हमारा लोकतंत्र भ्रष्टाचार बनाए रखने का हथियार है

Santosh-Sirकाम तो सचमुच कमाल के हो रहे हैं. सीबीआई सुप्रीम कोर्ट को स्टेटस रिपोर्ट सौंपती है, जिसका रिश्ता 26 लाख करोड़ रुपये के कोयला घोटाले से है. जब इस घोटाले का पर्दाफ़ाश हुआ और हमने देश में सबसे पहले छापा, तो उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. शायद इसका कारण यह था कि विपक्षी दलों के रिश्ते भी इस घोटाले के दरवाज़े से होकर जाते हैं, पर जब यह घोटाला सीएजी रिपोर्ट के बाद चर्चा का विषय बना, जिसमें सीएजी ने एक लाख 76 हज़ार करोड़ रुपये के घाटे की बात मानी, तो सीएजी नामक संस्था के ऊपर ही हमला शुरू हो गया. ग़ौरतलब है कि यह हमला भारत सरकार के सूचना मंत्री मनीष तिवारी ने किया. प्रधानमंत्री ने उस समय कहा था कि अगर मेरे ऊपर एक भी छींटा आता है, तो मैं सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लूंगा. और अब सीबीआई की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में कह रही है कि 2006 से 2009 के बीच कोयला मंत्रालय में कोल ब्लॉक के आवंटन में भारी अनियमितताएं हुईं, जिन्हें घोटाला कह सकते हैं और उस समय भारत सरकार के कोयला मंत्री मनमोहन सिंह थे. प्रधानमंत्री के नाते उनके पास कोयला मंत्रालय था और हर फाइल पर मंत्री के नाते प्रधानमंत्री ने ही दस्तख़त किए थे.

प्रधानमंत्री अपनी बात कैसे याद रख सकते हैं, क्योंकि बातें याद रखने की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री सहित सारे राजनीतिक दल भूल चुके हैं. विपक्ष के नाम पर भारतीय जनता पार्टी है और जो भी कांग्रेस में नहीं है, वह विपक्ष में है, पर किसी को भी इन वक्तव्यों की याद नहीं आई और किसी को भी कोयला घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई सीबीआई की रिपोर्ट विचारणीय नहीं लगी. क्यों लगे? बिहार में बीस लाख ऐसे जाली जॉब कार्ड मिलते हैं, जिनके ऊपर मनरेगा का पेमेंट होता है. कैसे होता है यह सब कुछ? पैसा केंद्र सरकार भेजती है, मैनेजमेंट राज्य सरकार करती है. बीस लाख वे कार्ड हैं, जो सरसरी तौर पर पकड़ में आए. इसका मतलब यह है कि इन बीस लाख जॉब कार्ड्स के ऊपर बीस अरब रुपये कुछ लोगों की जेब में चले गए. रुपया पेमेंट हुआ, लेकिन जॉब कार्ड जाली हैं, तो फिर पैसा कहां गया, इस पर ख़ामोशी है. पूरे बिहार में ख़ामोशी है. बिहार से जुड़े नेता इसीलिए केंद्र के ऊपर सवाल नहीं उठा रहे हैं. अगर बिहार में बीस लाख जॉब कार्ड पकड़े गए, तो फिर ज़ाहिर है कि बाकी सारे प्रदेशों में लगभग ऐसा ही हाल होगा.

प्रधानमंत्री अपनी बात कैसे याद रख सकते हैं, क्योंकि बातें याद रखने की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री सहित सारे राजनीतिक दल भूल चुके हैं. विपक्ष के नाम पर भारतीय जनता पार्टी है और जो भी कांग्रेस में नहीं है, वह विपक्ष में है, पर किसी को भी इन वक्तव्यों की याद नहीं आई और किसी को भी कोयला घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई सीबीआई की रिपोर्ट विचारणीय नहीं लगी. क्यों लगे?

अफ़सोस इस बात का है कि यह सारा वह पैसा है, जिससे हिंदुस्तान के ग़रीब लोगों की किस्मत संवारने की कोशिश हो सकती थी. अब तो भारत की जनता के 80 प्रतिशत लोगों की ज़िंदगी में खुशहाली की कोई उम्मीद बची दिखाई भी नहीं देती! जितनी खुशहाली की उम्मीदें दिखाई देती हैं, वे केवल 10 प्रतिशत लोगों के लिए हैं, बाक़ी 80 से 90 प्रतिशत लोग दूर खड़े तमाशा देख रहे हैं. यह तमाशा देश के लिए जी का जंजाल बन सकता है, पर इस तमाशे को रोकने का कोई उपाय न तो सत्तारूढ़ दल कर रहा है और न ही विपक्ष में बैठे लोग.

