यह संसद संविधान विरोधी है

सरकार को आम जनता की कोई चिंता नहीं है. संविधान के मुताबिक़, भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है. इसका साफ़ मतलब है कि भारत का प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार आम आदमी के जीवन की रक्षा और उसकी बेहतरी के लिए वचनबद्ध है. लेकिन सरकार ने इस लोक कल्याणकारी चरित्र को ही बदल दिया है. सरकार बाज़ार के सामने समर्पण कर चुकी है, लेकिन संसद में किसी ने सवाल तक नहीं उठाया. अगर भारत को लोक कल्याणकारी की जगह नव उदारवादी बनाना है तो इसका फैसला कैसे हो? क्या यह फैसला स़िर्फ सरकार या कुछ राजनीतिक दल कर सकते हैं? नहीं, इसका फैसला देश की जनता करेगी. यह देश की जनता का अधिकार है कि वह किस तरह की सरकार से शासित होना चाहती है. इसलिए हमारी यह मांग है कि इस संसद को भंग किया जाए, ताकि जनता फैसला कर सके कि उसकी सरकार का चरित्र कैसा हो, वह संविधान द्वारा स्थापित लोक कल्याणकारी हो या नव उदारवादी.

सरकार ने संविधान की प्रस्तावना (प्रीएम्बल) की आत्मा और उसकी भावनाओं को दरकिनार कर दिया है. संविधान का भाग 4, जिसे हम डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी कहते हैं, उसकी पूरी तरह से उपेक्षा हो रही है. सरकार के साथ-साथ विपक्षी पार्टियां भी इस मुद्दे पर चुप हैं. बाबा भीमराव अंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान की भावनाओं को दरकिनार करने का हक़ सरकार को किसने दिया है? दरअसल, ग़रीबों और आम लोगों के हितों की बजाय निजी कंपनियों के हितों के लिए नीतियां बनाई जा रही हैं. संसद में इसके ख़िलाफ़ कोई आवाज़ भी नहीं उठा रहा है. इसलिए हमारी मांग है कि इस संसद को फ़ौरन भंग किया जाए. कांग्रेस पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और सारे राजनीतिक दल अपना पक्ष जनता के सामने रखें और बताएं कि वे बाज़ारवाद के मूल्यों पर सरकार चलाना चाहते हैं या फिर संविधान की आत्मा और भावनाओं को लागू करना चाहते हैं.

आज की संसद को भंग करके नई संसद जनता को बनानी है और नई संसद बनाने के लिए जनता की शर्तें होंगी. यह जनता का हक़ है, अधिकार है. जनता की संसद जब बनेगी, तब उसमें जन लोकपाल आएगा, ग्राम विकास आएगा, राइट टू रिजेक्ट आएगा, ग्राम सभा को शक्तियां मिलेंगी, साथ ही अंग्रेजों द्वारा बनाए गए सारे सड़े-गले क़ानूनों को बदला जाएगा.

इस संसद ने देश के लोगों का प्रतिनिधित्व करने का हक़ इसलिए भी खो दिया है, क्योंकि देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं. जल, जंगल, ज़मीन के मुद्दे पर देश के ग़रीबों का भरोसा ख़त्म हो गया है. सरकार नदियों और जल स्रोतों का निजीकरण कर रही है. खदानों के नाम पर जंगलों को निजी कंपनियों को बेचा जा रहा है और आदिवासियों को बेदख़ल किया जा रहा है. इतना ही नहीं, किसानों की उपजाऊ ज़मीनों का अधिग्रहण करके सरकार निजी कंपनियों के साथ मिलकर उसकी बंदरबांट कर रही है. जिस ज़मीन पर देश के लोगों का हक़ है, वह निजी कंपनियों को बांटी जा रही है. सरकार की इन नीतियों से आम जनता परेशान है और सांसदों ने जल, जंगल, ज़मीन के मुद्दे को संसद में उठाना भी बंद कर दिया है. इसलिए इसका फैसला होना ज़रूरी है कि देश के जल, जंगल, ज़मीन पर किसका हक़ है. इस बात का फैसला करने का हक़ भी देश की जनता को है, इसलिए अगले चुनाव में यह तय होगा कि देश की जनता किन नीतियों के पक्ष में है, इसलिए इस संसद का भंग होना अनिवार्य है.

