निगाहें भ्रष्‍टाचार पर, निशाना 2014

अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के बाक़ी सदस्य जब जुलाई 2012 के अनशन के लिए मांगों की लिस्ट तैयार कर रहे होंगे, तब उन्हें भी यह अहसास रहा होगा कि वे असल में क्या मांग रहे हैं? 15 दाग़ी मंत्रियों (टीम अन्ना के अनुसार), 160 से ज़्यादा दाग़ी सांसदों और कई पार्टी अध्यक्षों के खिला़फ जांच और कार्रवाई की मांग, अब ये मांगें मानी जाएंगी, उस पर कितना अमल हो पाएगा, इन सवालों के जवाब ढूंढने की बजाय इस बात का विश्लेषण होना चाहिए कि अगर ये मांगें नहीं मानी जाती हैं तब टीम अन्ना का क्या होगा, तब टीम अन्ना क्या करेगी? इस विश्लेषण में कई नकारात्मक तथ्य शामिल किए जा सकते हैं, लेकिन इस सबके बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य हिमाचल प्रदेश में पिछले कई महीनों से टीम अन्ना के कई सदस्यों द्वारा बिताया गया समय है, लेकिन सवाल उठता है कि बिहार, मध्य प्रदेश या अन्य राज्यों की अपेक्षा हिमाचल में इतने सघन दौरे, वह भी मीडिया में बिना प्रचार किए, की वजह क्या थी? दरअसल, टीम अन्ना के मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और नवीन जयहिंद ने पिछले कई महीने का समय हिमाचल प्रदेश में गुज़ारा है. ग़ौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसी चुनाव को ध्यान में रखते हुए और चुनावी राजनीति की पहली प्रयोगशाला के तौर पर टीम अन्ना ने हिमाचल प्रदेश को चुना. वहां घूम-घूमकर, लोगों से मिलकर एक तरह से अपनी राजनीतिक शुरुआत के लिए रायशुमारी कराने की क़वायद की. हालांकि इस दौरान भी टीम अन्ना ने खुद की राजनीतिक महत्वकांक्षा या कहें कि राजनीति में उतरने की मंशा ज़ाहिर नहीं की. रणनीति यह थी कि जनता को चुनाव में उतरने के लिए तैयार किया जाए. जनता खुद अपना निर्दलीय उम्मीदवार तैयार करे और फिर टीम अन्ना उन्हें समर्थन दे. का़फी गुप्त तरीक़े से, जनलोकपाल पर जनता को जागृत करने के नाम पर यह अभियान हिमाचल प्रदेश में चलाया जा रहा था.

अगस्त 2011 से लेकर जुलाई 2012 के बीच इस देश से न तो भ्रष्टाचार खत्म हुआ और न भ्रष्टाचारी. लेकिन इस बीच भ्रष्टाचार के खिला़फ आंदोलन कर रही टीम अन्ना के अनशन स्थल से जनता ग़ायब हो गई. आखिर क्यों? क्या जनता निराश है, भ्रमित है? या फिर इससे विपरीत स्थिति है. कहीं टीम अन्ना मुद्दे या मार्ग से तो नहीं भटक गई है? ऐसा नहीं है. टीम अन्ना के अंदऱखाने में जो राजनीतिक इच्छा पिछले कई महीनों से पनप रही थी, वह इस अनशन के बहाने एक मुकम्मल तस्वीर में बदलती दिख रही है, लेकिन सबसे ब़डा सवाल तब भी वही रहेगा, जो जंतर-मंतर के अनशन को लेकर है. क्या जनता टीम अन्ना के राजनीतिक स्वरूप का समर्थन करेगी?

बहरहाल, जुलाई 2012 के अनशन और तीन मांगों की घोषणा के बाद हिमाचल प्रदेश का अभियान भले ही मंद प़ड गया, लेकिन जंतर-मंतर पर अनशन के दौरान जिस तरह से अन्ना और बाक़ी सदस्यों ने बार-बार यह बात दोहराई कि जनता के पास विकल्प नहीं है और अंतत: अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने भी एक इंटरव्यू के दौरान यह सा़फ कर दिया कि 2014 के चुनाव में एक ग़ैर कांग्रेसी, ग़ैर भाजपाई, ग़ैर तीसरा मोर्चा यानी जनता का एक मोर्चा (टीम अन्ना का मोर्चा) अस्तित्व में आ सकता है, उससे सा़फ हो गया कि अब टीम अन्ना अपनी राजनीतिक यात्रा बस शुरू ही करने वाली है. अन्ना हजारे ने फिर से वहीं बात दोहराई कि वह या उनकीटीम के सदस्य खुद चुनाव नहीं ल़डेंगे, लेकिन ईमानदार लोगों का (जनता द्वारा चुने गए) वह समर्थन करेंगे.

