प्रजातंत्र बना लाठीतंत्र

एक बार लखनऊ में मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर जबरदस्त प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शनकारी पूर्वांचल के अलग-अलग शहरों से लखनऊ पहुंचे थे, उनकी संख्या क़रीब 1500 रही होगी, उनमें किसान, मज़दूर एवं छात्रनेता भी थे, जो अपने भाषणों में मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ आग उगल रहे थे. वे सब अपने भाषणों में सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना साध रहे थे. उस प्रदर्शन का नेतृत्व समाजवादी नेता चंद्रशेखर कर रहे थे. प्रदर्शन क़रीब दो-तीन घंटे तक चला. धक्कामुक्की भी हुई. वे लोग मुख्यमंत्री से मिलना चाहते थे. उनकी कुछ मांगें थीं और वे मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी मांगें उनके सामने रखना चाहते थे. उस वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे विश्‍वनाथ प्रताप सिंह. प्रदर्शनकारियों के कुछ नेताओं को मुख्यमंत्री से मिलने के लिए बुलाया गया. जब वी पी सिंह से उनका सामना हुआ तो पहला सवाल वी पी सिंह ने चंद्रशेखर जी से यह पूछा कि सवेरे से आप लोग अपने घरों से चले हैं, खाने-पीने की तो आपने व्यवस्था की नहीं है. चंद्रशेखर जी गुस्से में थे. उन्होंने कहा कि हम मुख्यमंत्री के सामने अपनी मांगें रखने आए हैं, बाकी आप जानिए. इस पर वी पी सिंह कहा, मुझे मालूम है कि आप लोग सवेरे से भूखे हैं और आपने खाने-पीने की व्यवस्था भी नहीं की है. इसलिए मैंने पहले से ही खाने-पीने का इंतजाम कर रखा है. इसलिए पहले खाना खा लीजिए, फिर बातचीत करेंगे. इसके बाद उन्होंने अधिकारियों से सारे प्रदर्शनकारियों को खाना खिलाने के लिए कहा और फिर बातचीत की. यह घटना राजनीति में साधारण शिष्टाचार को दर्शाती है. अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि आज यह शिष्टाचार भारत की राजनीति से ग़ायब हो गया है, क्योंकि जननेताओं की जगह बौनों ने राजनीति की कमान संभाल रखी है. आज की सरकार जनता के आंदोलनों का एक ही जवाब जानती है दमन. पहले आंदोलनकारियों को रोकना, फिर पानी बरसाना और उससे भी न मानें तो उन पर पुलिस की लाठी बरसाना. शुक्र है कि अब तक गोलियां नहीं चल रही हैं.

ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका लोगों की आशाओं के मुताबिक़ काम नहीं कर रही हैं. भारत में प्रजातंत्र की नई परिभाषा रची जा रही है. प्रजातंत्र के इस प्रारूप में जनता की हिस्सेदारी नहीं है. पब्लिक ओपिनियन का कोई महत्व नहीं है. ग़रीबों और मजलूमों की सुनवाई नहीं है. शोषित वर्ग की सुरक्षा नहीं है. प्रजातंत्र का यह नया रूप डराने वाला है, क्योंकि यह युवा भारत की आशाओं और आकांक्षाओं के बिल्कुल विपरीत है. सरकार और सरकार चलाने वाली पार्टी को इस बात की भनक भी नहीं है कि लोगों की सोच और उनके रवैये में ज़मीन-आसमान का अंतर हो गया है. अफ़सोस के साथ यह कहना पड़ता है कि जिन लोगों पर देश के प्रजातंत्र को बचाने की ज़िम्मेदारी है, उन्होंने इसे आईसीयू में डाल दिया है. किसी आंदोलन के दमन और लोगों की मांगों को दबा देने को सरकार जीत समझने लगी है. इसके लिए झूठ, फरेब और साज़िश के इस्तेमाल से भी उसे कोई गुरेज़ नहीं है.

