प्रत्यक्ष लोकतंत्र ?

राष्ट्रीय विकास परिषद, जो अब एक नो डिबेट क्लब, यानी बहसविहीन क्लब के  तौर पर सिमट कर रह गया है, ने आज़ादी के  शुरुआती दशकों में योजना को सहभागी प्रक्रिया बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

योजना को लेकर जवाहर लाल नेहरू की भूमिका के  बारे में जो लोकप्रिय धारणा है, उसके विपरीत एक तथ्य और भी है, और वह यह कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष के  रूप में स्वतंत्र भारत में योजना के  उद्देश्य पर जोर दिया था. 19 से 21 फरवरी, 1938 तक हरिपुरा (गुजरात) में  संपन्न कांग्रेस के  सत्र में अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा था कि मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि ग़रीबी हटाने, निरक्षरता, बीमारियों के उन्मूलन, वैज्ञानिक ढंग से उत्पादन और वितरण से संबंधित हमारी राष्ट्रीय समस्याओं से प्रभावी तरी़के से निपटने के लिए समाजवादी रास्ता अपनाना ही सही है. उन्होंने कहा था कि भविष्य की हमारी राष्ट्रीय सरकार को सबसे पहले पुनर्निर्माण की एक व्यापक योजना बनाने के  लिए एक आयोग गठित करना होगा. अक्टूबर 1938 में उन्होंने नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस प्लानिंग कमेटी की स्थापना की. हालांकि यह कमेटी 1939 में द्वितीय विश्‍व युद्ध की शुरुआत और कांग्रेस पार्टी द्वारा अगस्त 1942 के  भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के  कारण अपना काम शुरू नहीं कर पाई. इस दौरान कांग्रेस के ज़्यादातर नेता और सक्रिय सदस्य जेल में थे.

1944 से 1946 के  दौरान ब्रिटिश सरकार ने एक प्लानिंग बोर्ड की स्थापना की थी. उद्योगपतियों और अर्थशास्त्रियों ने स्वतंत्र रूप से 1944 में कम से कम तीन विकास योजनाएं तैयार कीं. हालांकि भारत की स्वतंत्रता के  बाद प्रधानमंत्री नेहरू को यह ज़िम्मेदारी दी गई थी कि योजना के  लिए कैसा मॉडल अपनाया जाएगा. 15 मार्च, 1950 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने योजना आयोग की स्थापना के लिए एक प्रस्ताव पारित किया. पहली पंचवर्षीय योजना के मसौदे में योजना आयोग के सुझाव में राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) के  गठन की बात इसलिए कही गई, ताकि एक ऐसा मंच बने, जहां समय-समय पर भारत के  प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री मिल कर योजना के  क्रियान्वयन और इसके विभिन्न पहलुओं की समीक्षा कर सके.

यूनियन कैबिनेट ने फिर एक प्रस्ताव 6 अगस्त, 1952 को पारित कर के  एनडीसी का गठन किया. एनडीसी को निम्न कार्य करने थे:

(1) समय-समय पर राष्ट्रीय योजना के  कामकाज की समीक्षा करना.

(2) राष्ट्रीय विकास को प्रभावित करने वाले सामाजिक और आर्थिक नीतियों से संबंधित महत्वपूर्ण सवालों पर विचार करना.

(3) राष्ट्रीय योजना में लक्षित उद्देश्य को पाने के  लिए उपायों की सिफारिश करना, लोगों की सक्रिय भागीदारी और सहयोग को सुनिश्‍चित करना, प्रशासनिक सेवाओं की दक्षता में सुधार के  उपाय सुझाना, कम उन्नत क्षेत्रों और समुदाय के विकास को सुनिश्‍चित करना और राष्ट्रीय विकास के  लिए संसाधनों का निर्माण करना.

एनडीसी में प्रधानमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री और योजना आयोग के  सदस्य होते हैं, लेकिन दरअसल इसकी बैठक में अन्य लोग भी हिस्सा लेते हैं, खास कर, सरकार में शामिल मंत्री इसमें शामिल होते हैं, जिन्हें विशेषज्ञों द्वारा सलाह देने के  लिए बुलाया जाता है. ध्यान देने की बात यह है कि योजना आयोग और एनडीसी कोई संवैधानिक संस्था नहीं है और न ही इसे संसद से पास किसी क़ानून के तहत बनाया गया है.

