बंद हो कमोडिटी एक्सचेंज

कमोडिटी एक्सचेंज को अर्थशास्त्री सट्टा बाज़ार मानते हैं, क्योंकि वहां लोगों की गाढ़ी कमाई के साथ खिलवाड़ किया जाता है. खिलाड़ी हैं सटोरिए, देश के कुछ तथाकथित नेता और पूंजीपति. इसलिए चौथी दुनिया का यह मानना है कि यदि कमोडिटी एक्सचेंज बंद हो जाए, तो इससे हमारे देश के किसानों और आम लोगों को फ़ायदा ही होगा.

क्या आपको पता है कि किस तरह से काम करता है कमोडिटी एक्सचेंज, क़ीमतों में इज़ाफ़ा कैसे होता है, हमारे देश के वरिष्ठ नेता एवं विशेषज्ञों की एक टीम किस तरह से कमोडिटी एक्सचेंज पर सांप की तरह कुंडली मारकर बैठी हुई है. सटोरिए, बिचौलिए, पूंजीपति और हमारे देश के तथाकथित नेता जिस तरह से कमोडिटी एक्सचेंज को चला रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि कमोडिटी एक्सचेंज को बंद हो जाना चाहिए, क्योंकि इस गड़बड़ी के पीछे कुछ शातिर दिमाग़ लोग काम कर रहे हैं. आख़िर इस बाज़ार का कड़वा सच क्या है?

इस समय देश में 21 कमोडिटी एक्सचेंज काम कर रहे हैं. इनमें पांच राष्ट्रीय कमोडिटी एक्सचेंज हैं और 16 क्षेत्रीय. पारंपरिक तौर पर अगर कमोडिटी में निवेश पर नज़र डालें, तो पता चलता है कि निवेश के इस वैकल्पिक तरी़के का अमेरिकी डॉलर में उतार-चढ़ाव के विपरीत व्यवहार से काफ़ी कुछ लेना-देना है. भारत में कमोडिटी एक्सचेंजों की व्यवस्था छोटे किसानों की मदद, कारोबारियों एवं निर्यातकों के जोख़िम को कम करने और उत्पाद की क़ीमत पता लगाने के उद्देश्य से की गई. लेकिन आश्‍चर्य की बात तो यह है कि न किसानों को मदद मिली और न ही कारोबारियों-निर्यातकों का जोख़िम कम हुआ, बल्कि दिन-ब-दिन गड़बड़ियां और बढ़ती ही चली गईं. औद्योगिक संगठन एसोचैम ने सरकार से नेशनल कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया (एनसीडीईएक्स) में कुछ कारोबारियों द्वारा की गई गड़बड़ियों की जांच की सिफ़ारिश की, क्योंकि क़ीमतों में काफ़ी उतार-चढ़ाव और कमज़ोर नियामक व्यवस्थाओं के काफ़ी उदाहरण देखने को मिले. एक वरिष्ठ विशेषज्ञ ने पिछले दिनों अपने एक भाषण में यह स्वीकार किया था कि यह स्थिति शेयर बाज़ार के हर्षद मेहता घोटाले की तरह ही है, जहां कुछ चुनिंदा लोगों ने एनसीडीईएक्स को ही हाईजैक कर लिया है.

हक़ीक़त तो यह है कि यह वही बाज़ार है, जो अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी और किसानों की कमर तोड़ रहा है. इन बाज़ारों में चीनी, गुड़, सोना, चांदी या एल्युमीनियम पर पैसा नहीं लगाया जाता, बल्कि यहां खेला जाता है आम आदमी पर सट्टा. उस आम आदमी पर, जिसने अपना ख़ून-पसीना एक करके फ़सल उगाई और उस आदमी पर भी, जो परिवार का पेट पालने के लिए एड़ी से चोटी तक पसीना बहा रहा है.

