षडयंत्र के साये में भाजपा

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को समझे बिना आने वाले समय में क्या होगा, इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता. भारतीय जनता पार्टी संसद में प्रमुख विपक्षी पार्टी है और कई राज्यों में उसकी सरकारें हैं. इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी, जो 2014 के चुनाव में दिल्ली की गद्दी पर दांव लगाने वाली है, इस समय सबसे ज़्यादा परेशान दिखाई दे रही है. यशवंत सिन्हा, गुरुमूर्ति, अरुण जेटली, नरेंद्र मोदी एवं लालकृष्ण आडवाणी के साथ सुरेश सोनी ऐसे नाम हैं, जो केवल नाम नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय जनता पार्टी में चल रहे अवरोधों, गतिरोधों, अंतर्विरोधों और भारतीय जनता पार्टी पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश करने वाली तोपों के नाम हैं.

एस गुरुमूर्ति चेन्नई में रहते हैं, बड़े चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काफ़ी सालों से दिमाग़ माने जाते हैं. गुरुमूर्ति ने अपनी सार्वजनिक ज़िंदगी इंडियन एक्सप्रेस के स्वामी स्वर्गीय रामनाथ गोयनका के साथ शुरू की और वहीं से उनका संपर्क नानाजी देशमुख से हुआ. नानाजी देशमुख के ज़रिए वह तत्कालीन संघ नेतृत्व के नज़दीक आए और संघ को उनका विश्लेषण करने का तरीक़ा, उनके संपर्क सूत्र और उनकी सादगी पसंद आ गई. तबसे अब तक संघ के कई सरसंघ चालक बदले, लेकिन गुरुमूर्ति का स्थान वही बना रहा. वह स़िर्फ दो बार असफल हुए, पहली बार गोविंदाचार्य को लेकर, जब वह उन्हें बचा नहीं पाए और दूसरी बार संजय जोशी को लेकर, जब वह संजय जोशी को बचा नहीं पाए, लेकिन न बचा पाने के भी अलग कारण हैं.

गुरुमूर्ति ने पांच साल पहले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की बिसात बिछा दी थी. वह सबसे पहले राम जेठमलानी को राज्यसभा में इसलिए लाए, क्योंकि उन्हें लगा कि राम जेठमलानी से बेहतर वकालत नरेंद्र मोदी की कोई और नहीं कर सकता. जब गुरुमूर्ति को लगा कि स्वयं नितिन गडकरी में प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जाग उठी है तो उन्होंने सबसे पहले नितिन गडकरी की कंपनियों का ख़ुलासा अरविंद केजरीवाल के ज़रिए करा दिया. अभी तक यह रहस्य है कि गुरुमूर्ति के सूत्रों ने कैसे सारे काग़ज़ अरविंद केजरीवाल के पास पहुंचाए, क्योंकि अरविंद केजरीवाल और गुरुमूर्ति में कोई सीधा या टेढ़ा रिश्ता नहीं है. इसके बाद गुरुमूर्ति ने महेश जेठमलानी से नितिन गडकरी का इस्तीफ़ा मंगवाया. महेश जेठमलानी देश के मशहूर वकील राम जेठमलानी के पुत्र हैं और ख़ुद बड़े वकील हैं. वह भारतीय जनता पार्टी की कार्यकारिणी के सदस्य हैं और गुजरात के भूतपूर्व मंत्री अमित शाह के वकील भी हैं. महेश जेठमलानी ने भाजपा की कार्यकारिणी से इस्तीफ़ा देने की घोषणा की और नितिन गडकरी का इस्तीफ़ा मांग लिया. महेश जेठमलानी ने यह काम अपने पिता राम जेठमलानी और गुरुमूर्ति की सलाह पर किया. इसके बाद राम जेठमलानी ने गडकरी को हटाने के लिए एक अभियान सा छेड़ दिया. वह कई भाजपा नेताओं के पास गए, लेकिन किसी ने उनका खुलकर साथ नहीं दिया.

एस गुरुमूर्ति चेन्नई में रहते हैं, बड़े चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काफ़ी सालों से दिमाग़ माने जाते हैं. गुरुमूर्ति ने अपनी सार्वजनिक ज़िंदगी इंडियन एक्सप्रेस के स्वामी स्वर्गीय रामनाथ गोयनका के साथ शुरू की और वहीं से उनके संपर्क नानाजी देशमुख से हुए.

