एक साधारण बजट

अमेरिका का एक कलाकार था हाउदनी, जो लोगों को मोहित करने की कला जानता था. वह लोगों को वास्तविकता का पता नहीं लगने देता था. पी चिदंबरम ने अपना आठवां बजट पेश करते हुए हाउदनी वाली कला का प्रदर्शन किया है. हालांकि, परिस्थितियां अच्छी नहीं हैं, क्योंकि जीडीपी ग्रोथ पांच प्रतिशत के आसपास है और महंगाई दर लगातार ग्रोथ रेट से ज़्यादा रही है. जो शख्स अभी राष्ट्रपति भवन में हैं, उन्होंने वसीयत में ऐसा बजट दिया, जिसमें बजट घाटे का अनुमान विश्‍वसनीय नहीं था. ऐसे में चिदंबरम किस तरह से कठोरता एवं लोकप्रियता के बीच, महंगाई एवं विकास के बीच, राजकोष एवं कल्याणकारी योजनाओं पर ख़र्च के बीच सामंजस्य बैठाने जा रहे हैं, यह समझ से परे है. बेशक यशवंत सिन्हा, जो स्वयं वित्त मंत्री रहे हैं, ने इसे बाज़ीगरी कहा है, लेकिन एक सच यह भी है कि चिदंबरम के सामने कई चुनौतियां थीं, जिनसे उन्हें निपटना था. उनका बजट इन्हीं मांगों पर आधारित था. जब प्रणब मुखर्जी ने वित्त मंत्रालय छोड़ा था और चिदंबरम को वित्त मंत्री बनाया गया था, तो उन्होंने भी खर्च में कटौती की नीति बनाई थी. इस तरह की नीति का मतलब था कि पिछले वित्तीय वर्ष के आख़िरी 6 महीनों में योजनागत व्यय में क़रीब 18 फ़ीसदी की कमी लाना. इसका मतलब था कि राजस्व में धीमी वृद्धि करना, ताकि अनुमानित घाटा कम किया जा सके, लेकिन घाटा कितना कम हुआ? कोई ज़्यादा फ़़र्क तो पड़ा नहीं, क्योंकि यह 5.2 प्रतिशत के बदले 5.1 प्रतिशत ही रहा.

अब सौ लाख करोड़ का सवाल यह है कि क्या यह बजट अगले चुनाव में यूपीए की विजय सुनिश्‍चित करेगा? अभी महंगाई बढ़ी हुई है. महंगाई बढ़ने से मध्य वर्ग के लोगों का जीवन स्तर प्रभावित हुआ है, क्योंकि उन्होंने ऋण ले रखा है. उस ऋण के बदले उन्हें हर महीने कुछ रकम बैंक को देनी पड़ती है. उल्लेखनीय है कि महंगाई बढ़ने के कारण वे अपने घरेलू ख़र्चों में कटौती करके ही बैंक को ईएमआई देते हैं. उनकी बचत कम होती जा रही है और इसलिए वे यूपीए को पसंद नहीं करते हैं.

अब इस साल का बजट तो पेश कर दिया गया, लेकिन अगले साल के बजट के लिए इससे भी अधिक चालाकी की ज़रूरत होगी. वैसे, इस बार के बजट में भी इसकी ज़रूरत थी और इसके लिए लैंगिक भेदभाव और बच्चों एवं मानव विकास से जुड़े मुद्दे उभारना ज़रूरी था. वित्त मंत्री ने महिलाओं, युवाओं एवं ग़रीबों की बात की और उनके लिए क्या सुविधाएं हैं, इस बात की ओर ध्यान आकर्षित भी किया. चुनाव को ध्यान में रखकर ही उन्होंने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के मुद्दे को बहुत तरजीह नहीं दी, जबकि राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है. अगले साल के लिए उन्होंने 4.8 प्रतिशत घाटे का अनुमान लगाया है. आर्थिक सर्वे में अनुमान लगाया गया है कि अगले साल जीडीपी ग्रोथ रेट 6.1 से 6.7 के बीच रहेगी, जिसे ज़्यादा बेहतर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इससे महंगाई दर जल्दी कम नहीं की जा सकेगी. इसलिए वित्त मंत्री यह नहीं कह सकते हैं कि महंगाई दर कम हो जाएगी, जबकि आरबीआई ने ब्याज दर में कटौती करके शहरी मध्य वर्ग को राहत दी है. बजट में नॉमिनल जीडीपी के आधार पर 13.4 प्रतिशत ग्रोथ का अनुमान लगाया गया है, जो कि महंगाई दर और 6.7 प्रतिशत के आसपास रहने वाली वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर के बीच समान तौर पर दरार पैदा करता है. इस प्रकार देखा जाए, तो इस बजट में उच्च वृद्धि दर प्राप्त करने के लिए किसी तरह की कोई रणनीति नहीं बनाई गई है. ऐसे में अनुमान यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में आठ प्रतिशत की वृद्धि दर की बात अभी दूर है. और वैसे भी विकास दर बढ़ाने के लिए जिस तरह के क़दम उठाने की आवश्यकता है, उसे उठाना अभी कांग्रेस के लिए ख़तरनाक भी हो सकता है, क्योंकि चुनाव का समय नज़दीक है. अगर यूपीए 2014 का चुनाव जीत लेता है, तो वह ग्रोथ रेट बढ़ाने और कई अन्य नए क़दम उठाने के बारे में विचार कर सकता है. जैसा कि संत एक्वाइनस ने पवित्रता के बारे में कहा था कि यह एक अच्छा विचार हो सकता है, लेकिन अभी के लिए नहीं. ठीक उसी तरह ग्रोथ रेट बढ़ाने का यूपीए सरकार का विचार अच्छा हो सकता है, लेकिन अभी के लिए यह विचार सही नहीं है, क्योंकि इसके लिए जो कड़े क़दम उठाने पड़ेंगे, उनसे अगले चुनाव में कांग्रेस की पराजय हो सकती है. अब सौ लाख करोड़ का सवाल यह है कि क्या यह बजट अगले चुनाव में यूपीए की विजय सुनिश्‍चित करेगा? अभी महंगाई बढ़ी हुई है. महंगाई बढ़ने से मध्य वर्ग के लोगों का जीवन स्तर प्रभावित हुआ है, क्योंकि उन्होंने ऋण ले रखा है. उस ऋण के बदले उन्हें हर महीने कुछ रकम बैंक को देनी पड़ती है. उल्लेखनीय है कि महंगाई बढ़ने के कारण वे अपने घरेलू ख़र्चों में कटौती करके ही बैंक को ईएमआई देते हैं. उनकी बचत कम होती जा रही है और इसलिए वे यूपीए को पसंद नहीं करते हैं. ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को मनरेगा एवं खाद्य सब्सिडी जैसी योजनाओं से लाभ हुआ है. इस बजट ने इन दो क्षेत्रों में कोई बदलाव नहीं किया. मध्य वर्ग को कुछ ज़्यादा नहीं मिला और सरकार ने महंगाई कम करने का वादा भी नहीं किया है. ग्रामीण वोट तो पहले से ही यूपीए के साथ रहे हैं, ऐसे में 2014 में यूपीए की स्थिति कुछ बेहतर नहीं होने वाली है. इसलिए बजट चालाकी से बनाया गया है, ताकि इससे स्थितियां ख़राब न हों. हां, यूपीए को बहुत लाभ ज़रूर नहीं होगा, लेकिन नुक़सान भी नहीं होगा. वैसे, यह बता देना ज़रूरी है कि यह कोई छोटी या तुच्छ उपलब्धि नहीं है.

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