चलिए, हम बताते हैं कि कैसे शुरुआत हुई कमोडिटी बाज़ार की. दरअसल, भारत में कृषि उत्पादन विपणन समितियों के माध्यम से कमोडिटी का कारोबार मुख्य रूप से होता है. आधुनिक कमोडिटी बाज़ार की जड़ें कृषि उत्पादों की परंपरागत विपणन व्यवस्थाओं (मंडी और हाट) में निहित हैं, जबकि अंगे्रजों के समय से ही मानक सौदों के आधार पर यह कारोबार शुरू हुआ. बॉम्बे कॉटन एसोसिएशन द्वारा 1875 में बॉम्बे कॉटन एक्सचेंज की स्थापना की गई थी. 1900 से तिलहन में वायदा कारोबार की शुरुआत करने वाली गुजराती व्यापारी मंडली ने मूंगफली, कपास और कैसर सीड में भी वायदा कारोबार की शुरुआत की. गेहूं में वायदा हापुड़ मंडी में 1913 से शुरू हुआ. इसके कुछ सालों बाद कोलकाता (तब कलकत्ता) में कच्चे जूट और जूट के सामानों का वायदा कारोबार शुरू किया गया. 2002-2003 में फिर से कमोडिटी वायदा के दिन बहुरे. सरकार ने देशव्यापी बहु-कमोडिटी एक्सचेंजों के गठन के साथ फारवर्ड कॉन्ट्रैक्ट रेगुलेशन एक्ट 1952 के तहत ज़्यादातर जिंसों के वायदा कारोबार का रास्ता साफ़ कर दिया. वायदा बाज़ार में एक्सचेंजों पर किए जाने वाले जो करार हैं, उनमें एक पक्ष (किसान, कारोबारी आदि) अमुक तिथि को किसी ख़ास क़ीमत पर कोई उत्पाद ख़रीदने अथवा बेचने के लिए राज़ी होता है, लेकिन विडंबना तो यह है कि दूसरी ओर भविष्य में तय किए जाने वाले सौदे अपनी मूल प्रकृति की वजह से सबसे ज़्यादा जोखिम भरे निवेश होते हैं. और यही जोख़िम उठाते हैं बिचौलिए, पूंजीपति और दलाल, जिनकी नज़र हमेशा बाज़ार के उतार-चढ़ाव पर टिकी रहती है.  किसी भी वस्तु की क़ीमतें कम होते ही, सटोरिए और पूंजीपति उस पर टूट पड़ते हैं. मतलब यही है कि वायदा बाज़ार क़ीमतों को बढ़ावा देता है. दरअसल, वायदा कारोबार में रोक के बावजूद क़ीमतों का बढ़ना नहीं रुकता. एक उदाहरण देते हैं. मई 2009 में चीनी के वायदा कारोबार पर रोक लगा दी गई थी, क्योंकि ऐसा कहा जा रहा था कि वायदा बाज़ार क़ीमतों में बढ़ोत्तरी के लिए ज़िम्मेदार है, लेकिन आश्‍चर्य की बात तो यह है कि चीनी की क़ीमतें उसके बाद भी खूब बढ़ीं. सच तो यह है कि जनवरी 2010 में जब वायदा कारोबार पर रोक लगी थी. उल्लेखनीय है कि तब फुटकर में चीनी की क़ीमत 50 रुपये तक पहुंच गई थी. अब देखिए, हाल ही में सोया की क़ीमतें आपूर्ति में कमी की वजह से बढ़ीं, क्योंकि वैश्‍विक और घरेलू बाज़ार दोनों ही तंग थे. दरअसल, इसी वजह से घरेलू बाज़ार में क़ीमतें हाज़िर बाज़ार में 30 फ़ीसदी और वायदा बाज़ार में 27 फ़ीसदी तक बढ़ीं.

राजनीतिक गलियारे में रोज़ाना चलने वाली तू तू-मैं मैं भले ही कोई हल नहीं निकाल पा रही है, लेकिन मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में बैठे दलाल अपना उल्लू ज़रूर सीधा कर रहे हैं. दरअसल, दलालों के बीच यह चर्चा आम रहती है कि अरे सुनो, आज किस पर पैसा लगा रहे हो, पैसे सोच-समझ कर लगाना. प्रधानमंत्री की बैठक चल रही है. महंगाई को कंट्रोल करने के लिए अगर उन्होंने चीनी, गेहूं, चावल या चाय के दाम घटा दिए, तो हमें भारी घाटा हो सकता है. अरे, क्यों न हम काली मिर्च, तेज़पत्ता, लौंग या धनिया पत्ता पर पैसा लगा दें. हो न हो, इनके दाम तो बढ़ने ही हैं.

