क्या इस समर्पण से शांति आएगी

यूं तो पूर्वोत्तर में कार्यरत अधिकतर अलगाववादी संगठन धीरे-धीरे शांति के रास्ते पर आने के लिए तैयार हो रहे हैं और सच तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकार इसका स्वागत भी कर रही हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि इन छिटपुट संगठनों के समर्पण से क्या मणिपुर में शांति स्थापित हो जाएगी, क्या सरकार ने कभी इस समस्या की जड़ तलाशने की कोशिश की है? अलगाववादियों के समर्पण से क्या इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि अब नए लोग आतंकवाद के रास्ते पर नहीं चलेंगे?

क्या इस समर्पण से शांति आएगी

पिछले कई सालों से गृह मंत्रालय, केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा मणिपुर में सक्रिय अलगाववादी संगठनों के साथ शांति वार्ता की जा रही है और उसके परिणाम भी अब दिखने लगे हैं. बीती 13 फरवरी को तीन अलगाववादी संगठनों ने इंफाल में त्रिपक्षीय सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. ये संगठन हैं यूआरएफ, केसीपी (लम्फेल) और केवाईकेएल (एमडीएफ). इन तीनों संगठनों के कुल 197 कैडर हैं, जिनमें यूआरएफ के 90, केसीपी (लम्फेल) के 40 और केवाईकेएल (एमडीएफ) के 67 शामिल हैं. इस मौ़के पर केंद्र और राज्य सरकार की तरफ़ से ज्वाइंट सेक्रेटरी-मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स नार्थ-ईस्ट इंचार्ज शंभू सिंह, प्रिंसिपल सेक्रेटरी होम सुरेश बाबू, राज्य के मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, कई मंत्री एवं अधिकारी मौजूद थे. यूआरएफ की तरफ़ से चेयरमैन ख्वाइराकपम गोपेंद्रो उर्फ लानहैबा एवं सेक्रेटरी पुयाम मंगियाम्बा मैतै एलाइज रुहिनी मैतै, केसीपी (लम्फेल) की तरफ़ से चीफ ऑफ आर्मी ब्रोजेन मैतै उर्फ सिटी मैते एवं ज्वाइंट सेके्रटरी ताइबंगानबा उर्फ दिलीप और केवाईकेएल (एमडीएफ) की तरफ़ से प्रेसिडेंट मैस्नाम अथौबा एवं जनरल सेक्रेटरी लाइमयुम रोनेल शर्मा उर्फ अचौबा ने हस्ताक्षर किए. सहमति ज्ञापन के अनुसार कैडरों को सही रास्ते पर चलने और नई ज़िंदगी शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. हर कैडर को दो साल तक प्रतिमाह 4000 रुपये बतौर वेतन दिए जाएंगे और हर कैडर के नाम ढाई लाख रुपये का फिक्स डिपॉजिट किया जाएगा, उन्हें न केवल वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाएगी, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर सरकार उन्हें क़र्ज़ भी देगी. उनकी क्षमता-योग्यता के अनुसार उन्हें पैरामिलिट्री फोर्स में नौकरी भी दी जाएगी. इससे उनकी चरमराई हुई ज़िंदगी दोबारा पटरी पर आ सकेगी. उक्त कैडर किसी असामाजिक एवं राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेंगे. अगर वे ऐसा करेंगे, तो क़ानून के अनुसार उन्हें दंड दिया जाएगा. मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी सिंह ने कहा कि भटके हुए युवा फिर शांति के रास्ते पर वापस आ रहे हैं, उनका स्वागत है. उन्होंने बाक़ी अलगाववादी गुटों से भी अपील की कि वे मुख्य धारा में वापस आएं. एमपी टी मैन्य ने कहा कि राज्य में शांति स्थापित करके ही विकास के रास्ते पर आगे बढ़ा जा सकता है. तीनों संगठनों ने समर्पण के वक्त कई हथियार भी सौंपे, जिनमें 3 एके-56 रायफल्स, 12 एके-47 रायफल्स, 3 नाइन एमएम रायफल्स, एक प्वाइंट-32 रायफल, 11 नाइन एमएम कारबाइन, 35 नाइन एमएम पिस्टल, 34 7.65 पिस्टल , आठ प्वाइंट-32 पिस्टल, एक नाइन एमएम रिवाल्वर, आठ लेथोट गन, सात एसबीएल, एक एयर पिस्टल, एक शार्ट गन, तीन आरपीजी, दो एम-16, दो एम-4, एक एसलर, पांच गे्रनेड और बंदूक. हथियारों की कुल संख्या 138 है. मणिपुर की समस्याएं अलग हैं. राज्य के युवाओं को रोज़गार चाहिए, लेकिन सरकार रोज़गार मुहैया नहीं करा रही है, जिसके चलते युवाओं को सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल करना आसान हो गया है. बेरोज़गार युवा जल्द ही अलगाववादियों के झांसे में आ जाते हैं. एक दूसरी बात, जो मणिपुर के लोगों को सबसे ज़्यादा खलती है, वह है आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा). वर्षों से इसे हटाने की मांग की जा रही है. इसके लिए इरोम शर्मिला पिछले 12 सालों से अनशन पर बैठी हैं. जस्टिस जीवन रेड्डी कमेटी ने इस एक्ट को आपत्तिजनक बताया था, बावजूद इसके सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है. राज्य के लोगों का मानना है कि सरकार उनके साथ दोहरा रवैया अपना रही है. दिल्ली में जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता दो-चार दिन अनशन करता है, तो सरकार उसके साथ बात करने के लिए तैयार हो जाती है, लेकिन मणिपुर में बारह साल से अनशन जारी है. अगर सरकार के पास इस एक्ट को लागू करने का सही तर्क है, तो वह उस पर भी चर्चा करा सकती है. जब सरकार द्वारा बनाई गई कमेटी ही इस एक्ट को हटाने की सिफारिश करती है, तो फिर भी सरकार उसे क्यों नहीं मानती? बहरहाल, जब तक मणिपुर के युवाओं को रोज़गार नहीं मिलेगा, तब तक कुछ लोगों द्वारा समर्पण कर देने मात्र से शांति स्थापित नहीं हो सकती. सरकार को सबसे पहले रोज़गार का सृजन करना चाहिए. अगर युवाओं को रोज़गार मिलेगा, तो अलगाववादी संगठन ख़ुद-ब-ख़ुद कमज़ोर हो जाएंगे, लोगों का नज़रिया बदलेगा और सरकार पर विश्‍वास और बढ़ेगा. मणिपुर के विकास के लिए सरकार को विशेष योजनाएं बनानी होंगी, क्योंकि विकास ही समस्याओं का समाधान कर सकता है.

