भविष्य के भ्रष्टाचारियों के कुतर्क

बहुत चीजें पहली बार हो रही हैं. पूरा राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है. पहले भ्रष्टाचार का नाम लेते थे, तो लोग अपने आगे भ्रष्टाचारी का तमगा लगते देख भयभीत होते हुए दिखाई देते थे, पर अब ऐसा नहीं हो रहा है. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जो भी बोलता है, उसे अजूबे की तरह देखा जाता है. राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े हुए लोग चाहते हैं कि यह आवाज़ या इस तरह की आवाज़ें न निकलें और जो निकालते भी हैं, उनके असफल होने की कामना राजनीतिक दल करते हैं और राजनीतिक दल से जुड़े हुए लोग इसका उपाय बताते हैं कि भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाने वाले लोग कैसे असफल होंगे.

उदाहरण के तौर पर अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आवाज़ उठाई. उसके बाद अरविंद केजरीवाल ने और अब जनरल वी के सिंह भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आवाज़ उठा रहे हैं. वह देश के नौजवानों, किसानों, दलितों, वंचितों, पिछड़ों एवं मुसलमानों को संगठित करने की बात कर रहे हैं. उनकी यह बात राजनेताओं को समझ में नहीं आ रही है, ब्यूरोक्रेसी की समझ में तो ख़ैर क्या आएगी. मज़े की बात यह है कि राजनेताओं की दूसरी टीम यानी बड़े पत्रकार भी इसे नहीं समझ रहे हैं. टेलीविज़न चैनलों पर बहस यह होती है कि क्यों अन्ना हजारे सफल नहीं होंगे और क्यों अरविंद केजरीवाल या वी के सिंह असफल हो जाएंगे. इस तर्क में उस दर्द की ज़रा भी झलक नहीं है, जिसे इस देश का 90 प्रतिशत आदमी भोग रहा है.

शर्म नाम की एक चीज़ होती है. हम बुराई का समर्थन करें, लेकिन उसमें भी शर्म का एक भाव होता है कि क्या करें हम मजबूर हैं कि बुराई का समर्थन कर रहे हैं, पर भ्रष्टाचार का समर्थन करने वाले इस शर्म को भी घोलकर पी गए हैं. लोकपाल जैसा भी लूला-लंगड़ा प्रस्तावित है, उस लोकपाल बिल में कौन-कौन न रहे और रहे तो उसकी शक्तियां कैसे कम कर दी जाएं, इसके ऊपर ज़्यादा जोर राजनीति में रहने वाले लोग लगा रहे हैं. राहुल गांधी के साथ रहने वाले लोग शायद यह सोचते हैं कि अगर लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री आ गया तो फिर जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे और तब अगर उन्होंने भ्रष्टाचार किया तो वह लोकपाल से कैसे बच पाएंगे. कोशिश यह हो रही है. ठीक उसी तरह भाजपा के लोग भी सोच रहे हैं कि कहीं हमारा प्रधानमंत्री हो गया तो वह लोकपाल के दायरे में क्यों रहे. नतीजे के तौर पर प्रधानमंत्री का पद लोकपाल के दायरे में न आए, इस पर सभी दल, जो संसद में जनता का प्रतिनिधि होने का दावा कर रहे हैं, लगभग एकमत हैं. यानी भविष्य के भ्रष्टाचार की चिंता उन्हें भी है, जो आज भ्रष्टाचार में कम शामिल हैं.

अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आवाज़ उठाई. उसके बाद अरविंद केजरीवाल ने और अब जनरल वी के सिंह भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आवाज़ उठा रहे हैं. वह देश के नौजवानों, किसानों, दलितों, वंचितों, पिछड़ों एवं मुसलमानों को संगठित करने की बात कर रहे हैं. उनकी यह बात राजनेताओं को समझ में नहीं आ रही है, ब्यूरोक्रेसी की समझ में तो ख़ैर क्या आएगी. मज़े की बात यह है कि राजनेताओं की दूसरी टीम यानी बड़े पत्रकार भी इसे नहीं समझ रहे हैं. टेलीविज़न चैनलों पर बहस यह होती है कि क्यों अन्ना हजारे सफल नहीं होंगे और क्यों अरविंद केजरीवाल या वी के सिंह असफल हो जाएंगे. इस तर्क में उस दर्द की ज़रा भी झलक नहीं है, जिसे इस देश का 90 प्रतिशत आदमी भोग रहा है.

