पुलिस सुधार बिल 2013- लोगों में ख़ौफ़

जम्मू और कश्मीर सरकार पुलिस सुधार बिल 2013 लाना चाहती है. राज्य में इस बिल के विरोध में आवाज़ बुलंद होनी शुरू हो गई है. आख़िर इस बिल में ऐसा क्या है, जो लोग इसे दिल दहला देने वाला मान रहे हैं, जानिए इस ख़ास रिपोर्ट में…

जम्मू और कश्मीर में इन दिनों प्रस्तावित पुलिस बिल 2013 विवादों में है. यह संभवत: 28 मार्च से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में विधि निर्माण के लिए पेश किया जाएगा. वैसे, सरकार ने जनमत के लिए इसे राज्य के गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर डाल दिया है. पुलिस सुधारों के लिए पेश किए जाने वाले इस बिल के कई बिंदु वास्तव में दिल दहला देने वाले हैं. ऐसी स्थिति में यह और निश्‍चित ही कहा सकता है कि अगर यह बिल पारित हुआ, तो इस राज्य में, जहां की आबादी पहले ही पिछले दो दशकों से अधिक समय से मानवाधिकारों के उल्लंघन का शिकार रही है, में हिंसा के एक नए दौर का आग़ाज़ हो सकता है. 76 पृष्ठों पर आधारित प्रस्तावित पुलिस बिल के मसौदे पर एक नज़र डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार जम्मू व कश्मीर में पुलिस को इन सभी अधिकारों से लैस करने का मन बुना चुकी है, जो फ़िलहाल इस राज्य में आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पॉवर एक्ट के तहत फ़ौज को प्राप्त है. उदाहरणस्वरूप अगर पुलिस बिल पारित हुआ, तो पुलिस को पूरे राज्य में ग्रामीण सुरक्षा समितियां स्थापित करके उन्हें हथियार उपलब्ध कराने का अधिकार मिलेगा. जानकारों का मानना है कि अगर राज्य में आतंकवाद के विरोध के नाम पर आम लोगों पर आधारित सुरक्षा समितियां गठित कर दी गईं, तो यहां गृहयुद्ध का माहौल पैदा हो जाएगा, क्योंकि पूर्व में इस तरह का अनुभव जम्मू के सीमावर्ती क्षेत्रों में हुआ है. ये समितियां हत्याओं और क्रूरता का विषय बन जाएंगी. अगर यह बिल पारित हो जाता है, तो इसके परिणाम में पुलिस को अधिक से अधिक अधिकार मिलेंगे. बिल के एक बिंदु के अनुसार शांति और क़ानून के हवाले से ज़िला अधिकारियों से अधिकार पुलिस अधिकारियों को स्थानांतरित हो जाएंगे, यानी इस समय अगर किसी व्यक्ति को मिलिटेंसी के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है, तो ऐसी स्थिति में इसे पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट के तहत जेल भेजना होता है, जिसके लिए ज़िला अधिकारी की म़ंजूरी आवश्यक होती है, लेकिन अब जो नया क़ानून बनने जा रहा है, इसके बाद यह अधिकार पुलिस अधिकारियों को सीधे प्राप्त होगा, यानी अब पुलिस अधिकारी ही यह तय करेंगे कि किसको किस प्रकार का दंड देना है. प्रस्तावित बिल के अनुसार, पुलिस अधिकारियों को मुख़बिरों या उन अधिकारियों को सम्मानित करने का अधिकार होगा, जो संदिग्ध लोगों की गिरफ्तारियों में मदद करेंगे. प्रस्तावित बिल के सेक्शन 14 में कहा गया है कि पुलिस अपराध को रोकने के लिए किसी भी शहरी की मदद लेने या कह सकते हैं कि इस्तेमाल करने का अधिकार रखती है और पुलिस अपनी मदद के लिए जिस नागरिक का भी चयन करेगी, इसे इंकार करने का अधिकार ही नहीं होगा, बल्कि इसे अवज्ञा के आरोप में गिरफ्तार भी किया जा सकता है. हद यह है कि प्रस्तावित पुलिस बिल के अनुसार, कोई भी पुलिसकर्मी किसी भी व्यक्ति को बिना औचित्य और बिना किसी जवाबदेही के छह घंटे तक हिरासत में रख सकता है. इसके अलावा, पुलिस को किसी भी पब्लिक या प्राइवेट इमारत या अहाते में बिना अनुमति प्रवेश करने का अधिकार होगा. कोई भी पुलिसकर्मी अगर यह आवश्यक समझे, तो वह किसी भी नागरिक की जायदाद को छह घंटे के लिए ज़ब्त कर सकता है और इसके बाद कोई भी सक्षम पुलिस अधिकारी इसकी समयावधि बढ़ा सकता है.

