राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ- तब और अब

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा में आया अंतर अब साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा है. संघ की नींव किसने डाली और धीरे-धीरे पिछले 87 सालों में कैसे बदलाव आए, उन्हीं बिंदुओं पर चौथी दुनिया की विशेष पड़ताल….

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, तब और अब

केशवराव बलिराम हेडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक थे. दरअसल, उन्होंने ही प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असफल क्रांति और तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक अर्धसैनिक संगठन की नींव रखी. नींव रखने के बाद उन्होंने अपने तत्कालीन मित्रों से, यहां तक कि गांधी जी से भी उस संगठन के औचित्य की चर्चा की. गांधी जी को उन्होंने संघ की स्थिति, इच्छा, भविष्य के बारे में समझाया. गांधी जी के साथ अपने विचारों का आदान-प्रदान किया. हालांकि गांधी जी उनसे उस समय सहमत नहीं थे, बावजूद इसके हेडगेवार तटस्थ थे. उन्हें यह काम करना ही था. आख़िरकार उसी के तहत 1925 को दशहरा के दिन उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना नागपुर में विधिवत की. उन्होंने अपने मित्रों एवं तत्कालीन नेताओं को यही समझाने और विश्‍वास दिलाने का प्रयास किया कि नई चुनौतियों का सामना करने के लिए उन्हें नए-नए तरीक़ों से काम करना पड़ेगा. उल्लेखनीय है कि डॉ. साहब 1925 से 1940 तक यानी मृत्युपर्यंत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे. सच तो यही है कि जब तक जिंदा रहे, तब तक वह एक दबंग और प्रिय नेता के रूप में संघ में कार्यरत थे. 21 जून, 1940 को नागपुर में उनका निधन हो गया.

गोलवलकर

हिंदुत्व की बदलती व्याख्या : संघ का कट्टर हिंदूवाद की विचारधारा से उदारवाद तक का सफर बेहद लंबा रहा है. जब-जब परिस्थितियां बदलीं, तब-तब संघ ने भी अपना चोला बदला. कैसे? कैसे-कैसे बदलती गईं परिस्थितियां? हिंदू, हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की जो परिभाषा डॉ. हेडगेवार ने अपनाई थी, उसे उनके उत्तराधिकारी गुरुजी यानी गोलवलकर जी एवं देवरस जी ने आज़ादी के बाद न केवल बदल दिया, बल्कि पूरी तरह नकार दिया. दरअसल, गोलवलकर जी ने उसे इसलिए नकार दिया था, क्योंकि गांधी जी का हत्यारा नाथूराम गोडसे संघ का स्वयंसेवक था. कहते हैं कि नेहरू और कांगे्रस के कोप से बचने के लिए उन्होंने ऐसा किया था, लेकिन इससे कांगे्रस को कोई फर्क नहीं पड़ा. दरअसल, गोलवलकर जी को एक फरवरी, 1948 को गिरफ्तार करने के साथ ही साथ कम्युनिस्टों और मुसलमानों का विश्‍वास हासिल करने के लिए संघ को प्रतिबंधित तक कर दिया गया. गोडसे की आवाज़ सुनो किताब के पृष्ठ संख्या 51-52 में लेखक जगदीश बल्लभ गोस्वामी ने लिखा है कि रिहा होने के बाद गोलवलकर के भाषण और उनकी विचारधारा बदले-बदले से नज़र आ रहे थे. इसी वजह से वह कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहते थे और न ही ऐसी बात कहना चाहते थे, जो नेहरू सरकार या कांग्रे्रस को पसंद न हो. वह डॉ. हेडगेवार जी द्वारा बताए गए उद्देश्यों से भी धीरे-धीरे विमुख होकर संघ के पूर्व स्थापित सिद्धांतों को दबे पांव चतुराई से नकारने और बदलने लगे. 7 सितंबर को कोलकाता में समाचारपत्रों के प्रतिनिधियों के सामने उनके भाषण और उसके उपरांत प्रश्‍नोत्तर के दौरान उनसे पूछा गया कि संघ की सदस्यता के लिए किस बात की आवश्यकता है? जवाब में गोलवलकर जी ने कहा कि वह पूर्ण अवस्था प्राप्त हिंदू हो, यानी एक कट्टर हिंदू.

बालासाहेब देवरस :  गोलवलकर जी के निधन के बाद बालासाहेब देवरस ने सरसंघचालक का पद संभाला. यदि यह कहें कि 26 जून, 1975 को भारत के इतिहास में एक और काला पृष्ठ जुड़ा, तो शायद गलत नहीं होगा. गौरतलब है कि आपातकाल के दौरान सरसंघचालक देवरस पूरे 19 महीने तक बंदीगृह में रखे गए. बंदीगृह में रहते वक्त ही देवरस जी का कई समाजवादी खेमे के नेताओं, जमात-ए-इस्लामी के नेताओं एवं दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम बुखारी आदि से तालमेल बना. आपस में विचारधारा का आदान-प्रदान हुआ और धीरे-धीरे उन लोगों से उनके बहुत ही मधुर संबंध हो गए. अब यदि यह कहें कि उन सब लोगों की विचारधारा का बालासाहेब के व्यक्तित्व और विचारों पर कई तरह से प्रभाव पड़ा था, तो शायद ग़लत नहीं होगा. दरअसल, उसी दौरान 26 मई, 1981 को ग्वालियर में भारत के मध्य प्रांत के संघ शिक्षा वर्ग के अपने बौद्धिक व्याख्यान में बालासाहेब देवरस ने अपने विचार इस तरह से व्यक्त किए, यहां जो मुसलमान और क्रिश्‍चियन हैं, वे एथेनिक ग्रुप में नहीं आते हैं. यहां का मुसलमान और क्रिश्‍चियन यहां का पुराना हिंदू है. उनका और हमारा खून एक ही है. उन्होंने आगे कहा, न केवल हमारे पूर्वज एक हैं, बल्कि बाप-दादा भी एक हैं. तर्क दिया कि दो-चार पीढ़ी पहले ही उसने उपासना पद्धति में परिवर्तन किया होगा. उन्होंने जेहादी रूप अख्तियार करते हुए कहा कि केवल धर्म बदलने से ही राष्ट्रीयता नहीं बदलती. यदि हम गौर से इन सब बातों की पड़ताल करें, तो पाएंगे कि हिंदू, हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की जो परिभाषा डॉ. हेडगेवार ने अपनाई थी, उसे उनके उत्तराधिकारी गोलवलकर यानी गुरुजी एवं देवरस जी ने चेंज ही नहीं किया, बल्कि पूर्णत: नकार भी दिया. सच तो यह है कि उन्होंने मुसलमानों के लिए भी संघ और उसके अनुयायी संगठनों के द्वार खोल दिए. संदर्भ…हिंदू अस्मिता, 15 फरवरी, 2008. 1977-78 की बात है. एक मुस्लिम पत्रकार एवं विद्वान मुजफ्फर हुसैन द्वारा नागपुर संघ कार्यालय में ही संघ मुस्लिम संवाद का आयोजन किया गया. सोच और विचार में किस तरह से फर्क आता गया, उसकी एक बानगी यहां देखने को मिलती है. जब नमाज का समय हुआ और मुस्लिम नेता नमाज के लिए संघ कार्यालय से बाहर जाने लगे, तो देवरस जी ने उनसे पूछा कि क्या वे संघ कार्यालय में नमाज नहीं पढ़ सकते? इस पर मुस्लिम नेता बोले, क्यों नहीं? तब वहां उनके वजू की व्यवस्था कराई गई और वहां आए सभी मुस्लिम नेता नमाज में शामिल हो गए. अजान की आवाजें भी संघ कार्यालय प्रांगण में गूंज उठीं. हिंदू अस्मिता, इंदौर, 16 फरवरी 1996, पृष्ठ संख्या 2. परंतु आश्‍चर्य की बात तो यह है कि इस हिंदू-मुस्लिम संवाद का कोई नतीजा अंतत: नहीं निकला.

रज्जू भइया:  देवरस जी के बाद डॉ. राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भइया मार्च 1994 में चौथे सरसंघचालक बने, लेकिन वह ज़्यादातर समय अस्वस्थ ही रहे. उन्होंने लिखा कि सनातन धर्म की व्यापकता और ईसाइयत एवं इस्लाम की संकीर्णता में कोई मेल ही नहीं है. संदर्भ…हिंदू अस्मिता, पृष्ठ संख्या 7, 16 सितंबर, 1996. प्रोफेसर राजेंद्र सिंह यानी रज्जू भइया के उपरोक्त वक्तव्य, जो कि पांचजन्य में 28 जुलाई-11 अगस्त, 1996 के अंक में छपा, से यह स्पष्ट होता है कि वह डॉक्टर हेडगेवार के विचारों के ज़्यादा निकट थे, न कि गोलवलकर जी या देवरस के. हालांकि यह कह पाना फ़िलहाल मुश्किल है कि वह क्यों संघ को दोबारा डॉ. हेडगेवार की नीतियों के मुताबिक़ ढाल पाने में असमर्थ रहे.

के एस सुदर्शन:  मार्च 2002 में के एस सुदर्शन संघ के पांचवें सरसंघचालक बने. वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के दर्शन के अधिक निकट थे और हिंदू के स्थान पर भारतीय शब्द का इस्तेमाल अधिक करते थे. कहते हैं कि उन्हें भारतीय शब्द से अधिक प्यार था. वह हिंदुत्व एवं हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से प्राय: अनभिज्ञ ही दिखाई दिए, बल्कि यहां यह कहना ज़्यादा उपयुक्त होगा कि वह गांधी दर्शन के अधिक निकट दिखे. दरअसल, गांधी जी के अनुरूप ही सुदर्शन जी भी मुस्लिम सहयोग के सदैव आकांक्षी बने रहे. जिस प्रकार गांधी जी स्वतंत्रता प्राप्ति को मुस्लिम समुदाय के सहयोग के बिना संभव नहीं समझते थे, ठीक उसी तरह सुदर्शन जी भी मुस्लिम समुदाय के सहयोग को अपने आचार-विचारों में नितांत ज़रूरी समझते थे. कहते हैं कि इसी दृष्टिकोण के कारण ही संभवत: वह मुस्लिम पत्रकार मुजफ्फर हुसैन से इतने प्रभावित हो गए थे कि उनके कहने पर उन्होंने कई बैठकें मुस्लिम उलेमाओं के साथ इसलिए कीं, ताकि उन्हें रिझाया और अपनाया जा सके. और इसी प्रयास में आनन-फानन में उन्होंने यह भी कह दिया कि वेद और कुरान एक समान हैं और ये दोनों एक ही शिक्षा देते हैं, परंतु दु:ख की बात तो यह है कि मुस्लिम उलेमाओं को रिझाने के सुदर्शन जी के सारे प्रयत्न अंतत: बेकार ही साबित हुए. सुदर्शन जी के अनुरूप देश का मुसलमान न तो मोहम्मद पंथी हिंदू बनने को तैयार हुआ और न इस देश को अपनी माता एवं पुण्यभूमि मानने को.

मोहनराव भागवत: मोहनराव भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक हैं. भागवत की छवि की बात करें, तो वह निर्विवाद रूप से उदारवादी रही है. दरअसल, उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में संघ के प्रचारक के रूप में विभिन्न ज़िम्मेदारियों को निभाया भी. कोलकाता एवं पटना में भी वह काफी समय तक रहे. उल्लेखनीय है कि पटना में अपने अभिनंदन समारोह में उन्होंने विवेकानंद की पंक्तियों को उद्धृत किया था. उन्होंने कहा था कि शक्तिशाली भारत का विचार करने पर हमारे सामने जिस देश की परिकल्पना उभरती है, उसके मुताबिक़ भारत का शरीर इस्लाम का होना चाहिए, जबकि हृदय हिंदू. हालांकि संघ के मुसलमानों के प्रति प्रचलित दृष्टिकोण से यह बात काफी अलग दिखती है. दरअसल, इस दृष्टिकोण में शरीर और हृदय की उपयोगिता को लेकर बहस-मुबाहिसे की पूरी गुंजाइश ज़रूर है, लेकिन एक बात साफ़ है कि वैचारिक रूप से मुसलमानों को संघ अवांछित नहीं मानता और यह भागवत की पंक्तियों से पता चल जाता है. अब यदि यह कहें कि इस तरह से संघ ने धीरे-धीरे वीर सावरकर एवं डॉ हेडगेवार जी के हिंदुत्व और नीतियों को छोड़कर गांधीवादी नीतियों को ही अपना लिया, तो शायद गलत नहीं होगा. एक सच यह भी है कि वह समय-समय पर अपने को गांधीवादी कहलाने में ही सुरक्षित एवं गौरवान्वित महसूस करते रहे.

संघ के मुख्य प्रचारक और सदस्य

केशव बलिराम हेडगेवार, माधव सदाशिव गोलवलकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, मधुकर दत्तात्रेय, देवरस, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भइया, अशोक सिंहल, के एस सुदर्शन, प्रवीण तोगड़िया, उमा भारती, नरेंद्र मोदी, नितिन गडकरी, विनय कटियार, नानाजी देशमुख, भैयाजी जोशी, सुरेश सोनी, एम जी वैद्य और राजनाथ सिंह.

वह विवादित बयान

भारत में इन दिनों जिस तरह दुष्कर्म की घटनाओं का तांता लगा हुआ है, ठीक उसी तरह नेताओं के बेतुकी बयानबाज़ी का भी तांता लगा हुआ है. नेता दुष्कर्म के बढ़ते मामलों पर एक के बाद एक अजीबोग़रीब बयान दे रहे हैं. इसी कड़ी में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों सिल्चर में एक सभा के दौरान भारत और इंडिया को अलग करते हुए कहा कि रेप भारत में कम और इंडिया में ज़्यादा होते हैं. दरअसल, मोहन भागवत कहना यही चाहते थे कि दुष्कर्म का मुख्य कारण है पश्‍चिमी सभ्यता. उनका मानना है कि पश्‍चिमी सभ्यता का प्रभाव इंडिया यानी शहरों पर ज़्यादा है, इसलिए वहां दुष्कर्म के मामले भी ज़्यादा होते हैं. भागवत ने कहा कि भारत यानी गांवों की बात करें, तो वहां ऐसी घटनाएं नहीं के बराबर होती हैं, क्योंकि वे पश्‍चिमी सभ्यता से दूर हैं. गांव की संस्कृति और रहन-सहन आज भी भारतीय संस्कृति के आसपास है. भागवत ने दुष्कर्म के मामले में कड़ी सजा की पैरवी करते हुए कहा कि आरएसएस भी ऐसी घटनाओं के ख़िलाफ़ सख्त क़ानून बनाने की मांग करता है. साथ ही उन्होंने दोषियों के लिए फांसी जैसी कड़ी सजा की मांग भी की.

भाजपा और संघ का नाभि नाल संबंध?

ग़ौरतलब है कि राज नारायण एवं मधु लिमये जैसे समाजवादियों ने जनता पार्टी और आरएसएस दोनों की सदस्यता रखने का विरोध किया. इसका नतीजा यह निकला कि जनता पार्टी में बिखराव पैदा हो गया. दूसरी ओर वर्ष 1980 में जनसंघ ने अपने आपको पुनर्गठित कर लिया. जनता पार्टी में शामिल उसके नेता एक मंच पर आए और एक नई पार्टी का जन्म हुआ, जिसका नाम भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा रखा गया. लेकिन एक कटु सच यह भी है कि उसने खुद को हमेशा संघ के चश्मे से ही देखा. कभी अपनी पार्टी को अलग तरीके से देखने की कोशिश ही नहीं की. अब यदि यह कहें कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भाजपा की रीढ़ है और हिंदुत्व उसकी विचारधारा, तो शायद गलत नहीं होगा. हालांकि यह अलग बात है कि अलग-अलग परिस्थितियों में भाजपा उदारवादी रुख अपनाती रही है, लेकिन घूम-फिरकर वह हिंदुत्व की विचारधारा के आसपास ही आकर ठहर सी जाती है. शायद इसलिए, क्योंकि संघ का दबाव जो है. हालांकि यह भी एक सच है कि यह संघ का ही कमाल है कि जब भी भाजपा हिंदुत्व को अपने एजेंडे से दरकिनार करने की कोशिश करती है, तो संघ का डंडा तुरंत उस पर चल जाता है. तिलमिला जाते हैं भाजपा के वरिष्ठ नेता. यही कारण है कि आडवाणी जैसे बड़े नेता को भी आख़िरकार अलग-थलग होना ही पड़ा. इसमें कोई दो राय नहीं कि 80 और 90 के दशकों के दौरान संघ और भाजपा ने अपने हिंदूवादी एजेंडे को काफी मजबूत किया, लेकिन आम लोगों से यह बात छुप नहीं सकी. दरअसल, उनके इसी कट्टर हिंदूवादी रवैये और धार्मिक उन्माद की प्रवृत्ति का नतीजा था 6 दिसंबर, 1992 का बाबरी मस्जिद विध्वंस और 2002 का गोधरा दंगा. सच तो यह है कि इन दोनों अमानवीय एवं पैशाचिक घटनाओं ने भारतीय जनमानस को झकझोर कर रख दिया. हालांकि इसी दौरान तीन मौक़ों पर सत्ता रस का पान भी कर चुकी है भाजपा. हक़ीक़त तो यही है कि लगातार दो बार कांगे्रस से लोकसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद वह ख़ुद को बदलने का कई बार असफल कोशिश भी कर चुकी है, लेकिन संघ की नाराज़गी और दबाव के आगे उसकी एक भी न चली. भले ही संघ कहता रहा है कि उसका भाजपा में कोई हस्तक्षेप नहीं है, लेकिन सच्चाई तो यही है कि संघ ही भाजपा को चलाता है और यह बात हमारे देश के मतदाता भलीभांति जानते हैं.

कौन हैं आरएसएस से जुड़े चरमपंथी

केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी पर दिए गए बयान के बाद गृह सचिव आर के सिंह ने कहा है कि सरकार के पास कम से कम ऐसे 10 लोगों के नाम हैं, जो समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ दरगाह धमाकों में शामिल थे और जिनका संबंध किसी न किसी समय आरएसएस से रहा है. दरअसल, राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए ने इस मामले में जिन 10 व्यक्तियों के नाम दिए हैं, उनमें से कुछ निम्न हैं:-

स्वामी असीमानंद : 1990 से 2007 के बीच असीमानंद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी संस्था बनवासी कल्याण आश्रम के प्रांत प्रचारक प्रमुख रहे. असीमानंद को 19 नवंबर, 2010 को गिरफ्तार किया गया और 2011 में उन्होंने अपने इकबालिया बयान में कहा कि अजमेर शरीफ दरगाह, हैदराबाद की मक्का मस्जिद एवं अन्य कई स्थानों पर हुए बम विस्फोटों में उनका और दूसरे हिंदू चरमपंथियों का हाथ था. ग़ौरतलब है कि असीमानंद को साध्वी प्रज्ञा का क़रीबी माना जाता है, जो मालेगांव धमाके की एक प्रमुख संदिग्ध रही हैं.

सुनील जोशी: राजस्थान एटीएस के मुताबिक़, सुनील जोशी अजमेर धमाकों के प्रमुख सूत्रधार थे. वह इन धमाकों के आरोप में गिरफ्तार स्वामी असीमानंद के हमेशा संपर्क में थे. उल्लेखनीय है कि जोशी की 29 दिसंबर, 2007 को मध्य प्रदेश के देवास में रहस्यमय हालत में हत्या हो गई थी. आश्‍चर्य की बात तो यह है कि जोशी की हत्या की जांच तब तक आगे नहीं बढ़ी, जब तक राजस्थान एटीएस ने कुछ लोगों को अजमेर धमाकों में गिरफ्तार नहीं कर लिया.

देवेंद्र गुप्ता: अजमेर और समझौता एक्सप्रेस धमाके में देवेंद्र के ख़िलाफ़ आरोप हैं. कहा गया है कि वह 2003 से 2006 के बीच झारखंड स्थित जामताड़ा में आरएसएस के ज़िला प्रचारक रहे.

लोकेश शर्मा: देवगढ़ में आरएसएस के नगर कार्यवाहक रहे लोकेश शर्मा समझौता एक्सप्रेस और मक्का मस्जिद मामले में गिरफ्तार हैं.

संदीप डांगे: फ़िलहाल फरार हैं. उन्हें समझौता एक्सप्रेस और मुसलमानों से जुड़े दो धार्मिक स्थलों पर बम धमाकों में शामिल बताया जाता है. वह कथित तौर पर मऊ, इंदौर और शाजापुर में आरएसएस प्रचारक थे.

कमल चौहान: समझौता एक्सप्रेस मामले में गिरफ्तार. उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक बताया जा रहा है.

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