बाज़ार के एक विशेषज्ञ ने अपने तर्क में आश्‍चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि जिस हल्दी की क़ीमत जनवरी 2009 में 35 रुपये किलोग्राम थी, उसे एक साल के भीतर 150 रुपये के स्तर तक पहुंचा दिया कमोडिटी एक्सचेंज के इन दलालों ने. हालांकि, फिर कुछ ही माह में यह 40 रुपये के स्तर पर पहुंच गई, क्योंकि इसकी मांग आम लोगों में कम हो गई थी. दरअसल, आम लोगों ने हल्दी के बिना ही खाना खाना सही समझा. अब आप ही बताएं कि अप्रैल 2011 में काली मिर्च की क़ीमत 225 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो मार्च 2012 तक 432 रुपये तक पहुंच गई. रातोंरात यह कैसे हुआ? यानी एक साल में 95 प्रतिशत की बढ़त. ऐसी स्थिति में सवाल यह उठता है कि इस बढ़त के लिए कौन ज़िम्मेदार है? सरकार, नेता, सटोरिए या पूंजीपति? अब कोई न कोई तो ज़िम्मेदार है ही. क्या आप जानते हैं कि इस गड़बड़ी के पीछे कुछ शातिर दिमाग़ काम कर रहे हैं. हालांकि, सच तो यह है कि ऩुकसान असली निवेशकों, कारोबारियों, निर्यातकों और हेजिंग करने वालों को हो रहा है. विशेषज्ञ आगाह करते हुए कहते हैं कि यह कृत्रिम बढ़त किसानों की कमर तोड़ने वाली है, क्योंकि अगली फ़सल के लिए वे ग्वार के बीज ख़रीद ही नहीं सकते. अब यदि यह कहें कि ग्वार सीड और ग्वार गम की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव भी अविश्‍वसनीय ही है, तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी. अब ज़रा देखें कि सामान्य मौसम में ग्वार की क़ीमत क्या होती है. सामान्य मौसम में ग्वार की क़ीमत होती है 10 रुपये प्रति किलो, जबकि ग्वार सीड 25 रुपये और ग्वार गम 50 रुपये प्रति किलो बिकता है. लेकिन दुर्भाग्यवश कुछ लोगों की कारस्तानी की वजह से ग्वार सीड की क़ीमत 291 रुपये और ग्वार गम की क़ीमत 15 मार्च को 959 रुपये तक पहुंच गई. बाज़ार में किस तरह से गड़बड़ी होती है, उसका एक और उदाहरण है. दिसंबर और अप्रैल के बीच मेंथा ऑयल की क़ीमतों में 83.98 फ़ीसदी का उछाल दर्ज किया गया. आश्‍चर्य की बात तो यह है कि धनिया की क़ीमतों में भी 59 फ़ीसदी का उछाल आया. ऐसा नहीं है कि इस बढ़ोत्तरी को लेकर एफएमसी ने कोई ठोस क़दम नहीं उठाया, ठोस क़दम तो उठाया, लेकिन इससे बाज़ार में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं हुआ. ठोस क़दम के तहत ग्वार गम और ग्वार सीड के वायदा बाज़ार पर रोक लगा दी गई और धनिया, सोयाबीन, आलू, चना, मेंथा ऑयल, पीली सोया और काली मिर्च के लिए विशेष मार्जिन भी तय किए गए, लेकिन उतार-चढ़ाव फिर भी बने रहे. विशेषज्ञ आश्‍चर्य व्यक्त करते हुए कहते हैं कि पशुओं का चारा भी 291 रुपये प्रति किलो तक चला गया, जो कि आम इंसानों के लिए इस्तेमाल होने वाली दालों और अनाज की क़ीमत से कई गुना अधिक है. विशेषज्ञों ने यह सवाल भी उठाया कि बीते एक माह में