हम टेलीविज़न की बहसों में अक्सर देखते हैं, चाहे कांग्रेस के प्रवक्ता हों या भारतीय जनता पार्टी या दूसरी पार्टी के प्रवक्ता, वे लोकपाल या भ्रष्टाचार पर कोई स्टैंड लेते हुए दिखाई नहीं देते. शायद इसका एक ही कारण है कि भविष्य के भ्रष्टाचार में कौन-कौन लिप्त होगा, यह किसी को पता नहीं है और जो आज लिप्त नहीं है, वह भी मान रहा है कि अगर भविष्य में वह भ्रष्टाचार में लिप्त हुआ तो कैसे बच पाएगा. इसीलिए वह बहुत अजीब तर्क दे रहा है, जिसका सीधा मतलब है कि इस देश में अगर नए नियम बनाने हैं तो ऐसे नियम बनाने चाहिए, जिनसे भ्रष्टाचार न समाप्त हो, बल्कि भ्रष्टाचार से बचने का रास्ता निकाला जाए. अ़फसोस इस बात का है कि इस हालत को देखकर भी देश में उन लोगों का ख़ून नहीं खौल रहा है, जो भ्रष्टाचार के शिकार हैं. अगर सीधे कहूं तो मैं दलितों, पिछड़ों, मज़दूरों, किसानों एवं मुसलमानों की बात कर रहा हूं. उन्हें नहीं लगता कि उनका भविष्य या उनके भविष्य के सपने आज के भ्रष्टाचारी तो कुतर चुके हैं और जो कुछ बचा हुआ है, उसे भविष्य के भ्रष्टाचारी कुतरने की योजना बना रहे हैं. इसलिए दु:ख मनाने की भी अब ख्वाहिश नहीं होती, लेकिन हमारी संस्कृति है कि मुर्दे का शोक मनाया जाता है और अगर दलित, पिछड़े, वंचित, मुसलमान एवं किसान मुर्दा हो चुके हैं, तो उनका शोक तो मनाया जाना चाहिए.

हमारे देश में बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग है. मैं अगर शुरुआत करूं तो मुस्लिम बुद्धिजीवियों से करना चाहूंगा. मुस्लिम बुद्धिजीवी इस बात पर तो बहस कर रहे हैं कि जयप्रकाश आंदोलन हुआ तो उसने मुस्लिम लीडरशिप को कमज़ोर किया. वी पी सिंह के आंदोलन से कोई मुस्लिम लीडरशिप नहीं निकली और अब अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल या जनरल वी के सिंह का जो आंदोलन चल रहा है, यह तो मुस्लिम लीडरशिप को क्रिएट ही नहीं कर रहा है. अब सवाल पूछने का मन करता है, इन मुस्लिम बुद्धिजीवियों से कि आपने कभी मुसलमानों के असली सवालों को उठाने की कोशिश की या जयप्रकाश नारायण के समय को अगर याद किया जाए तो हमें कोई ऐसी नज़ीर नहीं मिलती, जिसमें लोगों ने लीडरशिप में आगे आने की कोशिश की हो या उन्हें जबरन पीछे धकेल दिया गया हो. ठीक यही बात वी पी सिंह के समय हुई. वी पी सिंह के समय तो मुस्लिम बुद्धिजीवियों को बार-बार झकझोरा गया, सामने आने की दावत दी गई, पर फिर भी फ्रंट रो में कोई नहीं आया. आया कौन, जिसे मुसलमान अपना प्रतिनिधि नहीं मानते हैं यानी आरिफ मोहम्मद ख़ान. जो मुसलमानों के प्रतिनिधि थे, वे दाएं-बाएं चर्चाएं और आलोचना करते रहे, लेकिन लीडरशिप संभालने नहीं आए.