दरअसल, टीम अन्ना के सदस्यों के बीच इस बात को लेकर का़फी मतभेद रहा है कि राजनीतिक दल बनाया जाए या नहीं. कुछ सदस्य जहां इसके पक्ष में हैं, वहीं अरविंद केजरीवाल इस मुद्दे पर संशय की स्थिति में हैं. लेकिन जनलोकपाल के मुद्दे पर उनके पास जनता को देने के लिए ज़्यादा कुछ बचा नहीं है. उन्हें भी मालूम है और जनता भी जानती है कि क़ानून आखिरकार संसद से ही बनना है. 15 मंत्रियों (टीम अन्ना के मुताबिक़ जनलोकपाल के दुश्मन) के खिला़फ एसआईटी जांच की मांग जनता को ज़्यादा प्रेरित नहीं कर पाई. टीम अन्ना भी यह समझाने में असफल साबित हो रही है कि आ़खिर कैसे इन 15 मंत्रियों के खिला़फ जांच से जनलोकपाल क़ानून बन पाएगा. लेकिन यही बात टीम अन्ना को अपनी असफलता को जनता के सामने पेश कर जनता की सहानुभूति और समर्थन हासिल करने का एक मौक़ा भी दे रही है. टीम अन्ना की ये तीन मांगें अगर नहीं मानी जाती हैं तो टीम अन्ना आराम से जनता के बीच यह संदेश पहुंचा सकती है कि सरकार उसकी बात ही नहीं सुन रही है, वह क्या करे. ऐसी सूरत में जनता खुद उससे राजनीति में उतरने के लिए कहेगी. तब वह आराम से यह कहते हुए कि वह ऐसा जनता की मांग पर कर रही है, जनलोकपाल क़ानून लाने के लिए कर रही है, एक राजनीतिक दल का गठन कर राजनीति में उतर सकती है. फिर इस अनशन के माध्यम से जिन 15 मंत्रियों के खिला़फ टीम अन्ना ने मोर्चा खोला है, उसका भी फायदा उसे चुनाव के समय मिल सकता है.

टीम अन्ना भी यह समझाने में असफल साबित हो रही है कि आखिर कैसे इन 15 मंत्रियों के खिला़फ जांच से जनलोकपाल क़ानून बन पाएगा. लेकिन यही बात टीम अन्ना को अपनी असफलता को जनता के सामने पेश कर जनता की सहानुभूति और समर्थन हासिल करने का एक मौक़ा भी दे रही है. टीम अन्ना की ये तीन मांगें अगर नहीं मानी जाती हैं तो टीम अन्ना आराम से जनता के बीच यह संदेश पहुंचा सकती है कि सरकार उसकी बात ही नहीं सुन रही है, वह क्या करे.

लेकिन सबसे ब़डा सवाल है कि क्या तब वह जनता जो जंतर-मंतर पर उसके अनशन को समर्थन देने नहीं पहुंचती, क्या वह अपना वोट देकर उसे चुनेगी? और एक ऐसी चुनावी व्यवस्था में, जहां अन्ना हजारे खुद कई बार कह चुके हैं कि इस देश में अगर वह खुद चुनाव ल़डने उतरें तो ज़मानत ज़ब्त हो जाएगी, क्योंकि यहां नोट और शराब से वोट बिक जाते हैं, क्या ऐसे में टीम अन्ना जनता का समर्थन हासिल कर पाएगी? और फिर बाबा रामदेव फैक्टर. बाबा रामदेव की राजनीतिक महत्वकांक्षा भी जगज़ाहिर है. भले वह खुद चुनाव न ल़डें, लेकिन अगर 2014 का उनका मिशन भी सामने आता है तो वैसी हालत में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल का फैसला क्या होगा? क्या वे रामदेव के साथ मिलकर चुनाव ल़डेंगे? इन चंद सवालों के जवाब टीम अन्ना को अभी से ढूंढ लेने चाहिए, क्योंकि अगर वह राजनीति में उतरती है तो 2014 किसी और के लिए अहम हो न हो इस देश के करो़डों लोगों की उम्मीदों और खुद टीम अन्ना के अस्तित्व और भविष्य में भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाने वाले लोगों के लिए का़फी अहम होगा.

राजनीति: ये राह आसान नहीं 

किसी सामाजिक संगठन या कहे सिविल सोसाइटी की ओर से केंद्रीय स्तर पर एक राजनीतिक विकल्प देने की बात पहली बार की जा रही है. लेकिन कहते हैं कि इतिहास निर्माण के लिए इतिहास से सबक़ लेने की भी ज़रूरत होती है यानी इतिहास में ऐसे राजनीतिक विकल्प की क्या हालत हुई थी, इससे भी सीखने की ज़रूरत है. राजनीतिक विकल्प का अर्थ अगर सत्ताधारी दल को सत्ता से बेद़खल करना है तो इस तरह के प्रयोग इस देश में कई बार हुए हैं, जो असफल साबित हो चुके हैं. चाहे वह जनता पार्टी का प्रयोग हो या संयुक्त मोर्चा का. महंगाई और भ्रष्टाचार के खिला़फ शुरू किया गया जेपी का आंदोलन ग़ैर कांग्रेसी सरकार बनाने की मुहिम में बदला और फिर अपने ही अंतरविरोधों की वजह से कांग्रेस को पुनर्स्‍थापित भी कर गया. फिर संयुक्त मोर्चा सरकार भी महज़ सत्ता संघर्ष की एक असफल कहानी बनकर रह गई. हालांकि जनता पार्टी का सत्ता में आने के पीछे उस समय के हालात और सरकार के खिला़फ जनमानस तैयार करने में जेपी द्वारा किया अथक प्रयास था. विभिन्न विचारधाराओं वाले दलों को एक मंच पर लाने का जो श्रम जेपी ने किया था, उसी का नतीजा था जनता पार्टी की सरकार. ऐसा कोई प्रयास, ऐसा कोई श्रम और ऐसी कोई मंशा टीम अन्ना की तऱफ से होती नहीं दिख रही है. राजनीतिक ज़मीन तैयार करने में ज़िंदगी बीत जाती है, लेकिन अगर टीम अन्ना स़िर्फयह मानकर अपनी जीत तय समझ रहे हैं कि देश की जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त है, सरकार से ना़खुश है, तो शायद यह कहीं उसके लिए एक हसीन खुश़फहमी न साबित हो जाए.

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