बलात्कार की शर्मनाक घटना के अगले दिन जेएनयू के छात्र-छात्राओं ने दिल्ली के मुनीरका में रास्ता जाम किया तो किसी को नहीं लगा कि यह आंदोलन की शक्ल लेकर पूरे देश को हिला देगा. सरकार से इस घटना को समझने में चूक हुई. सरकार को लगा कि यह बलात्कार की छोटी घटना है, सब कुछ शांत हो जाएगा. न प्रधानमंत्री सामने आए, न गृहमंत्री सामने आए और न कोई आश्‍वासन मिला.

देश के लोग बलात्कार जैसे घृणित मामले में सरकार से कड़े क़ानून की मांग कर रहे थे, तुरंत कार्यवाही चाह रहे थे. इसके लिए युवा इंडिया गेट पर आंदोलन कर रहे थे. कांग्रेस पार्टी, मीडिया और पुलिस ने एक कांस्टेबल की मौत का ऐसा तमाशा बनाया कि पूरा देश सहम गया. जबकि जिस दिन से कांस्टेबल सुभाष तोमर राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचे, उसी दिन से वहां के डॉक्टर लगातार यह कह रहे थे कि उनके  शरीर पर न तो कोई बाहरी और न आंतरिक जख्म है. पुलिस और सरकार ने मीडिया की मदद से एक सिपाही की मौत के जरिए एक शांतिपूर्ण आंदोलन को न स़िर्फ बदनाम किया, बल्कि यह इल्जाम लगा दिया कि आंदोलनकारियों ने उसकी हत्या की है. हालांकि अभी इस मामले में कोर्ट का फैसला आना बाकी है, लेकिन प्रशासन की तरफ़ से यही कोशिश है कि येन-केन-प्रकारेण कुछ लोगों को कांस्टेबल सुभाष तोमर की मौत के लिए ज़िम्मेदार ठहरा कर आंदोलन में शामिल लोगों को शर्मसार किया जाए.

बलात्कार की शर्मनाक घटना के अगले दिन जेएनयू के छात्र- छात्राओं ने दिल्ली के मुनीरका में रास्ता जाम किया तो किसी को नहीं लगा कि यह आंदोलन की शक्ल लेकर पूरे देश को हिला देगा. सरकार से इस घटना को समझने में चूक हुई. सरकार को लगा कि यह बलात्कार की छोटी घटना है, सब कुछ शांत हो जाएगा. न प्रधानमंत्री सामने आए, न गृहमंत्री सामने आए और न कोई आश्‍वासन मिला. लोगों का गुस्सा बढ़ता गया. युवाओं ने जब पहले दिन कैंडिल मार्च किया था, तब अगर सरकार की तरफ़ से कोई ठोस आश्‍वासन दे दिया जाता तो शायद बात यहां तक नहीं पहुंचती. लोगों की नाराज़गी ने आंदोलन की शक्ल ले ली, जिसमें युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. सरकार ने बातचीत के बजाय शक्ति का प्रयोग किया. ठोस आश्‍वासन की जगह सरकार की तरफ़ से पहली प्रतिक्रिया यह आई कि इंडिया गेट के आंदोलन में असामाजिक तत्व शामिल हैं. युवाओं का साथ देने के लिए बाबा रामदेव, जनरल वी के सिंह और अरविंद केजरीवाल भी मैदान में कूद पड़े. युवाओं को इससे बल मिला. आंदोलन तेज़ हो गया और दिल्ली के बाहर भी देश के अलग-अलग शहरों में जुलूस और मार्च निकलने लगे. उनकी मांग स़िर्फ इतनी थी कि सरकार जल्द से जल्द अपराधियों को सख्त सज़ा दे और बलात्कार के ख़िलाफ़ एक कड़ा क़ानून बने, लेकिन सरकार और पुलिस की तरफ़ से ऐसी-ऐसी दलीलें दी गईं, जिनसे लोगों की नाराज़गी और बढ़ती गई.