संविधान के तहत सरकार को यह दायित्व दिया गया है कि जितने भी वंचित हैं, जैसे कि दलित, आदिवासी, घुमंतू, मछुआरे, महिलाएं, पिछड़े एवं मुसलमान, इन सबकी ज़िंदगी बेहतर करने के लिए नीतियां बनाई जाएं. देश के फैसले में इन लोगों की हिस्सेदारी हो. इसके लिए यह ज़रूरी है कि इन्हें समान अवसर और सत्ता में हिस्सेदारी मिले. सत्ता में हिस्सा देना तो दूर, सरकार किसी के मुंह का निवाला तो किसी के  हाथ से काम को छीनने का काम कर रही है. भ्रष्टाचार, घोटालों, महंगाई और बेरोज़गारी की वजह से देश के हर वर्ग के लोगों का विश्‍वास इस संसद से उठ गया है. इसलिए हम यह मांग करते हैं कि इस संसद को भंग कर फ़ौरन चुनाव की घोषणा हो, ताकि नई सरकार लोगों की आशाओं के अनुरूप काम कर सके.

एक तरफ़ देश में ग़रीबी है, भुखमरी है, बेरोज़गारी है, अशिक्षा है और दूसरी तरफ़ देश में मूलभूत सेवाओं को बहाल करने के  लिए सरकार क़र्ज़ लेती है. विदेशी पूंजी के लिए देश के सारे दरवाज़े खोलने को सरकार एकमात्र विकल्प बता रही है, जबकि विदेशी बैंकों में भारत का काला धन जमा है. अगर यह काला धन वापस आ जाता है तो देश की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है. दुनिया भर के देश अपने यहां का काला धन वापस लाकर अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में लगे हैं, लेकिन हमारी संसद काला धन वापस लाने के मुद्दे पर ख़ामोश है. देश के लोगों को यह भी नहीं पता है कि किन-किन लोगों का कितना काला धन विदेशी बैंकों में जमा है. इसलिए इस संसद को भंग किया जाना चाहिए, ताकि अगली सरकार काला धन वापस ला सके.

सरकार ने डीजल के  दाम बढ़ा दिए. इसकी वजह से महंगाई पर ज़बरदस्त असर पड़ा है. देश के कई शहरों में टैम्पो और ऑटोरिक्शा वाले आंदोलन कर रहे हैं. किराया बढ़ गया है. यूपीए गठबंधन में शामिल पार्टियों ने उसका साथ छोड़ दिया.

कांग्रेस पार्टी बिल्कुल अकेली खड़ी है. देश की जनता पर मुश्किल फैसले थोपना क्या प्रजातंत्र है? एलपीजी यानी कुकिंग गैस की क़ीमत मनमाने ढंग से बढ़ा दी गई और दलीलें दी गईं कि पेट्रोलियम कंपनियों को नुक़सान हो रहा है. दूसरी तरफ़ एक के बाद एक केंद्रीय मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री ने प्रजातंत्र में कैबिनेट की सामूहिक ज़िम्मेदारी के मंत्र को बड़ी आसानी से भुला दिया है. पहले सरकार फैसला नहीं ले रही थी और अब जब फैसले लेने लगी तो आम जनता की मुसीबत बढ़ाने का फैसला ले रही है. इसलिए हमारी मांग है कि संसद को भंग कर फ़ौरन चुनाव हों, ताकि राजनीतिक पार्टियां इन मुद्दों पर अपनी राय जनता के सामने रखें. इस बात का फैसला हो सके कि क्या हम संविधान के मुताबिक़ देश में नीतियां बनाना चाहते हैं या फिर बाज़ार के अनुकूल नीतियों के पक्ष में हैं.

