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कांग्रेस में अपनी ढपली-अपना राग : राहुल गांधी की फिक्र किसी को नहीं

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कांग्रेस में राहुल गांधी के भविष्य की चिंता किसी को नहीं है. अगर है, तो फिक़्र अपने-अपने मुस्तकबिल की. पार्टी में रणनीतिकार की भूमिका निभाने वाले कई नेताओं के लिए राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की बजाय एक मोहरा भर हैं. राहुल गांधी की आड़ में उक्त नेता कांग्रेस पार्टी पर अपनी हुकूमत चलाना चाहते हैं. लिहाज़ा उनके बीच घमासान इस बात का नहीं है कि आम चुनावों से पहले पार्टी की साख कैसे बचाई जाए, बल्कि लड़ाई इस बात की है कि राहुल गांधी को अपने-अपने कब्ज़े में कैसे रखा जाए, ताकि सरकार और पार्टी उनके इशारों पर करतब दिखाए. उधर हर तऱफ से शिकस्त पाए राहुल गांधी अब कोई और जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं हैं. पार्टी की रणनीतियों के मसले पर अब वह अपनी मां सोनिया गांधी की भी नहीं सुनना चाहते. राहुल गांधी ने सोनिया गांधी को स्पष्ट कर दिया है कि अब उन्हें दिग्विजय सिंह एवं अहमद पटेल की शागिर्दी और सलाहों की कोई ज़रूरत नहीं है. बावजूद इसके राहुल गांधी पर अपना-अपना हक़ जताने को लेकर सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल और राहुल गांधी के राजनीतिक गुरु कहे जाने वाले दिग्विजय सिंह के बीच टशन जारी है. दोनों ही गुट शह और मात का खेल खेलने में लगे हैं, क्योंकि सवाल पार्टी में उनके वजूद का है. फिलहाल दिग्विजय सिंह की पूछ कम हो चुकी है और अहमद पटेल के भी हाशिए पर जाने के आसार साफ़ नज़र आ रहे हैं.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में बुरी तरह मुंह की खाने के बाद बेहद हताश और निराश कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी जब मीडिया के सामने खड़े होकर अपनी हार स्वीकार कर रहे थे, उस वक़्त पार्टी के कई प्रमुख रणनीतिकार एवं कद्दावर नेताओं के घर के अंदर ख़ुशी का माहौल था. ये वे लोग थे, जिनकी उत्तर प्रदेश चुनावों में नहीं चली थी या राहुल गांधी ने उनकी एक नहीं सुनी थी. कांग्रेस की क़रारी हार के बाद भी जश्न मनाने वाले इन नेताओं को ख़ुशी इस बात की थी कि कम से कम अब राहुल गांधी की कमान दिग्विजय सिंह के हाथों से निकल कर उनके नियंत्रण में आ जाएगी और हुआ भी ऐसा ही. राहुल गांधी के राजनीतिक गुरु कहे जाने वाले दिग्विजय सिंह हाशिए पर चले गए और सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की आमद-रफ़त राहुल गांधी के यहां बढ़ गई. पर कुछ दिन बीतते-बीतते अब अहमद पटेल का जादू भी राहुल के सिर से उतर चुका  है. खबर है कि अभी तक इनकार करते आ रहे राहुल गांधी अब देश के प्रधानमंत्री पद की भूमिका निभाने के लिए बिल्कुल तैयार हैं, पर उन्हें अहमद पटेल और दिग्विजय सिंह के सहारे की कोई ज़रूरत नहीं है. हां, राहुल गांधी को एक वैसे शख्स की तलाश ज़रूर है, जो पार्टी के लिए प्रणब मुखर्जी की तरह वक़्त-बेव़क्त संकट मोचक की भूमिका निभा सके और फिलहाल मिल रही जानकारी के मुताबिक़, जनार्दन द्विवेदी के नाम पर ग़ौर किया जा रहा है. उत्तर प्रदेश में रीता बहुगुणा जोशी को हटाकर निर्मल खत्री की ताजपोशी जनार्दन के कहने पर ही की गई और इस सिलसिले में दिग्विजय सिंह से सलाह-मशविरा तक नहीं किया गया.

