सुशासन का सच या फरेब

बिहार के चौक-चौराहों पर लगे सरकारी होर्डिंग में जिस तरह सुशासन का प्रचार किया जाता है, वह एनडीए सरकार की शाइनिंग इंडिया की याद दिलाता है. बिहार से निकलने वाले अ़खबार जिस तरह सुशासन की खबरों से पटे रहते हैं, उसे देखकर आज अगर गोएबल्स (हिटलर के एक मंत्री, जो प्रचार का काम संभालते थे) भी ज़िंदा होते तो एकबारगी शरमा जाते. ऐसा लिखने के पीछे तर्क है. इस तर्क में वे सरकारी आंकड़े भी हैं, जिनके सहारे राज्य सरकार बिहार को विकसित राज्यों की श्रेणी में खड़ा करने का प्रयास करती है और कुछ ऐसी सच्चाइयां भी हैं, जिन्हें न तो मीडिया में जगह मिलती है और जिन पर चर्चा करने की अघोषित मनाही है. लेकिन लोकतंत्र की एक खूबी है कि तमाम कोशिशों के बाद भी आवाज़ निकलने के लिए कहीं न कहीं एक सुराख बन ही जाता है. नीतीश कुमार के सुशासन की असलियत जनता के सामने लाने का काम भी कुछ इसी तरह हो रहा है. अब नीतीश कुमार के पुराने साथी ही उनके सुशासन का सच सामने ला रहे हैं. उपेंद्र कुशवाहा और मंगनी लाल मंडल जैसे पुराने साथियों की राहें अब नीतीश की राह से अलग हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला दिया गया कि संपत्ति विवाद मामलों में जहां पूरे देश भर में तीन हज़ार हत्याएं हुईं, वहीं इसमें से अकेले बिहार के हिस्से में 916 हत्याएं शामिल हैं (अक्टूबर 2011 के आंकड़ों के मुताबिक़). यानी जो राज्य 11 फीसद जीडीपी की बात करता है, वहां अकेले संपत्ति विवाद में हुई हत्या का राष्ट्रीय फीसद 30 के क़रीब है. एक और आंकड़े (एनसीआरबी) के मुताबिक़, 2010 में बिहार में 1359 बच्चों का अपहरण हुआ. यानी दिल्ली के बाद दूसरा सबसे बड़ा राज्य जहां बच्चों का अपहरण हुआ, बिहार है.

दरअसल, उपेंद्र कुशवाहा और मंगनी लाल मंडल जैसे जदयू सांसदों का रिश्ता नीतीश कुमार से छत्तीस का हो चुका है. उपेंद्र कुशवाहा ने तो बाक़ायदा बिहार नवनिर्माण मंच भी बनाया है, जिसके तहत हर एक मौक़े पर वह बिहार का सच सामने ला रहे हैं. अभी हाल में दिल्ली में इसी मंच का एक राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ. मावलंकर हॉल में बिहार का सच नामक इस कार्यक्रम में नीतीश सरकार की जमकर बखिया उधेड़ी गई. आंकड़ों के सहारे यह बताया गया कि कैसे सुशासन का ढोंग रचा जा रहा है. मसलन, इस मौक़े पर छपे एक पैंफ्लेट्‌स में कहा गया है कि कैसे तरक्क़ी के नाम पर बिहार में यात्राओं का खेल खेला जा रहा है, जबकि बिहार के कई इलाक़ों में बच्चे दिमाग़ी बु़खार से तड़प-तड़प कर मर रहे हैं. अ़खबारों में सुनहरे बिहार के विज्ञापन छाए रहते हैं और दूसरी ओर छात्र उपस्थिति घोटाला, साइकिल घोटाला, बियाडा ज़मीन घोटाला और महादलितों को दी जाने वाली ज़मीन का घोटाला हो रहा है.

वैसे नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप एक सामान्य सी घटना है, लेकिन बिहार के संदर्भ में देखें तो कई आरोप सही लगते हैं. एक तो घोटाले सामने नहीं आते, उनकी ़खबरें नहीं आती हैं और अगर आ भी जाती हैं तो उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती, जांच नहीं होती. यह सब आखिर क्या साबित करता है. इस कार्यक्रम में बिहार में बढ़ते अपराध के ग्राफ से संबंधित आंकड़ों पर भी बहस हुई. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला दिया गया कि संपत्ति विवाद मामलों में जहां पूरे देश भर में तीन हज़ार हत्याएं हुईं, वहीं इसमें से अकेले बिहार के हिस्से में 916 हत्याएं शामिल हैं (अक्टूबर 2011 के आंकड़ों के मुताबिक़). यानी जो राज्य 11 फीसद जीडीपी की बात करता है, वहां अकेले संपत्ति विवाद में हुई हत्या का राष्ट्रीय फीसद 30 के क़रीब है. एक और आंकड़े (एनसीआरबी) के मुताबिक़, 2010 में बिहार में 1359 बच्चों का अपहरण हुआ. यानी दिल्ली के बाद दूसरा सबसे बड़ा राज्य जहां बच्चों का अपहरण हुआ, बिहार है.

हम लोग प्रत्येक पार्टी के उपेक्षित कार्यकर्ताओं को इस मंच के साथ लाने और नए बिहार की स्थापना के लिए प्रयास कर रहे हैं.

– रामपुकार सिन्हा, युवा नेता, बिहार नवनिर्माण मंच.

आर्थिक विकास के मोर्चे पर भी इस सम्मेलन में कहा गया कि जिस 11 फीसदी विकास दर की बात कही जा रही है, उसका सीधा फायदा आम लोगों तक नहीं पहुंचा. औद्योगिक क्षेत्र में निवेश के मुद्दे पर वित्त मंत्री सुशील मोदी के उस बयान को उद्धृत किया गया, जो उन्होंने 2011-12 के बजट भाषण के दौरान दिया था कि राज्य में नए निवेश की प्रस्तावित रक़म का एक फीसदी से भी कम वास्तविक निवेश हुआ है. यह सच फिक्की की एक रिपोर्ट में भी सामने निकल कर आया था कि सरकार लाखों करोड़ के पूंजी निवेश का प्रचार कर रही है, लेकिन असल निवेश महज़ कुछ करोड़ का ही हुआ. चौथी दुनिया से बात करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि हम गांव-गांव जा रहे हैं. अभी राजनीतिक दल बनाने का विचार नहीं है, अभी जनांदोलन की ज़रूरत है. लोगों को सुशासन का सच बताना ही होगा.

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