दवा कंपनियां, डॉक्‍टर और दुकानदार: आखिर इस मर्ज की दवा क्‍या है

दवा, डॉक्टर एवं दुकानदार के प्रति भोली-भाली जनता इतना विश्वास रखती है कि डॉक्टर साहब जितनी फीस मांगते हैं, दुकानदार जितने का बिल बनाता है, को वह बिना किसी लाग-लपेट के अपना घर गिरवी रखकर भी चुकाती है. क्या आप बता सकते हैं कि कोई घर ऐसा है, जहां कोई बीमार नहीं पड़ता, जहां दवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती? यानी दवा इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे अधिक है. किसी न किसी रूप में लगभग सभी लोगों को दवा का इस्तेमाल करना पड़ता है, कभी बदन दर्द के  नाम पर तो कभी सिर दर्द के नाम पर. यह कितना अजीब है कि जहां आज भी 70 फीसदी जनता 30 रुपये प्रतिदिन नहीं कमा पाती, उस देश में दवाओं कालाबाज़ारी चरम पर है. लाभ कमाने की दौड़ लगी हुई है. कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा दवाओं के  संबंध में कराए गए शोध में पाया गया है कि देश-विदेश की जानी-मानी दवा कंपनियां भारतीय बाज़ार में 203 से लेकर 1123 फीसदी तक मुना़फा कमा रही है. दवा कंपनियां ब्रांड के नाम पर मरीजों को लूट रही हैं. जैसे एक साल्ट से बनी दवा को कोई कंपनी 50 रुपये में बेच रही है तो कोई 100 रुपये में. दवाओं की गुणवत्ता संदिग्ध है. दूसरे देशों में प्रतिबंधित हो चुकी दवाएं भारतीय बाज़ार में धड़ल्ले से बेची जा रही हैं. डॉक्टर अनावश्यक जांच एवं दवाएं लिखते हैं. दवा दुकानदार जेनरिक के नाम पर लोगों को लूट रहे हैं. सरकारी अस्पतालों में दवाएं उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे सैकड़ों तथ्य सामने आ रहे हैं, जिन्हें गहराई से जानने की ज़रूरत है.

विचारणीय बात यह है कि दवा कंपनियां अपने उत्पादों का बिक्री मूल्य इतना बढ़ाकर किसके कहने पर रखती हैं? क्या सरकार को पता नहीं है कि दवा बनाने में वास्तविक ख़र्च कितना आता है? अगर सरकार को नहीं पता है तो यह शर्म की बात है. अगर वह जानते हुए अंधी बनी हुई है तो यह और भी शर्म की बात है! देश में रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है. लोगों का स्वास्थ्य बजट बढ़ता जा रहा है. दूसरे मद में तो आदमी कमी कर सकता है, लेकिन स्वास्थ्य ऐसा मुद्दा है, जहां जीवन और मौत का सवाल है. ऐसे में स्वास्थ्य के नाम पर जितना ख़र्च ज़रूरी है, वह करना पड़ता है, चाहे उसके लिए घर बेचना पड़े, शरीर बेचना पड़े या किसी की गुलामी करनी पड़े. यह बात सरकार भी मानती है कि लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब है. इसलिए वह समय-समय पर तरह-तरह की योजनाएं चलाती रहती है. बावजूद इसके परिणाम ढाक के तीन पात वाले हैं. सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि सरकार ने सभी समस्याएं दूर करने के लिए नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) नामक एक स्वतंत्र नियामक संस्था बना रखी है, जिसकी ज़िम्मेदारी है कि वह देश में बेची जा रही दवाओं की कीमतें नियंत्रित करे. इसके लिए कई क़ानून भी हैं. कंपनियों द्वारा मनमाने ढंग से दवाओं का दाम तय करना यह बताता है कि एनपीपीए अपना कार्य कर सकने में असफल रही है. सस्ती दवा-सस्ता इलाज संबंधित सरकारी दावों को ठेंगा दिखाते हुए कंपनियां मनमाने ढंग से दवाओं की एमआरपी तय कर रही हैं.

