गांव की आज की व्यवस्था एवं उपाय योजना

गांव में किए जा सकने वाले काम ग्रामसभा करे, ऐसा संविधान स्वराज्य के बाद बनाया जाना चाहिए था. दरअसल जो काम ग्राम-स्तर पर नहीं हो सकता है, वह अवश्य ही शासन की ऊपर की इकाइयां करें. लेकिन ऊपर भी गांव के मतदाताओं का अंकुश होना चाहिए. बचे हुए सारे विषयों की सत्ता और इन कार्यकलापों के लिए लगने वाले आय के आवश्यक स्रोत संविधान की सूची में परिवर्तन कर ग्रामसभा को मिलने चाहिए थे. लेकिन आज संविधान में केंद्रीय सरकार के विषयों की सूची एवं राज्य सरकार के अख्तियार के विषयों की सूची है और एक समवर्ती सूची भी है, जिसमें निर्दिष्ट किए हुए विषयों पर केंद्र एवं राज्य दोनों क़ानून बना सकते हैं. ग्राम पंचायतों के विषयों को निर्धारित करने का काम राज्य सरकारों को सौंप दिया गया है. संविधान सभा में संविधान बनाने के अंतिम समय में यह ख्याल आया कि गांधीजी जिस ग्राम पंचायत और ग्राम राज्य का उल्लेख स्वतंत्र भारत के लिए बुनियाद के रूप में करते थे और जिसकी परंपराएं देश में अनादिकाल से हैं, वह बात छूट गई है. इतना महत्वपूर्ण बुनियादी विषय छूट गया, तो इसी विषय से पता चलता है कि संविधान के प्रमुख निर्माताओं के मन में गांवों और नगरों के लोगों की क्षमता के बारे में कितना विश्‍वास था. वातावरण भी ऐसा नहीं था और न ही गांवों में अपने अधिकारों के बारे में जागृति थी. तब संविधान निर्माण के अंत में नीति निर्देशक सिद्धांत की धारा (आर्टिकल) 40 में उसे स्थान दिया गया, जिसमें लिखा गया कि पंचायतों को राज्य उतनी सत्ता एवं अधिकार देगा, जिसमें कि वे स्वशासन की इकाई के रूप में काम कर सकें. वैसे, प्रत्यक्ष में राज्य सरकार ने राज्य की विकास योजना के एजेंट के रूप में काम करने के लिए कुछ अधिकार ज़रूर दिए हैं, लेकिन स्वशासन के लिए नहीं. अतः संविधान की यह अपेक्षा कि राज्य सरकार उसके अनुरूप क़ानून बनाएगी, सत्य नहीं साबित हुई. सभी जानते हैं कि नीति निर्देशक सिद्धांतों की अवहेलना होने पर न्यायपालिका के दरवाज़े नहीं खटखटाए जा सकते और सरकार को नीति निर्देशक सिद्धांतों के अनुसार आवश्यक क़ानून बनाने को मजबूर नहीं किया जा सकता.

ग्रामसभा सलाहकारी समिति

दरअसल, राज्य सरकारों ने वही किया, जो मतदाता पर भरोसा न रखने से और ख़ुद के बारे में अवास्तव विश्‍वास रखने से हो सकता है. स्थानीय स्वशासन का विषय संविधान के अनुसार राज्यों की सूची में है और सभी राज्य सरकारों ने पंचायत क़ानून बनाए हैं, लेकिन उनमें ग्रामसभा को सत्ता सौंपने का कोई प्रावधान नहीं है. ये क़ानून ग्राम पंचायत को विकास की इकाई के रूप में मानते हैं, स्वशासन की इकाई नहीं. ग्रामसभा की बैठक साल में दो या चार बार हो और ग्रामसभा पंचायत को सुझाव दे, सलाह दे या सिफ़ारिश करे, इतना मात्र उल्लेख इन क़ानूनों में है.

मुख्य विषयों की स्वायत्त सत्ता  पंचायत को भी नहीं

ज़मीन की व्यवस्था, जंगल की व्यवस्था, सिंचाई के छोटे स्रोत, ग्रामीण उद्योग, स्वास्थ्य आदि ग्राम से संबद्ध किसी विषय के बारे में पंचायत को स्वायत्त सत्ता नहीं है. जहां कहीं नाममात्र की सत्ता दी गई है, वहां उसे ज़िला परिषद एवं राज्य सरकार के साथ अनुदानों द्वारा ऐसी शर्तों से बांध दिया है कि सत्ता का उपयोग वे कर ही न सकें. अतः पंचायतों का अतिक्रम कुंठित हो गया है और वे केवल ऊपर की सरकारों की विकास योजनाओं के एजेंट मात्र रह गए हैं.