नितिन गडकरी के संपूर्ण राजनीतिक क्रियाकलापों और उनकी कंपनियों के ख़ुलासे के बाद बनी स्थिति पर बात करने के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेता अलग-अलग मिल रहे थे. भारतीय जनता पार्टी के भूतपूर्व मंत्री एवं उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जसवंत सिंह के घर पर यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा मिले, जहां उनमें भारतीय जनता पार्टी की स्थिति को लेकर गंभीर बातचीत हुई. ये तीनों इस बात से चिंतित थे कि जहां भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में आते दिखना चाहिए था, वहां भारतीय जनता पार्टी बहुत पीछे खिसकती दिखाई दे रही है. इस बैठक के बाद जसवंत सिंह ने एक लंबा और राजनीतिक तकलीफ को बताने वाला पत्र लालकृष्ण आडवाणी को लिखा, जिसमें उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी से आग्रह किया कि उन्हें इस स्थिति में हस्तक्षेप करना चाहिए. आडवाणी जी ने पत्र को पढ़कर जसवंत सिंह को फोन किया और कहा कि उन्हें यह पत्र गुप्त रखना चाहिए और किसी को बताना नहीं चाहिए, लेकिन स्वयं उन्होंने भाजपा के कुछ नेताओं को यह बात बता दी. जब राम जेठमलानी जसवंत सिंह से मिलने गए, तो जसवंत सिंह ने इस पत्र की चर्चा उनसे कर दी. राम जेठमलानी ने उसी दिन शाम प्रेस वालों से इस तरह बात की, मानो जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा का एक गु्रप उनके नेतृत्व में बन गया है. जबकि हक़ीक़त यह थी कि उस समय तक ये तीनों क्या करें-क्या न करें की उधेड़बुन में थे. पर इन तीनों ने तय कर लिया था कि भारतीय जनता पार्टी को इस जड़ता की स्थिति से निकालने के लिए कुछ न कुछ उन्हें ज़रूर करना होगा.

यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह और शत्रुघ्न सिन्हा की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि ये संघ से जुड़े हुए नहीं हैं. इतने सालों में भी इनका रिश्ता संघ से नहीं जुड़ पाया है. ये अटल जी की सरकार में मंत्री भी रहे, लेकिन संघ ने कभी इन्हें अपना नहीं माना. संघ ने यह भी तय कर लिया है कि इन तीनों को अगली बार पार्टी का टिकट नहीं देना है. इन सारी स्थितियों के बीच इन तीनों ने यह तय किया कि वे पार्टी को बचाने की एक कोशिश करेंगे और इसके लिए इन तीनों ने पहले तो अलग-अलग आडवाणी जी से बात की और बाद में एक साथ आडवाणी जी से मिले. उसके बाद जसवंत सिंह ने दो बार आडवाणी जी से मिलकर कहा कि वह अगर अब भी चुप रहे तो पार्टी बर्बाद हो जाएगी. इन तीनों ने आडवाणी जी से यह भी कहा कि उन्हें मोहन जी यानी मोहन भागवत जी यानी सरसंघ चालक से तत्काल बात करनी चाहिए. इन तीनों में एक ने यहां तक आडवाणी जी से कहा कि आप अभी फ़ोन उठाइए और मोहन जी से बात कीजिए. लेकिन आडवाणी जी ने अपने एक विश्वस्त साथी से कहा कि मैं इस उम्र में संघ से अलग नहीं जाऊंगा. उस व्यक्ति ने आडवाणी जी से पूछा कि और देश का क्या होगा? आडवाणी जी ख़ामोश रहे.

