लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है. इसीलिए सरकार ने वह सब करना शुरू कर दिया है, जो भारतीय संविधान की आत्मा ही नहीं, उसमें लिखे शब्दों के भी विपरीत है. सरकार ने बिना संविधान को बदले या बिना संविधान में संशोधन किए उसमें लिखे सोशलिस्ट शब्द की हत्या कर दी और बिना देश को बताए कल्याणकारी राज्य की जगह बाज़ार द्वारा नियंत्रित एवं निर्देशित राज्य की स्थापना कर दी. लालकृष्ण आडवाणी, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान, प्रकाश करात, ए बी वर्द्धन, चंद्रबाबू नायडू, करुणानिधि, जयललिता, मायावती एवं देवगौड़ा जैसे नेता इस पूरे दौर में निष्क्रिय भी रहे और ख़ामोश भी रहे.

देश की जनता की याददाश्त कमज़ोर है, ऐसा राजनेता मानते हैं. इसीलिए 1992 में जब नई आर्थिक नीति का ऐलान तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने किया था तो उन्होंने कहा था कि देश का आधारभूत ढांचा टूटा हुआ है और इसका तेजी से निर्माण करने के लिए नई आर्थिक नीति की आवश्यकता है. बीस सालों में देश का कायाकल्प हो जाएगा, पर हुआ इससे बिल्कुल उल्टा. देश में पैसा आया, लेकिन वह प्रायोरिटी सेक्टर की जगह कंज्यूमर सेक्टर में लगा. देश में टेलीविजन, कार, कपड़े एवं मोबाइल सहित कंज्यूमर आइटम्स की भरमार हो गई, लेकिन सड़क, अस्पताल, शिक्षा, संचार और उद्योग वहीं के वहीं खड़े रहे. बिजली का कहीं अता-पता नहीं. पानी सिंचाई की छोड़ दें, पीने के लिए भी ख़त्म हो रहा है. अब आर्थिक सुधारों के नाम पर देश को बेचने की साजिश रचने वाले नौकरशाह राजनेताओं के मुंह से कहलवा रहे हैं कि एफडीआई इसलिए ज़रूरी है, ताकि देश में सड़कों का, कोल्ड स्टोरेज का निर्माण हो सके और किसानों को सीधा फायदा हो सके. किसान को सीधा फायदा होने से मतलब किसान को पैसे देकर उसकी ज़मीन हड़पना है.

क्या यह माना जाए कि भारतीय संविधान के निर्माताओं में प्रमुख रहे बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, पंडित जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, श्री राजगोपालाचारी, सरदार पटेल एवं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे लोगों के पास दूरदर्शिता नहीं थी और न उनमें भारतीय समाज की समस्याओं को समझने लायक़ अक्ल थी. क्या हम यह भी मान लें कि आज की सरकार के मंत्री और विपक्षी नेता ही भारतीय समाज के अंतर्विरोधों को समझते हैं. पहले के नेता कम ज्ञानवान थे या शायद उनमें भविष्य को पहचानने की समझ नहीं थी. अगर ऐसा होता तो आज भारत में विषमता नहीं बढ़ती, महंगाई नहीं बढ़ती, भ्रष्टाचार सर्वव्यापी नहीं होता और न अवसरों के समाप्त होने का ख़तरा पैदा होता. देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती और देश समग्र रूप से विकास कर रहा होता.

देश की जनता की याददाश्त कमज़ोर है, ऐसा राजनेता मानते हैं. इसीलिए 1992 में जब नई आर्थिक नीति का ऐलान तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने किया था तो उन्होंने कहा था कि देश का आधारभूत ढांचा टूटा हुआ है और इसका तेजी से निर्माण करने के लिए नई आर्थिक नीति की आवश्यकता है. बीस सालों में देश का कायाकल्प हो जाएगा, पर हुआ इससे बिल्कुल उल्टा. देश में पैसा आया, लेकिन वह प्रायोरिटी सेक्टर की जगह कंज्यूमर सेक्टर में लगा. देश में टेलीविज़न, कार, कपड़े एवं मोबाइल सहित कंज्यूमर आइटम्स की भरमार हो गई, लेकिन सड़क, अस्पताल, शिक्षा, संचार और उद्योग वहीं के वहीं खड़े रहे. बिजली का कहीं अता-पता नहीं. पानी सिंचाई की छोड़ दें, पीने के लिए भी ख़त्म हो रहा है. अब आर्थिक सुधारों के नाम पर देश को बेचने की साजिश रचने वाले नौकरशाह राजनेताओं के मुंह से कहलवा रहे हैं कि एफडीआई इसलिए ज़रूरी है, ताकि देश में सड़कों का, कोल्ड स्टोरेज का निर्माण हो सके और किसानों को सीधा फायदा हो सके. किसान को सीधा फायदा होने से मतलब किसान को पैसे देकर उसकी ज़मीन हड़पना है. पिछले बीस सालों में किसान की ज़मीन एक बड़े खजाने में तब्दील हो गई है और इसी खजाने को हड़पने का काम आज का बाज़ार करने जा रहा है. मौजूदा सरकार इसका खुलकर साथ दे रही है.