आर्थिक स्रोत पर्याप्त नहीं

पंचायत के आर्थिक स्रोत अत्यंत अपर्याप्त होने से वह हमेशा ऊपर की सरकारों के यानी नौकरशाही की कृपा पर निर्भर रहती है. ऐसी परिस्थिति में ग्रामसभाओं की बैठक में लोग नहीं आते हैं या पंचायतों के द्वारा अपना गांव आदर्श बनाने में पंच रुचि न लेते हों, तो क्या आश्‍चर्य? धरमपाल ने सिद्ध किया है कि अंग्रेजों के आगमन तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष करों से होने वाली आय का 5-10 प्रतिशत हिस्सा केंद्रीय शासन और प्रांतों का शासन गांव से ले जाता था और बचा हुआ 10 प्रतिशत हिस्सा ग्रामसभा या ग्रामसमाज के पास रहता था. अंग्रेजों ने इसका उल्टा किया और 5-10 प्रतिशत करों का हिस्सा गांववालों के पास छोड़कर बाक़ी सारी रक़म वे ऊपर ले गए. गोरे अंग्रेज जो करते थे, काले अंग्रेजों ने वही परिपाटी चालू रखी है. आय के सारे लचीले स्रोत केंद्र सरकार के पास में हैं. राज्य सरकारों को कम लचीले स्रोत दिए गए हैं और सबसे कम आय वाले एवं बेलोचदार स्रोत पंचायतों को दिए हैं.

हर गांव में ग्राम सभा नहीं

केवल इतना ही नहीं, हर एक गांव की ग्रामसभा या पंचायत को राज्य के पंचायत क़ानून में कोई स्थान नहीं है. एक से अधिक गांवों को मिलाकर उनकी पंचायत बनाई गई है. (केवल बड़े गांव में ही उस अकेले गांव की पंचायत है.) इन अनेक गांव की मिली हुई पंचायतों में प्रत्यक्ष लोकशाही डायरेक्ट या पार्टीसियेटरी डिमोक्रेसी-संभव नहीं है. सवाल यह उठता है कि दो से पांच किलोमीटर दूरी पर रहने वाले दो-चार गांव के लोग मिलकर गांव का शासन कैसे चलाएंगे? उड़ीसा में कुछ गांवों की ग्राम पंचायत में उपस्थित रहने के लिए तीसरे दिन तीन पहाड़ लांघकर पहुंचना होता है. अतः सौ से या दो सौ से कम जनसंख्या वाला बहुत छोटा गांव हो, तो अपवाद के तौर पर उन्हें अन्य गांवों के साथ मिलाया जा सकता है. अपवादस्वरूप ऐसे गांवों को छोड़कर बाक़ी सब गांवों को स्वशासन के अधिकार अकेले-अकेले गांव को दिए जाने चाहिए, एक दूसरे को मिलाकर नहीं. यह इसलिए भी ज़रूरी है कि गांव छोटे हों या बड़े, हर गांव में लोग एक दूसरे को जानते हैं और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उनका प्रत्यक्ष संबंध आता है, जो नज़दीक के गांव के साथ उतना गहरा आना संभव नहीं. उल्लेखनीय है कि प्रशासन और समाज की बुनियादी इकाई गांव है. यह ऐसी वास्तविक इकाई है, जहां लोग आमने-सामने रहकर जीवन जीते हैं. ज़िला, राज्य, राष्ट्र आदि ऊपर की इकाइयों की सीमाएं राजनीति के अनुसार बदलती रहती हैं. सबसे ऊपर की वास्तविक इकाई है दुनिया एवं सबसे नीचे की इकाई है गांव.

चुनाव राज्य सरकार की लहर पर

फिर ग्राम पंचायतों के चुनाव राज्य सरकार की इच्छा पर निर्भर है. अक्सर 10-12 साल चुनाव आगे धकेले जाते हैं. जो दल राज्य में शासन करते हैं, उन्हें शंका हो कि चुनाव कराने से उनका दल पंचायत में चुनकर नहीं आएगा, तो चुनाव स्थगित किए जाते हैं. दरअसल, राज्य शासन के अर्थात सत्ताधारी दल के हाथ का खिलौना पंचायतें बन गई हैं, इसलिए हर गांव में सर्वशक्तिमान ग्रामसभा हो और उस पर उस गांव के विकास एवं प्रशासन का विश्‍वासपूर्वक भार डाला जाए. इससे ग्राम भावना का उदय होगा और ग़लतियां करते करते वे अपने-अपने गांव को अच्छा बनाने की कोशिश करेंगे.

प्रस्तुत अंश ठाकुरदास बंग द्वारा लिखित एवं वर्ष 1983 में प्रकाशित पुस्तक-गांव की सत्ता गांव के हाथ में से उद्धृत है. यह पुस्तक हमें बताती है कि सत्ता-शासन व्यवस्था का विकेंद्रीकरण कैसे हो और उसे जनकल्याणकारी कैसे बनाया जा सकता है.

       -संपादक

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