आडवाणी जी की एक मानसिक परेशानी है. मोहन भागवत सहित संघ के सारे नेता आडवाणी जी से आयु में, अनुभव में और समझ में छोटे हैं. आडवाणी जी अपनी तरफ़ से उनसे बात करना अपनी गरिमा के अनुकूल नहीं मानते. इसलिए शायद ही ऐसा कोई अवसर आया हो, जब उन्होंने मोहन भागवत से अपनी तरफ़ से बात की हो. संघ यह चाहता है कि आडवाणी जी राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दें. कई बार ऐसे इशारे मिलने के बाद भी आडवाणी जी ने ऐसा इसलिए नहीं किया, क्योंकि उन्हें मालूम है कि अगर वह इस चुनाव से हट गए तो भारतीय जनता पार्टी की स्थिति बहुत ख़राब हो सकती है. संघ ने जब नितिन गडकरी को भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया था, तो उसने एक नया प्रयोग किया था. उसका मानना था कि दिल्ली में बैठे नेताओं, जिनमें पहला नाम लालकृष्ण आडवाणी का था, में से किसी को भी अब भाजपा का अध्यक्ष नहीं बनाना है. इसीलिए उसने नितिन गडकरी का अंधा समर्थन किया. नितिन गडकरी ख़ुद नागपुर के हैं और महाराष्ट्र में भाजपा सरकार में मंत्री रहे हैं. यह माना जाता है कि नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में धोबी से लेकर ड्राइवर तक के ख़र्च नितिन गडकरी ही उठाते रहे हैं, लेकिन नितिन गडकरी राजनीतिक रूप से अपना वर्चस्व भाजपा में स्थापित नहीं कर पाए. दिल्ली की राजनीति करने वाले लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, वैंकेया नायडू और अनंत कुमार ने उन्हें कभी इस लायक़ नहीं माना कि वह उनसे राजनीतिक विषयों पर चर्चा कर सकते हैं. अपने पूरे कार्यकाल के दौरान नितिन गडकरी कूरियर ब्वाय ही बने रहे.

संघ की नीतियों और भारतीय जनता पार्टी में सर्वमान्य नेता न होने की वजह से जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता मायूस हो गया है, वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी में क्षत्रप पैदा हो गए हैं. शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, प्रेम कुमार धूमल और वसुंधरा राजे आदि किसी की नहीं सुनते. कर्नाटक के येदियुरप्पा तो सरकार गिराने तक के लिए तैयार हैं और उन्होंने पार्टी तक छोड़ दी है.

संघ के भीतर फिर एक विचार हुआ कि क्या नरेंद्र मोदी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जा सकता है. उन्हें लगा कि शायद नितिन गडकरी वह रिज़ल्ट न दे पाएं, जो रिज़ल्ट भारतीय जनता पार्टी को चाहिए. इसीलिए संघ के कार्यपालक अधिकारी सुरेश सोनी ने संघ की बैठक में यह कहा कि अरुण जेटली को भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाना चाहिए और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार. सुरेश सोनी का यह बयान संघ के नेताओं की सोच का संकेत देता है, लेकिन अभी तक संघ के बाक़ी नेताओं की प्रतिक्रिया आनी बाक़ी है. 20 दिसंबर को गुजरात का रिज़ल्ट भी आएगा. अगर नरेंद्र मोदी ने अपना मौजूदा समर्थन बनाए रखा, तब एक फैसला होगा और उन्हें मिलने वाले वोटों का प्रतिशत गिर जाता है या फिर उनकी सीटें कम हो जाती हैं तो फिर एक तरह का फैसला होगा. नरेंद्र मोदी पिछली बार 30 चुनाव क्षेत्रों में 2 हज़ार के आसपास के बहुमत से जीते थे. अगर केशुभाई पटेल की वजह से उनकी सीटें कम हो जाती हैं तो फिर संघ के सामने परेशानी खड़ी हो जाएगी. संघ नरेंद्र मोदी के नाम पर स़िर्फ इसलिए सोच रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से उसे हिंदुओं को पोलराइज़ करने में आसानी होगी. साथ ही संघ को यह भी लगता है कि नरेंद्र मोदी अच्छे प्रशासक हैं, इसका भी फ़ायदा उन्हें मिलेगा.

