अन्ना हजारे की प्रासंगिकता बढ़ गई

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की पूरी कोशिश है कि अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे आपस में लड़ जाएं. अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे इस तथ्य को कितना समझते हैं, पता नहीं. लेकिन अगर उन्होंने इसके ऊपर ध्यान नहीं दिया, तो वे सारे लोग जो उनके प्रशंसक हैं, न केवल भ्रमित हो जाएंगे, बल्कि निराश भी हो जाएंगे.

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी इस समय किसी भी तरह अपने ऊपर लगे आरोपों से छुटकारा चाहती है और इसके लिए अन्ना और अरविंद केजरीवाल को आपस में लड़ाने से बेहतर कोई रास्ता नहीं है. अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और मनीष सिसोदिया जिस तरह अपनी रणनीति बना रहे हैं, शायद वह रणनीति अन्ना के कुछ साथियों को पसंद नहीं आ रही है. अरविंद केजरीवाल के कुछ समर्थक जो ख़ुद को प्रशांत भूषण और मनीष सिसोदिया के समकक्ष लाना चाहते हैं, वे भी यह कोशिश कर रहे हैं कि अगर वे अन्ना हजारे के क़दमों की आलोचना करेंगे, तो उन्हें बड़ा नेता मान लिया जाएगा. ऐसा ही अन्ना हजारे के कुछ समर्थकों को लग रहा है कि वे अरविंद केजरीवाल की जितनी

आलोचना करेंगे, उतना ही उन्हें अन्ना के क़रीब माना जाएगा. हक़ीक़त यह है कि दोनों ही पक्षों के लोग जाने-अनजाने में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के विरोधियों के हाथों में खेल रहे हैं.

टेलीविजन इसका एक बड़ा माध्यम है. कुछ लोग हैं, जिन्हें न समाज में घटित हो रही घटनाओं के कारणों का पता है और न वे आम आदमी के दर्द से परिचित हैं, वे लोग टेलीविजन चैनलों पर आते हैं और देश के अंतर्विरोधों पर चर्चा करते हैं. यह दोनों माध्यमों में हो रहा है. अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनलों पर और हिंदी न्यूज़ चैनलों पर. टेलीविजन चैनलों को भी इसमें मज़ा आता है, क्योंकि वे उन्हें बुलाने की ज़्यादा कोशिश करते हैं, जिनके पास सतही ज्ञान होता है. वैसे तो किसी भी विषय पर बोलने वालों के साथ यह स्थिति लागू होती है, पर आज हम बात अन्ना और केजरीवाल के साथियों और सहयोगियों की कर रहे हैं.

अन्ना हजारे की ज़िम्मेदारी अरविंद केजरीवाल से ज़्यादा है. अन्ना हजारे जिन मूल्यों के लिए लड़ रहे हैं, उन मूल्यों का संदर्भ, उन मूल्यों का महत्व और उन मूल्यों की प्रासंगिकता अन्ना को अपने साथियों को भी समझानी पड़ेगी, क्योंकि राजनीति और समाज को बदलने के शब्दों के पीछे के अर्थ को जाने बिना बात संप्रेषित नहीं हो सकती. अन्ना को अपने सारे कोर कमेटी के लोगों को गांधीवाद, समाजवाद, संविधान, ग़रीब, किसान, मज़ूदर, दलित, वंचित, पिछड़े, आदिवासी और मुसलमानों के हितों के बीच की समानता और इस समानता के साथ चलने वाले विरोधाभासों को बहुत गहराई से समझाना होगा.

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में विपक्ष के इस ख़ाली स्थान को भरा है, जिसे भारतीय जनता पार्टी ने ख़ाली कर दिया था. विपक्ष का सही मतलब न स़िर्फ लोगों के दुख-दर्द और तकलीफ़ से जुड़े सवालों को मीडिया में उठाना है, बल्कि उन्हें साथ लेकर सरकार के सामने खड़े होना भी है. यह काम दिल्ली राज्य में भारतीय जनता पार्टी को करना चाहिए था, लेकिन भारतीय जनता पार्टी पिछले तीन चुनावों की हार की वजह से इतनी निराश हो गई है कि उसने विरोध के रीचुवल करने भी बंद कर दिए हैं. अरविंद केजरीवाल ने इस स्थान को न केवल भरा है, बल्कि इसे पुख्ता भी किया है. आज दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का जब भी प्रदर्शन होता है, तो उसमें उनके कार्यकर्ता नहीं होते, क्योंकि अरविंद केजरीवाल के पास अभी कार्यकर्ता हैं ही नहीं. इसमें आम जनता से अपने आप आए हुए लोग होते हैं, जो सर पर मैं आम आदमी हूं, लिखी हुई टोपी पहनकर अरविंद केजरीवाल के कार्यकर्ता बन जाते हैं. अपनी समस्याओं को हल कराने के लिए सरकार के सामने सक्रिय विरोध करने का यह जनता का वह तरीक़ा है, जो मौजूदा राजनीतिक तंत्र के ख़िलाफ़ जाता है. इसका सीधा मतलब है कि जनता मौजूदा राजनीतिक दलों के क्रिया-कलापों को पसंद नहीं कर रही है.