भारत में ग़रीबी दर 29.8 फीसदी है या कहें कि 2010 के  जनसांख्यिकी आंकड़ों के हिसाब से यहां 35 करोड़ लोग ग़रीब हैं. वास्तविक ग़रीबों की संख्या इससे से भी ज़्यादा है. ऐसी आर्थिक परिस्थिति वाले देश में दवा कारोबार की कालाबाज़ारी चरम पर है. मुनाफा कमाने की होड़ लगी है. धरातल पर स्वास्थ्य सेवाओं की चर्चा होती है तो मालूम चलता है कि स्वास्थ्य के नाम पर सरकारी अदूरदर्शिता के चलते आम जनता लुट रही है और दवा कंपनियां, डॉक्टर एवं दुकानदार मालामाल हो रहे हैं.

एनपीपीए द्वारा तय क़ीमतों से ज़्यादा पैसा वसूला जा रहा है. हालांकि एनपीपीए के चेयरमैन सी पी सिंह का कहना है कि अगर किसी भी ग्राहक को लगता है कि दुकानदार हमारे द्वारा निर्धारित मूल्य से अधिक पैसा ले रहा है तो वह हमें शिकायत कर सकता है. इसके लिए फार्म एनपीपीए की वेबसाइट पर उपलब्ध है.

मनमानी के विरोध में आंदोलन

पिछले पांच महीनों से सोशल मीडिया के माध्यम से ग़ैर सरकारी संस्था प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान दवाइयों के नाम पर हो रही लूट को लेकर कंट्रोल मेडिसन मैक्सिमम रिटेल प्राइस (कंट्रोल एमएमआरपी) कैंपेन चला रही है, जिसके चलते पिछले 14 सालों से लटकी राष्ट्रीय दवा नीति को मंत्री समूह द्वारा अनुमोदित करने को लेकर एक दबाव भी बना. इस कैंपेन ने आम लोगों को दवाओं में हो रही धांधली के प्रति सचेत किया. संस्थान के नेशनल को-ऑर्डिनेटर आशुतोष कुमार सिंह लगातार शोध कार्य में जुटे हुए हैं. उनकी खोजपरक रिपोर्टिंग का नतीजा है कि आज पूरा देश दवा व्यापार में व्याप्त भ्रष्टाचार को समझ पा रहा है. दवाओं की क़ीमतें नियंत्रित करने को लेकर एक सामाजिक कार्यकर्ता ने लखनऊ हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की है. ग़ौरतलब है कि इससे पूर्व फिल्म अभिनेता आमिर खान के शो सत्यमेव जयते में भी महंगी चिकित्सीय सेवाओं का मुद्दा उठाया गया था. आमिर खान ने जेनेरिक दवाओं का मुद्दा भी उठाया था. आख़िर एनपीपीए कर क्या रही है? इसी बीच चौथी दुनिया ने नेशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) को सूचना अधिकार क़ानून के तहत आवेदन देकर कुछ बुनियादी जानकारियां जुटाने की कोशिश की. एनपीपीए ने सभी सवालों के पूरे जवाब तो नहीं दिए, लेकिन जो आधे-अधूरे जवाब दिए हैं, उनसे बेवक्त मर रहे लाखों लोगों की मौत का कारण ज़रूर पता चलता है.

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि दवाओं की क़ीमतें निर्धारित करने के लिए बनाई गई इस संस्था के पास देश की तमाम दवा निर्माता कंपनियों की सूची तक नहीं है. एनपीपीए को यह भी नहीं पता है कि भारत में कितनी कंपनियां जेनेरिक दवाएं बनाती हैं. उसे यह तक पता नहीं है कि देश में कितनी कंपनियां दवाएं बनाती हैं. ड्रग इंस्पेक्टरों से मिलने वाली शिकायतों की सूची भी एनपीपीए नहीं बनाती. यही नहीं, अभी तक किसी भी फार्मा कंपनी को ब्लैकलिस्टेड नहीं किया गया. दवाओं के नाम पर किस तरह लूट मची है, इसका एक और उदाहरण सामने आया है. महंगी दवाएं ख़रीदने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं हैं कि जो दवा आप खा रहे हैं, वह गुणवत्ता के मानकों को पूरा करती हो. चौथी दुनिया ने जब नेशनल फार्मास्यूटिकल्स प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) से सूचना अधिकार क़ानून के तहत यह जानकारी मांगी कि देश में किस जिले-राज्य में दवाओं को रैंडम सैंपलिंग के लिए सबसे ज़्यादा भेजा गया है? इस पर एनपीपीए का उत्तर चौंकाने वाला है. अंग्रेजी में दिए गए जवाब में एनपीपीए ने जो लिखा, उसका मतलब यही है कि इस साल रैंडम सैंपलिंग के ज़्यादातर कार्य दिल्ली और एनसीआर में कराए गए हैं. इस जवाब से कई सवाल उठते हैं. क्या पूरे देश में जो दवाइयां बेची जा रही हैं, उनकी जांच की ज़रूरत नहीं है? क्या केवल दिल्ली और एनसीआर के लोगों को क्वॉलिटी मेडिसिन की ज़रूरत है? इस लापरवाही से सा़फ-सा़फ दिख रहा है कि जन स्वास्थ्य को लेकर सरकारी व्यवस्था पूरी तरह अव्यवस्थित है. ऐसे में सवाल उठता है कि कब तक इस तरह लुका-छिपी का खेल चलता रहेगा?