अब देश में फिर लोग भ्रष्टाचार के ख़िला़फ बात कर रहे हैं, लेकिन मुझे भ्रष्टाचार के खिला़फ लड़ाई में मुस्लिम बुद्धिजीवी नज़र नहीं आ रहे हैं. उनकी जितनी भी राय सामने आ रही है, चाहे वह टेलीविज़न के ज़रिए हो या अख़बार के, वह इस स्टेटस को बनाए रखने की राय है. उनकी राय में यह चिंता है कि कहीं भाजपा पावर में न आ जाए और कांग्रेस ख़त्म न हो जाए. उनकी पूरी कोशिश है कि वे किसी भी तरह से कांग्रेस की लड़ाई लड़ें. जो लड़ाई कांग्रेस अपने आप नहीं लड़ पा रही है, उसे लड़ने का दंभ मुस्लिम बुद्धिजीवी या मुस्लिम नेता भर रहे हैं. शायद इसके पीछे कारण वही है, जो पिछले कुछ सालों से लगातार दिखाई दे रहा है. कारण चुनाव के समय कांग्रेस से मुसलमानों के नाम पर किसी न किसी तरह का सौदा कर लेना और हिंदुस्तान के मुसलमानों के सपनों को गिरवी रख देना, क्योंकि किसी भी चुनाव के बाद मुस्लिम तंज़ीमें, मुस्लिम संगठन या मुस्लिम बुद्धिजीवी उन मांगों के ऊपर कभी भी लामबंद होते दिखाई नहीं दिए.

सवाल यह है कि अगर नेता और बुद्धिजीवी अपनी भूमिका भूल जाएं तो आगे कौन आए. ऐसे समय में उनके आगे आने की ज़रूरत है, जो जामिया मिलिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पटना, बनारस, भुवनेश्वर एवं तमिलनाडु में पढ़ रहे हैं. अपनी समस्याओं से चिंतित और परेशान नौजवान, ख़ासकर मुस्लिम नौजवानों को इस समय आगे आना चाहिए. देश एक नई करवट के दरवाज़े पर खड़ा है. उस करवट का हिस्सा या उस बदलाव का हिस्सा बनना काफी नहीं है, बल्कि उस बदलाव की लीडरशिप का हिस्सा बनना ज़्यादा ज़रूरी है. मुसलमानों की समस्याएं वही हैं, जो इस देश के 80 प्रतिशत लोगों की हैं. इस बात को मुस्लिम समाज शायद समझता है, लेकिन उसके नेता नहीं समझते. इसीलिए इधर एक नई चीज़ नज़र आ रही है कि किसी भी संगठन के बयान या किसी भी संगठन की राय पर लोग अपना वोट नहीं देते. वोट अपनी समस्याओं की रोशनी में देते हैं.

यह दुर्भाग्य की स्थिति है, क्योंकि जितनी गई-गुजरी स्थिति मुसलमानों की है, उतनी गई-गुजरी स्थिति न दलितों की है, न पिछड़ों की और न किसानों की. किसान, दलित और पिछड़े मरते-मरते भी आवाज़ उठा रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन इस सिस्टम से लड़ाई का हौसला भी दिखा रहे हैं. देश में बहुत सारी जगहों पर ज़मीन अधिग्रहण के ख़िला़फ किसान लड़ाई लड़ रहे हैं. दलित अपनी अस्मिता को सामने रखकर किसी न किसी नेता के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. सबसे अफसोसनाक हालत मुस्लिम समुदाय की है, जिसके लीडर न तो भविष्य की चुनौतियां समझ रहे हैं और न देश के सामने खड़े हुए सवाल. एफडीआई, महंगाई, बेरोज़गारी, ग़रीबी और सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार उनके लिए बहुत मायने नहीं रखते. इसलिए जब-जब हम मुस्लिम बुद्धिजीवियों के मजमून या उनके राइटअप को पढ़ते हैं तो थोड़ी सी निराशा होती है.

