ओडिशा में पोस्को के ख़िलाफ़ आंदोलन – ज़ुल्म की इंतिहा है जहां

जगतसिंहपुर ज़िले में स्थानीय ग्रामीण कोरियाई स्टील कंपनी पोस्को का विरोध पिछले सात वर्षों से कर रहे हैं. महिला दिवस (8 मार्च)  की पूर्व संध्या पर गोविंदपुर गांव की महिलाओं ने जिस तरह अर्द्धनग्न प्रदर्शन किया, उससे प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया है. केंद्र और राज्य सरकारें तमाम कोशिशों के बाद भी पोस्को का सपना साकार नहीं कर सकी हैं. देश में चल रहे जनांदोलनों की एक नज़ीर बन चुका है जगतसिंहपुर, तभी तो यह जगह जन-पक्षधर लोगों के लिए एक प्रेरणास्थल बन गई है. क्या है पोस्को की पूरी कहानी, किसे फ़ायदा पहुंचाना चाहती है सरकार और इस व़क्त कैसे हालात हैं वहां, इसी मुद्दे पर पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च), विश्‍व की महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान की हिफ़ाजत करने का दिन. भारत  में प्राचीन समय से ही महिलाओं का सम्मान किया जाता रहा है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौ़के पर संसद समेत कई जगहों पर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की बात कही गई. वहीं दूसरी तरफ़ एक दिन पूर्व यानी (7 मार्च) को ओडिशा के जगतसिंहपुर ज़िले के गोविंदपुर गांव की दर्जनों महिलाओं ने कोरियाई स्टील कंपनी पोस्को के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ सड़कों पर अर्द्धनग्न प्रदर्शन किया. अफ़सोसजनक बात यह रही कि देश के मीडिया और सरकार चला रहे नेताओं ने महिला दिवस से एक दिन पहले हुई इस शर्मनाक घटना पर अपना मुंह तक नहीं खोला. गोविंदपुर गांव की उक्त महिलाओं ने कहा कि राज्य सरकार पोस्को को स़िर्फ ज़मीन ही क्यों, महिलाओं की इज्जत-आबरू भी सौंप दे. बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दलाल बन चुकी केंद्र और राज्य सरकारों के लिए इससे अधिक शर्म की बात और कुछ नहीं हो सकती है. जगतसिंहपुर में स्थानीय लोगों के आक्रोश का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले सात वर्षों में पोस्को स्टील प्लांट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे किसानों की संख्या बढ़कर हज़ारों में पहुंच गई है. स्टील प्लांट के लिए जिस जगह का चयन किया गया था, वहां के निवासी किसी भी सूरत में अपने पुरखों की ज़मीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं. वर्ष 2005 में जिस एमओयू को दिखाकर बीजू जनता दल गर्व कर रहा था, उसी की नवीन पटनायक सरकार पोस्को को लेकर पसोपेश में है. यहां उसकी हालत सांप और छछूंदर जैसी हो गई है. नवीन पटनायक सरकार ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस कोरियाई कंपनी को वह जगतसिंहपुर में बैठाना चाहती है, उसके ख़िलाफ़ स्थानीय ग्रामीणों का आंदोलन इतना तेज़ हो जाएगा. जगतसिंहपुर ज़िले के गोविंदपुर गांव की महिलाओं ने पोस्को के ख़िलाफ़ अर्द्धनग्न प्रदर्शन करके यह साबित कर दिया कि वे अपनी पुरखों की ज़मीन किसी भी क़ीमत पर विदेशी कंपनी के हाथों में नहीं जाने देंगी. पोस्को और सत्ता से लेकर विपक्ष तक बैठे उसके दलालों से त्रस्त इन महिलाओं के लिए यह फैसला उतना ही मुश्किल रहा होगा, जितना किसी और के लिए. उनके लिए शायद कोई और विकल्प बचे भी नहीं थे. पोस्को के ख़िला़फ़ आंदोलन कर रही पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के अध्यक्ष अभय साहू का कहना है कि पिछले दिनों हुए पुलिस लाठीचार्ज में डेढ़ दर्जन लोग घायल हुए. उनके मुताबिक़, प्रशासन ने महिलाओं और बच्चों पर भी जमकर लाठियां बरसाईं. पुलिस की इस बर्बरता से न केवल महिलाएं और बच्चे घायल हुए, बल्कि एक 70 वर्षीय बुज़ुर्ग की हालत भी गंभीर बनी हुई है. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि पोस्को के लिए अगर ज़बरन ज़मीन लेने की कार्रवाई की गई, तो आंदोलन और तेज़ होगा. पोस्को आंदोलन से जुड़े स्टालिन चौथी दुनिया को बताते हैं कि जगतसिंहपुर का इलाक़ा, जहां कोरियाई कंपनी स्टील प्लांट लगाना चाहती है, वहां पान, काजू और नारियल की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. ग्रामीणों के विरोध के बावजूद प्रशासन ज़ोर-ज़बरदस्ती करते हुए पान की लगी हुई फ़सलें उजाड़ रहा है. पोस्को के प्रस्तावित स्टील प्लांट के निकट बीते 2 मार्च को हुए बम विस्फोट में चार लोगों की मौत हो गई. यह गांव पोस्को विरोधियों का गढ़ माना जाता रहा है. पुलिस के अनुसार, बम बनाने के क्रम में यह धमाका हुआ, जबकि पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति का कहना है कि पोस्को समर्थकों ने आंदोलनकारियों पर यह हमला किया था. इतना ही नहीं, पोस्को संयंत्र के ख़िला़फ़ जिन महिलाओं ने 7 मार्च को अर्द्धनग्न प्रदर्शन किया था, उन पर मुक़दमा भी दर्ज किया गया है. वामपंथी दलों समेत कुछ जन संगठनों ने इस घटना पर अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा कि यह वाकया देश को शर्मसार करने वाला है. उनके अनुसार, गोविंदपुर की महिलाओं ने अर्द्धनग्न प्रदर्शन कर यह साबित कर दिया है कि अगर सरकार पोस्को के लिए भूमि अधिग्रहण से पीछे नहीं हटती है, तो लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं. ग़ौरतलब है कि पोस्को स्टील प्लांट के लिए कुल 4,004 एकड़ ज़मीन की आवश्यकता है, जबकि अभी तक 2000 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया जा चुका है. हालांकि कुछ लोग इसे सरकारी ज़मीन बता रहे हैं. स्थानीय लोगों के विरोध-प्रदर्शन के चलते यहां तनाव काफी बढ़ गया है.

