भारत- फ्रांस, दोनों को एक दूसरे की ज़रूरत है

फ्रांस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा को किन अर्थों में देखा जाना चाहिए. क्या यह फ्रांस की रणनीति का हिस्सा है या फिर फ्रांस के नए राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद को ऐसा लगा कि अभी भारत का साथ अन्य देशों की अपेक्षा ज़्यादा लाभकारी हो सकता है. भारत के साथ फ्रांस के अपने हित जुड़े हुए ज़रूर हैं, लेकिन क्या भारत का हित भी उसी तरह फ्रांस से नहीं जुड़ा हुआ है.

भारत- फ्रांस, दोनों को एक दूसरे की ज़रूरत है
भारत- फ्रांस, दोनों को एक दूसरे की ज़रूरत है

फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद दो दिन की भारतीय यात्रा पर आए. हालांकि उनका स्वागत उस तरह से नहीं हो पाया, जिस तरह का स्वागत अमेरिकी राष्ट्रपति का होता है, लेकिन इससे फ्रांस का भारत के लिए और भारत का फ्रांस के लिए अहमियत कम नहीं हो जाती है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि फ्रांस्वा ओलांद ने भारत को अहमियत दी है. एशिया के किसी देश की यात्रा करने के लिए उन्होंने भारत को चुना, न कि चीन या पाकिस्तान को. इससे भी ओलांद के भारत के प्रति नज़रिए का अनुमान लगाया जा सकता है. फ्रांसीसी राष्ट्रपति की यात्रा के समय भारत और फ्रांस के बीच चार समझौते हुए. पहला समझौता, जिस पर दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए, वह था सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम को बढ़ावा देने से संबंधित. इसके तहत दोनों देश न केवल सांस्कृतिक बल्कि बौद्धिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग को और अधिक गहन करेंगे. दोनों देश आपसी परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए कलाकारों, वास्तुकारों, सांस्कृतिक हितधारकों, छात्रों, शिक्षकों, अनुसंधानकर्ताओं और खिलाड़ियों आदि के बीच आदान-प्रदान को बढ़ावा देंगे. साथ ही समझौते के तहत दोनोंदेश अपने नागरिकों के स्तर पर संपर्क को भी बढ़ावा देंगे. दोनों देशों ने जिस दूसरे समझौते पर हस्ताक्षर किए, वह है उच्चतर शिक्षा एवं अनुसंधान से संबंधित. इस समझौते में कहा गया है कि दोनों देश एक दूसरे को वैज्ञानिक सहयोग प्रदान करेंगे तथा शिक्षा के क्षेत्र में भी सहयोग को बढ़ाएंगे, ताकि दोनों देशों के बीच चल रही व्यवसायिक शिक्षा का फ़ायदा उठाया जा सके. इस समझौते से दोनों के बीच वैज्ञानिक गतिविधियों से संबंधित आदान-प्रदान तेज होगा, जिसका लाभ दोनों देशों के अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रमों को मिलेगा. तीसरा समझौता अंतरिक्ष क्षेत्र से संबंधित है. इस समझौते के अंतर्गत दोनों देश अंतरिक्ष के क्षेत्र में सहयोग करेंगे. साथ ही दोनों देश के युवा वैज्ञानिकों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा, ताकि दोनों देशों के वैज्ञानिक एक दूसरे की विशेषता का लाभ उठा सकें. चौथा समझौता है, रेलवे के विकास से संबंधित. इसका उद्देश्य रेलवे स्टेशन को उन्नत करना तथा रेलवे नेटवर्क का आधुनिकीकरण करना है. भारत में हो रही रेल दुर्घटनाओं को कम करने में यह समझौता कारगर साबित हो सकता है. भारतीय रेल फ्रांस की तकनीक से सहयोग ले सकता है, जिससे न केवल यहां के रेलवे नेटवर्क में सुधार होगा बल्कि रेलों की रफ्तार भी बढ़ेगी. भारत में मेट्रो रेल के विकास में भी फ्रांस सहयोग करेगा. दोनों देशों ने जिन समझौतों पर हस्ताक्षर किया, वे बहुत महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन इसका लाभ तो दोनों देशों को होगा ही. अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिसका फ़ायदा फ्रांस उठा सकता है और जिन क्षेत्रों में फ्रांस की तकनीक अच्छी है, उसका फ़ायदा भारत भलीभांति उठा सकता है. हालांकि फ्रांस के राष्ट्रपति ने अपने देश के मीडिया में भी यह बयान दिया है कि उनके भारत के दौरे का मुख्य उद्देश्य है दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना, लेकिन यह कहने की बात है, क्योंकि  फ्रांस के राष्ट्रपति का मुख्य उद्देश्य तो व्यापार वाणिज्य से ही जुड़ा हुआ है. हालांकि दोनों देशों के बीच कोई बड़ा क़रार नहीं हुआ है, लेकिन उसके लिए उम्मीद तो बढ़ी ही है. भारत की गिनती दुनिया के रक्षा बाज़ार में सबसे बड़े ख़रीदार देशों में होती है. मालूम हो कि 2010 में भारत हथियार ख़रीदने में चीन को भी पछाड़ चुका है. 2011 में भारत ने रक्षा क्षेत्र में 44.28 बिलियन डॉलर ख़र्च किया है, जिनमें परमाणु हथियार से संबंधित ख़र्च भी शामिल है. अगले दस सालों में भारत इस क्षेत्र में 150 बिलियन डॉलर ख़र्च करने की योजना बना रहा है. ऐसा अनुमान है कि 2020 तक भारत रक्षा क्षेत्र में ख़र्च करने वाला चौथा सबसे बड़ा राष्ट्र बन जाएगा.

फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद ने भारत को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का वाजिब हकदार बताया है. यह इस दौरे की बात नहीं है, बल्कि भारत को सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनाने की बात फ्रांस ने बहुत पहले ही की थी. फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने तो कहा था कि एक अरब से अधिक आबादी वाले भारत को सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य न बनाना एक मज़ाक से कम नहीं है.

भारत के इस रक्षा बजट का फ़ायदा फ्रांस भी उठाना चाहता है, क्योंकि वह हथियार बेचने वाला एक महत्वपूर्ण देश है. भारत ने पहले भी फ्रांस से रक्षा ख़रीदारी की है. ग़ौरतलब है कि भारतीय वायुसेना में शामिल मिराज को भारत ने फ्रांस से ही ख़रीदा था. हालांकि कुछ तकनीकी खामियों की वजह से मिराज बहुत सफल नहीं हो पाया. अभी फ्रांस भारत को बहुउद्देशीय युद्धक विमान राफेल बेचना चाहता है. भारत ने भी पिछले साल एक सौ छब्बीस बहुउद्देशीय युद्धक विमान ख़रीदने का फैसला किया है. दूसरी ओर भारत भी फ्रांसीसी राफेल को ख़रीदने का मन बना रहा है, लेकिन इस पर अभी अंतिम फैसला होना बाक़ी है. उधर ब्रिटेन भी चाहता है कि भारत राफेल की जगह उनका यूरोफाइटर ख़रीदे. ऐसी स्थिति में यह ज़रूरी है कि फ्रांस भारत को अपने पक्ष में करने के लिए भारत को अन्य मोर्चे पर समर्थन दे. फ्रांस किसी भी तरह से 10 बिलियन डॉलर से अधिक के इस सौदे को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता है. इसके अलावा, दोनों देशों के बीच सतह से हवा में मार करने वाली कम दूरी की मिसाइलों पर भी बातचीत की गई. यह परियोजना क़रीब 6 अरब डॉलर की है. इसके तहत इसका विकास संयुक्त रूप से किया जाएगा, उसके बाद भारत में हीं इसका निर्माण किया जाएगा. रक्षा सौदों के अलावा फ्रांस का अन्य व्यावसायिक हित भी है. फ्रांसीसी कंपनी अरेवा महाराष्ट्र के जैतापुर में परमाणु रिएक्टर लगा रहा है, जिससे 9900 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा. यह परियोजना 9.3 बिलियन डॉलर का है. जैतापुर में इसका विरोध हो रहा है और फ्रांस के राष्ट्रपति के दौरे के समय भी इसका विरोध हुआ था. फ्रांस इस परियोजना को पूरा करना चाहता है. ग़ौरतलब है कि यूरोप के आर्थिक मंदी का असर फ्रांस पर पड़ा है. लगभग 1.833 बिलियन यूरो का क़र्ज़ उसके ऊपर है, जो उसके जीडीपी का 91 प्रतिशत है. फ्रांस का जीडीपी ग्रोथ रेट 0.2 से 0.3 प्रतिशत के बीच है और बेरोज़गारी दर 10 प्रतिशत से ऊपर है. ओलांद ने फ्रांस के आर्थिक सुधार के मुद्दे पर ही चुनाव जीता है और इसके लिए उन्हें भारत जैसे उभरते अर्थव्यवस्था वाले देश के सहयोग की आवश्यकता है. ऐसे में फ्रांस को भारत की आवश्यकता है, लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या भारत को भी उसी तरह फ्रांस के सहयोग की आवश्यकता है. फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद ने भारत को सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य का बाजिब हकदार बताया है. यह इस दौरे की बात नहीं है, बल्कि भारत को सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनाने की बात फ्रांस ने बहुत पहले ही की