हमारा मानना है कि जनसंसद दिल्ली की संसद से बड़ी है, क्योंकि जनसंसद यानी देश की जनता ने दिल्ली की संसद संविधान के अनुसार बनाई है. भारत का संविधान, भारत के लोगों यानी वी द पीपुल के संकल्प का परिणाम है. इसलिए जनसंसद का स्थान दिल्ली की संसद से बहुत बड़ा है और बहुत ऊंचा है. संसद में बैठे हुए लोग यह कह रहे थे कि क़ानून तो संसद में बनते हैं, रास्ते पर थोड़े ही बनते हैं और वे जनसंसद या जनता को मानने को ही तैयार नहीं थे. पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने कार्यकर्ताओं को कोयला घोटाले के सवाल पर स्पष्ट आदेश दिया कि रास्ते पर उतरो. हमें जनता के सामने जाना पड़ेगा. दूसरी तरफ़ भाजपा वाले भी कह रहे हैं कि हमें जनता के  सामने जाना पड़ेगा. उन्होंने मान लिया है कि दिल्ली की संसद से जनसंसद बड़ी है. दिल्ली की संसद में देश के भविष्य के बारे में कोई सोचता दिखाई नहीं दे रहा है, बल्कि अलग-अलग पक्षों और अधिकांश पार्टियों में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है. चिंता की बात यह है कि जो भ्रष्टाचार मिलकर हो रहा है, वह बहुत बड़ा ख़तरा है, जैसे कोयला घोटाला. कोयला घोटाले में सब शामिल हैं. टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला, इसमें सब फंसे हुए हैं. आज जनता सोचती है कि संसद में बैठे लोग देश को उज्ज्वल भविष्य नहीं दे सकते. अगर देश को उज्ज्वल भविष्य देना है, चाहे वह भ्रष्टाचार मुक्त भारत हो या महात्मा गांधी के  संकल्प का ग्राम विकास हो, क्योंकि गांधी जी कहते थे कि देश बदलने के लिए पहले गांव को बदलना होगा, जब तक गांव नहीं बदलेंगे, तब तक देश कैसे बदलेगा. गांधी जी ने कहा था कि मानवता और प्रकृति दोनों का दोहन नहीं होना चाहिए. विकास की दो शर्तें गांधी जी ने रखी थी कि न मानवता का दोहन हो, न प्रकृति का दोहन हो. आज हम देख रहे हैं कि सब मिलकर प्रकृति का दोहन कर रहे हैं. पेट्रोल, डीजल, कोयला, जंगल काट रहे हैं. विदेशी लोगों को बुला रहे हैं, किसानों की ज़मीनें ज़बरदस्ती छीन रहे हैं, उन पर बड़े-बड़े उद्योग लगा रहे हैं, जिसकी वजह से हवा प्रदूषित हो रही है, पानी प्रदूषित हो रहा है और समाप्त हो रहा है. इससे देश आगे नहीं बढ़ेगा, कभी न कभी विनाश होगा. ऐसा विकास सही विकास नहीं है, ऐसा महात्मा गांधी कहते थे. देश में कई जगह ग्राम स्वराज के अच्छे प्रयोग हुए हैं. जहां पेट्रोल नहीं, डीजल नहीं, कोयला नहीं, हमने स़िर्फ प्रकृति का उपयोग किया और लोग स्वावलंबी हो गए. बारिश की एक-एक बूंद को रोका, पानी का संचयन किया, रिचार्ज किया, ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ाया, गांव की मिट्टी गांव में रखी जिससे कृषि का विकास हुआ. हाथ के लिए काम, पेट के लिए रोटी गांव में ही मिल गई. इसकी वजह से शहर की तरफ़ जाने वाले लोगों की रोकथाम हो गई.

अब देश की जनता के लिए सोचने का समय आ गया है. अगर जनता आज नहीं सोचेगी तो हमारी आने वाली पीढ़ियां ख़तरे में पड़ जाएंगी. तब तक ये लोग कुछ बाक़ी रखेंगे या नहीं, इसमें संदेह है. दिल्ली की संसद सफल नहीं हो रही, सब मिलकर देश को लूट रहे हैं. अंग्रेजों ने जितना लूटा, उससे ज़्यादा ये लोग लूट रहे हैं. अंग्रेजों ने डेढ़ सौ सालों में जितना भारत को नहीं लूटा, पैंसठ सालों में इन्होंने देश को उनसे ज़्यादा लूट लिया. यह बात स्पष्ट हो गई है कि संसद में बैठे लोग और सत्ता में बैठी सरकार देश को अच्छा भविष्य नहीं देंगे.

