अमीर लोगों से ज्यादा टैक्स लेना ज़रूरी

वित्त मंत्री ने बहुप्रतिक्षित वार्षिक बजट की घोषणा कर दी. वर्ष 1991 के बाद बजट ने अपने महत्व खो दिए, क्योंकि अर्थव्यवस्था को बाजार के हवाले कर दिया गया है. पश्‍चिमी देशों में वार्षिक बजट अकाउंट के स्टेटमेंट के अलावा कुछ नहीं होता है. भारत में, विशेषकर 1991 के पहले बजट का एक औचित्य होता था, क्योंकि यह सरकार की दिशा क्या है, उस ओर इशारा करता था कि सरकार गरीबों के लिए क्या करेगी, रोजगार देने के लिए कौन-सा कदम उठाएगी, उत्पादन के लिए सरकार क्या करेगी, विकास आदि के लिए सरकार किस तरह का काम करेगी. पिछले पंद्रह सालों में ऐसा देखा गया है कि बजट केवल कारपोरेट सेक्टर के इर्द गिर्द ही घूमता रहता है. अब तो बजट में केवल इन बातों पर ध्यान दिया जाता है कि किस तरह की सुविधाएं कारपोरेट सेक्टर को दी जा रही हैं. किस तरह का बांड इश्यू किया जा रहा है. विदेशी निवेश कैसे भारत लाया जा सकता है. इसलिए यह कहा जा सकता है कि बजट अब केवल अमीरों और कारपोरेट सेक्टर के लिए ही प्रतीक्षा करने योग्य रह गया है. कोई भी इसे अनुभव कर सकता है. बजट के बाद प्रतिक्रियाएं भी इसी सेक्टर से आती हैं. विपक्षी दल अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, बजट की बुराई करते हैं और फिर अपने-अपने रास्ते चलने लगते हैं. इस बजट में एक अच्छी बात दिखाई दी. वित्त मंत्री ने अमीरों के ऊपर ज्यादा टैक्स लगाया. हमलोग हमेशा ऐसी सलाह देते रहे हैं कि अमीरों और कारपोटरेट सेक्टर से अधिक टैक्स लिया जाना चाहिए. वित्त मंत्री ने अधिक अमीर लोगों पर दस प्रतिशत का सरचार्ज लगाया, जिसका मतलब है कि अधिक अमीर लोगों को अब तीन प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स देना होगा. भारत में किसी व्यक्ति के ऊपर अधिकतम तीस प्रतिशत तक का प्रावधान है. एक करोड़ से ज्यादा वार्षिक आमदनी वाले लोगों को पैंतीस प्रतिशत टैक्स देना होगा, न कि चालीस प्रतिशत. सरचार्ज केवल एक साल के लिए लगाया गया है. सवाल यह है कि यह सरचार्ज आखिर एक साल के लिए क्यों. इसे तो हमेशा के लिए लगाया जाना चाहिए. भारत में एक करोड़ की आमदनी ठीक-ठाक मानी जाती है और इतनी आमदनी वाले केवल 42800 लोग हैं, जो एक करोड़ से अधिक का आयकर रिटर्न भरते हैं. उन लोगों के ऊपर पैंतीस या चालीस प्रतिशत का टैक्स हमेशा के लिए लगाया जाना चाहिए. वित्त मंत्री को यह मेरी सलाह है. दूसरी बात यह कि कारपोरेट टैक्स पर लगने वाले सरचार्ज में फिर से थोड़ी वृद्धि की गई है और इससे कारपोरेट टैक्स में कुछ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी. भारत में क्या होता है. यहां प्रत्यक्ष कर लेने की व्यवस्था में बहुत सारी कमियां हैं. पी चिदंबरम ने कमियों को दूर करने के लिए एक सही व्यक्ति हैं. अभी तक नौकरी करने वाले असहाय वेतनभोगियों के वेतन से टैक्स ले लिया जाता रहा है, क्योंकि जहां वे काम करते हैं, वह कंपनी या संस्था उनके वेतन से ही टैक्स काट लेता है. हालांकि व्यापारी और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोग हजारों करोड़ का व्यापार करते हैं, लेकिन टैक्स नहीं देते और सरकार कुछ नहीं कर पाती. आयकर का छापा पड़ता है, लेकिन यह केवल डराने के लिए, क्योंकि होता कुछ भी नहीं है. या तो वेतनभोगी लोग टैक्स देते हैं या फिर कारपोरेट सेक्टर टैक्स देता है. इसलिए कारपोरेट से ज्यादा टैक्स लिया जाना चाहिए और अमीर लोगों से ज्यादा टैक्स लिया जाना चाहिए, ताकि मनरेगा जैसे कार्यक्रम चलाकर गरीब लोगों की सहायता की जा सके. यह एक सामान्य तरीका है, लेकिन फिर भी यह तो तय है कि अगर अधिक गरीब लोगों की सहायता करनी है, तो ऐसी स्थिति में अधिक अमीर लोगों से धन लेना जरूरी हो जाता है. यही एक काम है, जो हम लोग कर सकते हैं. सरकार बाजार सुधार की बात भी करती है. यह सरकार बाजार को सुधारने का दृढ़ निश्‍चय कर चुकी है. यह विदेशी निवेश लाने का भी निश्‍चय कर चुकी है. यह इसी दिशा में जाने का निश्‍चय कर चुकी है. लेकिन इसी के बीच हम कोई कदम उठा सकते हैं. शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार किया जा सकता है. गरीबों के लिए बीमा कराया जाना चाहिए और मैं फिर से कहता हूं कि इसके लिए धन अमीरों से ही लिया जाना चाहिए. अगर देखा जाए, तो इस तरह के बजट का क्या प्रभाव पड़ेगा, जबकि पेट्रोल का दाम बढ़ने वाला है और इसका दाम बढ़ाने के लिए बजट का इंतजार नहीं करना होता है. पेट्रोल और डीजल के दामों के बढ़ने से महंगाई बढ़ ही जाती है. डीजल, पेट्रोल और किरोसीन पर कितना सब्सिडी दिया जा सकता है. इसी तरह दस साल के बाद भी रेलवे का किराया नहीं बढ़ा. हालांकि रेल मंत्री ने पिछले महीने ही किराया बढ़ाया था. बहुत गरीब लोग ज्यादा यात्रा नहीं करते हैं, इसलिए रेलवे का किराया बढ़ाए जाने से इनके ऊपर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा. अधिक गरीब लोग गांवों में रहते हैं, वे भूमिहीन मजदूर हैं, दलित हैं, पिछड़े हैं. मैंने पहले ही कहा था कि यह बजट कोई दिशा नहीं देगा. इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ने वाला है, इसलिए हमें एक सामाजिक बजट की जरूरत है. यहां सवाल यह उठता है कि हम लोग दलितों के लिए और अल्पसंख्यकों के लिए क्या कर रहे हैं. दरअसल, जरूरत इनके लिए करने की है. हां, इस बजट में महिलाओं के बारे में कुछ सोचा जरूर गया है. उनके लिए एक विशेष बैंक का गठन किए जाने की बात कही गई है. यह स्वागत योग्य है, लेकिन दलितों और अल्पसंख्यकों का क्या. उनके लिए क्या कोई व्यवस्था इस बजट में है. अगर इन लोगों के लिए कुछ नहीं किया जाता या फिर करते हुए दिखाई नहीं देता है, तो मैं बहुत दुख के साथ कहता हूं कि जिस तरह की आर्थिक नीति हमारे देश में अपनाई जा रही है, उससे सामाजिक असंतोष ही पनपेगा. यह अगर अभी नहीं दिखाई दे रहा है, तो कुछ वर्षों के बाद इसका परिणाम जरूर दिखाई देगा. चुनावी वर्ष में वित्त मंत्री जो कर सकते हैं, वह करें, लेकिन मैं यह सलाह देता हूं कि अगले दो तीन महीने में 42800 अमीर लोगों और कारपोरेट सेक्टर पर टैक्स जरूर लगाएं.

 

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