दरअसल, इन सबके पीछे कांग्रेस और सरकार की मानसिकता काम कर रही थी. कांग्रेस पार्टी और सरकार की सोच यह है कि देश में सब कुछ सही चल रहा है, कोई समस्या नहीं है, किसी चीज की कमी नहीं है और देश की जनता बहुत खुश है, लेकिन कुछ लोगों को हंगामा खड़ा करने की आदत है. कांग्रेस को लगता है कि ये सब अराजकता फैलाने वाले लोग हैं और मीडिया की वजह से इन्हें लोगों का समर्थन मिल जाता है. सरकार चलाने वाली पार्टियों और अधिकारियों को यह अटूट विश्‍वास है कि अगर मीडिया और कैमरे न पहुंचें तो देश में कोई आंदोलन न हो. लोग टीवी कैमरे को देखकर व्याकुल हो उठते हैं, वरना इस देश में कोई आंदोलन ही न हो. समझने वाली बात यह है कि देश में जिस तरह लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं, जिस तरह वे अपनी नाराज़गी इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ज़ाहिर करने लगे हैं, जिस तरह आज के युग में लोगों तक मैसेज पहुंचाना आसान हो गया है, वैसे में सरकार अब अपनी ताकत के बल पर सच को झूठ और झूठ को सच नहीं बना सकती.

कांस्टेबल सुभाष तोमर के बारे में सबसे पहले दिल्ली पुलिस के अधिकारी ने यह बताया कि उस पर चाकू से हमला किया गया है. गृहमंत्री तक ने कह दिया कि वह अस्पताल में घायल पड़ा है. पुलिस कमिश्‍नर ने तो यह भी बताया कि सुभाष तोमर के शरीर पर कहां-कहां चोटें आई हैं, लेकिन यह सब दावे झूठे साबित हो गए, जब फेसबुक और ट्विटर पर सुभाष तोमर की तस्वीरें आने लगीं. मजबूरन मीडिया को भी उन तस्वीरों को दिखाना पड़ा. इस घटना के चश्मदीद एक युवक और एक युवती ने बहादुरी दिखाई और सच को सामने रखा.

कांस्टेबल सुभाष तोमर के बारे में सबसे पहले दिल्ली पुलिस के अधिकारी ने यह बताया कि उस पर चाकू से हमला किया गया है. गृहमंत्री तक ने कह दिया कि वह अस्पताल में घायल पड़ा है. पुलिस कमिश्‍नर ने तो यह भी बताया कि सुभाष तोमर के शरीर पर कहां-कहां चोटें आई हैं, लेकिन यह सब दावे झूठे साबित हो गए, जब फेसबुक और ट्विटर पर सुभाष तोमर की तस्वीरें आने लगीं. मजबूरन मीडिया को भी उन तस्वीरों को दिखाना पड़ा. इस घटना के चश्मदीद एक युवक और एक युवती ने बहादुरी दिखाई और सच को सामने रखा. उधर राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टरों ने भी यह पुष्टि की कि सुभाष तोमर को पहला हार्ट अटैक आंदोलन के दौरान हुआ और फिर दूसरी बार हार्ट अटैक अस्पताल में, जब उनकी मौत हुई. लेकिन पुलिस ने 8 साधारण युवकों पर हत्या करने की कोशिश की धारा लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. जब उन्हें कोर्ट में पेश किया गया तो दिल्ली पुलिस कोई भी सबूत नहीं दे सकी. कोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी, जबकि धारा 307 के मामले में आरोपियों को ज़मानत नहीं मिलती. सवाल यह है कि बिना सबूत के लोगों पर इस तरह की सख्त धाराएं लगाने का क्या मतलब है.

