हमें तीसरे विकल्प की ज़रूरत है

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बहुत समय के बाद प्रधानमंत्री ने एक राजनीतिक बयान दिया है. हालांकि, इस तरह के बयान के लिए संसद एक सही फोरम नहीं था. उन्होंने कहा कि भाजपा 2004 और 2009 की तरह इस बार भी सत्ता में नहीं आ सकेगी और कांग्रेस एक बार फिर से 2014 में सत्ता में वापस आ जाएगी. उनकी एक बात तो सही है कि इस वक्त भाजपा के हालात ठीक नहीं हैं. सरकार के घपलों-घोटालों का ख़ुलासा करने से भी किसी के लिए सत्ता में आ पाना संभव नहीं है. सही है, लेकिन मुद्दा स़िर्फ इतना भर नहीं है, बल्कि इससे ज़्यादा गंभीर सवाल और भी हैं. एक गंभीर बात तो यह है कि अगर भाजपा की हालत ठीक नहीं है, तो फिर कांग्रेस क्या है, कांग्रेस की हालत कैसी है और कांग्रेस अभी क्या कर रही है?

आज़ादी के बाद हमने कोशिश करके एक नया संविधान बनाया और जिसे 26 जनवरी, 1950 को अपनाया. इस संविधान में लोक कल्याणकारी राज्य की बात थी और जनता की भलाई को सबसे महत्वपूर्ण माना गया था, लेकिन यह कहते हुए मुझे काफी दु:ख और आश्‍चर्य भी हो रहा है कि सरकार के किसी भी बयान में, बजट में, नीति में और प्रधानमंत्री के बयान में यह आम आदमी, ग़रीब आदमी कहीं नहीं दिखता है. ग़रीब और भूमिहीन लोगों के लिए कुछ नहीं है. आख़िर उनकी चिंता कौन करेगा? निश्‍चित तौर पर भाजपा यह काम नहीं करेगी, क्योंकि वह व्यापारियों की पार्टी है.

अब कांग्रेस क्या कर रही है? वह अल्पसंख्यकों, दलितों, भूमिहीनों एवं श्रमिकों के लिए क्या कर रही है? दुर्भाग्यवश, 1991 के आर्थिक सुधार शुरू करने के बाद कांग्रेस भी एक अलग रास्ते पर चल पड़ी. प्रधानमंत्री ख़ुद इन आर्थिक सुधारों के आर्किटेक्ट रहे हैं. हालांकि, मैं निश्‍चित तौर पर कह सकता हूं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मनमोहन सिंह को यह मालूम हो गया होगा कि देश की समस्याओं का समाधान इन तरीक़ों से नहीं हो सकता और न हुआ. देश की समस्याएं कहीं ज़्यादा जटिल और बड़ी हैं. उत्तर भारत, दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत की समस्याएं अलग-अलग किस्म की हैं.

प्रधानमंत्री के बयान में यह आम आदमी, ग़रीब आदमी कहीं नहीं दिखता है. ग़रीब और भूमिहीन लोगों के लिए कुछ नहीं है. आख़िर उनकी चिंता कौन करेगा? निश्‍चित तौर पर भाजपा यह काम नहीं करेगी, क्योंकि वह व्यापारियों की पार्टी है.

जब तक समग्र विकास की बात नहीं की जाएगी, तब तक कुछ नहीं हो सकता. लेकिन कांग्रेस पार्टी इन सब पर ध्यान देने के बजाय उच्च वर्ग यानी इलीट क्लास पर ध्यान दे रही है. दलितों, ग़रीबों, अल्पसंख्यकों एवं भूमिहीनों के समग्र विकास के लिए हमें नई क्रांतिकारी नीतियां चाहिए, ताकि संविधान में वर्णित राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का सही मायनों में पालन हो सके. आज इन नीति-निदेशक तत्वों में से एक का भी पालन नहीं हो रहा है. हां, मनरेगा से ग़रीबों को रोज़गार के कुछ अवसर ज़रूर मिले, लेकिन यह बहुत कम है. व्यवस्था में लीकेज इतना ज़्यादा है कि हमें यह भी नहीं पता चलता कि ग़रीबों तक कितना पैसा पहुंच रहा है.

मैं समझता हूं कि अब वक्त आ गया है कि प्रधानमंत्री जी राजनीतिक बयान देने की जगह उन समस्याओं की ओर ध्यान दें, जो आज देश के सामने हैं. प्रधानमंत्री जी को एक ऐसा पॉलिसी फ्रेमवर्क तैयार करना चाहिए, ताकि 2014 में सत्ता में आने वाला कोई भी दल जिस पर काम करके इस देश की समस्याओं का समाधान निकाल सके. सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार के इस दौर में हमें तीसरे विकल्प की ज़रूरत है. नरेंद्र मोदी किस्म की राजनीति कोई उपाय नहीं है. जिस तरी़के से कांग्रेस का शासन चल रहा है, वह भी विकल्प नहीं है.

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