तसलीमा सुर्खियों में रहना चाहती हैं

बांग्लादेश की विवादास्पद और निर्वासन का दंश झेल रही लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर से नए विवाद को जन्म दे दे दिया है. तसलीमा ने बंग्ला के मूर्धन्य लेखक और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का बेहद संगीन इल्ज़ाम जड़ा है. तसलीमा ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा- सुनील गंगोपाध्याय किताबों पर पाबंदी के पक्षधर रहे हैं. उन्होंने मेरा और कई अन्य महिलाओं का यौन शोषण किया. वह साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं. शर्म, शर्म. तसलीमा नसरीन के इस ट्विट ने साहित्य जगत में त़ूफान खड़ा कर दिया है. तसलीमा के अलावा लोगों ने सुनील गंगोपाध्याय से इस आरोप पर स़फाई मांगनी शुरू कर दी. सुनील गंगोपाध्याय का क़द साहित्य में बहुत बड़ा है और उन पर इसके पहले इस तरह के आरोप लगे हों, यह ज्ञात नहीं है. इतना अवश्य है कि जब दो हज़ार चार में तसलीमा की आत्मकथा का तीसरा खंड द्विखंडित प्रकाशित हुआ तो साहित्यिक हलक़े में इस तरह की चर्चा हुई थी, लेकिन उस व़क्त किसी का नाम सा़फ तौर पर उभर कर सामने नहीं आया था. अब उस पुस्तक के प्रकाशन के आठ साल बाद तसलीमा ने वरिष्ठ और बुज़ुर्ग साहित्यकार लेखक सुनील गंगोपाध्याय पर खुलेआम आरोप लगाया है. जहां तक तसलीमा के यौन शोषण के आरोप की बात है तो अब एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि वह अब तक इस मसले पर चुप क्यों रहीं. जब उनका यौन शोषण हुआ था तो उस व़क्त उन्होंने हल्ला क्यों नहीं मचाया. तसलीमा ने इस बात का जवाब देते हुए कहा है कि एक उनके साथ कोलकाता के एक होटल में सुनील गंगोपाध्याय ने छेड़छाड़ की. तसलीमा के मुताबिक़, कोलकाता में सुनील अपने एक दोस्त के साथ उनके कमरे में डिनर के लिए आए थे. जब जाने लगे तो उन्होंने विदाई आलिंगन के व़क्तआपत्तिजनक हरकत की थी, लेकिन उस व़क्ततसलीमा सुनील गंगोपाध्याय के रसूख को देखते हुए खामोश रही थीं.

भारत में हमेशा पुलिस के पहरे में रहने वाली तसलीमा ने शोषण के व़क्त पुलिस को इस बात की जानकारी क्यों नहीं दी. उन्होंने ज़रूर इस बात का ज़िक्र किया है कि उनकी आत्मकथा द्विखंडित को बैन करवाने के पीछे सुनील गंगोपाध्याय ही मास्टरमाइंड थे. तसलीमा इतने पर ही नहीं रुकीं और गंगोपाध्याय पर उनको बंगाल से निकलवाने की साज़िश रचने और झूठ बोलने का भी आरोप जड़ दिया है. दरअसल, तसलीमा नसरीन चर्चा और विवादों के केंद्र में बने रहना चाहती भी हैं और जानती भी हैं. जो लोग तसलीमा नसरीन को ट्विटर पर फॉलो करते हैं, उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी है. वह लगातार धर्म, स्त्री-पुरुष संबंधों और पुरुषों के खिला़फ अजीबोग़रीब ट्विटरबाज़ी से चर्चा में आने की जुगत में लगी रहती हैं.