लगता है, सरकार ने यह तय कर लिया है कि जो भी विरोध के स्वर को मजबूत करेगा, उसे सबक सिखाया जाएगा. यही वजह है कि इन आठ युवकों के अलावा पुलिस ने जनरल वी के सिंह, बाबा रामदेव, अरविंद केजरीवाल एवं मनीष सिसोदिया पर हिंसा भड़काने के मामले दर्ज किए. जबकि ये सब शांतिपूर्ण तरी़के से प्रदर्शन कर रहे थे. जनरल वी के सिंह तो लगातार अपील कर रहे थे कि यह आंदोलन शांतिपूर्ण है और उन्हें इंडिया गेट जाने दिया जाए. अजीब बात है, एक तरफ़ लगातार बदला लेने की नीयत से और सबक सिखाने की धुन में सरकार ग़लती पर ग़लती करती रही और उसकी हर चाल का पर्दाफ़ाश होता रहा, फिर भी उसने इस बीच एक ऐसा फैसला लिया, जो यह दिखाता है कि भारतीय राजनीति को किस तरह की मानसिकता का घुन लग गया है. सरकार का फरमान आया कि जनरल वी के सिंह को दी गई जेड-सिक्योरिटी हटा ली गई है. मीडिया ने भी इस ख़बर को प्रमुखता दी, लेकिन किसी टीवी चैनल ने अपने पुराने टेप को खंगालने की जहमत नहीं उठाई. अगर उन्होंने यह काम किया होता तो पता चलता कि पिछले कुछ महीनों में जनरल वी के सिंह देश के कई शहरों में गए, कई आंदोलनों में जंतर-मंतर पहुंचे, रामलीला मैदान गए, लेकिन कहीं भी उनके साथ कोई बंदूकधारी या सुरक्षाकर्मी नज़र नहीं आया. जनरल वी के सिंह जहां जाते हैं, अकेले होते हैं. जब जनरल वी के सिंह के साथ कोई सिक्योरिटी नहीं है तो फिर सरकार ने कौन सी जेड-सिक्योरिटी हटाने का आदेश दिया? दरअसल, यह मामला भी मानसिकता का है. सरकार ने जनरल वी के सिंह को अपमानित करने की कोशिश की. लेकिन हमने ट्विटर पर एक कमेंट पढ़ा, जिसमें लिखा था, जनरल वी के सिंह को सिक्योरिटी की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि देश के लोग ही उनकी सुरक्षा में लगे हैं. जेड-सिक्योरिटी की ज़रूरत उन लोगों को है, जो जनता से डरते हैं.

इस पूरे मामले में सरकार की जो किरकिरी हुई है, उसके लिए वह खुद ज़िम्मेदार है. इस आंदोलन के दौरान सरकार के पास ऐसे कई मौ़के आए, जबकि आंदोलनकारियों को संतुष्ट किया जा सकता था, लेकिन उन्हें संतुष्ट करने के बजाय सरकार ने ऐसा रवैया अपनाया, जिससे लोगों की नाराज़गी बढ़ गई. सबसे पहला मौक़ा तब आया, जब शुरुआत में ही सरकार या कांग्रेस पार्टी के किसी बड़े नेता ने आश्‍वासन दिया होता तो विरोध आंदोलन की शक्ल नहीं लेता. लेकिन कांग्रेस की समस्या यह है कि वहां ऐसा कौन है, जिसके आश्‍वासन पर लोग भरोसा करते. दूसरा मौक़ा तब आया, जब लोग इंडिया गेट पहुंचे. तब अगर गृहमंत्री ने वहां जाकर आंदोलनकारियों से बात की होती तो भी आंदोलनकारियों को भरोसा हो जाता, लेकिन उन्होंने ऐसा बयान दे दिया, जिससे मामला और बिगड़ गया. उन्होंने यह संदेश दिया कि देश के गृहमंत्री का आंदोलनकारियों के पास जाना उनकी तौहीन है. सरकार ने दिल्ली पुलिस की लापरवाही पर कोई कार्रवाई की होती तो भी लोगों को लगता कि यह जनता की चुनी हुई सरकार है, लेकिन सरकार के सबसे आला अधिकारी ने उल्टे दिल्ली पुलिस कमिश्‍नर की पीठ थपथपा दी. सरकार के पास आख़िरी मौक़ा तब आया, जब बाबा रामदेव, जनरल वी के सिंह और अरविंद केजरीवाल एक समय पर आंदोलनकारियों के साथ थे. सरकार उन्हें बुलाकर बात कर सकती थी और आंदोलनकारियों को समझाने की ज़िम्मेदारी उन पर छोड़ सकती थी, लेकिन सरकार उन्हें ही बाहरी और असामाजिक तत्व बताने की मुहिम में जुट गई और उनके ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने का मामला दर्ज कर लिया गया. सरकार ने मीडिया के जरिए एक कांस्टेबल की मौत की झूठी कहानी बताकर आंदोलनकारियों के हौसले को पस्त करने की कोशिश की. लोग घरों में लौट गए, लेकिन सरकार को यह समझना पड़ेगा कि देश के लोग परेशान हैं. वे महंगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, जनविरोधी नीतियों, जल- जंगल-ज़मीन की लूट और राजनीतिक वर्ग की संवेदनहीनता से त्रस्त हैं. लोग देश में मूलभूत परिवर्तन चाहते हैं, इसलिए कोई छोटी सी चिंगारी भी भयंकर आग में तब्दील हो सकती है. देश परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा है. देखना है कि क्या यह परिवर्तन वर्तमान राजनीतिक दलों की मानसिकता को बदलेगा या फिर देश में कोई नई ताक़त पैदा होगी, जो लोगों की आशाओं के अनुरूप नए भारत का निर्माण करेगी.

