मुलायम से परेशान मुसलमान

बीते दिनों सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अपने एक बयान में कहा कि उनकी सरकार ने उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद उन 400 से अधिक निर्दोष मुस्लिम नौजवानों को रिहा कर दिया है, जिन्हें आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उत्तर प्रदेश में जबसे सपा की सरकार बनी है, तबसे किसी भी निर्दोष मुस्लिम नौजवान को आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार नहीं किया गया है. मुलायम सिंह का यह बयान आते ही मुस्लिम संगठनों ने इसकी निंदा शुरू कर दी, क्योंकि यह बयान झूठ का पुलिंदा है. चौथी दुनिया ने जब इस संबंध में जांच-पड़ताल की, तो पता चला कि अभी तक उत्तर प्रदेश की जेलों में आतंकवाद के आरोप में बंद किसी भी निर्दोष मुस्लिम नौजवान की रिहाई ही नहीं हुई है.

उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने सपा को जिन उम्मीदों के साथ सत्ता की दहलीज़ तक पहुंचाया था, वे सरकार बनने के बाद धूमिल होती दिखाई दे रही हैं, क्योंकि पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव से पूर्व समाजवादी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में मुसलमानों से वादा किया था कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्यवाही की आड़ में उत्तर प्रदेश के जिन निर्दोष मुस्लिम नौजवानों को जेलों में बंद किया गया है, उन्हें न केवल तुरंत रिहा किया जाएगा, बल्कि मुआवज़ा देने के अलावा उनके साथ न्याय भी किया जाएगा और उन्हें बदनाम करने वाले अधिकारियों को दंडित किया जाएगा. लेकिन मुख्यमंत्री ने अब तक ऐसा कोई काम नहीं किया, जिससे साबित हो कि मुसलमानों के साथ किया गया उनका वादा पूरा हो गया है. इसके ठीक विपरीत मुलायम सिंह दावा कर रहे हैं कि उनकी सरकार ने आतंकवाद के नाम पर जेलों में बंद 400 निर्दोष मुस्लिम नौजवानों को रिहा कर दिया है. चौथी दुनिया उत्तर प्रदेश सरकार से पूछना चाहता है कि अगर उसके पास ऐसे 400 मुस्लिम नौजवानों की सूची है, तो वह उसे सार्वजनिक करे. जांच-पड़ताल के दौरान जो सूची चौथी दुनिया को प्राप्त हुई, उसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है. दरअसल, ये वे नौजवान हैं, जो आतंकवाद के झूठे आरोप में उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद हैं या फिर इन्हें देश की किसी दूसरी जेल में कैद करके रखा गया है.

चौथी दुनिया उत्तर प्रदेश सरकार से पूछना चाहता है कि अगर उसके पास ऐसे 400 मुस्लिम नौजवानों की सूची है, तो वह उसे सार्वजनिक करे. जांच-पड़ताल के दौरान जो सूची चौथी दुनिया को प्राप्त हुई, उसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है. दरअसल, ये वे नौजवान हैं, जो आतंकवाद के झूठे आरोप में उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद हैं या फिर इन्हें देश की किसी दूसरी जेल में कैद करके रखा गया है.

मुलायम सिंह यादव ने दूसरा झूठ यह बोला कि जबसे उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार बनी है, तबसे अब तक एक भी निर्दोष मुसलमान को आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार नहीं किया गया. अगर यह सच है, तो सीतापुर के शकील अहमद और आज़मगढ़ के एक मदरसे में पढ़ रहे दो मुस्लिम विद्यार्थियों वसीम बट्ट एवं सज्जाद बट्ट को क्यों गिरफ्तार किया गया? यह बात समझ से परे है कि मुलायम सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को झूठ बोलने की क्या ज़रूरत पड़ गई? वह अगर वाक़ई मुसलमानों के हमदर्द होते, तो निमेश आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में पेश करते और उसकी अनुशंसाओं पर अमल करते, लेकिन वह तो पूरी रिपोर्ट ही दबाकर बैठे हैं. ऐसे में यह कैसे मानें कि वह मुसलमानों के हितैषी हैं और उनके दामन पर लगा आतंकवाद का दाग़ मिटाना चाहते हैं.