उत्तर प्रदेश में आठ जोनल प्रभारियों की नियुक्ति के समय भी राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह को किनारे ही रखा. दिग्विजय सिंह से उत्तर प्रदेश एवं असम का प्रभार भी ले लिया गया. असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने पार्टी हाईकमान से मिलकर दिग्विजय सिंह की शिकायत की थी. उन्होंने कहा था कि प्रदेश में दिग्विजय सिंह की गतिविधियां पार्टी के हित में नहीं हैं, वह जातीयता और गुटबंदी को बढ़ावा दे रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में आठ जोनल प्रभारियों की नियुक्ति के समय भी राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह को किनारे ही रखा. दिग्विजय सिंह से उत्तर प्रदेश एवं असम का प्रभार भी ले लिया गया. असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने पार्टी हाईकमान से मिलकर दिग्विजय सिंह की शिकायत की थी. उन्होंने कहा था कि प्रदेश में दिग्विजय सिंह की गतिविधियां पार्टी के हित में नहीं हैं, वह जातीयता और गुटबंदी को बढ़ावा दे रहे हैं. दिग्विजय सिंह के खिला़फ आ रही शिकायतों और उनकी कमज़ोर होती स्थिति का फायदा उठाने की सोचकर अहमद पटेल ने राहुल गांधी को अपने कब्ज़े में करने की कोशिश की. वह कुछ कामयाब भी हुए. कुछ वक़्त तक अहमद पटेल राहुल गांधी के अघोषित सलाहकार भी रहे, पर राहुल गांधी अहमद पटेल के भी क्रियाकलापों और सलाहों से संतुष्ट नज़र नहीं आए, ख़ासकर कोलगेट मामले में अहमद पटेल का नाम आने के बाद. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अहमद पटेल से इस मसले पर नाराज़ चल रहे हैं. उन्होंने सोनिया गांधी से ख़ास तौर पर मिलकर उन्हें इस बात से वाकिफ कराया कि उनके तत्कालीन सचिव टीकेए नायर ने अहमद पटेल के कहने के मुताबिक़ ही आवंटन के निर्णय लिए थे. हालांकि अहमद पटेल ने इस बात से साफ़ इनकार किया था कि उनका इस मसले से कोई लेना-देना भी है, पर 10 जनपथ के क़रीबी बताते हैं कि प्रधानमंत्री की शिकायत को सोनिया गांधी ने बेहद गंभीरता से लिया था और तुरंत कार्यवाही करने का भरोसा भी दिलाया था. सोनिया गांधी ने अहमद पटेल को बुलाकर कहा कि वह कोल ब्लॉक आवंटन में उनकी दख़लंदाजी से नाराज़ हैं. अब चूंकि कांग्रेस की सत्ता का केंद्र सोनिया गांधी से खिसक कर राहुल गांधी के पास आने वाला है, लिहाज़ा राहुल गांधी की पसंद-नापसंद अब सोनिया गांधी से ज़्यादा मायने रखने लगी है. यही वज़ह है कि कोलगेट हंगामे के बाद जब सोनिया गांधी ने पार्टी की रणनीति तय करने के लिए रणनीतिकारों की बैठक बुलाई, तब उसमें राहुल गांधी के साथ माखन लाल फोतेदार, आर के धवन एवं सुमन दुबे वगैरह तो हाज़िर थे, पर अहमद पटेल और दिग्विजय सिंह नज़र नहीं आए. इन दोनों की ग़ैर हाज़िरी और पार्टी आलाकमान से बढ़ती दूरियों का फायदा उठाने की फ़िराक में राजीव शुक्ला और सुरेश पचौरी जैसे नेता राहुल गांधी की परिक्रमा में लगे हैं, लेकिन राहुल फिलहाल इन दोनों के नाम पर विचार भी नहीं करना चाहते. राजीव शुक्ला अभी भी कनिष्ठ श्रेणी के नेताओं में आते हैं, उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता और सुरेश पचौरी के विरोधी बहुत हैं. हालांकि राहुल गांधी ने इस बाबत राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिलकर भी सलाह-मशविरा किया. दादा ने उन्हें ग़ुलाम नबी आज़ाद और सुशील कुमार शिंदे के नाम का प्रस्ताव दिया. पर जो खबर मिल रही है, उसके मुताबिक़, ये दोनों भी राहुल की थ्योरी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं. हालांकि ग़ुलाम नबी आज़ाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेहद भरोसे के माने जाते हैं और उनके पास पार्टी से जुड़े फैसले लेने के बड़े अहम अधिकार हैं. अपनी आने वाली नई भूमिका एवं ज़िम्मेदारियों के तहत राहुल अपनी एक नई और मज़बूत टीम बनाना चाह रहे हैं, जो ज़मीनी हक़ीक़त से जुड़ी हो और जिसे आमजनों के सरोकारों और निहितार्थों की बखूबी खबर हो. राहुल पुराने घाघ और मठाधीश किस्म के कांग्रेसी नेताओं के साथ काम करने के बिल्कुल ख्वाहिशमंद नहीं हैं. शायद इसी वज़ह से राहुल ने अपनी एक नई टीम बना ली है, जिसके सदस्य बाक़ायदा वैतनिक हैं. उन्हें वेतन, टीए-डीए एवं मोबाइल सब कुछ मिलता है. इस टीम में राजनीतिक और ग़ैर राजनीतिक लोग शामिल हैं. राहुल अपनी इस युवा टीम के साथ अपनी नई और बड़ी भूमिका में अभिनव प्रयोग करने के लिए उतावले हैं. राहुल के क़रीबी लोग बताते हैं कि हर तऱफ से हारने के बाद राहुल अब हवाई बातें नहीं करते.