दरअसल तसलीमा और सुनील गंगोपाध्याय के बीच यह पूरा विवाद शुरू हुआ है पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी डॉक्टर नज़रुल इस्लाम की किताब-मुसलमान की करनीय (मुसलमानों को क्या करना चाहिए) से. इस किताब के छपने के बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने बग़ैर किसी इजाज़त के प्रकाशक के गोदाम और दफ्तर पर छापा मारा और उनको जमकर धमकाया. डॉक्टर इस्लाम की किताबों की बिक्री नहीं करने का फरमान जारी कर दिया गया. इस किताब में ममता बनर्जी सरकार की अल्पसंख्यकों के प्रति नीति की आलोचना की गई है और तमाम तर्कों और उदाहरणों के साथ ममता की नीति को वोट बैंक की राजनीति और अल्पसंख्यकों को लुभाने वाली नीति क़रार दिया गया है. पिछले दिनों कई घटनाओं से यह सा़फ हो गया है कि ममता बनर्जी अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं. पहले जब एक टेलीविजन के कार्यक्रम में स्नातक की छात्रा तान्या भारद्वाज ने उनसे महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल पूछा तो उसको माओवादी क़रार देते हुए कार्यक्रम को बीच में छोड़कर चली गई थीं. उसके बाद एक जगह किसानों ने जब उनसे अपनी समस्याओं की बात की तो उनको जेल भेज दिया गया. बीच में फेसबुक पर कार्टून बनाने को लेकर जो हंगामा मचा, वह तो अभी तक सबके ज़ेहन में ताज़ा है.

नज़रुल इस्लाम की इस किताब पर ममता बनर्जी सरकार की अघोषित पाबंदी और पुलिस के प्रकाशक के दफ्तर पर छापा मारने के बाद से पश्चिम बंगाल के कुछ बुद्धिजीवियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. इस विरोध में बयान जारी करने वालों में से एक नाम सुनील गंगोपाध्याय का भी है. उन्होंने इस पाबंदी को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरा बताते हुए तगड़ा विरोध जताया. सुनील गंगोपाध्याय के इस विरोध के बाद तसलीमा नसरीन ने ताबड़तोड़ ट्विट करके यह साबित करने की कोशिश की सुनील गंगोपाध्याय का विरोध स़िर्फ दिखावा मात्र है और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर उनके दो चहरे हैं. तसलीमा ने पहले तो लोगों से अपील की कि वह नज़रुल इस्लाम की अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थन में खड़े हों. इसी क्रम में उन्होंने कहा कि सुनील गंगोपाध्याय का विरोध छद्म है. सुनील गंगोपाध्याय को अभिव्यक्ति की आज़ादी से कोई लेना-देना नहीं है. तसलीमा ने अपनी किताब का हवाला देते हुए कहा कि सुनील गंगोपाध्याय ने बुद्धदेव भट्टाचार्य की तत्कालीन सरकार पर दबाव डालकर उनकी किताब द्विखंडित पर पाबंदी लगवाई थी. द्विखंडित को बुद्धदेव सरकार ने धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में बैन कर दिया था. बाद में मामला कोर्ट में गया और कलकत्ता हाईकोर्ट ने पहले तो कुछ विवादित अंशों को हटाकर किताब से बैन हटा दिया था. जब द्विखंडित हिंदी में छपा तो कई जगह खाली बॉक्स बनाकर यह लिख दिया गया था कि कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा प्रतिबंधित पाठ्य सामग्री यहां नहीं छापी गई है. बाद में कोर्ट ने उन प्रतिबंधित अंशों को प्रतिबंध से मुक्त कर दिया था और कथित विवादास्पद अंशों को भी छापने की इजाज़त दे दी थी.

दरअसल अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ लेकर लेखक अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं. नज़रुल इस्लाम की किताब पर जब पाबंदी लगी तो तसलीमा को उसमें अपना पुराना हिसाब चुकाने की संभावना नज़र आई. तमाम मुद्दों पर मुखर रहने वाली तसलीमा आमतौर पर भारत के साहित्यिक मसलों पर खामोश ही रहती हैं, लेकिन नज़रुल के मामले में जब सुनील गंगोपाध्याय ने विरोध जताया तो वह भी कूद पड़ीं और उन पर यौन शोषण का आरोप जड़ दिया. उसका नतीजा क्या हुआ, पूरे देश और मीडिया का ध्यान मूल प्रश्न से हटकर यौन शोषण पर केंद्रित हो गया. सारी बहस उस दिशा में मुड़ गई और अभिव्यक्ति की आज़ादी का बड़ा प्रश्न आरोप-प्रत्यारोप में गुम सा गया. बाद में जब तसलीमा से इस बात पर सवाल-जवाब किए गए तो उन्होंने कहा कि आई हैव हर्ड दैट सुनील हैज डन इट टू मैनी वूमन. अब सुनी सुनाई बातों पर किसी का चरित्र हनन करना कहां तक जायज़ है. अब तसलीमा यह भी स़फाई दे रही हैं कि इस यौन शोषण की अभिव्यक्ति उन्होंने एक कविता रास्तेर छेले इबोंग कोबी लिखकर की थी. उनकी यह कविता उनके संग्रह खाली खाली लगे में संग्रहीत है.