निमेश आयोग का ख़ुलासा

23 दिसंबर, 2007 को उत्तर प्रदेश पुलिस ने मीडिया के सामने एक सनसनीखेज़ ख़ुलासा करते हुए दो आतंकवादियों को गिरफ्तार करने का दावा किया था. पुलिस ने बताया कि उसने एक दिन पहले, यानी 22 दिसंबर को बाराबंकी ज़िले से मोहम्मद तारिक़ क़ासमी एवं ख़ालिद मुजाहिद नामक दो आतंकवादियों को गिरफ्तार करके उनके पास से 3 डेटोनेटर, पॉलिथिन में लिपटा आरडीएक्स, मोबाइल और सिमकार्ड बरामद किया. इन दोनों की गिरफ्तारी के बाद न केवल राज्य के आम मुसलमान आक्रोशित हुए, बल्कि कई विधायक भी इस ङ्गर्ज़ी गिरफ्तारी के विरुद्ध खड़े हो गए. मामले ने तूल पकड़ा और फरवरी 2008 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के चौधरी चरन पाल सिंह एवं मज़हर आज़ाद ने इन दोनों की रिहाई के लिए लखनऊ में विधानसभा के बाहर भूख हड़ताल शुरू कर दी. हालांकि, उनकी भूख हड़ताल ज़बरदस्ती ख़त्म करा दी गई, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह ने 14 मार्च, 2008 को राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर न्यायिक जांच कराने की सिफ़ारिश की, इस सिफ़ारिश पर अमल करते हुए तत्कालीन मायावती सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश आर डी निमेश की अध्यक्षता में आयोग गठित करके मामले की जांच रिपोर्ट 6 माह के भीतर पेश करने का आदेश दिया, लेकिन आयोग को अपनी जांच पूरी करने में दो साल लग गए. आख़िरकार, निमेश आयोग ने 237 पृष्ठों वाली अपनी रिपोर्ट 31 अगस्त, 2012 को अखिलेश सरकार के सुपुर्द कर दी, जिसमें उसने कई हैरान करने वाले ख़ुलासे किए.

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है :

  •  सामने आए तथ्यों से स्पष्ट होता है कि संदिग्ध आरोपी तारिक़ क़ासमी को 12 दिसंबर, 2007 को दोपहर 12 बजे, जब वह सराय मीर, आज़मगढ़ से अपनी मोटरसाइकिल से इजतेमा के लिए जा रहा था, तो उसे शंकरपुर चेकपोस्ट थाना रानी की सराय से कुछ लोगों ने उठाया और टाटा सूमो में डालकर ले गए. उनमें से दो अन्य लोग उसकी बाइक लेकर चले गए.
  •  इस प्रकार उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि 16 दिसंबर, 2007 को शाम सवा छह बजे संदिग्ध आरोपी ख़ालिद मुजाहिद को महत्वाना मोहल्ला, थाना मड़ियाहूं, ज़िला जौनपुर से टाटा सूमो में सवार लोगों ने उठा लिया. फिर इन दोनों आरोपियों को निर्दयता से पीटा गया.
  •  12 दिसंबर, 2007 के बाद और 22 दिसंबर, 2007 से पहले की घटनाओं में एसटीएफ के अलावा अन्य पुलिस दस्तों का शामिल होना शक के घेरे में है, लेकिन सबूतों से यह स्पष्ट नहीं है कि संदिग्ध आरोपी ख़ालिद मुजाहिद एवं तारिक़ क़ासमी को जिन लोगों ने उठाया और बेदर्दी से मारा-पीटा, वे किस पुलिस दस्ते के थे, कौन-कौन लोग थे और उन्होंने इन दोनों के साथ क्या किया.
  •  निमेश आयोग ने न केवल तारिक़ क़ासमी एचं ख़ालिद मुजाहिद के मामले में सभी तथ्यों से पर्दा उठाया, बल्कि उसने पुलिस के रवैये पर भी सवाल खड़े किए. आयोग ने राज्य सरकार को इस संबंध में जो अनुशंसाएं पेश की हैं, अगर उन पर अमल किया जाए, तो आतंकवाद के नाम पर निर्दोष मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी का सिलसिला थम सकता है.