किसानों की आत्महत्या के कारण प्रधानमंत्री द्वारा दिए हुए आर्थिक पैकेज में घोटाला हो जाता है, लेकिन उसके बारे में प्रधानमंत्री को कोई चिंता नहीं. जब मौजूदा प्रधानमंत्री वित्त मंत्री थे, तो विदेशी बैंकों ने 5 हज़ार करोड़ रुपये का घोटाला किया था और वह पैसा देश से बाहर चला गया और उस घाटे की भरपाई तत्कालीन वित्त मंत्री ने हिंदुस्तान के ग़रीब लोगों की कमाई से की, लेकिन बैंकों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई ही नहीं हुई. एक बार फिर हिंदुस्तान के तीन प्रमुख विदेशी बैंक एक नए घोटाले में फंसे सामने आए हैं. उनके ऊपर रिज़र्व बैंक ने एक नोटिस जारी किया है, क्या इतना काफ़ी है? क्या इस बात का आकलन नहीं होना चाहिए कि जब विदेशी बैंकों ने सन् 1992-93 में 5 हज़ार करोड़ रुपये का घोटाला किया था, उस पर कोई कार्रवाई हुई या नहीं? कहने को कह सकते हैं, जब किसी चीज का सड़क पर विरोध न हो रहा हो, तो सरकार को चिंता किस बात की. विरोध संसद में होता है और विरोध का तरीक़ा संसद न चलने देना है. यह दोनों को सूट करता है. सत्ता पक्ष के लिए भी यह फ़ायदेमंद है और विपक्ष के लिए भी. सत्ता पक्ष के लिए इसलिए फ़ायदेमंद है, क्योंकि उसके घोटाले पूरी तरह देश के सामने नहीं आ पाते. और विपक्ष के लिए इसलिए यह फ़ायदेमंद है, क्योंकि उसका इसमें जो हिस्सा है, वह भी सामने नहीं आ पाता. विपक्ष की काहिली सामने नहीं आ पाती. संसद में शोरगुल कीजिए और मिलकर संसद की कार्यवाही ठप्प कर दीजिए.

मैं आरोप लगा रहा हूं, सेंट्रल हॉल में पहले ही पता चल जाता है कि सदन आज चलेगा या नहीं चलेगा, क्योंकि संसदीय कार्यमंत्री और विपक्ष के नेता पहले तय कर लेते हैं कि आज सदन की कार्यवाही नहीं चलने देनी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन सबका असर देश के लोकतंत्र के ऊपर नहीं पड़ रहा? देश में लोकतंत्र की व्यवस्था का सम्मान इसलिए हो रहा है, क्योंकि हम अब भी मानते हैं कि लोकतंत्र विश्‍वास और विकास का रास्ता है और लोकतंत्र भाईचारे की जीवनशैली है, लेकिन आज लोकतंत्र भ्रष्टाचार बनाए रखने का सबसे बड़ा हथियार बन गया है. किसी भी चीज़ को टालने के लिए सबसे बड़ा इंस्ट्रूमेंट बन गया है. लोगों की ज़िंदगी को नरक बनाने के लिए लोकतंत्र के नाम का इस्तेमाल सरकारें भी कर रही हैं और विपक्षी दल भी. लोकतंत्र में अगर समस्याओं का हल न हो, तो लोगों का उससे विश्‍वास उठना लाज़िमी है.

पर सवाल यह है कि लोकतंत्र में ख़राबी है या जो लोकतंत्र को चला रहे हैं, उनमें ख़राबी है? मेरा मानना यह है कि लोकतंत्र चलाने वाले सारे राजनीतिक दल इसके ज़िम्मेदार हैं. उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था का मखौल बना दिया है. लगभग सारी पार्टियां कार्यकर्ताविहीन पारिवारिक नेतृत्व से भरपूर हैं. जहां पारिवारिक नेतृत्व नहीं है, वहां तानाशाही है. आंतरिक लोकतंत्र हर दल में समाप्त हो चुका है. कुछ इक्का-दुक्का वामपंथी दल अभी इसी बीमारी से बचे हैं, लेकिन कब तक वे बचे रहेंगे, कहा नहीं जा सकता. और यह स्थिति हिंदुस्तान के लोगों के मन में लोकतंत्र को लेकर संदेह पैदा कर रही है. यह संदेह नए-नए फ्रेज गढ़ने के काम आ रहे हैं. कुछ लोगों का कहना है कि इससे तो अच्छे अंग्रेज थे, जिन्होंने कम से कम हमें एक सिस्टम तो दिया, लेकिन हमारे लोगों ने तो उस सिस्टम से हमारा ख़ून चूसने का काम किया. कुछ लोग कह रहे हैं कि सेना को सत्ता मिलनी चाहिए, क्योंकि ये सारे लोग जो सत्ता में आते हैं, लोकतंत्र में जनता के नाम पर जनता की ही गर्दन काटने में अपनी सारी कुशलता का इस्तेमाल करते हैं. एक विचारधारा चल रही है कि जनता को अपने-अपने इला़के में शासन हाथ में ले लेना चाहिए और जनता की स्थानीय सरकार बनानी चाहिए.