सवाल यह उठता है कि तसलीमा इस तरह के प्रश्न उठाकर या आरोप लगाकर क्या हासिल करना चाहती हैं. इस बात की पड़ताल होनी चाहिए. बांग्ला के कई लेखक इस आरोप की टाइमिंग पर सवाल खड़े कर रहे हैं. टाइमिंग पर सवाल होना लाज़िमी है. इस व़क्त सुनील गंगोपाध्याय साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं. अकादमी का उनका कार्यकाल विवादित नहीं रहा है. क्या इसके पीछे साहित्य अकादमी की राजनीति है. क्या तसलीमा के इस बयान के निहितार्थ और भी हैं. क्या तसलीमा नसरीन नज़रुल इस्लाम की किताब के बहाने अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकाल रही हैं. क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी के बड़े प्रश्न की आड़ में व्यक्तिगत झगड़ों का बदला चुकाया जा रहा है. या फिर सच में तसलीमा के साथ ऐसा हुआ था जिस पर उन्होंने सालों बाद मुंह खोला है. लेकिन इतना तो तय है कि तसलीमा के इन आरोपों की गूंज देर तलक सुनाई देगी. हो सकता है साहित्य अकादमी के चुनाव के व़क्त भी इसकी अनुगूंज सुनाई दे. हैरानी की बात नहीं है कि इस मामले में लेखकों की जमात से किसी तरह का कोई स्टैंड सामने नहीं रहा. लेखक संगठनों की चुप्पी भी चकित करने वाली है. महिला अधिकारों के लिए गलाफाड़ कर चिल्लाने वाले संगठन भी खामोश क्यों हैं. क्या लेखक संगठनों को यह सवाल या आरोप बड़ा नहीं लगता. या फिर किसी पॉलिटिक्स के तहत लेखक संगठनों ने चुप्पी साध रखी है. लेखकों के इन संगठनों ने तो तसलीमा के बंगाल निष्कासन से लेकर उनकी किताब पर पाबंदी लगाने के व़क्त भी चुप्पी साध ली थी. अपनी पार्टी का क़र्ज़ चुका रहे थे, लेकिन अब व़क्त आ गया है कि वे संगठन इस मसले में हस्तक्षेप करें और आरोपों के धुंध को सा़फ करने में एक भूमिका निभाएं.

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2 thoughts on “तसलीमा सुर्खियों में रहना चाहती हैं

  • November 26, 2012 at 7:48 PM
    Permalink

    सुनील गंगोपाध्याय दूध के धुले हैं या नहीं भगवान ही जाने , इस से इतर बात कहना चाहता हूँ, आज कल एक नया चलन चल पड़ा है; मीडिया के सामने आकर ऊट पटांग बकते रहो, मीडिया आपको सर आँखों पर चढ़ा लेगा, लोग आपको जानने लगेंगे और आप एक जानी मानी हस्ती बन जायेंगे भले ही आपने एक चूहा भी न मारा हो. तसलीमा नसरीन, अरुंधती रे, राखी सावंत, दिग्विजय सिंह, राज ठाकरे, कुछ ऐसे ही नाम हैं.

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  • November 10, 2012 at 6:42 PM
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    लेखकों का एक बहुत बड़ा वर्ग शब्दों के दुरूपयोग को ही अपना व्यवसाय बना चुका है ऐसे लेखक समय के साथ स्वयं ही लेखकवर्ग से निष्कासित हो जातें हैं l

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