अलगाववादी दलों ने भी प्रस्तावित बिल पर सख्त प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं. उनका कहना है कि जम्मू कश्मीर में जारी आंदोलन को कुचलने और अलगाववादी दलों के ख़िला़फ़ प्रत्यक्ष कार्यवाई करने के लिए पुलिस को असीमित अधिकार दिए जा रहे हैं. जनता बिल के बिंदु सार्वजनिक हो जाने के बाद परेशान हैं. स्थानीय अख़बारों में बिल के ख़िला़ङ्ग पिछले कई दिनों से संपादकीय और लेख लगातार प्रकाशित हो रहे हैं. घाटी से प्रकाशित होने वाले दैनिक अख़बार कश्मीर-ए-इज़मा ने अपने एक संपादकीय में प्रस्तावित पुलिस बिल को जनता का दुश्मन क़रार देते हुए इस बात पर आश्‍चर्य जताया है कि यह बिल एक ऐसी सरकार प्रस्तुत करने जा रही है, जो स्वयं जनतांत्रिक और जनता की सरकार है.

पुलिस को बिना लाइसेंस का हथियार रखने का अधिकार भी प्राप्त होगा और कोई पुलिस अधिकारी अपने घर में भी मौजूद हो, तो उसे ड्यूटी पर ही माना जा सकता है. कह सकते हैं कि कोई भी पुलिस अधिकारी जब चाहे और जहां भी चाहे अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है. हद तो यह है कि पुलिस राज्य के किसी भी क्षेत्र को अशांत क्षेत्र घोषित कर वहां विशेष सुरक्षा ज़ोन बना सकती है, जिसके बाद इस विशेष क्षेत्र में सिविल प्रशासन के अधिकार समाप्त माने जाएंगे. दिलचस्प बात यह है कि उपरोक्त प्रस्तावित बिल में पुलिस के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने का प्रबंध है और इस संबंध में एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के जज की निगरानी में एक पुलिस शिकायती अथॉरिटी भी क़ायम होगी, लेकिन इस अथॉरिटी को किसी भी शिकायत के बाद कार्यवाई करने का अधिकार नहीं होगा, जबकि इसका काम स़िर्फ जनता की शिकायत को संबंधित पुलिस अधिकारियों तक पहुंचाना होगा. इन शिकायतों पर पुलिस अधिकारियों की कार्यवाई का निरीक्षण होगा. सवाल यह उठता है कि पुलिस के ख़िला़फ़ शिकायत होने पर अगर पुलिस को ही कार्यवाई करनी है, तो न्याय कैसे मिलेगा? इस बिल में किसी की गिरफ्तारी के फ़ौरन बाद इसके परिजनों को सूचित करने की मांग पर कुछ नहीं कहा गया है, यानी पुलिस किसी को गिरफ्तार करने के बाद इसके परिजनों को सूचित करने के लिए बाध्य नहीं होगी. विस्तृत बिल सामने आने के बाद जम्मू कश्मीर में जनता में सख्त प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. आम राय यही है कि इस तरह का बिल पारित करने के प्रयास का उद्देश्य है जम्मू व कश्मीर को एक पुलिस राज्य में बदलना. विपक्षी पार्टियों ने प्रस्तावित पुलिस विधेयक को आतंक फैलाने वाला क़रार दिया है. विपक्षी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की महबूबा मुफ्ती ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि अगर इस बिल को वर्तमान परिस्थतियों में पारित कराया जाता है, तो यह राज्य को उसी दौर में ले जाएगा, जब यहां ख़ाकी वर्दीधारियों ने लोगों पर क़हर बरपा किया