अंतराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 सशक्‍त कृषि नीति बनाने की जरूरत

संसद द्वारा सहकारिता समितियों के सशक्तिकरण के लिए संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत की सहकारी संस्थाएं पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और मज़बूत हो जाएंगी. विधेयक पारित होने के बाद निश्चित तौर पर देश की लाखों सहकारी समितियों को भी पंचायतीराज की तरह स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा. हालांकि इस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अभी कुछ और पहल करने की ज़रूरत है, ख़ासकर वित्तीय अधिकारों और राज्यों की सहकारी समितियों में एक समान क़ानून को लेकर. वर्ष 2012 में संसद द्वारा बहुप्रतीक्षित इस विधेयक को पारित कर दिया गया. संयोगवश इसी साल अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष भी मनाया जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी सहकारिता के क्षेत्र में भारत की कामयाबी को का़फी सराहा जा रहा है. आज वैश्विक जगत सहकारिता की प्रासंगिकता समझ रहा है, ख़ासकर वे देश, जो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को ही बेहतर मानते थे. हालांकि उनकी यह सोच बदली है, विशेषकर वर्ष 1990 के बाद, जिसे आर्थिक उदारीकरण का जमाना कहते हैं. पूंजीवादी देशों का यह तर्क था कि इस नई आर्थिक व्यवस्था के बाद हर स्तर पर खुशहाली आएगी, लेकिन पिछले बीस वर्षों के कटु अनुभवों से साबित हो गया है कि विश्व में खुशहाली का रास्ता पूंजीवाद नहीं, बल्कि सेवाभावना और सामाजिक मूल्यों पर आधारित सहकारिता से होकर गुज़रता है. इस मामले में भारत दुनिया के सामने एक बेहतरीन उदाहरण पेश कर रहा है, जहां सहकारी संस्थाएं निरंतर सशक्त हो रही हैं. अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 और संसद द्वारा पारित सहकारिता विधेयक के बाद देश की को-ऑपरेटिव सोसायटियों पर क्या असर पड़ेगा, इस मुद्दे पर भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ के चेयरमैन डॉ. चंद्रपाल सिंह यादव बताते हैं कि इससे देश की लगभग छह लाख सहकारी समितियां और उससे जुड़े करोड़ों लोगों पर सकारात्मक असर पड़ेगा. अब पंचायतों की तरह सहकारी समितियां भी स्वतंत्र होंगी. इसके अलावा राजनीतिक हस्तक्षेप और नौकरशाही का दबदबा भी खत्म होगा. डॉ. यादव के अनुसार, गुजरात और महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन सबसे ज़्यादा सफल रहा है. ख़ासकर गुजरात में, जहां हर पंचायत और क़स्बाई शहरों में का़फी संख्या में सहकारी समितियां बेहतरीन काम कर रही हैं. गुजरात का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां कुछ सहकारी बैंकों द्वारा किसानों को कृषि कार्य के लिए शून्य ब्याज़ दर पर क़र्ज़ दिए जा रहे हैं. भूमि अधिग्रहण और उससे पैदा होने वाली समस्याओं के बारे में उन्होंने कहा कि ज़मीन किसानों की जीविका का मुख्य आधार है. अत: सरकार को चाहिए कि वह भूमि अधिग्रहण संबंधित ऐसा क़ानून बनाए, जो किसानों के लिए लाभप्रद हो. सहकारिता और किसानों के बीच संबंध के बारे में उनका मानना है कि सरकार अलग-अलग क्षेत्रों में जिस तरह नीतियां बनाती हैं, उसी तरह किसान और कृषि से जुड़ी नीति भी बनाने की ज़रूरत है. उनके मुताबिक़, आम बजट और रेल बजट की तरह किसान बजट बनाने की आवश्यकता है. सहकारी समितियों के लिए बनी बैधनाथन कमेटी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस कमेटी ने कई महत्वपूर्ण सुझाव सरकार को दिए थे, अगर उन पर पूरी तरह अमल किया जाए तो सहकारी समितियों का का़फी भला होगा. देश के खुदरा बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के सवाल पर डॉ. यादव ने बताया कि निश्चित तौर पर इसका असर सहकारिता क्षेत्र पर पड़ेगा. अगर सरकार इसे म़ंजूरी देती है तो उसे इस बात का विशेष ख्याल रखना होगा कि इससे देश की लाखों को-ऑपरेटिव सोसायटियों का कोई अहित न हो.