दरअसल, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में ज़मीन से कटे राहुल ने अपनी उड़ानों की असलियत जान ली है. राहुल को अच्छे सहयोगियों एवं कार्यकर्ताओं की ज़रूरत इसलिए भी है, क्योंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपनी एक कोर टीम तैयार कर ली है, जो सरकार के लिए डैमेज कंट्रोल का भी काम करेगी. मनमोहन सिंह की इस टीम ने अपनी रणनीति पर बाक़ायदा अमल करना भी शुरू कर दिया है. सरकार और पार्टी के बीच लंबे समय से दरार पड़ी है, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है. मनमोहन सिंह अपनी टीम के बूते सरकार के साथ-साथ पार्टी पर भी हावी न हो जाएं, सोनिया और राहुल को डर इस बात का भी है. मनमोहन सिंह की इस कोर टीम में टीकेए नायर, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, पी चिदंबरम, पुलक चटर्जी, सुशील कुमार शिंदे, पवन बंसल एवं नारायणसामी हैं. मज़ेदार बात यह है कि कुछ वक़्त पहले तक पी चिदंबरम एवं मनमोहन सिंह के ख़ासमख़ास रहे कपिल सिब्बल को निकाल बाहर किया गया है. कपिल को इस कोर टीम में तो क्या, इससे जुड़ी गतिविधियों के इर्द-गिर्द फटकने की भी इजाज़त नहीं है.