और जो बचे लोग हैं, जिनके पास रोज़गार के न तो अवसर हैं और न ही कोई संभावनाएं, वे हाथ में ढाई सौ रुपये का तमंचा लेकर किसी सड़क पर खड़े होकर शाम 6 बजे से रात 8 बजे तक ढाई-तीन सौ रुपये की राहजनी करना ज़्यादा आसान समझने लगे हैं. यह रास्ता धीरे-धीरे अराजकता की तरफ़ जाता है. पुलिस की साख ख़त्म होती जा रही है. ज़्यादातर लोगों का मानना है कि कुछ भी कुकर्म करो, पुलिस को घूस दो और क़ानून की पकड़ से बच जाओ. अगर पुलिस से सौदा न हो, तो फिर जहां अदालती फैसले होते हैं, वहां पर भी सौदे हो सकते हैं. ऐसा ही बहुत सारे लोगों का मानना है. बहुत सारे इलाकों में तो यह कहा जाता है कि पांच बीघा गन्ने की खेती करो, उसका पैसा एक तरफ़ रखो, उसके बाद मर्डर करो और अदालत से छूट जाओ. ये सारी चीज़ें इसलिए सामने आ रही हैं, क्योंकि हमारे राजनेताओं ने पूरे लोकतंत्र और प्रशासन का मखौल बना दिया है. अपनी चीज़ें भरने के लिए, चाहे देश हो या विदेश, वे लोकतंत्र के नाम का इस्तेमाल करते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि जनता अगर खड़ी होगी, तो उसका दुष्परिणाम उन्हें किस तरह से भुगतना पड़ेगा.

दरअसल, उनका यह मानना कि उनका कुछ नहीं हो सकता, अतार्किक नहीं है, क्योंकि जनता भी कहां खड़ी हो रही है. जनता जिसे खड़े होकर अपनी तकलीफ़ों के लिए गर्जना करनी चाहिए, वह चूहे की तरह अपने घरों में दुबकी हुई है, जात-पांत, धर्म, भाषा के सवालों पर बंटी हुई यह बेबस जनता उन्हीं नेताओं के पीछे खड़ी है, जो उसे इस तरह से बांटकर अपना घर भर रहे हैं, अपने रिश्तेदारों को राजनीति में लाकर वंशवाद की परिभाषा को पुख़्ता कर रहे हैं. जनता चुनाव के समय कुछ पैसों के लिए तालियां बजाने लगती है. राज्यों के चुनाव सामने आ रहे हैं. उसके बाद लोकसभा का चुनाव है. जनता निरुत्साहित है, वह अपनी तकलीफों के कारणों का राजनीतिक दलों के सामने वर्णन नहीं कर पा रही है. आख़िर क्या हो सकता है?

विभिन्न संभावनाएं देखी जा सकती हैं, पर उनका तभी कोई मतलब है, जबकि संगठित रूप से जनता इस लोकतंत्र को अपने हित में इस्तेमाल करने के लिए राजनीतिक दलों के ऊपर दबाव डाले. अगर जनता दबाव नहीं डालती है, तो यह मानना चाहिए कि हम लोग अभी और तकली़फें सहना चाहते हैं. हम और आत्महत्याएं, अराजकता देखना चाहते हैं और हम ऐसे लोगों को, जो भ्रष्ट हैं, जिनके सामने देश का कोई नक्शा नहीं है, जो देश को कठपुतली बनाए रखना चाहते हैं, आम लोगों को जेल में और ख़ुद बाहर घूमना चाहते हैं, उन्हें सहते रहेंगे. अगर ऐसा ही रहा, तो 120 करोड़ लोगों के इस मुल्क में अराजकता फैलेगी, विद्रोह होगा और बग़ावत भी होगी. यह संभावना हिंदुस्तान का हर वह आदमी देख रहा है, जो संवेदनशील है, जो लोगों की स्थितियों से वाकिफ़ है. लोग चाहे किसी मज़हब के हों, किसी जाति के हों, किसी धर्म के हों, वे कभी भी एक सीमा के आगे नहीं सहते. यह संदेश अभी राजनेताओं के पल्ले नहीं पड़ रहा, लेकिन शायद व़क्त आएगा, जब यह संदेश राजनेताओं के पास जाएगा. उस समय एक अजीब नज़ारा देखने को मिल सकता है कि सारे राजनीतिक दल एक तरफ़ हों और हिंदुस्तान की जनता एक तरफ़. हक़ीक़त तो यह है कि सारे राजनीतिक दलों की सदस्य संख्या मिलकर पांच करोड़ भी नहीं है, लेकिन देश के लोग 120 करोड़ हैं. अब इन 120 करोड़ लोगों को सोचना है कि वे इन पांच करोड़ लोगों के ख़िलाफ़ खड़े होने की हिम्मत जुटा पाएंगे या नहीं? अगर हिम्मत जुटा पाएंगे, तो अपनी किस्मत संवार लेंगे और अगर नहीं जुटा पाए, तो पांच करोड़ लोगों की गुलामी 120 करोड़ लोग अगले और कुछ सालों तक करेंगे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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