एक आंदोलन- ताकि यमुना कैदमुक्त हो

1990 में शुरू हुआ आर्थिक उदारीकरण अब अपना असर दिखा रहा है. ख़ुशहाली से भरे सपनों का गुब्बारा फटने लगा है. व्यवस्था के ख़िलाफ़ आक्रोश और व्यवस्था के प्रति नाराज़गी बढ़ती ही जा रही है. देश भर में हज़ारों आंदोलन चल रहे हैं और सभी आंदोलनों का मूल मुद्दा एक ही है, जल, जंगल और ज़मीन को बचाना है, क्योंकि धीरे-धीरे पूंजीवादी साम्राज्य का शिकंजा इस पर कसता जा रहा है. उत्तर प्रदेश के ब्रजवासियों ने ऐसा ही एक आंदोलन शुरू किया है. मक़सद है, यमुना को हथिनी कुंड से आज़ाद कराने और दिल्ली के सीवरों से निकलने वाली गंदगी से बचाने का. पेश है, चौथी दुनिया की खास रिपोर्ट:-

दिल्ली-मथुरा राजमार्ग. क़रीब 5 किलोमीटर तक लंबी लाइन. दस से पंद्रह हज़ार लोग. बच्चे, जवान, बुजुर्ग एवं महिलाएं. कोई कीर्तन कर रहा है, तो कोई कृष्ण धुन पर नाच रहा है. हथिनी कुंड जाना है, यमुना जी को लाना है. इन लोगों का यही नारा है. सबके दिल में एक उम्मीद और एक सपना है. उम्मीद इस बात की कि एक बार फिर से ब्रजवासियों को अविरल एवं स्वच्छ यमुना मिल सकेंगी. किसानों को खेती के लिए पानी मिल सकेगा, तो कृष्ण भक्तों को आचमन के लिए स्वच्छ जल. वृंदावन से एक मार्च को शुरू हुई यह पदयात्रा धीरे-धीरे दिल्ली और हथिनी कुंड की ओर बढ़ती जा रही थी. दरअसल, ये लोग यमुना बचाओ पदयात्रा में शामिल हैं. अपने किस्म का यह एक अनोखा आंदोलन है. इसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं ब्रज के साधु-संत, तो दूसरी तरफ़ इसमें किसान से लेकर आम लोगों के साथ कृष्ण-यमुना भक्त भी शामिल हैं. इस आंदोलन का स्वरूप धार्मिक, सामाजिक और पर्यावरणीय है. यह आंदोलन मान मंदिर बरसाना के रमेश बाबा जी महाराज की देखरेख में शुरू किया गया. इसके लिए यमुना रक्षक दल बनाया गया. यमुना रक्षक दल के मुताबिक़, यमुना की आज़ादी का अर्थ है, यमुना की धारा को फिर से अविरल और उसके जल को स्वच्छ बनाना. ब्रजवासियों को इस बात का दु:ख है कि यमुनोत्री से चलने वाली यमुना हरियाणा के हथिनी कुंड तक आकर कैद हो जाती है, यानी इसी जगह से यमुना का पानी नहर के ज़रिए हरियाणा और उत्तर प्रदेश की ओर भेज दिया जाता है. इसके बाद जो पानी दिल्ली तक पहुंचता है, उसमें दिल्ली शहर की सारी गंदगी घुल-मिल जाती है. फिर इसके बाद मथुरा तक जो यमुना जल पहुंचता है, वह पीने तो क्या, कृष्ण भक्तों के आचमन लायक़ तक नहीं होता.

