मन को छूते मेरे गीत

गीत मन के भावों की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति हैं. साहित्य ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक मेरे गीत में सतीश सक्सेना ने भी अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर गीतों की रचना की है. वह कहते हैं कि वास्तव में मेरे गीत मेरे हृदय के उद्‌गार हैं. इनमें मेरी मां है, मेरी बहन है, मेरी पत्नी है, मेरे बच्चे हैं. मैं उन्हें जो देना चाहता हूं, उनसे जो पानी चाहता, वही सब इनमें है. वास्तव में ये गीत हमारे समाज के गीत हैं. कवि ने सच ही कहा है कि ये गीत हमारे सबके गीत हैं. इन गीतों में इंसान के परिवार से जु़डे रिश्तों के साथ ही सामाजिक दायित्व को ब़खूबी पेश किया गया है. कवि की मां का उनके बचपन में ही देहांत हो गया था. उनकी ब़डी बहन ने उनकी परवरिश की. उनकी पत्नी ने जीवन के हर क़डे संघर्ष में उनका साथ निभाया. अपने बच्चों से उन्हें वह आदर और प्यार दिया, जो आज के दौर में हर माता-पिता को नसीब नहीं हो पाता. कवि ने अपने गीतों में इन्हीं रिश्तों के प्रेम को सहेजा है, जो  उनकी प्रेरणा है. वह कहते हैं:-

सबसे पहला गीत सुनाया

मुझे सुलाते, अम्मा ने

थपकी दे देकर बहलाते

आंसू पोंछे, अम्मा ने

सुनते-सुनते निंदिया आई, आंचल से निकले थे गीत

उन्हें आज तक भुला न पाया, बड़े मधुर थे मेरे गीत

यूं तो किताब की हर रचना अपने में कोई न कोई भाव और संदेश समेटे हुए है, लेकिन उनका अपनी मां की स्मृति में लिखा गया गीत बेमिसाल है. अगर इस गीत को इस किताब की जान कहा जाए तो ग़लत न होगा. वह कहते हैं :-

कई बार रातों को उठकर

दूध गरम कर लाती होंगी

मुझे खिलाने की चिंता में

खुद भूखी रह जाती होंगी

मेरी तकली़फों में अम्मा, सारी रात जागती होंगी

बरसों मन्नत मांग ग़रीबों को, भोजन करवाती होंगी

सुबह सवेरे ब़डे जतन से

वे मुझको नहलाती होंगी

नज़र न लग जाए, बेटे को

काला तिलक लगाती होंगी

चू़डी, कंगन और सहेली, उनको कहां लुभाती होंगी

ब़डी-ब़डी आंखों की पलकें, मुझको ही सहलाती होंगी

सबसे सुंदर चेहरे वाली

घर में रौनक़ लाती होंगी

अन्नपूर्णा अपने घर की

सबको भोग लगाती होंगी

दूध मलीदा खिला के मुझको, स्वयं तृप्त हो जाती होंगी

गोरे चेहरे वाली अम्मा, रोज़ न्यौछावार होती होंगी

रात-रात भर सो गीले में

मुझको गले लगाती होंगी

अपनी अंतिम बीमारी में

मुझको लेकर चिंतित होंगी

बच्चा कैसे जी पाएगा, वे निश्चित ही रोई होंगी

सबको प्यार बांटने वाली, अपना कष्ट छिपाती होंगी

अपनी बीमारी में चिंता

स़िर्फ लाडले की ही होगी

गहन कष्ट में भी वे आंखें

मेरे कारण चिंतित होंगी

अपने अंत समय में अम्मा, मुझको गले लगाए होंगी

मेरे नन्हे हाथ पक़ड कर, फफक-फफक कर रोई होंगी

मानव जीवन बहुत महत्वपूर्ण है. हम इसका सदुपयोग करके खुद भी खुश रह सकते हैं और दूसरों में भी खुशियों बांट सकते हैं. इसी भावना को पेश करते हुए वह कहते हैं:-

रो रोकर दुनिया जीती है, हम हंसना उसे सिखाएंगे

नफ़रत की जलती लपटों, पर गंगा जल ही बरसाएंगे

शीतल जल की फुहार बरसे, जब तपती धरती पर यारो

रजनीगंधा के साथ-साथ, घर का गुलमोहर महक उठे.

शिल्प के लिहाज़ से देखा जाए तो यह गीत नहीं, बल्कि कविताओं की किताब है. कवि ने अपनी पुस्तक भी भूमिका में स्वयं इस बात को स्वीकारा है कि उन्हें गीत के शिल्प का ज्ञान नहीं है. बहरहाल, किताब का आवरण तो मनोहारी है ही. इसके साथ ही इसमें संग्रहीत कविताएं जीवन के विभिन्न रंगों को समेटे हुए हैं.

 

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. आपने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में कई वर्षों तक सेवाएं दीं हैं. ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है. आपने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लिए लेखन. आपकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक किताब प्रकाशित हो चुकी है.

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. आपने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में कई वर्षों तक सेवाएं दीं हैं. ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है. आपने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लिए लेखन. आपकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक किताब प्रकाशित हो चुकी है.

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