थी. फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोज़ी ने तो यहां तक कहा था कि एक अरब से अधिक आबादी वाले इस देश को सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य न बनाया जाना एक मज़ाक से कम नहीं है. देखा जाए तो फ्रांस ने उस समय भारत का पक्ष लिया था, जिस समय इसे सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य देशों के समर्थन की आवश्यकता थी. अब तो भारत को ब्रिटेन और रूस का भी समर्थन है, लेकिन स्थाई सदस्य बनने के लिए अभी चीन और अमेरिका का समर्थन ज़रूरी है. दूसरी ओर, फ्रांस सुरक्षा परिषद में भारत विरोधी प्रस्तावों पर विटो भी कर सकता है, जिसकी भारत को तब तक ज़रूरत रहेगी जब तक कि पाकिस्तान कश्मीर विवाद और चीन उत्तर पूर्व राज्यों का विवाद बनाए रखता है. फ्रांस ने अफ़ग़निस्तान में भारत की भूमिका बढ़ाने की बात कही थी. ग़ौरतलब है कि 2014 तक अफ़ग़ानिस्तान से नाटो सेना चली जाएगी और उसके पहले अफगान सैनिकों को प्रशिक्षण की ज़रूरत है ताकि तालिबान जैसे संगठन के आतंकी कार्रवाई का जवाब दिया जा सके. सैन्य प्रशिक्षण में भारत की भूमिका लंबे समय के लिए भारतीय हित में होगा. इसके साथ हीं अफ्रीका में चीन और भारत के बीच आर्थिक टकराव है. अफ्रीका में भारत को यूरोपीय देशों का सहयोग चाहिए, ताकि वहां भारतीय हितों की रक्षा की जा सके. माली में भारत ने फ्रांस को सहयोग दिया क्योंकि वहां भारत  कृषि, ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण आदि की क्षेत्र में क़रीब 150 मिलियन डॉलर की पांच परियोजनाएं चला रहा है. इसके साथ वह 100 मिलियन डॉलर का एक और पॉवर प्रोजेक्ट लगाने की योजना भी बना रहा है. ऐसे में अगर अफ्रीकी देशों में आतंकी संगठनों का वर्चस्व होगा, तो भारतीय हितों के लिए ख़तरा उत्पन्न हो जाएगा. चूंकि कट्टर मुस्लिम संगठनों से पाकिस्तान का संबंध है और पाकिस्तान से चीन की निकटता है, ऐसे में भारत के नुक़सान की संभावना बढ़ जाती है. यही नहीं, पाकिस्तान इन देशों का उपयोग भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों में कर सकता है, इसलिए अफ्रीका में भारतीय हितों की सुरक्षा में भी फ्रांस भारत की सहायता कर सकता है. इसके अलावा, हिंद महासागर में भारत और चीन के बीच के टकराव में फ्रांस की भूमिका हो सकती है. मालूम हो कि फ्रांस यूरोपीय संघ का एक मज़बूत देश है, इसलिए यूरोपीय संघ के साथ व्यापारिक और रणनीतिक संबंध मज़बूत करने में फ्रांस के सहयोग की आवश्यकता भारत को ज़रूर होगी. इस तरह देखा जाए, तो फ्रांस भारत के लिए उतना ही उपयोगी हो सकता है, जितना भारत फ्रांस के लिए होगा. ऐसी स्थिति में भारत को फ्रांस के साथ अपने संबंध मज़बूत करने पर ध्यान देना चाहिए. फ्रांस पर विश्‍वास किया जा सकता है क्योंकि पहले भी उसने भारत को सहयोग दिया है. जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया था, तो उस समय यूरोपीय संघ में फ्रांस ही ऐसा देश था, जिसने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाया था. सच तो यह है कि ऐसे कई महत्वपूर्ण मौ़के पर फ्रांस ने भारत की सहायता की है. इसलिए अब समय आ गया है कि भारत को फ्रांस के साथ संबंध मज़बूत करने की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए.

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