प्रधानमंत्री के नाम अन्ना की चिट्ठी

सेवा में,

श्रीमान् डॉ. मनमोहन सिंह जी,

प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली. 

 

विषय : गैंगरेप-मानवता को कलंकित करने वाली शर्मनाक घटना घटी और देश की जनता का आक्रोश सड़कों पर उतर आया. ऐसे हालात में आम जनता का क्या दोष है?

 

महोदय,

गैंगरेप की घटना से देशवासियों की गर्दन शर्म से झुक गई. इस घटना से आहत जनता का गुस्सा बेकाबू हो गया और वह देश की सड़कों पर उतर आई. कई दिनों से लगातार जनता का गुस्सा और आक्रोश बढ़ता ही गया. ख़ास तौर पर युवा शक्ति बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आई. सामाजिक न्याय के लिए इतनी बड़ी संख्या में युवा शक्ति का उतरना और अहिंसा के मार्ग से आंदोलन करना, यही देश में होने जा रहे परिवर्तन के पूर्व संकेत हो सकते हैं. लगता है, अब देश में परिवर्तन का समय निकट आ रहा है. युवा शक्ति ही राष्ट्र शक्ति होने के कारण देश में परिवर्तन लाएगी. ऐसा विश्‍वास हो रहा है. ज़रूरी है कि इस बारे में सरकार की तरफ़ से गंभीर सोच हो. सरकार की तरफ़ से बयान आ रहे हैं कि शीघ्र ही क़ानून में संशोधन करके अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाएगी. सरकार के कहने का यही मतलब निकलता है कि जनता अन्याय-अत्याचार के  विरोध में बार-बार आंदोलन करती रहे और आंदोलन के बाद सरकार क़ानून में संशोधन करने का आश्‍वासन देती रहेगी.

26 जनवरी, 1950 को इस देश में हम भारत की जनता ने पहला प्रजासत्ताक दिन (गणतंत्र दिवस) मनाया. इसी दिन जनता इस देश की मालिक बन गई. सरकारी तिजोरी जनता की है, उसका सही नियोजन करने के लिए, देश की सर्वोच्च व्यवस्था न्याय व्यवस्था होने के कारण क़ानून और सुव्यवस्था रखने के लिए, देश में अच्छे-अच्छे सशक्त क़ानून बनवाने के लिए हम देश की जनता ने राज्य के लिए विधायक और केंद्र के लिए सांसदों को जनता के सेवक के नाते भेजा है. मंत्रिमंडल में जो लोग हैं, वे भी जनता के  सेवक हैं. विधानसभा और लोकसभा का मुख्य काम है सुव्यवस्था के लिए सशक्त क़ानून बनाना. आज गैंगरेप के कारण जनता का गुस्सा बेकाबू हो गया और उधर प्रधानमंत्री के नाते आप, श्रीमती सोनिया गांधी जी और सरकार के लोग कह रहे हैं कि हम क़ानून में संशोधन करके दोषियों को कठोर सज़ा देंगे. आज़ादी के 65 साल बीत गए हैं. प्रश्‍न खड़ा होता है कि महिलाओं पर इस प्रकार के अन्याय-अत्याचार के देश में हज़ारों उदाहरण हैं. देश में सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए नए-नए क़ानून बनवाना और क़ानून में संशोधन करना, यही तो सरकार का कर्तव्य था. 65 साल में आज तक सरकार ने क़ानून में संशोधन करके फांसी या जन्मठेप (उम्रकैद) जैसे सशक्त क़ानून क्यों नहीं बनाए?

गैंगरेप जैसी शर्मनाक घटना के लिए छह लोग दोषी बताए जाते हैं. ऐसे अपराध करने वालों को फांसी या उम्रकैद की सज़ा जैसे सशक्त क़ानून बनवाए गए होते तो इन छह आरोपियों में ऐसा गुनाह करने की हिम्मत ही न होती. क्या सरकार को ऐसा नहीं लगता? हमें लगता है कि इन छह दोषी आरोपियों को कड़ी से कड़ी सज़ा तो मिलनी चाहिए, लेकिन पिछले 65 साल में सशक्त क़ानून न बनवाने वाली सरकार भी तो उतनी ही ज़िम्मेदार है. ऐसा अगर हम कहें तो ग़लत नहीं होगा.

बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण जनता का जीना मुश्किल हो गया है. महंगाई के कारण परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. इससे परेशान होकर देश की जनता करोड़ों की संख्या में रास्ते पर उतर गई थी. अगर भ्रष्टाचार को रोकने वाले सशक्त क़ानून बनाए गए होते तो भ्रष्टाचार नहीं बढ़ता. 16 अगस्त, 2011 को देश भर में जनता ने रास्ते पर उतर कर अपना गुस्सा प्रदर्शित किया था. अन्ना हजारे तो रामलीला मैदान में निमित्त मात्र थे. जनता रास्ते पर उतर गई थी, क्योंकि जनता का जीना मुश्किल हो गया और दिल में भ्रष्टाचार का बहुत गुस्सा था. आपकी सरकार को जनता के सब्र का अब और अंत नहीं देखना चाहिए. सुव्यवस्था बनाए रखने हेतु सशक्त क़ानून बनवाने के लिए तो जनता ने सांसदों को संसद में भेजा है. उस कर्तव्य भावना से सशक्त क़ानून न बनवाने के  कारण गैंगरेप की घटना घटती है तो जनता का गुस्सा होना सहज स्वाभाविक है. इसमें उसका क्या दोष है?

सरकार चलाने वाले लोगों को सोचना चाहिए कि यदि अपनी बेटी या अपनी बहन के साथ ऐसा व्यवहार होता तो आप क्या करते? जनता को गुस्सा आया, इसमें उसका क्या दोष है? अहिंसा के मार्ग से जनता आंदोलन करती है और धारा 144 लगाकर सरकार जनतंत्र का गला घोंटने का काम करती है. ऐसा कहें तो ग़लत नहीं होगा. जनता को संविधान ने ही आंदोलन का अधिकार दिया है. जनता में ऐसा गुस्सा फिर से पैदा न हो, इसलिए महिलाओं के  संरक्षण के लिए सशक्त क़ानून बनवाना सरकार के हाथ में है और यह सरकार का कर्तव्य भी है. आज सरकार जनता को जो आश्‍वासन दे रही है, वह पहले भी तो कर सकती थी, लेकिन समाज और देश की भलाई की अपेक्षा लगता है कि सत्ता और पैसे की सोच अधिक प्रभावी होने से सरकार कुछ नहीं कर पाती.

आज देश में युवकों और जनता ने जो आंदोलन किया, वह अहिंसा के मार्ग से किया है. कहीं पर भी तोड़फोड़ की घटना नहीं घटी. आंदोलन का यह एक आदर्श उदाहरण है. देश और दुनिया के लिए एक आदर्श है. आंदोलनकारियों का मुख्य उद्देश्य यही है कि महिलाओं पर फिर से ऐसा अन्याय, अत्याचार न हो. ऐसा सशक्त क़ानून सरकार से बनवा कर दोषी लोगों को कड़ी सज़ा मिल जाए. इस आंदोलन से सरकार को समझना चाहिए कि देश का युवक, देश की जनता सामाजिक परिवर्तन चाहती है. संविधान के मुताबिक़ जीवन की ज़रूरत पूरी करने और अच्छा जीवन जीने का हर व्यक्ति को अधिकार है. सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करने वाली जनता को सशक्त क़ानून का अगर आधार मिल जाए तो देश में सामाजिक परिवर्तन का बहुत बड़ा काम होगा. दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले और आगे ऐसी घटना न हो, इसलिए सशक्त क़ानून जल्द से जल्द बने, चाहे इसके लिए संसद का विशेष अधिवेशन बुलाना ही क्यों न पड़े. इस पर सरकार की राय जानना चाहता हूं. इस काम के लिए सरकार चलाने वाले और क़ानून बनाने वाले लोगों को मजबूती मिले, इसलिए 27 और 28 दिसंबर को मैंने और मेरे गांव के कुछ लोगों ने रालेगण सिद्धी के श्री संत यादव बाबा मंदिर में भगवान से प्रार्थना के लिए बैठने का संकल्प किया है.

 

भवदीय,

 

कि. बा. तथा अन्ना हजारे

 

मैं जनता और युवा भाई-बहनों से विनती करता हूं कि वे आंदोलन करते समय संयम रखें, ताकि राष्ट्रीय संपत्ति की कोई हानि न हो. रास्ते से गुजरने वाले सभी जन हमारे भाई-बहन हैं, उन्हें तकलीफ़ न हो. आपने पहले भी अगस्त 2011 में शांतिपूर्ण आंदोलन का आदर्श निर्माण किया है. करोड़ों युवक रास्ते पर उतरे, लेकिन किसी ने एक पत्थर तक नहीं उठाया. उस आदर्श की दुनिया ने सराहना की है. उसी आदर्श को सामने रखते हुए शांति के मार्ग से आंदोलन करने की विनती करता हूं. अन्याय और अत्याचार के विरोध में जली इस मशाल को कभी बुझने न देना, क्योंकि इसी में समाज और देश की भलाई है.

 

जयहिंद.

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One thought on “प्रधानमंत्री के नाम अन्ना की चिट्ठी

  • January 16, 2013 at 9:36 PM
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    अन्ना हजारे जी आप ने जो कुछ कहा सब ठीक मगर इस देश के नेताओं को ऐसी बाते समझ में कहा आती हैं । आपने देखा ही हैं सब कुछ फिर भी आप इन लोगों से उम्मिद कर रहे हैं । इसी लिए मुझें लगता हैं केजरीवाल का रास्ता सही हैं । बहार सडक पर चलने वालों की कोई नही सुनता अच्छा यही हैं के हम संसद में जा कर अपनी बात कहें ।

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