अ़फसोस इस बात का है कि भारतीय राजनीति के प्रमुख तत्व राजनीतिक दलों के नेताओं से आशा करना व्यर्थ है कि वे संविधान की पुनर्स्थापना की मांग उठाएंगे. अगर उन्हें आवाज़ उठानी होती तो वे अब तक उठा चुके होते. क्या मान लें कि पूरा राजनीतिक तंत्र न केवल भारतीय संविधान, बल्कि भारतीय जनता के हितों के ख़िला़फ खड़ा हो गया है, परिणाम तो ऐसा ही संकेत देते हैं. तो जनता फिर क्या करे, आवाज़ उठाए या हथियार उठाए? आवाज़ उठाने पर सरकार आवाज़ नहीं सुनती, शांतिपूर्ण ढंग से किए जाने वाले आंदोलन सरकार को परेशान नहीं करते, सरकार उनका नोटिस नहीं लेती और वहीं आंदोलन जब हिंसक हो जाते हैं तो सरकार फौरन आश्वासन देने लगती है. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक यही हो रहा है. इतना ही नहीं, जनता की तकलीफों को लेकर आवाज़ उठाने वाले संगठन के लोग देशद्रोही मान लिए जाते हैं. आतंकवादियों और देश विरोधी ताक़तों की जासूसी करने की जगह उनकी जासूसी होती है, जो जनता की तकलीफें सरकार को बताना चाहते हैं. उनके टेलीफोन चौबीसों घंटे टेप होते हैं. सरकार यह संदेश दे रही है कि जब तक हिंसा नहीं होगी, तब तक उसके कानों में आवाज़ नहीं पहुंचेगी.

सरकारों को यह नहीं करना चाहिए, क्योंकि जो काम केंद्र सरकार दिल्ली में कर रही है, वही काम राज्य सरकारें राज्यों में कर रही हैं. और संयोग यह है कि कोई न कोई पार्टी कहीं न कहीं सरकार में हिस्सेदार है. हम विनम्रता से यह कहना चाहते हैं कि ऐसा करना लोकतंत्र के विपरीत है और कृपा करके लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए. लोकतंत्र के साथ अगर आप खेलेंगे तो इतिहास आपको कभी मा़फ नहीं करेगा और आने वाली पीढ़ियां आपको वैसे ही याद करेंगी, जैसे देशद्रोहियों को याद किया जाता है. इसलिए लोकतंत्र और संविधान के लिए सशक्त आवाज़ उठनी ज़रूरी है. यह आवाज़ कौन उठाएगा? इस आवाज़ को उठाने की पहली ज़िम्मेदारी आम लोगों की है, आम लोगों को आवाज़ उठाने के लिए संगठित करना पहला काम है. अगर यह काम राजनीतिक दल नहीं करते तोे फिर इसे करने का ज़िम्मा अन्ना हजारे, बाबा रामदेव एवं जनरल वी के सिंह जैसे लोगों को लेना चाहिए. आप जनता के बीच आशा जगाएं और फिर किनारे खड़े हो जाएं, ऐसा नहीं होना चाहिए. अगर जनता आपके ऊपर भरोसा करती है तो आपको भी अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए. इसलिए ज़रूरी है कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव एवं जनरल वी के सिंह एक साथ देश में घूमना शुरू करें और आम जनता को संविधान तथा लोकतांत्रिक परंपराओं की पुनर्स्थापना के लिए जाग्रत करें. वे जनता से कहें कि अब वक़्त आ गया है कि उसे लोकसभा में ऐसे उम्मीदवार भेजने चाहिए, जो इन मांगों को पूरा कर सकें. कैसे उम्मीदवार चुनने चाहिए और क्या उसका पैमाना होना चाहिए, इसका फैसला भी अब जनता को लेना चाहिए.

क्या भारत का नौजवान स़िर्फ राजनीतिक नेताओं की जिंदाबाद बोलने के लिए है या उसकी हिस्सेदारी भी कभी राजनीतिक प्रक्रिया में होगी? अट्ठारह साल की उम्र में उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह सीमा पर बंदूक लेकर खड़ा हो और देश के लिए अपनी जान दे दे, पर उसे सरकार चलाने योग्य नहीं समझा जाता. आवश्यकता इस बात की है कि युवा भी देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझें और समाज में संविधान की पुनर्स्थापना के प्रति शपथ लें.

 

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.