सवाल यह है कि अगर नेता और बुद्धिजीवी अपनी भूमिका भूल जाएं तो आगे कौन आए. ऐसे समय में उनके आगे आने की ज़रूरत है, जो जामिया मिलिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पटना, बनारस, भुवनेश्वर एवं तमिलनाडु में पढ़ रहे हैं. अपनी समस्याओं से चिंतित और परेशान नौजवान, ख़ासकर मुस्लिम नौजवानों को इस समय आगे आना चाहिए. देश एक नई करवट के दरवाज़े पर खड़ा है. उस करवट का हिस्सा या उस बदलाव का हिस्सा बनना काफी नहीं है, बल्कि उस बदलाव की लीडरशिप का हिस्सा बनना ज़्यादा ज़रूरी है. मुसलमानों की समस्याएं वही हैं, जो इस देश के 80 प्रतिशत लोगों की हैं. इस बात को मुस्लिम समाज शायद समझता है, लेकिन उसके नेता नहीं समझते. इसीलिए इधर एक नई चीज़ नज़र आ रही है कि किसी भी संगठन के बयान या किसी भी संगठन की राय पर लोग अपना वोट नहीं देते. वोट अपनी समस्याओं की रोशनी में देते हैं. पिछला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव इसका जीता-जागता उदाहरण है.

ठीक यही हालत किसानों, दलितों एवं पिछड़ों में भी है. उनके नेता स्टेटस क्वो (यथास्थितिवाद) का हिस्सा बन गए हैं, व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं. उनके सारे तर्क चाहे वे अख़बारों में हों, चाहे टेलीविज़न पर हों या छोटी-छोटी सभाओं में हों, भ्रष्टाचार को बनाए रखने और भ्रष्टाचार के ख़िला़फ चल रही लड़ाई को भोथरा करने वाले होते हैं. उनका यह मानना है कि इस देश की जनता ही बेईमान हो गई है. इसलिए इस देश से कभी भ्रष्टाचार जा ही नहीं सकता. उन्हें यह समझ में नहीं आता कि उनका यह तर्क इस देश के लोगों के दर्द को कितना बढ़ाता है. जब गांव का ग़रीब आदमी या ग़रीब किसान या ग़रीब मज़दूर या ग़रीब मुसलमान कहीं पर बीस रुपये की घूस देता है तो बीस रुपये की घूस उसे इसलिए देनी पड़ती है, क्योंकि सबसे ऊपर बैठे हुए लोग लाखों करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार करते हैं. जिस दिन ऊपर का भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा, उस दिन नीचे का भ्रष्टाचार अपने आप समाप्त हो जाएगा.

इस व्यवस्था को बदलने की बात कहना और इस व्यवस्था को बदलने के सपने देखना एक बात है, लेकिन इस व्यवस्था को बदलने की लड़ाई में हिस्सा लेना बिल्कुल दूसरी बात है. वे सारे लोग, जो इस व्यवस्था से पीड़ित हैं, इस समाज की कुरीतियों से परेशान हैं, उन सबको अपने-अपने दायरे तोड़कर हिंदुस्तान के नागरिक की हैसियत से, भारत के अवाम की हैसियत से आगे आना चाहिए और उन सारे तर्कों का जवाब गली-चौराहों पर देना चाहिए, जो उनके हित के ख़िला़फ व्यवस्था से जुड़े लोगों द्वारा गढ़े जाते हैं. उन्हें उन तर्कों को भविष्य के भ्रष्टाचारियों का तर्क मानना चाहिए और उन सारे लोगों की भाषा और उनकी गतिविधियों का विरोध करना चाहिए, जो हिंदुस्तान की तस्वीर बदलना नहीं चाहते. एक मौक़ा आ रहा है और इस मौक़े का इस्तेमाल हिंदुस्तान के लोग करेंगे, ऐसी आशा बहुत सारे लोगों को है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.