पुरानी तकनीक, कमज़ोर कहानी

समकालीन हिंदी कहानी के परिदृष्य पर नज़र डालें तो युवा कथाकारों ने अपनी कहानियों में शिल्प के अलावा उसके कथ्य में भी चौंकाने वाले प्रयोग किए हैं. आज की नई पीढ़ी के कहानीकारों के पास अनुभव का एक नया संसार है जिसको वे अपनी रचनाओं में व्यक्त कर रहे हैं. इस व़क्त के जो नए कथाकार हैं, उनके अनुभव में आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में जो बदलाव आया है उसको सा़फ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है. कहानियों में अब सर्वहारा की जगह उस युवा ने ले ली है, जो अपने करियर को लेकर बेहद सतर्क है. अपनी गर्ल फ्रेंड को लेकर संजीदा नहीं है, सेक्स जिसके लिए कोई टैबू नहीं है. सहजीवी होना और फिर बात नहीं बन पाने से आगे बढ़ जाने की मानसिकता आम है. इस तरह के खुले विषयों को लेकर कहानियां और उपन्यास लिखे जा रहे हैं. पहले यह माना जाता था कि जो कहानीकार रूप और शिल्प में नयापन पेश करेगा वह पाठकों को अपनी ओर खींच लेगा और आलोचक भी उनकी कृतियों का नोटिस लेने को विवश हो जाएंगे, लेकिन नई पीढ़ी ने जिसमें वंदना राग, मनीषा कुलश्रेष्ठ, जयश्री राय और गीताश्री जैसी कई कहानीकारों ने रूप और शिल्प के अलावा विषय की नई भावभूमि से पाठकों को रूबरू कराया. विषय और अनुभव के नए प्रदेश में पाठकों को ले जाने का कहानीकारों का यह प्रयोग सफल भी हुआ है और हिंदी जगत ने उनका नोटिस भी लिया, पर हिंदी में कुछ कहानीकार ऐसे भी हैं जो पुरानी पद्धति और लीक पर चलते हुए ही कहानियों का सृजन कर रहे हैं. अल्पना मिश्र का कहानी संग्रह- क़ब्र भी क़ैद औ ज़ंजीरें भी उसी तरह के संग्रहों में से एक है. नौ कहानियों के इस संग्रह में अल्पना ने गोरिल्ला तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अपने पाठकों को चौंकाने की कोशिश की है. हिंदी कहानी में यह तकनीक बेहद पुरानी हो चुकी है, जहां अचानक से किसी अनपेक्षित स्थितियों या घटनाओं पर ले जाकर कहानी खत्म कर दी जाती है, ताकि पाठकों को झटका लगे. अल्पना मिश्र के संग्रह की पहली कहानी ग़ैरहाज़िरी में हाज़िर में कथाकार इसी तकनीक का इस्तेमाल करती है. इस कहानी में शुरू से लेकर आखिर तक समाज और अ़फसरशाही में गहरे तक जमी जाति व्यवस्था को उघारते चलती है. फिर भटकते हुए लाल बिंदी के बहाने से समाज की एक और बुराई की तऱफ इशारा करती है, लेकिन जब कथा अपने मुक़ाम पर पहुंच रही होती है तो अंत में नायिका के भाई की अनायास मौत पर कहानी खत्म होती है. पहली नज़र में यह कहानी जाति व्यवस्था पर चोट करती नज़र आती है, लेकिन अंतत: यह एक संस्मरण भर बनकर रह जाती है.

