ जा रही हैं, तो स़िर्फ दिल्ली में उनका भाषण सुन रहे लोगों ने तालियां नहीं बजाईं, बल्कि सारे देश में जो भी उन्हें देख रहा था और सुन रहा था, उसने तालियां बजाईं. अपने भाषण में उन्होंने कहा कि देश में 1975 जैसे हालात पैदा हो गए हैं, जब लोकनायक जय प्रकाश ने नारा दिया था कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है… उन्होंने कहा कि यह बहुत खुशी में दिया गया नारा नहीं था, बल्कि लोगों के दु:ख, तकली़फ और पीड़ा से निकला हुआ नारा था. जनरल ने यह भी कहा कि संविधान का पालन न करने वाली संपूर्ण व्यवस्था को बदल कर दोबारा संविधान का पालन करने वाली व्यवस्था बनाना है. जनरल की हर बात पर तालियां बजीं और खासकर उस बात पर कि जब उन्होंने कहा कि मैं सेना से हूं, सेना के लोग आम जनता में से ही आते हैं और जब सेना दिए हुए काम को सौ प्रतिशत पूरा करती है तो हमारी ब्यूरोक्रेसी या हमारी सरकार क्यों आम जनता के लिए किए जाने वाले काम को सफलतापूर्वक पूरा नहीं करती है. उन्होंने सवाल किया कि सन्‌ 91 के बाद एक भी काम कोई बताए, जिसे सरकार ने 60-70 प्रतिशत भी पूरा किया हो. जनरल का यह भाषण पूरे देश ने सुना और महसूस किया कि उसे एक ऐसा ईमानदार चेहरा मिल गया है, जिस पर भरोसा किया जा सकता है. लोगों को लग रहा है कि जनरल शायद अब सारे देश में जाएंगे और एक तऱफ नौजवानों, वंचितों एवं कमज़ोरों को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने के लिए प्रेरित करेंगे, वहीं वह राजनीतिक दलों को अपने व्यवहार में बदलाव लाने और जनाभिमुख बनाने के लिए दबाव बनाएंगे. यह स्थिति एक तऱफ स्वागत योग्य है, लेकिन दूसरी तऱफ खतरनाक भी है. अगर राजनीतिक दल, कॉरपोरेट सेक्टर और सरकार इस स्थिति को बर्बाद करने के लिए कमर कसते हैं तो आज़ादी के बाद पहली बार वैसा ही मंज़र देखने को मिल सकता है, जैसा आज़ादी से पहले अंग्रेजों के खिला़फ गांधी जी के आंदोलन में देखने को मिलता था. यह मानना चाहिए कि जिस तरह लोकनायक जय प्रकाश नारायण को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था और जिस तरह वी पी सिंह को सरकारी कोप का भाजन बनना पड़ा था, ठीक वैसी ही स्थितियां जनरल वी के सिंह और अन्ना हजारे के लिए भी निर्मित होंगी.

24 घंटे के भीतर मीडिया द्वारा उठाए गए उक्त सवाल बताते हैं कि हमारे देश का मीडिया कितना खोखला हो गया है. इन सवालों पर किसी भी संवाददाता या समाचार विश्लेषक ने अन्ना हजारे या उनके साथियों से एक बार भी बात नहीं की और नकारात्मक निष्कर्ष निकाल कर लोगों के सामने रखने शुरू कर दिए. यह उन चैनलों पर भी हो रहा था, जिन्होंने अन्ना हजारे के राजनीति में आने को लेकर सर्वे कराए थे और लगातार यह बता रहे थे कि उनके सर्वे में 96 प्रतिशत से ज़्यादा लोग अन्ना हजारे के राजनीति में आने के पक्ष में हैं. शायद मीडिया की इन्हीं बुद्धिमानियों की वजह से लोग अब न्यूज चैनलों को मनोरंजन का साधन ज़्यादा मानने लगे हैं, दिमाग़ बनाने का साधन कम.

बाबा रामदेव का रास्ता कुछ अलग है. उन्होंने सारे देश में योजनापूर्वक घूमकर सभाएं कीं और लोगों को काले धन के साथ-साथ सरकार की विफलताओं के प्रति जागृत किया. पिछले वर्ष रामलीला मैदान में उनके द्वारा चलाए गए धरना-प्रदर्शन को सरकार ने तीन दिनों में पुलिस के बल पर उखाड़ दिया. बाबा रामदेव भी उसी सिंड्रोम का शिकार हो गए, जिसके शिकार अन्ना हजारे थे. उन्होंने अपना सारा ज़ोर दिल्ली में मीडिया को अपनी ताक़त दिखाने में लगा दिया. इस बार भी उन्होंने यही रणनीति बनाई, उनके मुख्य संगठनकर्ता बाबा बालकृष्ण जेल में हैं. सरकार ने यह मानकर कि बालकृष्ण नहीं रहेंगे, तो बाबा रामदेव का आंदोलन संगठित नहीं हो पाएगा, बालकृष्ण को सीबीआई के ज़रिए जेल भिजवा दिया. बाबा रामदेव के आंदोलन की सबसे बड़ी कमी यही है कि वह भी अपने आंदोलन को देश के लोगों के बीच नहीं ले जा पाए. पर बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और जनरल वी के सिंह द्वारा शुरू किए गए तीनों अभियान जहां इस देश में राजनीतिक दलों के लिए एक अवसर बन सकते हैं, वहीं उनके लिए खतरा भी बन सकते हैं. अब यह राजनीतिक दलों को तय करना है कि वे इस अवसर का उपयोग या सामना कैसे करेंगे. जनता बहुत उत्सुकता से इस स्थिति को देख रही है और अपना रोल निभाने के लिए खुद को तैयार कर रही है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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