याद रहे कि बीते 8 जनवरी से गोविंदपुर में विस्थापन के ख़िलाफ़ शुरू हुए आंदोलन में पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के 6 सदस्यों समेत पोस्को स्टील प्लांट का विरोध कर रहे दो हज़ार ग्रामीणों पर पुलिस ने 230 मुक़दमे दर्ज किए हैं. राज्य सरकार ने प्रशासन को बीते 8 जनवरी को दोबारा भूमि अधिग्रहण करने का आदेश दे दिया था, जबकि इस परियोजना के लिए जारी पर्यावरणीय मंजूरी 30 मार्च, 2012 को ही निरस्त हो चुकी है. ऐसे में, 700 एकड़ वन भूमि का ज़बरिया अधिग्रहण पूरी तरह ग़ैर क़ानूनी है. सरकार की तमाम धमकियों और दमन की सारी कोशिशों के बावजूद धिनाकिया समेत कई गांवों के लोग पोस्को के ख़िलाफ़ चरणबद्ध आंदोलन कर रहे हैं. असल में, आंदोलनरत लोगों पर मुक़दमे करना उड़ीसा सरकार की दमनकारी मशीनरी का एक पसंदीदा हथियार बन गया है. उल्लेखनीय है कि 22 जून, 2005 को ओडिशा सरकार और पोस्को के बीच हुए क़रार के बाद ओडिशा के जगतसिंहपुर ज़िले में 12,000,000 टन प्रतिवर्ष उत्पादन क्षमता वाला स्टील प्लांट स्थापित करने का निर्णय किया गया था, लेकिन स्थानीय ग्रामीण शुरुआत से ही इस परियोजना के ख़िलाफ़ हैं. उनका साफ़ कहना है कि वे अपनी जान दे देंगे, लेकिन अपने पुरखों की ज़मीन नहीं. ऐसे में, अगर यहां पोस्को अपना प्लांट लगाती है, तो उससे 718 परिवारों को विस्थापित होना पड़ेगा. राज्य सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक़, पोस्को स्टील प्लांट की ज़द में क़रीब 6 गांवों के 718 परिवार आने वाले हैं. इनमें सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाला गांव नोलिया साही है, जहां के 240 परिवारों को विस्थापित होना पड़ेगा. उसी तरह ढिंकिया गांव के 202, गोविंदपुर के 169, भुआंपाली के 12, पोलांग के 77 और नुआ के 18 परिवारों को विस्थापित होना पड़ेगा. पिछले छह सालों से जगतसिंहपुर ज़िले में पोस्को के ख़िलाफ़ स्थानीय लोग आंदोलन कर रहे हैं. यहां एक तरफ़ पोस्को और उसके समर्थन वाली नवीन पटनायक सरकार है, तो दूसरी तरफ़ वे लोग हैं, जो अपनी ज़मीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

पोस्को : एक नज़र

  • एक कोरियाई कंपनी, जिसके साथ  ओडिशा सरकार ने 22 जून, 2005 में एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे.
  • पोस्को की ओर से जहां स्टील प्लांट लगाया जाना है, वह स्थान ओडिशा के जगतसिंहपुर ज़िले में है.
  • पिछले सात वर्षों से स्थानीय ग्रामीण पोस्को के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं.
  • पोस्को की वजह से क़रीब एक हज़ार परिवारों को विस्थापन का ख़तरा है.
  • पर्यावरणीय लिहाज़ से भी यह परियोजना उचित नहीं है.
  • इस इला़के में पान, नारियल और काजू की खेती बड़े पैमाने पर होती है.
  • स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि सरकार उपजाऊ ज़मीन की बजाय बंजर भूमि का अधिग्रहण करे.
  • पोस्को विरोधी आंदोलन देश में चल रहे भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ एक सफल आंदोलन माना जा रहा है.
  • क़रीब डेढ़ वर्ष के बाद 3 फरवरी, 2013 को भूमि अधिग्रहण का काम दोबारा शुरू हुआ था, लेकिन विरोध के बाद उसे रोकना पड़ा.
  • पोस्को का लक्ष्य हर साल 120 लाख टन स्टील उत्पादन करना है.
  • बीते 2 मार्च की शाम पाटना गांव में हुए बम धमाके में चार आंदोलनकारियों की मौत हो गई.

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

You May also Like

Share Article

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *