शिवराज की सियासी चालें

शिवराज की सियासी चालें
शिवराज की सियासी चालें

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व और 2013 के अंत तक भावी सरकार का ख़ाका बहुत हद तक स्पष्ट हो जाने की उम्मीद है. इस चुनाव में देश की हृदयस्थली कहलाने वाला मध्य प्रदेश निश्‍चित ही सबसे अहम है. अहम इसलिए भी हैं, क्योंकि सबसे गंभीर स्थिति में यहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के तहत भाजपा का सहयोगी जनता दल (यू) है, जबकि यह इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और गठबंधन संयोजक शरद यादव का गृह प्रदेश है. इसलिए देश भर में सत्ता और चुनावी राजनीति के सबसे बड़े और प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों, कांग्रेस और भाजपा के लिए इस दौरान अपनी-अपनी ताक़त तौलने का एकदम सही मौक़ा होगा. दांव पर होगी मुख्य रूप से राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के लगातार तीसरी बार हैट्रिक लगा पाने की योग्यता, क्षमता और प्रतिष्ठा. इसके अलावा दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सत्यव्रत चतुर्वेदी, सुरेश पचौरी, कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया, नेता प्रतिपक्ष अर्जुन सिंह एवं पुत्र अजय सिंह की जोड़ी समेत अनेक गुटों में बंटे पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं के साथ-साथ नए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की भी परीक्षा होनी तय है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही नहीं, समूची भारतीय जनता पार्टी के लिए राज्य सरकार कई अर्थों में गुजरात से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मॉडल है. यही वजह है कि पार्टी के कई प्रमुख प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय नेता शिवराज सिंह में एक मा़कूल प्रधानमंत्री मटेरियल मौजूदगी तलाश रहे हैं. ख़ुद शिवराज सिंह न तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तरह उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने वालों को अपना दुश्मन बता रहे हैं और न राहुल गांधी की तरह ऐसा कहने वालों को डांट-डपट रहे हैं. जानकारों की मानें, तो प्रधानमंत्री पद को लेकर भाजपा के भीतर और बाहर, जो खींचतान मची हुई है, उससे बराबर बाख़बर रहते हुए इस दिशा में शिवराज सिंह अपने स्तर पर अपनी कछुआ चाल जारी रखे हुए हैं. उनका मानना है कि इस मार्ग पर आगे ब़ढने के लिए विधानसभा चुनाव का अंधा मोड़ पूरी सफलता से पार करना बेहद ज़रूरी है, इसीलिए उन्होंने अपना चुनावी प्रचार अभियान अभी से प्रारंभ कर दिया है. बताया जा रहा है कि मध्य प्रदेश की कांग्रेस फ़िलहाल अपने नवोदित राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की पाठशाला से मुक़ाबले के नए गुर सीख रही है. हालांकि इसके तरकश से चले अब तक तमाम तीरों से शिवराज पर कोई ख़ास प्रभाव पड़ता नहीं दिखाई दिया है. इसके उलट उन्होंने 18 फ़रवरी से जारी विधानसभा सत्र के दौरान जहां कांग्रेस की ओर से होने वाले हमलों के प्रति पूरी सावधानी बरती हुई है, वहीं दूसरी ओर अपने दल के अंदरूनी भितरघातों को लेकर भी वह ग़ज़ब की सतर्कता बरत रहे हैं. प्रभात झा की जगह नरेंद्र तोमर को अभी पिछले दिनों मिली भाजपा की प्रदेशाध्यक्षी का मामला इसका सबसे सटीक उदाहरण है. भाजपा के भीतरी समीकरणों में आए-दिन हो रहे बदलावों के साथ तालमेल और संतुलन साधने में भी हर कोई शिवराज का लोहा मान रहा है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही नहीं, अन्य सभी संघ परिवारों से उनके रिश्ते संभवत: सबसे ठीक-ठाक बताए जाते हैं. गत 15 फ़रवरी को धार के भोजशाला मामले में बसंत पंचमी की पूजा के साथ ही नमाज़ पढ़े जाने के विवाद को भी उनकी सरकार ने जिस तरह से निपटा लिया, उस पर भी उनकी पीठ थपथपाने वालों की संख्या कम नहीं है. सच तो यह है कि विरोध अथवा विपक्ष की किसी भी तीसरी ताक़त को शिवराज ने अपने कार्यकाल के दौरान उभरने ही नहीं दिया. समझौतावादी रुख़ न अपनाकर उनकी सरकार से आरपार टकराने वाले समूहों, संगठनों आदि के प्रति शिवराज कहीं से भी संवेदनशील नहीं, बल्कि कठोर हैं. राज्य की धरती पर जो कुछ भी प्राकृतिक एवं मानव संसाधन हैं, उन्हें उन्होंने देश-दुनिया के बड़े-बड़े पूंजी निवेशकों को अधिकतम सहूलियतों एवं रियायतों के साथ सस्ती दरों पर बतौर कच्चा माल उपलब्ध कराने को जनता के सामने प्रस्तुत किया. शिवराज सिंह, उनकी सरकार और पार्टी के नीति निर्धारकों ने इस तथाकथित विकास की बुनियादी विसंगतियों पर प्रबंधन और प्रचार का मुलम्मा चढ़ाकर सरकारी ख़ज़ाने का मुंह पूरी तरह से खोल रखा है. आश्‍चर्य की बात तो यह है कि जिस बेल्लारी कांड ने कर्नाटक से लेकर केंद्र तक भाजपा की चूलें अब तक हिला रखी हैं, राज्य में उससे बड़े खनिज घोटाले को लेकर कांग्रेस, जदयू अध्यक्ष एवं राजग संयोजक शरद यादव द्वारा कई बार उठाई गईं आवाज़ों को शिवराज सिंह ने कहीं कोई तव्वजो नहीं दी. आने वाले दिनों में राज्य को देश का नंबर एक राज्य बना देने का संकल्प और अर्से से जारी अंत्योदय मेले जैसे कई-कई सरकारी मजमों में शृंखलाबद्ध मजमेबाज़ी करते हुए शिवराज इस कला में अब इतने माहिर हो गए हैं कि चुनाव प्रचार के तमाम टोटकों को अभी से चालू कर चुके अपने इस दौर में वह अकेले स्टार प्रचारक होंगे. इस बात पर प्राय: सभी की आम सहमति है. इस तथ्य सहित माना यह भी जा रहा है कि शिवराज सिंह के नेतृत्व को भाजपा मे तो कहीं कोई चुनौती है ही नहीं, कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों में भी उनके मुक़ाबले का मजमेबाज़ मध्य प्रदेश में फ़िलहाल कोई दूसरा नहीं दिख रहा है. ग़ौरतलब है कि सरकार के मंत्रियों और पार्टी विधायकों की परफॉर्मेंस पर कई तरह के सिलसिलेवार सर्वे कराए जा रहे हैं. होने को तो यह सब कांग्रेस में भी हो रहा है, मगर राज्य विधानसभा चुनाव की दौड़ में भाजपा को चूंकि अभी कांग्रेस पर फ़ौरी बढ़त हासिल बताई जा रही है, अत: अपनी ही पार्टी के विधायकों, मंत्रियों की परफॉर्मेंस पर सवाल खड़े कर अपनी दावेदारी प्रस्तुत करने वाले भाजपा जनों की ही यहां भरमार दिखाई देने लगी है. ऐसे तमाम दावेदार यह बेहतर समझते और जानते हैं कि उनका मुख्यमंत्री न केवल मजमेबाज़ियों में माहिर है, बल्कि सत्ता और चुनावी राजनीति के हथकंडों को लेकर भी इतना शातिर है कि वह अपनी टीम में कहीं भी किसी कमज़ोर मोहरे को जगह नहीं देगा. अत: अपने दावे की मज़बूती और प्रतिस्पर्धा की कमज़ोरियों को लेकर भाजपा के चुनावी टिकट के दावेदारों ने अभी से एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना शुरू कर दिया है. भाजपा के लिए यह एक समस्या ज़रूर है, परंतु यह पार्टी मध्य प्रदेश मे अभी से चुनावी मोड में आ गई है, जबकि कांग्रेस समेत कई अन्य ख़ुद को फ़िलहाल तैयारियों में जुटा बता रहे हैं, हालांकि उनमें भाजपा के मुक़ाबले गतिशीलता का भारी अभाव है.

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