था. हालांकि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था चल रही है, लेकिन इस बिल का जो वर्तमान मसौदा है, उससे राज्य में क़ानूनी व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी. अगर वर्तमान परिस्थितियों में बिल पारित कराया जाता है, तो यहां लोकतांत्रिक संस्थाओं और चयनित प्रतिनिधियों की बजाय एक थानेदार को भी समाज के लिए क़ानून लागू करने का अधिकार होगा. अलगाववादी दलों ने भी प्रस्तावित बिल पर सख्त प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं. उनका कहना है कि जम्मू कश्मीर में जारी आंदोलन को कुचलने और अलगाववादी दलों के ख़िला़ङ्ग प्रत्यक्ष कार्यवाई करने के लिए पुलिस को असीमित अधिकार दिए जा रहे हैं. जनता बिल के बिंदु सार्वजनिक हो जाने के बाद परेशान हैं. स्थानीय अख़बारों में बिल के ख़िला़फ़ पिछले कई दिनों से संपादकीय और लेख लगातार प्रकाशित हो रहे हैं. घाटी से प्रकाशित होने वाले दैनिक अख़बार कश्मीर-ए-इज़मा ने अपने एक संपादकीय में प्रस्तावित पुलिस बिल को जनता का दुश्मन क़रार देते हुए इस बात पर आश्‍चर्य जताया है कि यह बिल एक ऐसी सरकार प्रस्तुत करने जा रही है, जो स्वयं जनतांत्रिक और जनता की सरकार है. अख़बार अपने 26 के संपादकीय में लिखता है कि क़ानून जनहित को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं. नए-नए क़ानूनों से नागरिकों को अधिक सुविधाएं, अधिकार और सुरक्षा मुहैया की जाती है. इसे विडंबना ही कहेंगे कि जम्मू-कश्मीर में पिछले 6 दशकों के दौरान जो नए क़ानून बनाए गए या जिन पुराने क़ानूनों में संशोधन किए गए, उनमें से अधिकतर के परिणामों में यहां के मानवाधिकार, सुविधाएं और अधिकारों का हनन कर लिया गया. दुर्भाग्य से इन सभी कारनामे को अंजाम देने में सत्ताधारी दल ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. ग़ौरतलब है कि घाटी में सभी क्षेत्रों से संबंध रखने वाले लोगों ने प्रस्तावित पुलिस बिल पर अपनी आपत्ति व्यक्त की है. प्रसिद्ध पत्रकार तारिक अली मीर ने इस विषय पर चौथी दुनिया को बताया कि एक लोकतांत्रिक और जनतांत्रिक सरकार से तो यह अपेक्षा थी कि नए पुलिस बिल के द्वारा पुलिस को जनता का दोस्त बनाने का प्रयास किया जाता, लेकिन यहां तो उल्टा ही हुआ है. आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि 2010 में पुलिस ने आंदोलन से निबटने के दौरान 110 लोगों, जिनमें अधिकतर बच्चे थे, को मार डाला था. अब यदि इसी पुलिस को प्रस्तावित बिल के द्वारा विशेष अधिकार दिए गए, तो क्या होगा? मैं बिल के बिंदुओं को पढ़कर सदमें में हूं. मैं हैरान हूं कि 21वीं सदी और इस प्रगतिशील दौर में भी कोई सरकार इस तरह के विधि निर्माण के बारे में कैसे सोच सकती है. एक बात तो निश्‍चित ही कही जा सकती है कि अगर सरकार ने उपरोक्त पुलिस बिल को पारित किया, तो जम्मू-कश्मीर में आने वाले दिनों में मानवाधिकारों के उल्लंघन का एक नया इतिहास लिखा जाएगा.

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