ग्वार की क़ीमत 120 फ़ीसदी, बीते चार माह में यह क़ीमत 700 फ़ीसदी, बीते 12 माह में 875 फ़ीसदी और पिछले एक माह में 1300 फ़ीसदी कैसे बढ़ गई? फेयरवेल्थ सिक्योरिटीज के एक वरिष्ठ विशेषज्ञ का मानना है कि बीते दो से तीन सालों के दौरान पूरी दुनिया के वित्तीय बाज़ारों में आई हलचल के मद्देनज़र नियामक तंत्र को और दुरुस्त करना ज़रूरी हो गया है, क्योंकि जैसे-जैसे भारतीय बाज़ार विकसित हो रहे हैं, ठीक उसी तरह से इसके साथ ही साथ सट्टेबाज़ों की जेबें भी भारी हो चली हैं. दरअसल, इस नियामक तंत्र और एफएमसी को मज़बूत बनाने के लिए एक संशोधन विधेयक की ज़रूरत है. और यह तभी संभव हो सकेगा, जब संसद में फारवर्ड कॉन्ट्रैक्ट रेगुलेशन संशोधन विधेयक को म़ंजूरी मिल जाए. दरअसल, इस विधेयक को मंज़ूरी मिलना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि इससे कमोडिटी के वायदा बाज़ार को त़ेज गति से आगे ले जाने के लिए पर्याप्त क़ानूनी आधार मिल सकेंगे और इससे सट्टेबाज़ों एवं पूंजीपतियों पर नियंत्रण पाने में सुविधा होगी. दरअसल, यह विधेयक एफएमसी को किसी जानकारी को छिपाने अथवा सूचना न देने की स्थिति में इकाइयों पर जुर्माना लगाने की शक्ति देता है. इसके साथ ही अगर कोई कमोडिटी बाज़ार में इनसाइडर ट्रेडिंग अथवा ग़लत कारोबारी तरी़के अख्तियार करने का दोषी पाया जाता है या फिर फारवर्ड कॉन्ट्रैक्ट नियमन अधिनियम 1952 के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो आयोग उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकता है. उपरोक्त विधेयक के पारित होने के साथ ही भारतीय कमोडिटी बाज़ार में ऑप्शंस डेरिवेटिव की शुरुआत हो जाएगी, जिसे हेजिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. इस बाज़ार में क़ीमतों में काफ़ी उतार-चढ़ाव के पीछे एक वजह यह भी है कि यहां निवेशकों के पास अपने जोख़िम के असर को कम करने के लिए कमोडिटी ऑप्शन जैसा कोई वित्तीय उत्पाद मौजूद नहीं है. अब हम आपको यह बता दें कि कमोडिटी एक्सचेंज का मतलब क्या है. यह वह बाज़ार है, जहां आप अप्रत्यक्ष रूप से ख़रीद-फ़रोख्त करते हैं. आप सोच रहे होंगे कि राजनीतिक उठापटक से कमोडिटी बाज़ार में खड़े दलाल का क्या ताल्लुक़ है. दरअसल, कमोडिटी बाज़ार यानी एमसीएक्स, नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव एक्सचेंज और नेशनल मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एनएमसीई) सरकार द्वारा बनाया गया वह सट्टा बाज़ार है, जहां हज़ारों सटोरिए पैसा लगाते हैं. उल्लेखनीय है कि इन सटोरियों के बीच हमारे देश के बड़े-बड़े नेता भी शामिल हैं, जो कि ब्लैक के पैसे को व्हाइट करने में लगे रहते हैं. दरअसल, यह वह बाज़ार है, जहां रातोंरात रोज़मर्रा की वस्तुओं, जैसे गेहूं, चावल, चीनी एवं दाल आदि की क़ीमतों में उछाल या गिरावट दर्ज होती है.

वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपने बजट भाषण में यह कहा है कि यदि छोटे कारोबारियों को हमें बाज़ार में टिकाए रखना है, तो हमें वायदा बाज़ार के कारोबार को और सरल बनाना होगा, बिचौलियों पर रोक लगानी होगी. चोरी-छिपे भेद जानकर कारोबार करने वालों पर अंकुश लगाना होगा. हक़ीक़त तो यह है कि यह वही बाज़ार है, जो अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी और किसानों की कमर तोड़ रहा है. इन बाज़ारों में चीनी, गुड़, सोना, चांदी या एल्युमीनियम पर पैसा नहीं लगाया जाता, बल्कि यहां खेला जाता है आम आदमी पर सट्टा. उस आम आदमी पर, जिसने अपना  ख़ून-पसीना एक करके फ़सल उगाई और उस आदमी पर भी, जो परिवार का पेट पालने के लिए एड़ी से चोटी तक पसीना बहा रहा है.

वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपने बजट भाषण में यह कहा है कि यदि छोटे कारोबारियों को हमें बाज़ार में टिकाए रखना है, तो हमें वायदा बाज़ार के कारोबार को और सरल बनाना होगा, बिचौलियों पर रोक लगानी होगी. चोरी-छिपे भेद जानकर कारोबार करने वालों पर अंकुश लगाना होगा. हक़ीक़त तो यह है कि यह वही बाज़ार है, जो अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी और किसानों की कमर तोड़ रहा है. इन बाज़ारों में चीनी, गुड़, सोना, चांदी या एल्युमीनियम पर पैसा नहीं लगाया जाता, बल्कि यहां खेला जाता है आम आदमी पर सट्टा. उस आम आदमी पर, जिसने अपना ख़ून-पसीना एक करके फ़सल उगाई और उस आदमी पर भी, जो परिवार का पेट पालने के लिए एड़ी से चोटी तक पसीना बहा रहा है. सच तो यह है कि बढ़ती महंगाई के कारण जिनके बच्चों को सेब और अनार जैसे फल भी नसीब नहीं हो पाते, ये वे लोग हैं. कमोडिटी एक्सचेंज को सट्टा बाज़ार का नाम हम नहीं दे रहे हैं, बल्कि देश के तमाम अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ भी इसे सट्टा बाज़ार ही मानते हैं. यह वह सट्टा बाज़ार है, जहां लोगों की कमाई के साथ खिलवाड़ होता है. कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना यही है कि कमोडिटी एक्सचेंज में व्यापार का सीधा प्रभाव आम लोगों की जेब पर पड़ता है. यह एक तरह का सट्टा बाज़ार है, जहां से गुज़रने के बाद खाद्य सामग्री के दाम उससे कहीं ज़्यादा ऊपर चढ़ जाते हैं. दरअसल, इसी वजह से इस बाज़ार का असर उत्पादक, यानी किसान और उपभोक्ता, यानी आम जनता पर सीधे पड़ रहा है. मुनाफ़ा केवल वे बीच वाले लोग ही कमा रहे हैं, जो कमोडिटी शेयरों में खुलकर पैसा लगा रहे हैं.

अब सवाल यह उठता है कि बाज़ार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव क्यों, जबकि पिछले कई सालों से न तो देश में अकाल पड़ा है और न ही सूखा. देश में पर्याप्त मात्रा में गेहूं की उपज हुई है. केवल उपज ही नहीं हुई, बल्कि हमारे देश का गेहूं विदेश में भी भेजा जा रहा है. चावल का उत्पादन भी पर्याप्त मात्रा में हुआ है, तो फिर बाज़ार में क़ीमतें इतनी क्यों बढ़ रही हैं? बाज़ार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव क्यों? हाल ही में कमोडिटी बाज़ार में एक ही सवाल ने सबको परेशान करके रख दिया है कि कृषि आधारित उत्पादों की क़ीमतों में ज़रूरत से ज़्यादा उतार-चढ़ाव क्यों उत्पन्न हो जाता है. इस एक सवाल ने पूरे बाज़ार की विश्‍वसनीयता को कठघरे में खड़ा कर दिया है. उल्लेखनीय है कि कमोडिटी बाज़ार केवल निवेश और ट्रेडिंग का एक ज़रिया भर ही नहीं है, बल्कि इसे कुछ लोग महंगाई के विपरीत एक हथियार के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं. और दरअसल, इसी वजह से इस बाज़ार को सट्टेबाज़ी करने का भरपूर मौक़ा मिल जाता है. ऐसी स्थिति में यदि यह कहा जाए कि यह बाज़ार बंद हो जाए, तो इससे क्या देश का नुक़सान होगा? विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे देश का नुक़सान नहीं होगा, बल्कि विदेशी निवेश कम हो जाएगा और हमारे देश के किसानों एवं मज़दूरों को रोजी- रोटी की तलाश के लिए भटकना नहीं पड़ेगा. पिछले दिनों शरद पवार ने अपने एक बयान में कमोडिटी बाज़ार के समर्थन में कहा था कि इस बाज़ार में निवेश की ज़रूरत है, जबकि सच्चाई यह है कि इससे अप्रत्यक्ष रूप से हमें विदेशी कंपनियों पर हमेशा निर्भर रहना पड़ेगा. मतलब यह हुआ कि किसानों को बीज ख़रीदने के लिए सदैव विदेशी कंपनियों पर आश्रित रहना पड़ेगा, अगर इन खलनायकों पर किसी तरह अंकुश लगाया जाए, तो इन सटोरियों पर हम काबू पा सकते हैं.