सीबीआई के घेरे में आ सकते हैं बीआईएफआर चेयरमैन

1980 के दशक में देश की ख़राब वित्तीय हालत को सुधारने के लिए एक क़ानून बनाया गया था, जिसका नाम था सिक इंडस्ट्रियल कंपनीज (स्पेशल प्रोविजन) एक्ट 1985 यानी सिका. इसी के तहत बोर्ड ऑफ इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंसियल रिकंस्ट्रक्शन (बीआईएफआर) का गठन जनवरी 1987 में किया गया था. देश की सरकारी कंपनियों को सिका की देखरेख में लाया गया. इसका मुख्य मकसद था बीमार कंपनियों की पहचान करना और उनकी बेहतरी के उपाय ढूंढना. बहरहाल, बीआईएफआर की मुख्य ज़िम्मेदारी जहां बीमार उद्योगों को ठीक करने की है, वहीं बीआईएफआर से कुछ ऐसी ख़बरें आ रही हैं, जो खुद बीआईएफआर के बीमार होने की कहानी कहती हैं और ख़ासकर उसके चेयरमैन का रोल काफ़ी संदिग्ध नज़र आ रहा है.

बोर्ड ऑफ इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंसियल रिकंस्ट्रक्शन के चेयरमैन जिस तरी़के से अपने रिटायरमेंट के पहले कुछ ख़ास निर्णय लेने की कोशिश कर रहे हैं, उससे कई लोगों की त्योरियां चढ़ गई हैं. बीआईएफआर के चेयरमैन जनवरी में रिटायर होने वाले हैं. एक बहुत ही ख़ास केस में, जिसका संबंध पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश के एक औद्योगिक घराने से है, बीआईएफआर के चेयरमैन एक पारिवारिक समूह को दूसरे पारिवारिक समूह के विरुद्ध फ़ायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. सबसे पहले उन्होंने आईडीबीआई पर दबाव बनाकर ऐसी सिफ़ारिश करने के लिए कहा, जैसी वह चाहते थे. हालांकि आईडीबीआई उनके दबाव में नहीं आई. अब चेयरमैन महोदय ने एक नोट तैयार किया है और यह चाहते हैं कि बीआईएफआर के उनके साथी उस पर दस्तख़त कर दें, ताकि वह अपने आदमी से किए गए वायदे को पूरा कर सकें, वह भी अपने रिटायरमेंट से पहले. हालांकि बीआईएफआर सूत्रों का कहना है कि इस नोट की एक कॉपी सीबीआई के हाथ लग गई है और अब चेयरमैन महोदय सीबीआई के शक के घेरे में आ गए हैं. अगर वह इस मामले को आगे बढ़ाते हैं तो निश्‍चित ही वह सीबीआई के जाल में फंस जाएंगे.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमताके साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है. ‎