दूसरी कहानी गुमशुदा भी अल्पना मिश्रा की सपाट बयानी का बेहतरीन नमूना है. एक बछड़े की मौत के बहाने वह नेताओं और मीडिया पर कटाक्ष करती हैं, लेकिन कहानी को संभाल नहीं पाती हैं. इस कहानी में अल्पना एक जगह बताती हैं कि एक खबरिया चैनल को एक नेता धमका कर अपनी कवरेज के लिए तैयार कर लेता है. धमकी के बाद चैनल से वहां एक कर्मचारी भेजा जाता है जिसे कैमरा चलाना नहीं आता, लेकिन वह वहां पहुंचकर अपनी उपस्थिति मात्र से चैनल को नेता के प्रकोप से बचा लेता है. यहां तक तो ठीक था, लेकिन उसके बाद अल्पना ने कह दिया कि नेता जी चैनल पर भाषण देकर अ़खबारों को फोन करने लगे. स्थिति बड़ी विकट है जब रिकॉर्डिंग नहीं आती तो नेता का चैनल पर भाषण प्रसारित कैसे हो सकता है. दरअसल लेखिका ने न्यूज चैनलों की वर्किंग पर तवज्जो देने और उसके बारे में पता करने की कोशिश नहीं की और सुनी-सुनाई बातों पर कहानी बुन डाली. कहानी में अल्पना की कल्पना को देखते हुए रूस के मशहूर समीक्षक विक्टर श्क्लोव्सकी के विचार सा़फ तौर पर याद आते हैं जब वह कहते हैं- प्लाट जीवन एवं मानव संबंधों के व्यवस्था क्रम के बारे लेखक की अपनी समझदारी को दर्शाता है. इस कहानी में भी खबरिया चैनल और उसके प्रसारण को लेकर लेखिका की लचर समझ एक्सपोज हो जाती है. बग़ैर जाने अगर स़िर्फ टिप्पणी के लिए टिप्पणी की जाती है तो लिखने वाले की असावधानी पकड़ में आ जाती है. अल्पना की इस कहानी में कथा कई छोरों और कोनों में भटकती हुई जब कसाईबाड़े तक पहुंचती है तो फिर से घटना शॉक देने की कोशिश के साथ खत्म होती है.

पुलिस पर सालों से ये आरोप लगते रहे हैं कि अपराधियों के नाम पर वे निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी दिखाकर वाहवाही लूटती है. जब से देश में आतंकवादी घटनाएं बढ़ी हैं तब से पुलिस पर आतंकवादियों के नाम पर एक खास समुदाय के लोगों को बग़ैर सबूत के गिरफ्तार कर लिए जाने और उन्हें प्रताड़ित करने की बात सामने आती रही है. इस संग्रह की एक कहानी- महबूब ज़माना और ज़माने में वे- भी एक ऐसी ही कहानी है, जिसमें फुटपाथ पर अपना कारोबार करने वाले दो बेक़सूर रहमत और रामसू को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया. इस कहानी और अ़खबार की रिपोर्ट में ज़्यादा फर्क़ नहीं है. इस रिपोर्टनुमा कहानी में लेखिका कुछ और पात्रों के मार्फत कथारस डालना चाहती है, लेकिन पात्रों से प्रभाव पैदा नहीं हो पाता है. इसके अलावा पुष्पक विमान और महबूब ज़माना और ज़माने में वे, का पुलिसवाला और दुकानवाला दोनों का व्यक्तित्व एक सा दिखाया गया है. कहानियों में कहीं न कहीं से खबर, अ़खबार और चैनल आदि भी आ ही जाते हैं. जो ज़बरदस्ती ठूंसे हुए लगते हैं और बहुधा कोई प्रभाव पैदा नहीं कर पाते हैं.

इस संग्रह की एक और कहानी मेरे हमदम, मेरे दोस्त में औरतों के प्रति समाज के नज़रिए को सामने लाया गया है. नायिका सुबोधिनी और उसके पति में अनबन चल रही होती है. इस बात का पता उसके दफ्तर के सहयोगियों को चलता है तो सब उस स्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं और सुबोधिनी में अपने लिए संभावना तलाशते हैं. सुबोधिनी के प्रति सहानुभूति दिखाकर हर कोई उससे नज़दीकी बढ़ाना चाहता है. हर किसी की गिद्ध दृष्टि नारी देह पर लगी होती है. यह भी एक बेहद ही साधारण सी कहानी है, जिसको पढ़ते हुए पाठकों के मस्तिष्क में कोई तरंग उठेगी, उसमें संदेह है. इस संग्रह के अंत में नामवर सिंह का दशकों पहले का एक कथन सर्वथा उपयुक्त होगा-आज भी कुछ कहानीकार नाटकीय अंतवाले कथानकों की सृष्टि करते दिखाई पड़ते हैं, परंतु ये वही लोग हैं, जिनके पास या तो कहने को कुछ नहीं है या फिर जीवन के प्रति उनका अपना कोई विशेष दृष्टिकोण नहीं है. हिंदी में किताबों के ब्लर्ब हमेशा से प्रशंसात्मक ही लिखे जाते हैं और इस संग्रह में ज्ञानरंजन ने उसका निर्वाह किया है.

 

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