राजनीति

आयकर का तरीक़ा ग़लत है

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राजा को कर कैसे लगाना चाहिए. प्राचीन भारतीय ग्रंथों में कहा गया है कि जिस तरह मधुमक्खी फूलों से रस लेती है, लेकिन उन फूलों को कोई नुकसान नहीं होता और मधु भी इकट्ठा हो जाता है, उसी तरह राजा से प्रजा को कर लेना चाहिए, ताकि करदाता भी खुश रहें और राज्य को भी नुकसान न हो. वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में कर भी राजनीति का जरिया हो गया है. सरकार कर लगाती है, तो यह सोचकर कि इससे उसका वोट बैंक प्रभावित नहीं होगा. इस बार के बजट में भी इसी तरह की व्यवस्था की गई है. आयकर में छूट की सीमा में केवल बीस हजार की बढ़ोतरी की गई और बताया गया कि पांच लाख की सालाना कमाई वाले लोगों को सालाना दो हजार की बचत होगी. हालांकि कर व्यवस्था पहले की तरह ही रही और स्लैब में भी कोई परिवर्तन नहीं किया गया. सरकार ज्यादा कर तो लेना चाहती है, लेकिन कर के दायरे को बढ़ाना नहीं चाहती.अगर सरकार ज्यादा से ज्यादा लोगों को आयकर के दायरे में ले आए, तो स्लैब में परिवर्तन कर लोगों को राहत दी जा सकती है. संगठित क्षेत्र में नौकरी करने वाले कर्मचारियों, जिनकी डाटा सरकार के पास है, उससे तो कर लेती है, लेकिन जिन लोगों की कमाई लाखों में है और वे कर दे सकते हैं, लेकिन कर लेने वाली एजेंसियों की नाकामयाबी की बजह से उनसे कर नहीं लिया जाता है, जिसका खामियाजा करदाता और देश के आम लोगों को उठाना पड़ता है. देश में कर देने वाले लोगों की संख्या मात्र तीन करोड़ पचास लाख है, जबकि वास्तविक संख्या पांच करोड़ से ऊपर की होगी. कर देने वाले लोगों की संख्या बढ़ाने के बजाए करदाता के लोगों से अधिक कर बसूलने के कारण न केवल सरकार को राजस्व घाटा होता है, बल्कि विकास के कार्य भी प्रभावित होते हैं. वित्त मंत्री ने अमीरों पर कर बढ़ाकर सामान्य लोगों को खुश करने की कोशिश की है. यह भी एक राजनीतिक एजेंडा है, जिसे तुष्टीकरण का सिंद्धांत कहा जा सकता है. सच तो यह है कि इसका खामियाजा भी आम लोगों को ही भुगतना पड़ेगा. एक करोड़ से अधिक वार्षिक आय वाले लोगों को 10 प्रतिशत का सरचार्ज देना पड़ेगा, जिसकी संख्या मात्र 42800 है. अधिक अमीर होने का मतलब क्या एक करोड़ से अधिक वार्षिक आय, यानी इस स्लैब में आठ लाख से अधिक मासिक आय वाले लोग हैं. जिस देश में योजना आयोग 32 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर मानता है, उस देश में अधिक अमीर होने के लिए लगभग 28 हजार प्रतिदिन कमाने का मानक तय करना सही है. यह गंभीर बहस का प्रश्‍न है और वित्त मंत्री को इस पर विचार करना चाहिए. वित्त मंत्री का आयकर लेने का तरीका सही नहीं है, क्योंकि अगर 12000 वार्षिक आमदनी वाले लोग गरीबी रेखा से ऊपर हैं, तो उससे ज्यादा कमाने वाले सभी लोगों को आयकर के दायरे में लाना चाहिए, चाहे किसी से दस रुपया लेना पड़े या सौ रुपया या फिर कुछ हजार. लेकिन सरकार वोट बैंक की राजनीति करती है और तुष्टीकरण की नीति अपनाती है, जिससे जहां एक तरफ देश को नुकसान होता है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दल को लाभ.

 

राजीव कुमार Contributor|User role
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