मौजूदा समय में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हालत सही नहीं है, यूरोपीय बाज़ारों का हाल खराब है, कई देशों में वायदा कारोबार पर विवाद है, शेयर बाज़ार भी रह-रहकर गोते लगा रहा है. कच्चे तेल की क़ीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं है, महंगाई से जनता परेशान है, युवाओं की नौकरी ख़तरे में है. कई देश ऐसे हैं, जहां थैलियों में मुद्रा दी जाती है और मुट्ठी भर खाद्य सामग्री आती है. यह मौजूदा आर्थिक व्यवस्था की एक बानगी है. कमज़ोर पड़ते अमेरिकी और यूरोपीय बाज़ार के नक्शेक़दम पर चलकर विश्व के कई देश आज बर्बादी के मुहाने पर खड़े हैं. भारत पर भी इसका असर पड़ा है, बावजूद इसके, देश की अर्थव्यवस्था अन्य देशों की अपेक्षा स्थिर है. इसकी वजह कहीं न कहीं हमारे देश में चला आ रहा वर्षों पुराना सहकारिता अभियान है.

मौजूदा अर्थनीति के बारे में कहा जाता है कि यह सभ्य समाज के प्रति संवेदनहीन और भ्रष्टाचारियों के लिए अनुकूल है. यह एक ऐसी व्यवस्था है, जो धनवानों को धनवान बनाती जा रही है. ग़रीबों के लिए मौजूदा अर्थनीति सही नहीं है. इस आरोप से बचने के लिए दुनिया भर के अर्थशास्त्री इकोनॉमी में व्यापक बदलाव की वकालत कर रहे हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या मानवीय मूल्यों को पोषित करने वाली वैकल्पिक अर्थव्यवस्था संभव है या नहीं? हालात से परेशान होने की बजाय थोड़ा ठहर कर सोचें तो आज सहकारिता एक अच्छा विकल्प है. सहकारिता यानी समाज में साथ मिलकर व्यवसाय करने की एक स्वस्थ परंपरा. कारोबार में किसी एक को लाभान्वित करने की बजाय सबके बीच बराबरी से लाभांश बांटने वाला व्यवसायिक मॉडल ही सहकारिता है. संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2012 को अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष के तौर पर मनाने की घोषणा की है. विश्वव्यापी कार्यक्रमों के माध्यम से दुनिया को सहकारिता की खूबियों से रूबरू कराया जा रहा है. इस जश्न में भारत भी शामिल है. भारत जैसे देश में सहकारिता कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह भारतीयों के आचार-विचार में रची-बसी है. इसे वैदिक काल से व्यवहार में लाया जा रहा है. आधुनिक भारत में हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की बुनियाद सहकारिता पर ही टिकी है. सहकारिता की वजह से ग्रामीण विकास के अलावा देश की एक बड़ी आबादी विविध रोज़गारों से जुड़ी है. यही वजह है कि भारत सहकारिता के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है. देश भर में लगभग छह लाख सहकारी समितियां हैं, जिनसे क़रीब 25 करोड़ लोग जुड़े हैं. ग्राम स्वराज की परिकल्पना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने की थी. उस ग्राम स्वराज की तीन अहम कड़ियां हैं, ग्राम पंचायत, सहकारिता और सर्वशिक्षा. ग़ौरतलब है कि आर्थिक मंदी से जहां कई देश परेशान हैं, वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका ज़्यादा असर नहीं हुआ है. इसकी वजह देश में मौजूद लाखों सहकारी समितियों का होना है. कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में देश की सहकारी समितियां बेहतरीन काम कर रही हैं. इस मामले में गुजरात की दुग्ध उत्पादन संस्था अमूल का नाम अग्रणी है. अमूल की कामयाबी ने भारत को दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया है. भारत की सहकारिता दुनिया के सबसे बड़े आंदोलन के तौर पर विकसित हुई है. कई भारतीय सहकारी संस्थाएं बेहतर प्रबंधन क्षमता के साथ उर्वरक, दुग्ध, मार्केटिंग, उपभोक्ता सामग्री, ऋण एवं बैंकिंग, चीनी, हैंडलूम, हैंडिक्राफ्ट, मत्स्य पालन, श्रम, आवास एवं आदिवासी विकास आदि क्षेत्रों में अच्छा काम कर रही हैं.