यमुना को बचाने के लिए ब्रज के लोग पिछले दो सालों से लगातार प्रयास कर रहे हैं. वे इलाहाबाद से लेकर दिल्ली तक पहले भी यात्रा कर चुके हैं और कई केंद्रीय नेताओं समेत यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलकर अपनी मांग भी रख चुके हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई न होते देख यमुना रक्षक दल ने एक मार्च से 10 मार्च तक की पदयात्रा की. यमुना रक्षक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबा जयकृष्ण दास कहते हैं कि हम लोग इस बार आर-पार के मूड में हैं. या तो सरकार रहेगी या फिर संत. यमुना हमारा धर्म है, हमारा जीवन है और हमारी मां है, जिसे हथिनी कुंड में कैद कर लिया गया है. हम इस बार अपनी यमुना मां को मुक्त कराए बिना वापस नहीं लौटने वाले. पदयात्रा में शामिल वृंदावन के तुलसीराम बताते हैं कि यमुना की ख़राब हालत का असर खेतों पर भी पड़ रहा है. हमारी खेती को नुक़सान हो रहा है. मैं इस यात्रा में इसलिए शामिल हुआ हूं, ताकि मेरे खेत को पानी मिल सके. इसी तरह मथुरा के सतीश चंद्र सैनी बताते हैं कि हमारे यहां जब विदेशी लोग आते हैं और यमुना की यह दशा देखकर हम पर कटाक्ष करते हैं, तो हमें बहुत ख़राब लगता है. यह हमारे लिए शर्म की बात है. इसलिए यमुना को आज़ाद कराने के लिए मैं इस यात्रा में शामिल हुआ हूं.

बहरहाल, इस पदयात्रा में भारतीय किसान यूनियन (भानू गुट) भी शामिल है. यूनियन से ज़ुडे हज़ारों लोग इस पदयात्रा में शामिल हैं. यूनियन के अध्यक्ष भानु प्रताप सिंह बताते हैं कि हम लोग पिछले दो सालों से यमुना बचाओ अभियान से ज़ुडे हुए हैं. वह कहते हैं कि हम सरकार से भी मिले, लेकिन तानाशाह सरकार ने हमारी बात नहीं सुनी, इसलिए हम लोग दिल्ली जा रहे हैं और इस बार यमुना को मुक्त कराकर ब्रज भूमि तक ज़रूर लाएंगे. इस यात्रा में गुजरात के वल्लभ संप्रदाय के लोग भी काफी संख्या में शामिल हैं. इस संप्रदाय के लोगों से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह है कि यमुना उनके लिए इतनी पूज्यनीय है कि वे उसमें अपना पांव तक नहीं डालते, स़िर्फ यमुना जल का आचमन करते हैं. वैसे, इस यात्रा का परिणाम चाहे जो भी निकले, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि अब जनता जाग रही है. ऐसा मानना कि पूंजीवादी व्यवस्था में जनांदोलनों के लिए जगह नहीं बचती, ग़लत साबित हो रहा है. पिछले दो-तीन सालों में जिस तरह से देश में जन-असंतोष बढ़ता जा रहा है, उसे लोकतंत्र के लिए कतई शुभ संकेत नहीं माना जा सकता. अगर हर एक मुद्दे के लिए इसी तरह जनता को सड़क पर उतरना पड़े, तो आख़िर सरकार नामक संस्था का औचित्य ही क्या रह जाता है?

पहले भी हुए थे प्रयास

ग़ौरतलब है कि यमुना को बचाने के लिए ब्रजवासियों ने इस पदयात्रा से पहले भी कई प्रयास किए. दरअसल, यमुना को हथिनी कुंड से आज़ाद कराकर ब्रज तक लाने की यह मुहिम दो साल पहले शुरू हुई थी. सबसे पहले यमुना रक्षक दल का गठन किया गया. इसके बाद दिल्ली से इलाहाबाद तक एक मार्च से लेकर 15 अप्रैल, 2011 तक पदयात्रा की गई. 15 मई, 2011 से 22 दिनों के लिए रथ यात्रा निकाली गई. यह रथ यात्रा उत्तर प्रदेश के 18 मंडलों में गई. यमुना रक्षक दल ने जनता के बीच जागृति फैलाने और उसका समर्थन पाने के लिए साइकिल यात्रा का आयोजन भी किया. यमुना रक्षक दल केंद्र सरकार के कई नेताओं एवं यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मिला और उन्हें अपनी मांगों से अवगत कराया, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस जवाब नहीं मिला. यमुना रक्षक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबा जयकृष्ण दास बताते हैं कि जब हर तरफ़ से ब्रजवासी निराश हो गए, तब यमुना बचाओ पदयात्रा शुरू करने का फैसला लिया गया.