केंद्र एवं राज्य सरकार ने अगर एमओयू में शामिल बातों का सही तरीके से पालन न किया, तो फिर हमारा संगठन भूमिगत भी हो सकता है. इसलिए सरकार ईमानदारी बरते.

अथौबा, चेयरमैन,

केवाईकेएल (एमडीएफ).

हम लोग हथियार छोड़ चुके हैं और चाहते हैं कि शांति के साथ केंद्र एवं राज्य सरकार के विकास कार्यों में अपनी भागीदारी सुनिश्‍चित करें.

सिटी मैतै उर्फ नाउरेम ब्रोजेन मैतै,

आर्मी चीफ, केसीपी (लम्फेल).

शांति हम सभी के अंदर है. इसे आपसी सामंजस्य के द्वारा ही क्रियान्वित किया जा सकता है.

लानहैबा उर्फ ख्वाइराकपम गोपेंद्रो,

चेयरमैन, यूनाइटेड रिवोल्यूशनरी फ्रंट (यूआरएफ).

 

अलगाववादी बनने के कारण

कहते हैं कि जब अंग्रेज भारत छोड़कर जा रहे थे, तब मणिपुर को भी आज़ाद किया गया था, लेकिन यह आधा सच है. पूरा सच यही है कि भारत सरकार ने 21 सितंबर, 1949 को एक बंद कमरे में मणिपुर के राजा बोधचंद्र से मर्जर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करा लिए थे. 1964 में यूएनएलएफ नामक एक संगठन बनाया गया, जिसका मकसद एक स्वतंत्र राज्य की मांग करना था. 1978 में पीएलए का गठन हुआ. उसके बाद प्रीपाक, केवाईकेएल, केसीपी एवं एमपीएलएफ आदि कई संगठन निकल कर सामने आए. इनमें से यूएनएलएफ, पीएलए एवं प्रीपाक आदि आज भी एक स्वतंत्र राज्य के पक्षधर हैं. कुछ ऐसी पार्टियां भी हैं, जो भटकाव के शिकार लोगों से मिलकर बनी हैं. युवाओं द्वारा अलगाववाद की ओर रुख़ करने के पीछे कई कारण हैं. राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर है, जिसकी वजह से पढ़े-लिखे युवक गलत रास्ता अपनाने के लिए बाध्य हो जाते हैं. दरअसल, छोटी और साधारण सरकारी नौकरी के लिए भी कम से कम तीन से पांच लाख रुपये की रिश्‍वत देनी पड़ती है, थोड़ा बड़ा पद हो तो 15 से 20 लाख रुपये तक. यह भी कोई ज़रूरी नहीं कि नौकरी मिलेगी. इंफाल शहर में बीए-एमए पास किया हुआ युवक चेहरा ढककर रिक्शा चलाता है. बेरोजगारी से हताश होकर पढ़े-लिखे नौजवान अलगाववाद के रास्ते पर चलने लगते हैं. उनके हाथों में कलम की जगह बंदूक आ जाती है. तीसरा कारण, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) के तहत शक के आधार पर किसी की भी तलाशी ली जा सकती है, उसे गिरफ्तार किया जा सकता है और ऐसा होता भी है. इस एक्ट की आड़ में राज्य में कई फर्जी मुठभेड़ें हुईं. आज भी देश में सरकारी और ग़ैर सरकारी दबाव के कारण कई मामले खुलकर सामने नहीं आ पाए, लेकिन एक सच यह भी है कि कई राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं ने सच्चाई बताने की हिम्मत दिखाई. ज़ाहिर है, बिना गुनाह के गिरफ्तार या प्रताड़ना के शिकार हुए युवाओं में बदले की भावना पनपती है. चौथा कारण यह कि केंद्र सरकार केवल मणिपुर ही नहीं, पूरे पूर्वोत्तर से कटी हुई है. दिल्ली में बैठकर योजनाएं बनाने के सिवाय कुछ नहीं होता. आज भी कई योजनाएं कागजों पर तो हैं, लेकिन पूर्वोत्तर के गांवों में उनका कोई नामोनिशान नहीं है. प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री एवं अन्य महत्वपूर्ण नेता विदेश यात्राओं में तो लगातार व्यस्त रहते हैं, लेकिन वे पूर्वोत्तर में साल में एक बार भी दौरा करना उचित नहीं समझते. इससे राज्य के लोगों को उपेक्षा का एहसास होता है.

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