अरुण जेटली ने सबसे ज़्यादा समझ-बूझकर बिसात बिछाई. जिन अरुण जेटली को संघ अब तक एक मैनेजर के रूप में देखता था, उसी संघ को अरुण जेटली ने इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि संघ उन्हें भी अध्यक्ष बनाने के बारे में सोचे. संघ अगर ऐसा करता है तो उसे भूल सुधार के रूप में देखा जाएगा. हालांकि कुछ लोग यह भी कहते हैं कि दिल्ली में बैठे किसी भी नेता को, जिसे संघ ने डी-फोर कहा था, अब अगर अध्यक्ष बनाया जाता है तो उसे संघ का थूककर चाटना कहा जाएगा और संघ की राजनीतिक अपरिपक्वता भी कहा जाएगा. अरुण जेटली और नरेंद्र मोदी में पुरानी दोस्ती भी है, समझदारी भी है और व्यवहारिकता भी है. इसलिए अगर अरुण जेटली प्रधानमंत्री पद का मोह छोड़ दें तो उनका और नरेंद्र मोदी का सफल गठजोड़ बन सकता है. नरेंद्र मोदी का समर्थन करने वाले भारत के बड़े पूंजीपति घराने जितने हैं, उनसे ज़्यादा घराने अरुण जेटली का समर्थन करते हैं. लालकृष्ण आडवाणी इस सारी लड़ाई में अलग-थलग पड़ गए हैं. उनका समर्थन स़िर्फ वे लोग कर रहे हैं, जो संघ से जुड़े नहीं हैं और जिनकी राजनीतिक ज़िंदगी भारतीय जनता पार्टी की सफलता और असफलता पर टिकी हुई है.

संघ का राजनीतिक चेहरा सुरेश सोनी हैं, लेकिन सुरेश सोनी की समझ पर भारतीय जनता पार्टी में बहुतों को संदेह है. इनमें नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं, सुषमा स्वराज भी, अरुण जेटली भी और बचे हुए बाक़ी नेता भी, जिन्हें भारतीय जनता पार्टी का निर्णायक नेता माना जाता है. दूसरी तरफ़ संघ के बारे में यह कहा जाता है कि उसने मुसीबत में किसी का साथ नहीं दिया है. बात अटल बिहारी वाजपेयी से शुरू करते हैं. सन्‌ 80 में अटल बिहारी वाजपेयी का समर्थन संघ ने किया, लेकिन जब बाबरी मस्जिद टूटी तो अटल बिहारी वाजपेयी का साथ संघ ने छोड़ दिया. संघ की शह पर राजनाथ सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी का इस्तीफ़ा तक मांग लिया. अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री अपने चेहरे और समझ की वजह से बने, न कि संघ के समर्थन की वजह से. दूसरा नाम लालकृष्ण आडवाणी का है, जिन्होंने पाकिस्तान में जिन्ना की मज़ार पर जो लिखा, वह सही लिखा था, लेकिन संघ ने संजय जोशी को भेजकर आडवाणी का इस्तीफ़ा ले लिया और जब संजय जोशी का विरोध नरेंद्र मोदी ने किया तो उसने संजय जोशी को अकेला छोड़ दिया. ऐसे कई सारे नाम हैं, जिनमें शांता कुमार, कल्याण सिंह, उमा भारती एवं मदन लाल ख़ुराना भी शामिल हैं. भाजपा में एक कहावत है कि जो भी संघ के चरणों में गया, वह उसके चरणों के नीचे आ गया. इस तथ्य की सत्यता को आडवाणी जी के अलावा और कौन ज़्यादा समझ सकता है.

संघ की नीतियों और भारतीय जनता पार्टी में सर्वमान्य नेता न होने की वजह से जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता मायूस हो गया है, वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी में क्षत्रप पैदा हो गए हैं. शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, प्रेम कुमार धूमल और वसुंधरा राजे आदि किसी की नहीं सुनते. कर्नाटक के येदियुरप्पा तो सरकार गिराने तक के लिए तैयार हैं और उन्होंने पार्टी तक छोड़ दी है. केंद्रीय नेतृत्व के नाम पर जो जाने जाते हैं, उनमें नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज एवं अरुण जेटली के ही नाम आते हैं और इन तीनों को राज्यों के क्षत्रपों के सामने हमेशा गिड़गिड़ाना पड़ता है. एक और नाम है, जो भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष हो सकता है और वह नाम है मुरली मनोहर जोशी का. मुरली मनोहर जोशी स़िर्फ एक बार भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बने हैं, लेकिन उनके कार्य करने की शैली से भारतीय जनता पार्टी के अधिकांश नेता प्रसन्न नहीं हैं, क्योंकि जब वह अध्यक्ष थे तो किसी की नहीं सुनते थे. लेकिन मुरली मनोहर जोशी के भी अध्यक्ष बनने में संघ का एक सिद्धांत बाधक बन गया है और वह सिद्धांत है कि 75 वर्ष से ऊपर की उम्र के लोगों को राजनीति से हट जाना चाहिए. राजनाथ सिंह, वैंकेया नायडू, अनंत कुमार और सुषमा स्वराज का एक ही उद्देश्य है कि किसी तरह पहले नितिन गडकरी अध्यक्ष पद से हटें और जब यह हटेंगे, तभी आगे की राह खुलेगी.

आम तौर पर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं एवं नेताओं, ख़ासकर वे नेता, जो भारतीय जनता पार्टी को चुनाव में जिताते हैं, उनकी साफ़ राय है कि इन चुनावों के लिए लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी की कमान सौंप देनी चाहिए. उन्हें लालकृष्ण आडवाणी के अलावा कोई और रास्ता नज़र नहीं आता, लेकिन यहां भी संघ का वही नियम आड़े आता दिखाई दे रहा है, जो कहता है कि 75 साल से ऊपर के लोगों को भाजपा की राजनीति से रिटायर हो जाना चाहिए और आडवाणी जी तो 80 पार कर चुके हैं. गुरुमूर्ति ने एक तरफ़ नितिन गडकरी के ख़िलाफ़ सारा माहौल बनाया, लोगों को खड़ा किया और दूसरी तरफ़ सार्वजनिक रूप से नितिन गडकरी को तथाकथित क्लीन चिट भी दे दी. इसलिए माना जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी की गुत्थी को उलझाने और सुलझाने के खेल में सबसे माहिर खिलाड़ी गुरुमूर्ति हैं. पर इस सारी क़वायद में सबसे ज़्यादा मनोबल भारतीय जनता पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं का टूटा है, क्योंकि उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि अपनी आंख में ख़ुद धूल झोंकने में कांग्रेस अव्वल है या उनकी ख़ुद की पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी. कार्यकर्ता यह भी समझ नहीं पा रहे हैं कि राम का नाम लेने वाली पार्टी और रामराज्य को आदर्श मानने वाली पार्टी क्यों राम के इस उदाहरण को नहीं मानती कि अगर समाज में राजा को लेकर संदेह पैदा हो जाए तो राजा को संदेह का कारण हटा देना चाहिए. भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने यह भी भुला दिया कि स़िर्फ एक धोबी के कहने पर राम ने सीता का त्याग कर दिया था.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.
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संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

10 thoughts on “षडयंत्र के साये में भाजपा

  • December 12, 2012 at 9:35 AM
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    —— we hinduus have to change our thinking —–hinduus have to wake up —– because —-

    in my life we hinduus have lost —– A . 1 . barmaa ; 2 . pakisthaan ; 3 . banglaa desh ; —–

    in my mothers life we hinduus lost —- B . 1 . afgaanisthaan ; 2 . iran ; 3 . iraq —–
    in our children’s life we hinduus are going to loose C . 1 .kashmir ; 2 . naagaa laand ; 3 . assaam and many more parts of india —-

    in raamaayan’s time lankaa was a hinduu country ; raavan was a hinduu king ; now lankaa [[ srilanka ]] is a bhuddhist country . in the same way all buddhist countris were hinduu countries —————————————-

    in mahaabhaarat’s time afgaanisthaan was a hinduu country KANDHAARI was from kandhaar the CAPITAL OF AFGAANISTHAAN .
    now afgaanisthaan is a islaamic country . in the same way all islaamic countries were hinduu countrie ———————————

    IN EVERY GENERATION WE HINDUUS LOOSE A VERY BIG CHUNK OF HINDUU LAND TO MUSLIMS AND CHRISTIANS etc. etc. NOW IT IS INDIA WE ARE GOING TO LOOSE TO MUSLIMS / CHRISTIANS —–

    HINDUUS !!! THINK ABOUT IT AND ACT FAST ; NOW OR NEVER ; RIGHT NOW ” DO OR DIE” ; ” DO OR DOOM” ———- WAKE UP HINDUUS ——WAKE UP HINDUUS ——WAKE UP HINDUUS ——

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  • December 7, 2012 at 10:51 PM
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    संतोष भारतीय जी आपको में काफी समय से पड रहा हूं आपकी कलम के जादू से तो खैर सभी परचित हैं लेकिन आपकी राजनीतक सोच का भी में कायल हो गया हूं । भाजपा की विफलता का लाभ सरकार को तो होगा ही मगर क्या इसका लाभ छोटे दलों को भी मिलेगा । आजकल जो राजनीतिक मेल – मिलाप , खाना – खिलाना चल रहा हैं उससे हर बडा दल सरकार की गोदी में बैठा नजर आ रहा हैं । इसे देखते हुए आप को क्या लगता हैं यह सरकार अपना सिंहासन बचा ले जाएगी या डुब जाएगीं ।

    इस लेख के लिए बहुत – बहुत आभार

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  • December 7, 2012 at 10:35 PM
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    भाजपा और संध के रिस्सों सभी जानते हैं । मगर आडवानी जी का अलग – थलग पड जाना चिंता का विषय हैं । क्यों की वहीं एक भाजपा का बडा चहरा हैं जिनकें ऊपर भाजपा की सफलता – असफलता निभर् करती हैं । वह भलें ही प्रधानमंत्री के दावेदार न माने जा रहें हो फिर भी उनका कद भाजपा में बडां हैं । 2014 से पहले भाजपा को चाहिए के वह आपसी मतभेद खत्म कर चुनाव की तैयारी करे । कांग्रेस की जनविरोधी नितियों से जनता को कोई उम्मीद नहीं और लोग मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में भाजपा को ही देखते हैं और लगातार भाजपा का विफल होना यह दर्शाता हैं के लोकतंत्र खतरें में हैं।

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  • December 7, 2012 at 9:06 PM
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    भाजपा ने अध्यक्ष नितिन गडकरी से इस्तीफे की मांग सार्वजनिक रूप से करके अनुशासन तोडऩे को लेकर निलंबित किए गए राज्यसभा सांसद और जाने-माने वकील राम जेठमलानी को निष्कासित करने की बजाय फिलहाल कारण बताओ नोटिस ही जारी किया है। ऐसा तब हुआ है, जबकि जेठमलानी खुल कर कह चुके हैं कि उन्हें पार्टी से निकालने का दम किसी में नहीं है। हालांकि माना यही जा रहा था कि संसदीय बोर्ड की बैठक में उन्हें पार्टी से बाहर करने का निर्णय किया जाएगा, मगर समझा जाता है कि पार्टी इसकी हिम्मत नहीं जुटा पाई। कदाचित ऐसा कानूनी पेचीदगी से बचने के लिए भी किया गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि जेठमलानी कानून के कीड़े हैं।
    गौरतलब है कि जेठमलानी एक ओर जहां पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं, वहीं सीबीआई के नए डायरेक्टर की नियुक्ति पर पार्टी से अलग राय जाहिर करके पार्टी नेताओं की किरकिरी कर चुके हैं। इतना ही नहीं जब उनसे पूछा गया कि उनके इस रवैये पर पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा सकती है तो उन्होंने अपने तेवर और तीखे करते हुए पार्टी हाईकमान को चुनौती देते हुए कहा था कि उन्हें पार्टी से निकालने का दम किसी में नहीं है। इस चुनौती के बाद भी यदि पार्टी का रुख कुछ नरम दिखा तो यही माना गया कि जरूर उनके पास पार्टी के नेताओं की कोई नस दबी हुई है। गडकरी के खिलाफ तो वे कह भी चुके हैं कि उनके पास सबूत हैं।
    ऐसा नहीं है कि जेठमलानी ने पहली बार पार्टी को मुसीबत में डाला है। इससे पहले भी वे कई बार पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं। उन्होंने भाजपाइयों के आदर्श वीर सावरकर की तुलना पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना से की थी। इतना ही नहीं उन्होंने उन्हीं जिन्ना को इंच-इंच धर्मनिरपेक्ष तक करार दे दिया था, जिनकी मजार शरीफ पर उन्हें धर्मनिरपेक्ष कहने पर लाल कृष्ण आडवाणी को अध्यक्ष पद छोडऩा पड़ गया था। असल में जेठमलानी पार्टी के अनुशासन में कभी नहीं बंधे। पार्टी की मनाही के बाद भी उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारों का केस लड़ा। इतना ही नहीं उन्होंने संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी नहीं देने की वकालत की, जबकि भाजपा अफजल को फांसी देने के लिए आंदोलन चला रही है। वे भाजपा के खिलाफ किस सीमा तक चले गए, इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये रहा कि वे पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ ही चुनाव मैदान में उतर गए। ऐसा व्यक्ति जब राज्यसभा चुनाव में भाजपा के बैनर पर राजस्थान से जितवा कर भेजा गया तो सभी अचंभे में थे। अब जब कि वे फिर से बगावती तेवर दिखा रहे हैं तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनके पास जरूर कोई न कोई तगड़ा हथियार है, जिसका मुकाबला करने में पार्टी को जोर आ रहा है।