जब अन्ना हजारे ने अरविंद केजरीवाल से अलग आंदोलन का रास्ता अपनाने की नई राह पकड़ी तो सत्ता और विरोध पक्ष के लोग तो खुश हुए ही, मीडिया के वे लोग भी खुश हुए, जो सत्ता और विपक्ष में ही सारी राजनीति देखते हैं. अब जब अन्ना हजारे ने 29 अक्टूबर को मुंबई में  जनरल वीके सिंह के साथ मिलकर देश की संसद को भंग करने की मांग की और यह मांग न माने जाने के फलस्वरूप संसद भंग करने के लिए आंदोलन करने की घोषणा भी की, तो वे सारे लोग परेशान हो गए, जिनका स्वार्थ मौजूदा राजनीतिक दलों में है. ये चाहते हैं कि अन्ना और वी के सिंह देश में न घूमें, स़िर्फ सामाजिक आंदोलन चलाएं. राजनीतिक सवालों को एक किनारे रख दें. उनकी एक दूसरी कोशिश और शुरू हो चुकी है और वह है अन्ना हजारे और वी के सिंह को अलग करना. इसके लिए खुले और छुपे दोनों तरीक़ों से कोशिशें हो रही हैं. कुछ अ़खबार और कुछ टेलीविजन चैनल तथा कुछ कॉलमनिस्ट किसी भी तरह इस अपवित्र काम को पूरा करना चाहते हैं. शायद देश के कुछ बड़े पैसे वाले भी अन्ना हजारे के खतरे को महसूस कर रहे हैं. इसलिए वह अन्ना हजारे की धार को भोथरा करना चाहते हैं या फिर अन्ना की गति को धीमा करना चाहते हैं. इसके लिए अन्ना के सहयोगियों पर जाल फेंकने की उनकी कोशिशें जारी हैं.

अन्ना हजारे की ज़िम्मेदारी अरविंद केजरीवाल से ज़्यादा है. अन्ना हजारे जिन मूल्यों के लिए लड़ रहे हैं, उन मूल्यों का संदर्भ, उन मूल्यों का महत्व और उन मूल्यों की प्रासंगिकता अन्ना को अपने साथियों को भी समझानी पड़ेगी, क्योंकि राजनीति और समाज को बदलने के शब्दों के पीछे के अर्थ को जाने बिना बात संप्रेषित नहीं हो सकती. अन्ना को अपने कोर कमेटी के सारे लोगों को गांधीवाद, समाजवाद, संविधान, ग़रीब, किसान, मज़ूदर, दलित, वंचित, पिछड़े, आदिवासी और मुसलमानों के हितों के बीच की समानता और इस समानता के साथ चलने वाले विरोधाभासों को बहुत गहराई से समझाना होगा. अगर अन्ना अपने सहयोगियों को यह बात नहीं समझाएंगे, तो अन्ना भले ही कहते रहें कि अब उन्हें समाज, राजनीति और व्यवस्था बदलनी है, पर उनके साथी कहते रहेंगे कि सीबीआई को निष्पक्ष करो या सीबीआई के काम जनलोकपाल को दे दो. जनलोकपाल समाज बदलने के हथियार के तौर पर एक तरह का काम करेगा और सुपर इंवेस्टीगेटिव एजेंसी के तौर पर दूसरा काम करेगा, यानी वह इस व्यवस्था को ही मज़बूत करने का काम शायद ही करे.

मुझे ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल इस परेशानी को बारीकी से समझते हैं. उनकी ज़िम्मेदारी भी सबसे ज़्यादा है और अगर इस ज़िम्मेदारी को निभाने में ज़रा भी चूक हुई, तो देश के लोगों का विश्वास बदलाव की भाषा से उठ जाएगा.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

One thought on “अन्ना हजारे की प्रासंगिकता बढ़ गई

  • December 6, 2012 at 10:07 PM
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    जहां अंना गांधीवाद के प्रतिक बने हुए हैं वही अरविंद एक क्रांतिकारी की भूमिका में नजर आते हैं । यह लोकतंत्र के लिए मैं बहुत अच्छा समय मानुगां क्योंकि जहां एक तरफ संडक की लडाईं संसद में पहिंच गईं हैं वही एक बार फिर अंना टीम संडक पर जनता के लिए लडती दिखेंगी । जहां तक आपसी बिबाद का सवाल हैं तो फिलाल अंना ने यह कह कर सभी विबादो पर पर्दा डाल दिया हैं कि रास्तें भलें ही अलग -अलग हों पर मजिंल एक हैं । अगर सब कुछ ठीक रहा तो 2014 का चुनाव एक नए जनतंत्र का चयन करेंगा । जहां शायद भूखी नंगी जनता को अपना हक मिल सकें और इस सडीं -गली व्यवस्था से मुक्ति । नेता कहलानें वाले बेसहारों का सहारा छिननें वालों किसानों की जमीन हडपनें वालों को सजा । देश एक बार फिर आजादी का सपना देख रहा हैं । मगर एक सवाल और भी हैं क्या यह सपना सकार हो पाएगां या इसका अंजाम भी जय प्रकाश नारायण की क्रांति जैसा ही होगा ।

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