26 जनवरी, 1950 को पहला गणतंत्र बना. उसी दिन देश में प्रजा की सत्ता आ गई. प्रजा इस देश की मालिक हो गई. सरकार की तिजोरी में जमा होने वाला पैसा जनता का है. पूरी जनता इस पैसे का कहीं नियोजन नहीं कर सकती, इसीलिए संविधान के मुताबिक़ हमने प्रातिनिधिक लोकशाही स्वीकार की. मालिक ने अपने प्रतिनिधि सेवक के नाते भेजे. राष्ट्रपति ने जिन अधिकारियों का चयन किया, वे सरकारी सेवक हैं यानी जनता के सेवक हैं. जब जनता ने सेवक को भेजा है और सेवक अच्छा काम नहीं कर रहा तो उसे निकालने का अधिकार जनता का है, क्योंकि जनता मालिक है. मालिक ने जिन सेवकों को भेजा था, वे देश एवं समाज की भलाई का सही काम नहीं कर रहे हैं. इसलिए उन्हें निकालने का समय आ गया है. इसलिए जनता की भलाई के लिए इस देश की संसद को भंग होना चाहिए. यह जनता के हाथ में है. अगर पूरे देश में जनता सड़कों पर उतर आए तो संसद भंग होगी. उसकी जगह नई संसद बनानी है, जिसके लिए जनता नए प्रतिनिधि चुनेगी, जो चरित्रवान हों. हम लोग चरित्रवान प्रतिनिधियों के चयन में मदद करने के लिए सारे देश में घूमेंगे. नए चुने जाने वाले प्रतिनिधि को चरित्रवान, सेवाभावी, सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण वाला होना चाहिए यानी उनकी छवि ठीक हो, वह सेवाभावी हो और सक्षम हो. उसे एक हलफ़नामा (एफिडेविट) देना होगा और उसके बाद यदि उसने उसका पालन नहीं किया तो जनता उस प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार रखेगी. इससे देश का भविष्य बदलने की शुरुआत हो सकती है. आज तो प्रतिनिधि को वापस बुलाने का ही कोई प्रावधान नहीं है, जिसकी वजह से किसी प्रतिनिधि को कोई डर ही नहीं रहता. वह कहता है कि पांच साल के लिए मुझे चुन लिया गया है, मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है. पांच साल के लिए तो हम राजा बन गए.

आज की संसद को भंग करके नई संसद जनता को बनानी है और नई संसद बनाने के लिए जनता की शर्तें होंगी. यह जनता का हक़ है, अधिकार है. जनता की संसद जब बनेगी, तब उसमें जन लोकपाल आएगा, ग्राम विकास आएगा, राइट टू रिजेक्ट आएगा, ग्राम सभा को शक्तियां मिलेंगी, साथ ही अंग्रेजों द्वारा बनाए गए सारे सड़े-गले क़ानूनों को बदला जाएगा. सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और सभी के लिए विकास की योजनाएं बनेंगी. देश को स्वावलंबी बनाएंगे. देश में जनतंत्र है, जनतंत्र के मुताबिक़ क़ानून होने चाहिए. संविधान में सामाजिक विषमता दूर करने की बात कही गई, आर्थिक विषमता दूर करने की बात कही गई, जाति-पांत का भेद समाप्त करने की बात कही गई. यह जाति-पांत लोगों को बांट रही है. संविधान का पालन संसद में बैठे लोग कहां कर रहे हैं? इसीलिए जनता को आज की संसद बर्ख़ास्त करके नई संसद बनाकर और चरित्रवान उम्मीदवारों को चुनकर अपने लिए नए भविष्य का निर्माण करना होगा. इस परिवर्तन के लिए हम जनता से जागने, उठने और आंदोलन करने का आह्वान करते हैं.

3 thoughts on “यह संसद संविधान विरोधी है

  • January 22, 2013 at 5:28 PM
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    जनरल साहब,हरियाणा के पूर्व मुख्य मंत्री ओ पी चौटाला और उनके पुत्र अजय चौटाला को 10-10 वर्ष की भ्रष्टाचार के आरोप में सजा हो चुकी हैै.आप ने उनके मंच से भ्रष्टाचार का विरोध किया.कैसा विरोधाभास?क्या अाप उनके कारनामों से भिज्ञ नहीं थे?आप के इन विचारों को /आपको क्यों गंभीरता से लेना चाहिये ?

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  • January 20, 2013 at 9:45 AM
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    जन तन्त्र या गन तन्त्र बन गया है राक्षस तन्त्र ; दुष्ट तन्त्र ; उल्ट बुद्धि तन्त्र ; रक्त चूस तन्त्र ; निपुन्सिक तन्त्र बन गया है ——
    ———– कोंग्रस हटाओ देश बचाओ ———–

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  • January 18, 2013 at 7:13 PM
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    एक बडे ओहदे के सुख भोग चुकने के बाद ख्याल आया क्या कि संसद संविधन के खिलाफ है

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