लूट के सबूत

दवा कंपनियां देश को लूट रही हैं, उनकी मनमानी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा दवाओं के संबंध में कराए गए शोध में पाया गया कि देश-विदेश की जानी-मानी दवा कंपनियां भारतीय बाज़ार में 203 से लेकर 1123 फीसदी तक मुना़फा कमा रही हैं. इनमें सिप्ला, रैनबैक्सी ग्लोबल, डॉ रेड्डी लैब, ग्लाक्सो स्मिथकिल्ने, फाइजर एवं जाइडस जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं. ग़ौरतलब है कि चौथी दुनिया ने एनपीपीए को सूचना अधिकार क़ानून के तहत आवेदन देकर पूछा था कि अभी तक कितनी कंपनियों पर ओवरचार्जिंग के मामले हैं और वे कौन-कौन हैं? उन कंपनियों की सूची उपलब्ध कराई जाए. जवाब में जानकारी मिली कि सितंबर 2012 तक एनपीपीए ने दवा कंपनियों के खिला़फ 871 बार आर्थिक दंड लगाया. चौथी दुनिया के पास उपलब्ध दस्तावेज़ के मुताबिक, कुल जुर्माना राशि 2574 करोड़, 95 लाख, 84 हज़ार रुपये है. एनपीपीए इस कुल राशि में से महज 234 करोड़, 72 लाख, 61 हज़ार रुपये वसूल कर पाई है. लगभग आठ सौ से ज़्यादा कंपनियों पर अर्थदंड लगाया गया. सबसे ज़्यादा अर्थदंड 1604 करोड़, 87 लाख, 92 हज़ार रुपये देश की सबसे बड़ी दवा कंपनी सिपला (उळश्रिर) पर लगाया गया, लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि सिपला (उळश्रिर) ने स्वयं पर लगाए गए आर्थिक दंड का एक भी पैसा एनपीपीए को नहीं दिया. इतना ही नहीं, वह एनपीपीए द्वारा लगातार चेतावनी दिए जाने के बावजूद दवाओं की एमआरपी सरकारी मानकों से कई गुना ज़्यादा तय कर रही है. इसी तरह रैनबैक्सी पर 127 करोड़, 84 लाख, 22 हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया गया, जिसमें उसने 26 करोड़, 88 लाख, 29 हज़ार रुपये जमा कर दिया है. डॉ. रेड्डी लैब पर 34 करोड़, 10 लाख, 45 हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया गया, जिसमें उसने 11 करोड़, 80 हज़ार रुपये जमा कर दिए हैं. यह तो स़िर्फ इन कंपनियों की लूट का ट्रेलर मात्र है. आगे की कहानी और भी दिलचस्प है.

राजनीतिक दलों को चंदा

चौथी दुनिया ने जब आगे और तहक़ीक़ात की तो कुछ दिलचस्प कहानी सामने आई. देश की कई दवा कंपनियां राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं, ताकि उनकी मनमानी पर वे खामोश रहें. स़िर्फ दवा कंपनियां ही नहीं, बल्कि डॉक्टर और दवा दुकानदार भी चंदा देने वालों की सूची में शामिल हैं.

दवा कंपनियों द्वारा दिया गया चंदा

कांग्रेस

वर्ष कंपनी धनराशि
2010-11 जाइडस एनिमल हेल्थ लिमिटेड 50 लाख
2009-10 हेट्रो ड्रग लिमिटेड 1 करोड़
2009-10 अरविंदो फार्मा लिमिटेड 30 लाख
2009-10 कृष्णा फार्मा केमिकल्स 25 लाख
2006-07 रेनबैक्सी लेब्रोरेटीज लिमिटेड 40 लाख
2005-06 अल्केम इंटरनेशनल लिमिटेड 1 लाख
2004-05 रेनबैक्सी लेब्रोरेटीज लिमिटेड 25 लाख