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  • December 7, 2012 at 9:03 PM
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    सटीक आलेख है, भाजपा मानसिकता के अंधभक्तों को यह अच्छा भले ही न लगे कि कोई उनके कपडों में झांक रहा है

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  • December 7, 2012 at 3:30 PM
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    आप ने यह लेख भाजपा के समर्थक/विरोधी या पत्रकार, किस रूप में लिखा है, ये स्पष्ट नहीं हो रहा। जसवंत सिंह जैसे जिन नेताओं को आप भाजपा का शुभचिंतक ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, उनका भाजपा की विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है, ये लोग तो भाजपा को सत्ता के निकट आते देखकर भाजपा में प्रविष्ट हो गए थे, और भाजपा से बेहतर विकल्प मिलते ही छोड़ भी जायेंगे।
    आपने आम कार्यकर्त्ता की बात की, भाजपा का कार्यकर्त्ता चेहरे के लिए नहीं,विचारधारा के लिए समर्पित है। यदि आडवानी जी ने विचारधारा को त्याग कर सत्ता की ओर दौड़ लगाई गई, तो कार्यकर्त्ता ने भारी मन से उनका साथ छोड़ दिया।
    भाजपा का कार्यकर्त्ता भारत के उत्कर्ष की कामना के साथ काम करता है, किसी चेहरे को बदलने के लिए नहीं, व्यवस्था परिवर्तन का शंकल्प के साथ अनवरत संघर्ष करता रहेगा।
    आपने संघ को भाजपा की समस्या बताया है, संघ भाजपा की नहीं सत्तालोलुपों की समस्या है। ये बात समझ लीजिये कि संघ के बिना भाजपा बिना आत्मा के शरीर की तरह होगा, जैसे आत्मा के निकलने के बाद शरीर मिटटी हो जाता है, वही दशा बिना संघ के भाजपा की होगी।

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  • December 7, 2012 at 3:16 PM
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    संतोषजी नमस्कार. बहुत ही अच्छा लैक लिखा है.. विश्लेषण बहुत ही अच्छा किया है..

    नमस्कार
    सप्रेम
    रत्नेश, जुरिच स्विट्ज़रलैंड

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  • December 7, 2012 at 2:11 PM
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    संतोष जी , आपकी कलम हर बार ही एक से बढ़कर एक जबरदस्त लेख लिखती है… एक और ज़ोरदार वस्तुपरक लेख के लिए बधाई…. इस बात में दो राय नहीं की भाजपा २०१४ में सरकार नहीं बना पाएगी.. पर अगर फिर भी आम चुनावों में भाजपा को अपनी इज्ज़त बचानी है तो चुनावों की कमान आडवानी के हाथों में सौंप देनी चाहिए.. नहीं तो भाजपा १०० सीटों का आंकड़ा भी शायद ही पार कर पाएगी…

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  • December 7, 2012 at 1:37 PM
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    अत्यंत विस्तृत एवं खूबसूरती के साथ लिखा गया लेख.
    मेरी शुभकामनाएँ.

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  • December 7, 2012 at 10:43 AM
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    Chintan yogya lekh.
    Sushma ji ko BJP ke Adhyksh pad ki jimmedari di jani chahiye.

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