समस्या और उसका निराकरण

राजनीतिक पार्टियों में अच्छे लोग नहीं हैं, यह बात नहीं है, पर सवाल अच्छे लोगों का नहीं, बल्कि नीतियों एवं योजनाओं का है. भले और अच्छे लोग भी अगर पुरानी नीतियों और पुराने ढांचे पर ही निर्भर करते रहें, तो वे कारगर साबित नहीं हो सकेंगे. जब तक ये नीतियां एवं योजनाएं और इनके परिणामस्वरूप पैदा हुई व्यवस्था एवं परिस्थिति नहीं बदली जाती तथा राजनीतिक एवं आर्थिक सत्ता वास्तव में जनता के हाथ व उसके वश में नहीं आती, तब तक आज की स्थिति में सुधार संभव नहीं है, बल्कि वह दिनोंदिन और बिगड़ती जाएगी. इस स्थिति को सुधारने का अभिक्रम जनता को ही अपने हाथ में लेना होगा और इसके लिए क़दम उठाने होंगे.

गांव को शासन की इकाई बनाना

आधुनिक भारत में शासन के विकेंद्रीकरण को आर्थिक विकेंद्रीकरण के साथ गांधी जी ने सर्वाधिक महत्व दिया, यह सब जानते हैं. विनोबा जी ने स्वराज्य के बाद देश में ग्राम स्वराज्य का व्यापक आंदोलन चलाया, यह सर्वविदित है. जयप्रकाश जी ने इस आंदोलन का देश के कोने-कोने में अपने भाषणों द्वारा प्रसार किया, लेकिन बावजूद इन प्रयत्नों के, सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ता गया. गांव ही एक ऐसी इकाई है, जहां लोगों के लिए सीधे, यानी प्रतिनिधियों के ज़रिए नहीं, बल्कि स्वयं अपनी व्यवस्था ख़ुद संभालना संभव है. अत: गांव की सारी व्यवस्था गांव की ग्रामसभा के, यानी गांव के सब मतदाताओं की मिलकर बनी हुई ग्रामसभा के हाथ में होनी चाहिए. अत: सत्ता को वहन करने में, व्यवस्था में, लोगों की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी हमारे कार्यक्रम का बहुत महत्व अंग है. सत्ता के इस अधिष्ठान के बिना जनता हमेशा पंगु और असुरक्षित रहेगी और स्वार्थी सत्ताधारियों की दुर्नीति का शिकार भी बनती रहेगी. ग्रामसभा और उसकी कार्यकारिणी के रूप में ग्राम पंचायत लोकशक्ति की सबसे नीचे की बुनियादी इकाई होगी. इस बुनियाद पर केंद्र तक की लोकशाही की इमारत खड़ी होगी. इस प्रकार ग्रामसभा से लोकसभा तक एक परस्पर संबद्ध और जीवंत रचना होगी. गांव को स्व-शासन की एक बुनियादी इकाई मानकर और उस पर ज़िला, राज्य और केंद्र का ऊपर का भवन खड़ा करना अन्य बात है और सारी मुख्य सत्ता, यानी क़ानून बनाने की सत्ता केंद्र और राज्य में लोकसभा और विधानसभा के पास रखकर प्रशासन के थोड़े-से टुकड़े ग्राम पंचायतों को फेंक देना बिल्कुल दूसरी बात है. यही आज भारत में हुआ है. ग्राम पंचायतों को कुछ अधिकार दिए गए हैं, लेकिन उनका उपयोग करने के लिए जो प्रशासन की सत्ता और पर्याप्त लचीले आर्थिक स्रोत चाहिए, वे सब राज्य शासन ने अपने अधीन ही रखे हैं. जो पैसा देता है, वही नियमन करता है. अत: वास्तविक इकाई, यानी गांव को स्व-शासन के पूरे अधिकार होने ही चाहिए.

सत्ता के इस अधिष्ठान के बिना जनता हमेशा पंगु और असुरक्षित रहेगी और स्वार्थी सत्ताधारियों की दुर्नीति का शिकार भी बनती रहेगी. ग्रामसभा और उसकी कार्यकारिणी के रूप में ग्राम पंचायत लोकशक्ति की सबसे नीचे की बुनियादी इकाई होगी. इस बुनियाद पर केंद्र तक की लोकशाही की इमारत खड़ी होगी. इस प्रकार ग्रामसभा से लोकसभा तक एक परस्पर संबद्ध और जीवंत रचना होगी.

यह ग्रामवासियों का जन्मसिद्ध अधिकार है और यह परंपरा से चला आया था. अंग्रेजों ने 150-200 साल पूर्व इसे छीन लिया और वही परिपाटी स्वराज्य काल में जारी रही. इतना ही नहीं, लेकिन कुछ अधिकार तो अभी-अभी कम किए गए हैं. जैसे महाराष्ट्र में ग्राम पंचायत की बैंक में जमा की हुई रकम पंचायत के ख़र्च के लिए निकालने का अधिकार सरपंच, यानी मुखिया एवं ग्राम सेवक के संयुक्त हस्ताक्षर से होता था, लेकिन ग्राम-प्रमुख का यह अधिकार दो वर्ष पूर्व ख़त्म कर दिया गया और अब केवल ग्राम-सेवक अकेला ही पैसे निकाल सकता है. ग्राम पंचायत को कुछ मदद जिला परिषद या राज्य सरकार द्वारा कुछ योजनाओं के लिए मिलती ज़रूर है, लेकिन उसकी शर्तें इतनी जटिल हैं कि उसे प्राप्त करने में काग़ज़ों का पुलिंदा तैयार करना पड़ता है, पंच अधिकारियों के पीछे दौड़ते हुए हैरान हो जाते हैं और सारे काम में बहुत देर होती है. इस प्रकार की पद्धति में आत्म-सम्मान समाप्त हो जाता है और भ्रष्टाचार की काफी गुंजाइश रहती है. अत: स्व-शासन की पर्याप्त सत्ता और तदनुसार आय के स्रोत ग्रामसभा को प्राप्त होने ही चाहिए.

संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों में से पंचायतों को हटाकर स्थानीय स्व-शासन के लिए, यानी ग्राम सभाओं के लिए संविधान में विशेष प्रावधान की रचना की जानी चाहिए. संविधान के परिशिष्ट में केंद्रीय कार्यों की सूची, राज्यों के कार्यों की सूची और समवर्ती सूची के साथ-साथ गांव के कार्यों की सूची भी जोड़ी जानी चाहिए. संविधान परिवर्तन द्वारा यह होने से ग्रामसभाओं का राज्य शासन पर अवलंबन दूर होगा और उन्हें स्वराज्य का अनुभव दो सौ सालों में प्रथम बार उपलब्ध होगा. इस अनुभव और आनंद से उन्हें वंचित रखना राष्ट्रद्रोह और मानव द्रोह है.

प्रस्तुत अंश ठाकुरदास बंग द्वारा लिखित एवं वर्ष 1983 में प्रकाशित पुस्तक-गांव की सत्ता गांव के हाथ में से उद्धृत है. यह पुस्तक हमें बताती है कि सत्ता-शासन व्यवस्था का विकेंद्रीकरण कैसे हो और उसे जनकल्याणकारी कैसे बनाया जा सकता है.

-संपादक