 अनुशंसाएं

  • आतंकवाद की घटना में पुलिस से अलग विभाग के वरिष्ठ अधिकारी को बरामद वस्तुओं का साक्षी बनाना चाहिए.
  • संदिग्ध आरोपियों से पूछताछ की वीडियो रिकॉडिंग होनी चाहिए.
  • निरीक्षण पुलिस की किसी दूसरी शाखा के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा ही किया जाना चाहिए.
  • ऐसे मामलों के निस्तारण के लिए विशेष अदालतें क़ायम की जानी चाहिए.
  • ऐसी अदालतों के प्रीज़ाइडिंग अधिकारी को मामलों के निबटारे में निर्धारित कोटा देने के लिए बाध्य न किया जाए.
  • अभियोजन पक्ष की ओर से कुशल एवं योग्य वकील/सरकारी अधिकारी द्वारा ही राज्य सरकार की ओर से पैरवी करनी चाहिए.
  • ऐसे मामलों के लिए अलग से प्रोसीक्यूशन सेल कायम होना चाहिए, जो शीघ्र निस्तारण में मदद करके अपना सहयोग दे.
  • ऐसे मामलों का निस्तारण शीघ्र से शीघ्र या अधिक से अधिक 2 साल में करने की व्यवस्था होनी चाहिए और हर स्तर की कार्यवाही की अवधि निर्धारित की जानी चाहिए. मामले का निस्तारण समय पर न होने पर उसकी रिपोर्ट की जानी चाहिए और संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए.
  • पीड़ित पक्ष को उचित मुआवज़ा देने की व्यवस्था भी होनी चाहिए.
  • अच्छे काम के लिए अधिकारियों एवं कर्मचारियों को पुरस्कृत करने की व्यवस्था होनी चाहिए.
  • निर्दोष लोगों को झूठे आरोप में फंसाने पर दायित्व निर्धारित करके दंडित किए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए.
  • ऐसे मामलों से जुड़े अधिकारी, कर्मचारी एवं न्यायालय के प्रीज़ाइडिंग अधिकारी को उचित सुरक्षा मिलनी चाहिए.

लेकिन, दु:ख इस बात का है कि निमेश आयोग की रिपोर्ट मीडिया में लीक होने के बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार उसे दबाकर बैठी है. मुसलमानों को सरकारी तंत्र द्वारा परेशान किए जाने का सिलसिला जारी है. आतंकवाद के नाम पर किसी निर्दोष को गिरफ्तार करना उचित नहीं है. ज़रूरत इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें हर आतंकवादी घटना के बाद मुसलमानों को दोषी ठहराने के बजाय इस बात पर विचार करें कि अगर कोई मुसलमान आतंकवादी बन जाता है, तो उसके पीछे आख़िर कारण क्या हैं. भूख इंसान को चोर बना देती है. इस देश का मुसलमान ग़रीब, अनपढ़ और सामाजिक रूप से पिछड़ा है. वह जिस जगह रहता है, वहां सड़कें टूटी हुई हैं, सफ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं है, गंदी नालियां बहती हैं, चिकित्सा की उचित व्यवस्था नहीं है. अगर सरकारें इन तथ्यों पर गंभीरता से विचार करें और मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल करने की कोशिश करें, तो शायद आने वाले दिनों में देश की स्थिति बेहतर हो सकेगी.

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *