मुक्केबाज़ी में माहिर महिलाएं- रसोई से रिंग तक

मुक्केबाज़ी, कठिन शारीरिक मेहनत, दिमाग़ी चतुराई और रिंग में हर व़क्तचौकन्ने रहने वाले इस खेल में अभी तक पुरुषों का ही वर्चस्व था, लेकिन अब महिलाओं ने इस वर्चस्व को तोड़ दिया है. अब भारतीय महिलाएं राष्ट्रीय, विश्‍व चैंपियनशिप और ओलंपिक में पदक जीतकर मुक्केबाज़ी में न केवल पुरुष मुक्केबाज़ों से आगे निकल रही हैं, बल्कि समाज को अपने मज़बूत वजूद का अहसास भीकरा रही हैं. पढ़िए चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

एम सी मैरीकॉम दो जु़डवा बच्चों की मां बनने के बाद विश्‍व चैंपियनशिप खेलने के लिए जब ट्रायल देने स्टेडियम पहुंचीं, तो पुरुष टीम के एक नामी कोच ने उन पर तंज़ कसते हुए कहा कि अब यहां तुम्हारा क्या काम है, जाओ और अपने बच्चों को खिलाओ. मैरीकॉम ने कोच की इस बात का बुरा नहीं माना. उन्होंने कोच को उनके ताने का उत्तर अपनी बातों की बजाय अपने घूंसों से दिया. मैरीकॉम न केवल वह ट्रायल जीतकर टीम में शामिल हुईं, बल्कि उन्होंने विश्‍व चैंपियनशिप भी जीतीं. मैरीकॉम यहीं नहीं रुकीं. उन्होंने 2012 के लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक भी जीता है. ये सब उपलब्धियां बताती हैं कि मां बनने के बाद भी मैरीकॉम के मुक्कों की धार कम नहीं हुई है. ज़ाहिर है, इन सब उपलब्धियों के बाद उन कोचों को पता चल गया होगा कि मैरीकॉम की सही जगह कहां है. मैरीकॉम का यही जज़्बा आज हज़ारों लड़कियों को बॉक्सिंग के लिए प्रेरित कर रहा है. आज देश का ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां लड़कियां हुक और पंच न सीख रही हों. ख़ासकर हरियाणा, मणिपुर, सिक्किम और कोलकाता में तो लड़कियों की एक भारी तादाद मुक्केबाज़ी से जु़ड गई है. 2012 में मंगोलिया में हुई एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में रिकॉर्ड आठ महिलाओं ने फाइनल में प्रवेश किया और इनमें से दो ने स्वर्ण, चार ने रजत और दो ने कांस्य पदक जीता. इस प्रतियोगिता में चीन और कजाकिस्तान जैसे मज़बूत चुनौती देने वाले देश भी थे. हरियाणा के कई अभिभावकों का कहना है, हमारी लड़कियां भी लड़कों से कम नहीं हैं, जब लड़के पदक जीत सकते हैं, तो हमारी बच्चियां भी. इसके अलावा, बॉक्सिंग से हमारी बच्चियों में अपनी सुरक्षा की भावना भी आती है और हम भी बेफ़िक्र रहते हैं. ग़ौरतलब है कि हरियाणा में इस समय हिसार, सोनीपत और भिवानी महिला बॉक्सिंग के हब बने हुए हैं. हरियाणा की एक बॉक्सर पिंकी जांगड़ को उनके बेहतरीन खेल के कारण ज्वाइंट किलर के नाम से जाना जाता है. पिंकी कई बार मैरीकॉम को भी हरा चुकी हैं. हरियाणा की कविता गोयत एशियन चैंपियनशिप में रजत पदक जीत चुकी हैं. इसके अलावा, सोनिया लाठर, मीना रानी समेत हरियाणा की अन्य महिला बॉक्सर रिंग में अपने जलवे बिखेर रही हैं. पटियाला के नेशनल स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट में महिला मुक्केबाज़ों के कोच भास्कर भट्ट बताते हैं कि इस समय पूरे भारत के साई सेंटरों और निजी क्लबों में क़रीब 1500 लड़कियां मुक्केबाज़ी सीख रही हैं. रिंग में लड़कियों की इस बढ़ती हुई भीड़ के लिए कोच भास्कर बीजिंग और लंदन ओलंपिक को ज़िम्मेदार मानते हैं. उनका कहना है कि आज के परिवार काफ़ी उदार हो गए हैं और अपनी बच्चियों को खेलने के लिए घर से बाहर भेज रहे हैं. आज भारत का कोई शहर ऐसा नहीं है, जहां लड़कियों के घूंसों की धमक न सुनाई पड़ रही हो. मणिपुर तो महिला बॉक्सिंग का सरताज बना हुआ है. पांच बार की विश्‍व चैंपियन एम सी मैरीकॉम और एक बार की विश्‍व चैंपियन सरिता देवी मणिपुर से ही हैं. इसके अलावा, जूनियर और सीनियर लेवल पर भी मणिपुर की महिला बॉक्सर अपने घूंसों से झंडे गाड़ रही हैं. मैरीकॉम मणिपुर की राजधानी इंफाल में साई की मदद से अपनी एक बॉक्सिंग एकेडमी भी चला रही हैं और इसमें अभी 50 के आसपास बच्चियां मुक्केबाज़ी सीख रही हैं और इनमें से कई जूनियर लेवल पर पदक भी जीत चुकी हैं. सबसे बड़ी बात है कि अब इस खेल में मुस्लिम लड़कियां भी आ रही हैं. 2011 में आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद की निकहत ने एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीत कर सबको चौंका दिया. निकहत के चाचा ही उनको बॉक्सिंग के गुर सिखाते हैं.

मुक्केबाज़ी में मुस्लिम लड़कियां

ऐसा माहौल, जिसमें लड़कियों या महिलाओं को पर्दे में रहने की अनिवार्यता हो, वहां की लड़कियां अगर खेल के मैदान में आ जाएं, तो विरोध के स्वर उठना लाज़िमी है. कोलकाता की चार बहनों ऐनल, ज़ैनब, सौगरा और बुशरा को कई साल लग गए अपने समाज को यह बताने में कि पर्दे से बाहर निकलना और खेलना कोई बुरा काम नहीं है. इन चारों बहनों के बॉक्सिंग सीखने से स्थानीय लोग क्रोधित हो गए और उनके मां-बाप को चेतावनी देने लगे कि यह समाज के लिए ठीक नहीं है, लेकिन चारों बेटियों और उनके परिजनों ने इन चेतावनियों को अनसुना कर दिया. इन बच्चियों की मां रुकसाना बेगम, जिन्होंने अपनी सारी ज़िंदगी पर्दे में काट दी, एकदम चकित रह गईं, जब उन्हें पता चला कि उनकी चारों बेटियां टीशर्ट और शॉट्स में मुक्केबाज़ी सीख रही हैं. उन्हें अपनी इन बेटियों के साहसिक क़दम से सामाजिक बहिष्कार का डर था. जब उन्हें बताया गया कि अन्य मुस्लिम लड़कियां भी सीख रही हैं, तो उनकी जान में जान आई. उन्हें अपनी ज़िंदगी में कुछ न कर पाने का मलाल है, पर अब वह ख़ुश हैं कि उनकी बेटियों ने मुक्केबाज़ी में नाम कर उनके मलाल को ख़ुशी में तब्दील कर दिया. उनकी चौदह वर्षीय बेटी ज़ैनब फ़ातिमा को इस मुक्केबाज़ी से काफ़ी फ़ायदा भी मिला है. वह बताती है कि मुक्केबाज़ी से उसका आत्मविश्‍वास काफ़ी बढ़ गया है और अब वह कहीं भी अकेले आने-जाने में डरती नहीं है. उसके साथ ऐसी ही एक घटना हो भी चुकी है. उसने अपने घूंसे से एक मनचले लड़के के दांत तोड़कर उसको सबक़ सिखाया था और अन्य लड़कियों को मुक्केबाज़ी सीखने के लिए प्रेरित भी किया. उसके पिता मोहम्मद कैस, जो कि क्रेन चलाते हैं, अपनी बेटियों को स्कूल भेजने में हिचकिचा रहे थे. उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनकी बेटियां बुरक़ा छोड़कर बॉक्सिंग के ग्लब्स पहन लेंगी. अपनी बेटियों के इस साहसिक क़दम के बारे में उनका कहना है कि मेरी बेटियों की इच्छाशक्ति इतनी मज़बूत थी कि मुझे उनकी इच्छा के आगे झुकना पड़ा. आज वह सवाल करते हैं कि कितने पिता ऐसे हैं, जिनकी बेटियां राष्ट्रीय स्तर की बॉक्सिंग चैंपियन हैं. कोलकाता के इस इला़के में मुस्लिम लड़कियों के लिए मुक्केबाज़ी सीखना न केवल रूढ़िवादी समाज में मान्यता प्राप्त करने का साधन है, बल्कि यह उनका पैसा कमाने का ज़रिया भी है. इन चारों बहनों का कहना है कि हम सात भाई-बहन हैं और हमारे पिताजी की आय इतनी नहीं है कि हमारे परिवार का ख़र्च चल सके, लेकिन हम चारों बहनें मुक्केबाज़ी की प्रतियोगिताओं से इतना पैसा कमा ही लेती हैं कि हमारी पढ़ाई और अन्य ख़र्चे आसानी से पूरे हो जाते हैं. वहीं इन लड़कियों के परिवारवालों को भी समझ में आ रहा है कि मुक्केबाज़ी से लड़कियां स्वस्थ भी रहेंगी और सुरक्षित भी. पश्‍चिम बंगाल के पूर्व मुक्केबाज़ मेहराजुद्दीन अहमद ने महिलाओं के लिए 1998 में बॉक्सिंग स्कूल शुरू किया था. वह बताते हैं कि हमारे इला़के में अधिकांश लड़कियां जैसे-तैसे स्कूली शिक्षा पूरी करके विवाह कर लेती थीं, लेकिन अब उनके यहां ऐसी भी लड़कियां हैं, जो पदक जीतती हैं, तो उन्हें इज्ज़त तो मिलती ही है और कोई उनकी जल्दी शादी करने की बात तक नहीं करता. हालांकि इन महिला मुक्केबाज़ों के लिए यह सब इतना आसान नहीं है. इन्हें मुक्केबाज़ी के हिसाब से बहुत कम ख़ुराक मिलती है और स्कूल की पढ़ाई के अलावा घर के सारे काम को निबटाने के बाद तीन-चार घंटे अभ्यास भी करना पड़ता है. महिला बॉक्सर सिमी की मां मुस्तफ़ा बेगम कहती हैं कि बॉक्सिंग के  चलते मेरी बेटी के चेहरे पर दो बार चोट आई है और मैं डरती हूं कि कहीं यह चोट ज़िंदगी भर के लिए चेहरे पर दाग़ न बना जाए.

उम्मीदें जगने लगी हैं-पिंकी

ज्वाइंट किलर के नाम से मशहूर एशियन चैंपियनशिप की रजत पदक विजेता और वर्तमान की राष्ट्रीय चैंपियन पिंकी जांग़ड महिला मुक्केबाज़ी की नई सनसनी हैं और निकट भविष्य में महिला मुक्केबाज़ी को उनसे काफ़ी उम्मीदें हैं. रेलवे की ओर से खेलने वाली हरियाणा की पिंकी जांग़ड से ख़ास बातचीत…

महिला बॉक्सिंग के बारे में क्या राय है?

पहले जब अखिल, विजेंदर और अन्य पुरुष मुक्केबाज़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतते थे, तो हर जगह उनका नाम होता था और घर का हर बच्चा मुक्केबाज़ बनना चाहता था. ख़ासकर हरियाणा में तो मुक्केबाज़ी का कुछ ज़्यादा ही जुनून है, लेकिन लड़कियों के लिए कोई विकल्प नहीं था, पर अब जब से मैरीकॉम ने पांच बार विश्‍व चैंपियनशिप और लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीता है, तो लड़कियों को एक प्रेरणा मिल गई है और अब अच्छी-ख़ासी तादाद में लड़कियां मुक्केबाज़ी सीख रही हैं.

परिवारवालों से कितना सहयोग मिलता है लड़कियों को?

पिछले दो-तीन सालों से लड़कियों को बॉक्सिंग रिंग में भेजने के मामले में परिवार वाले काफ़ी उदार हुए हैं. पहले ऐसा नहीं था. मां-बाप लड़कियों को बॉक्सिंग सीखने के लिए भेजते ज़रूर थे, लेकिन एक-दो साल बाद वापस भी बुला लेते थे. लड़कियों को बाहर खेलने के लिए भेजने में डर लगता था, लेकिन अब यह डर दूर हो गया है और इसे दूर करने में मीडिया का अहम योगदान है.

आपको कितना सहयोग मिला परिवार से?

मैं अपने घर में सबसे छोटी थी, मुझसे बड़े मेरे दो भाई थे, जो कि पढ़ाई कर रहे थे. मैंने नौवीं कक्षा से खेलना शुरू किया. जब मैंने बॉक्सिंग सीखने की बात घर में बताई, तो परिवार वाले परेशान हो गए कि घर की अकेली बच्ची अकेले खेलने कैसे जाएगी और मुझे मना करने लगे कि भाइयों की तरह पढ़ाई पर ध्यान दो, लेकिन मैंने खेलना जारी रखा और बाद में जब मैं प्रतियोगिताएं जीतने में कामयाब होने लगी, तो परिवार वाले मान गए और अब तो वे न केवल मेरे साथ हर प्रतियोगिता में जाते हैं, बल्कि मुझे उत्साहित भी करते हैं.

 बॉक्सिंग में गुड है गु़डगांव

एनसीआर में शामिल हरियाणा गु़डगांव ज़िले में भले ही भिवानी जैसी बॉक्सिंग एकेडमी नहीं है, लेकिन बॉक्सिंग सीखने के जुनून के मामले में यहां की लड़कियां किसी से कम नहीं हैं. ख़ासकर यहां के ग्रामीण इला़के की लड़कियां मुक्केबाज़ी में ख़ासी रुचि दिखा रही हैं. यहां की लड़कियों ने राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में पांच से आठ स्वर्ण पदक जीतकर सनसनी मचा दी है. लड़कियों की इस कामयाबी का सारा श्रेय यहां की बॉक्सिंग एसोसिएशन को जाता है. इस एसोसिएशन ने गु़डगांव में मुक्केबाज़ी प्रशिक्षण के बारह केंद्र स्थापित किए हैं. इसके अलावा, ज़िला स्तर पर लीग का आयोजन कर नई प्रतिभाओं को न केवल तलाशा जाता है, बल्कि अनुभवी प्रतिभाओं को तराशा भी जाता है.

loading...