प्रधानमंत्री ने सुशील कुमार शिंदे को गृहमंत्री होने के नाते साथ ज़रूर रखा है, पर चूंकि वह सोनिया गांधी के ज़्यादा क़रीब हैं, इसलिए उन्हें कोर टीम की महत्ती ज़िम्मेदारियों से अलग ही रखा गया है. मनमोहन सिंह की यह टीम रात के अंधेरे में अपना काम शुरू करती है. रात दस बजे के बाद इस टीम के सदस्य पार्टी के ख़ास-ख़ास नेताओं के दरवाज़े खटखटाते पाए जाते हैं. हालांकि हाल के दिनों में राहुल गांधी के विश्वासपात्र बने कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी मनमोहन सिंह के क़रीबियों में भी गिने जाते हैं, पर चूंकि वह मनमोहन सिंह द्वारा दिए गए केंद्रीय मंत्री के प्रस्ताव को तवज्जो नहीं दे रहे हैं, इसलिए राहुल एवं सोनिया उन्हें पार्टी से जुड़ी बेहद अहम ज़िम्मेदारियों और अधिकारों से नवाजने का मन बना चुके हैं. चूंकि तमाम बड़े-बड़े घोटालों और भ्रष्टाचार  की वज़ह से कांग्रेस पार्टी के खिला़फ देश भर में आक्रोश का माहौल तैयार हो चुका है, इसलिए राहुल एवं सोनिया भी इस बात को समझ चुके हैं कि अगर अब भी पार्टी और सरकार के अंदर टॉप टू बॉटम तब्दीलियां नहीं की गईं, तो गांधी खानदान के हाथ से हिंदुस्तान का राज-पाट फिसल जाएगा. दूसरी तऱफ पार्टी और सरकार के अंदर मचे घमासान की वजह से कांग्रेस हाईकमान पार्टी की छवि सुधारने की खातिर 2014 के पहले बचे-खुचे समय में जो काम कराना चाह रहा है, वह भी नहीं हो पा रहा है. लिहाज़ा राहुल एवं सोनिया अपने भरोसे के लोगों के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल में बदलाव की प्रक्रिया में लगे हैं, पर पेंच यहां भी हैं, क्योंकि पी चिदंबरम और मोंटेक सिंह अहलूवालिया के इशारे पर चलने वाले प्रधानमंत्री की अपनी  फरमाइशें हैं, तकरार अपने-अपने पसंदीदा और व़फादार लोगों को लेकर है. सच तो यह है कि फिलहाल राहुल गांधी के लिए आगे कुआं और पीछे खाई वाली स्थिति हो गई है. दशकों से सत्ता की मलाई खाने वाले पुराने कांग्रेसी नेता, जिनके अनुभवों से पार्टी का भला हो सकता है, वे पार्टी का सत्यानाश करने में लगे हैं. नई टीम को सियासत का तजुर्बा नहीं है. पुराने नेताओं का आलम यह है कि वे किसी भी हाल में राहुल का पीछा छोड़ने को तैयार नहीं. इसकी खातिर तमाम तिकड़म भी रचे जाते हैं. सत्ता और सियासत कितनी निर्मम एवं स्वार्थी होती है, इस बात से समझा जा सकता है कि जब दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश से राजनीतिक वनवास के तहत दिल्ली आना पड़ा था, उस समय कैप्टन सतीश शर्मा राहुल गांधी के बेहद क़रीब थे. तब दिग्विजय सिंह ने राजीव गांधी के पुराने विश्वस्त एवं सहयोगी विंसेंट जॉर्ज की मार्फ़त 10 जनपथ में अपनी जगह बनाई और दिग्गज कांग्रेसी अर्जुन सिंह के न रहने का पूरा फायदा उठाते हुए राहुल का भरोसा जीता, पर जैसे ही उत्तर प्रदेश के चुनाव ने कांग्रेस को आईना दिखाया, दिग्विजय सिंह की जगह अहमद पटेल ने ले ली. अब जनार्दन द्विवेदी की बारी है. हालांकि मनमोहन सिंह की पूरी कोशिश है कि जनार्दन द्विवेदी को पद और पावर का लालच देकर अपनी तऱफ कर लिया जाए, ताकि राहुल गांधी के पास कोई तजुर्बेकार और विवेकशील सलाहकार न बचे.

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Comments (1)

  1. बेचारा राहुल , शादी करके बच्चे पैदा किये होते तो चिंता करने वाला कोई होता भी, बहन तो पति-बच्चे में उलझी है. माँ को लगता ही नहीं की बेटा बड़ा हो गया है. सब ने अधेड़ उम्र में भी राहुल बाबा बना रक्खा है. आस-पास है चमचो का जमावड़ा जो स्थिति ज्यो की त्यों बनाये रखना चाहता है.

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