भाजपा

2010-11 जाइडेस वेलनेस लिमिटेड 1 करोड़
2010-11 एपोथेसिन फार्माक्युटिकल्स प्रा. लि. 75 हज़ार
2009-10 केडिला फार्माक्युटिकल लिमिटेड 1 करोड़
2009-10 डिशमेन फार्माक्युटिकल्स एंड केमिकल लि. 2 करोड़
2009-10 अविक फार्माक्युटिकल्स लिमिटेड 50 हज़ार
2009-10 पारस फार्माक्युटिकल्स प्रा. लि. 10 लाख
2009-10 विन मेडीकेयर प्रा. लि. 25 लाख
2009-10 पीरामल हेल्थकेयर लिमिटेड 1 लाख
2008-09 डिशमेन फार्माक्युटिकल्स एंड केमिकल लि. 1 करोड़
2008-09 पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड 11 लाख
2005-06 विन मेडीकेयर प्रा. लि. 25 लाख
2004-05 रेनबैक्सी लेब्रोरेटीज लिमिटेड 25 लाख
2004-05 पारस फार्माक्युटिकल्स प्रा. लि. 16 लाख
2004-05 डिशमेन फार्माक्युटिकल्स एंड केमिकल लि. 4 लाख
2004-05 विन मेडीकेयर प्राइवेट लिमिटेड 25 लाख

सीपीआई (एम)

2009-10 हेट्रो ड्रग लिमिटेड 6 लाख
2004-05 जेनिक्स फार्मा प्रा. लि. 75 हज़ार
2004-05 डायना मेडिकल सर्विसेज प्रा. लि. 20 हज़ार

आरजेडी

2009-10 विन मेडीकेयर प्रा. लि. 25 लाख

तेलगुदेशम

2009-10 अरविंदो फार्मा लिमिटेड 20 लाख
2004-05 रेनबैक्सी लेब्रोरेटीज लिमिटेड 5 लाख

4 thoughts on “दवा कंपनियां, डॉक्‍टर और दुकानदार: आखिर इस मर्ज की दवा क्‍या है

  • April 7, 2013 at 2:02 AM
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    सत्य है

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  • December 29, 2012 at 10:37 AM
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    आप ने जो लिखा है वो सब ठीक है पर एक और गोरख धंदा डॉक्टर्स भी चला रहें हैं| आज कल हर क्लिनिक जहाँ ओपरेशन्स होते हैं दावा भी वे ही देतें है| दावा मरीज को देवे या न देवे बिल में चढ़ जाती है| अंदर क्या हुआ किसे मालूम| बची दावा वापस बेच दी जाती है|

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  • December 16, 2012 at 9:02 AM
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    Hum gribi our uneducation se to lad rahe the per ye gorkh dandha or bhi khatrak h. Govt control system poori tarah se fail ho gya h . Mahnge dam our nakli dwaiya bhi market mein h.htash paresan log, paresani pe chighadate media or budhijivi varg k log. 5 sal tak soyi hoe sarkare. eelection k liye ugahi karte neta v ghar bharte unke chamche, aadhe se adhik darti k bhagwan khi ye to nahi h hmara system.

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  • November 23, 2012 at 12:28 PM
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    यह बात सत्य है लेकिन आप कर भी क्या सकते हैं आप परेसान हैं दावा के लिए दुकानदार एक रूपये की दावा के दो रूपये मांगता है विरोध पर कहता है लेना है तो लो नहीं तो आगे बड़ो आप क्या करेंगे. मैं स्वयम एक हॉस्पिटल के केमिस्ट से नार्मल दवा लेने गया नहीं दी कहता है पहले आपको डॉ से परचा बनवाना होगा इसका मतलब ५ रूपये की दवा के लिए २ सौ या ४ सौ रूपये देने पड़ेंगे हर जगह लूट है कोई कण्ट्रोल नहीं है इंसानियत खत्म हो चुकी है करोड़ों रूपये कोठियों मैं लगाये जा रहे लूट लूट कर रहने वाला कोई नहीं है. ये हवा के महल नहीं रहेगे लेकिन इंसानियत के लिए लोगों को दुनिया यद् करती है. राजा महल बनवाते थे जनता की सुरक्षा और राज्कोस के भंडार के लिए लेकिन आज मॉल और महल बनवाए जाते हैं दिखने के लिए. यह धन की बर्वादी ही तो है इंसानियत के रूप मैं हेवानियत

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