देश भर से आए हैं यमुना पुत्र

गुजरात के जूनागढ़ से आए जयंतीभाई वल्लभ संप्रदाय से हैं. उनके लिए जितने महत्वपूर्ण एवं पवित्र कृष्ण हैं, उतनी ही यमुना भी. तभी तो वह कहते हैं कि हम और हमारे संप्रदाय के लोग यमुना में अपने पांव तक नहीं रखते, केवल यमुना जल का आचमन करते हैं. आज जब यमुना की यह दुर्दशा है, तो उसे बचाने और आज़ाद कराने के  लिए जयंतीभाई और उनके सैकड़ों साथी इस पदयात्रा में शामिल होने गुजरात से ब्रजभूमि आए हैं. इसी तरह बिहार की अरुणा सिन्हा अमेरिका में रहती हैं, लेकिन यमुना को बचाने के इस अभियान में वह भी शामिल होने आई हैं. एक व्यक्ति ने इस संवाददाता को बताया कि वह ग्वालियर से गोवर्धन परिक्रमा के लिए आया था. परिक्रमा पूरी होने के बाद वह घर वापस नहीं गया, बल्कि इस पदयात्रा में शामिल हो गया. इसी तरह हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार एवं उत्तर प्रदेश के कई जिलों से लोग इस पदयात्रा में शामिल होने आए. पदयात्रा में ऐसे लोग भी हैं, जो यमुना के किनारे तो नहीं रहते, लेकिन उनका मानना है कि यमुना उनका धर्म है और वे धर्म की रक्षा के लिए ही इस पदयात्रा में शामिल होने आए हैं.

जल दो या जेल : बाबा जयकृष्ण दास 

यमुना रक्षक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबा जयकृष्ण दास ने यमुना मुक्तिकरण अभियान के बारे में इस संवाददाता से विस्तार से बातचीत की. पेश हैं मुख्य अंश:

यमुना रक्षक दल की मुख्य मांग क्या है?

1376 किलोमीटर लंबी यमुना नदी हथिनी कुंड तक आकर कैद हो जाती है. हमारी मुख्य मांग तो यही है कि यमुना जी को हथिनी कुंड से मुक्त किया जाए. दूसरी बात यह है कि दिल्ली से निकल कर जो यमुना ब्रजभूमि तक पहुंचती है, वह दिल्ली के सीवरों से निकले मल-मूत्र एवं गंदगी से भरी होती है. साफ़ पानी मिलना हमारा अधिकार है. हमारी ज़िंदगी और भावनाएं यमुना से ज़ुडी हुई हैं, इसलिए यह आंदोलन धर्म के साथ-साथ जीवन बचाने के लिए भी है. यमुना की धारा जीवन के लिए ज़रूरी है. दिल्ली में सीवरों के ज़रिए जो गंदगी यमुना में मिलती है, उसे तत्काल बंद करना होगा. जब असम से हज़ारों किलोमीटर की लंबी पाइपलाइन बनाकर तेल भेजा जा सकता है, तो क्या 2 किलोमीटर लंबा नाला नहीं बनाया जा सकता, जिससे यमुना में जाने वाली गंदगी की धारा बदली जा सके.

क्या कारण है कि ब्रज के ज़्यादातर साधु-संत आपके इस आंदोलन में साथ नहीं दिख रहे हैं?

ऐसा नहीं है. हम लोग रमेश बाबा जी के आदेश से यह सारा काम कर रहे हैं. लोग हमारे साथ हैं. आप देख रहे हैं कि किस तरह पूरे देश से आकर लोग हमारी पदयात्रा में शामिल हो रहे हैं. अब कौन साथ देना चाहता है और कौन नहीं, हमें इसकी चिंता नहीं है. हम लोग रमेश बाबा के नेतृत्व में लगातार आगे बढ़ रहे हैं.

पदयात्रा शुरू होने के बाद क्या अब तक सरकार के साथ कोई बातचीत हुई?

नहीं, अब तक न कोई बातचीत हुई है और न ही हमें कोई संदेश मिला है, लेकिन हमने तय कर लिया है कि इस बार दिल्ली पहुंच कर हमें यमुना जी को हथिनी कुंड से मुक्त कराकर लाना ही है.

एक प्रतिनिधिमंडल, जिसमें आप भी शामिल थे, फरवरी में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मिला था. क्या वहां से कोई आश्‍वासन मिला था?

उन्होंने कहा था कि वह इस मामले को देखेंगी, लेकिन अगर इस संबंध में कुछ हुआ होता, तो फिर हमें यह पदयात्रा क्यों करनी पड़ती?

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