उल्लेखनीय है कि भारत का सहकारी आंदोलन ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाली और देश में महाजनी प्रथा खत्म करने के लिए शुरू हुआ था, ताकि किसान बग़ैर किसी चिंता के कृषि कार्य कर सकें. सहकारिता की ताक़त ने ही हरित क्रांति और फिर श्वेत क्रांति को सुखद अंजाम तक पहुंचाया है. अब इसी सहकारिता के बल पर देश के पूर्वी राज्यों में हरित क्रांति का दूसरा अध्याय लिखने की कोशिश की जा रही है. ऐसा नहीं है कि सहकारी संस्थाएं स़िर्फ भारत में ही मौजूद है. दुनिया के कई देशों मसलन, चीन, ब्राजील और स्पेन में सहकारी समितियां बेहतर काम कर रही हैं. अमेरिका में भी सहकारिता की खुशबू है. वहां की सहकारी संस्थाओं को भरपूर सब्सिडी मिल रही है. कई विकसित देशों की सरकारें व्यापक सामाजिक हित का पोषण करने के लिए सहकारी संस्थाओं को सब्सिडी के ज़रिए बढ़ावा दे रही हैं. संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 पारित होने के बाद राज्यों के सहकारी मंत्रियों, सहकारी समितियों के रजिस्ट्रारों, सहकारी निकायों के अध्यक्षों एवं प्रबंध निदेशकों से सुझाव मांगे गए हैं, ताकि इस अधिनियम के प्रावधानों को राज्यों में शीघ्र लागू किया जा सके.

संसद द्वारा पारित नए विधेयक के बाद सहकारी समितियों को यह अधिकार दिया गया है कि चुनाव आयोग की तर्ज़ पर एक विशेष एजेंसी की स्थापना की जाए, जो सहकारी समितियों के चुनाव का संचालन कर सके. यदि विधेयक को पारदर्शी तरीक़े से लागू किया गया तो भारत में सहकारिता आंदोलन और अधिक मज़बूत होगा.

संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 पर एक नज़र

  • सहकारिता भारतीयों का मौलिक अधिकार.
  • सहकारिता एजेंसियों के चुनावों की देखरेख करना.
  • सहकारी बोर्ड के निदेशकों के कार्यकाल में एकरूपता.
  • सहकारी समितियों को कामकाज में पूरी स्वायत्तता.
  • किसी सहकारी समिति में निदेशकों की संख्या कम से कम 21 होनी चाहिए.
  • सहकारी समिति के निर्वाचित बोर्ड सदस्यों और कार्यालय पदाधिकारियों का कार्यकाल चुनाव तिथि के दिन से पांच वर्ष सुनिश्चित.
  • सहकारी समिति के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को छह महीने से अधिक निलंबित नहीं रखा जा सकता.
  • अंकेक्षक स्वतंत्र एवं पेशेवर होना चाहिए.
  • सहकारी समिति के सदस्यों के लिए सूचना का अधिकार क़ानून होना चाहिए.
  • सहकारी समिति के बोर्ड में समाज के कमज़ोर तबक़ों और महिलाओं के लिए पद आरक्षित होना चाहिए.

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

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अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

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