प्रशासनिक सुधार आयोग

प्रशासनिक सुधार आयोग (एआरसी) 5 जनवरी, 1966 को भारत सरकार द्वारा स्थापित किया गया था. एआरसी को भारत में सार्वजनिक प्रशासन प्रणाली की समीक्षा करके  ऐसे सुझाव देने थे, जिससे कि इसे बेहतर बनाया जा सके. शुरू में मोरारजी देसाई ने एआरसी की अध्यक्षता की, जब वे 1967 में उप प्रधानमंत्री थे. फिर सांसद के. हनुमंथैय्या एआरसी के अध्यक्ष बने. एआरसी ने कांग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद आर आर मोरारका की अध्यक्षता में एक अध्ययन दल का गठन किया. इस दल को सभी स्तरों पर योजना बनाने की मशीनरी का अध्ययन करना था. इसके तहत केंद्र और राज्य स्तर पर योजना संगठन और प्रक्रियाओं का अध्ययन, योजना आयोग एवं राज्यों की प्लानिंग एजेंसी व अन्य एजेंसी के  बीच संबंध का अध्ययन करना था. मोरारका स्टडी टीम ने प्रमुख व्यक्तियों, जिनमें पार्टी नेताओं, मुख्यमंत्री और औद्योगिक जगत के  लोग थे, के  साथ 38 बैठकें  कीं. टीम ने योजना प्रक्रियाओं का गहन परीक्षण किया और दिसंबर 1967 में अपनी अंतिम रिपोर्ट दी.

अध्ययन दल की रिपोर्ट ने योजना के निर्माण में एनडीसी की भूमिका के  महत्व को स्वीकार किया. रिपोर्ट के  पैरा 1.72 में लिखा हुआ है कि एक योजना को तैयार करने की प्रक्रिया में प्रमुख कमी यह है कि योजना के  कार्यक्रमों और नीतियों पर सोचने के  दौरान केंद्र और राज्यों के योजनाकारों के बीच संचार/संवाद बहुत ही कम होता है. एनडीसी की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में इस अध्ययन टीम की रिपोर्ट में कहा गया कि हम पहले ही हमारी अंतरिम रिपोर्ट में सिफारिश दे चुके हैं कि राष्ट्रीय विकास परिषद को लगातार और व्यवस्थित रूप से काम करना चाहिए. आगे कहा गया है कि एनडीसी और उसकी उप-समितियों का इस्तेमाल संचार के  साधन के  रूप में और राज्यों और केंद्र के बीच परामर्शदात्री संस्था के  रूप में नियमित तौर पर किया जाना चाहिए. यहां इस बात का उल्लेख करना ज़रूरी हो जाता है कि कोई सार्थक परामर्श संभव नहीं है, अगर चर्चा के  लिए आवश्यक कग़ज़ात अंतिम मिनट में प्रतिभागियों को उपलब्ध कराया जाता है. राज्यों के  कई राजनीतिक और सरकारी लोगों ने एनडीसी की प्रभावी भूमिका के  कम होने के  पीछे इसे एक वजह बताया है. (पैरा 1.73).

मोरारका अध्ययन दल द्वारा दी गई सबसे महत्वपूर्ण सिफारिशें और सुझावों को अलग नहीं रखा जा सकता है. टीम ने विशेष रूप से सुझाव दिया है कि राष्ट्रीय विकास परिषद को अपने अतीत से उलट लगातार और व्यवस्थित रूप से काम करना चाहिए, क्योंकि आज इसकी ज़्यादा ज़रूरत है. एआरसी ने केंद्र-राज्य संबंध पर एक अध्ययन दल का गठन एमसी सेतलवाड की अध्यक्षता में गठित की. सेतलवाड एक प्रख्यात न्यायविद् थे, जो भारत के  पहले ऐसे अटॉर्नी जनरल बने, जिनका कार्यकाल सबसे लंबा (1950-1963) था. अध्ययन दल की रिपोर्ट के परिचय में ही केंद्र-राज्य संबंधों का योजना आयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद के  उपकरणों के  उपयोग के  संदर्भ में ज़बरदस्त विश्‍लेषण प्रस्तुत किया गया है. रिपोर्ट का महत्वपूर्ण अंश-केंद्र और राज्यों के  बीच का संबंध व्यापक है. यह प्रशासन के पूरे क्षेत्र को कवर तो करता है लेकिन इतने तक ही सीमित नहीं रहता है, बल्कि यह राजनीति तक पहुंच जाता है. राजनीति और प्रशासन अलग नहीं है. असल में, प्रशासन का अर्थ है कि वह राजनीतिक तौर पर शुरू किए गए कार्यक्रम और नीतियों को प्रभावी बनाएगा, लेकिन राजनीति इससे अलग है, क्योंकि राजनीति सत्ता से भी जुड़ी है. यह प्रशासन के  वैध दायरे से परे फैला है. यानी अक्सर केंद्र-राज्य संबंध का अर्थ केंद्र व राज्य की सत्ता में बैठे पार्टियों के  कार्य, उनके  बीच बातचीत और रुख़ पर भी निर्भर करता है. (पी-1).

आगे रिपोर्ट में लिखा है कि इस अर्थ में केंद्र-राज्य संबंध में एक ऐसा राजनीतिक गठजोड़ हो सकता है, जिसकी बारीकियां संविधान से नहीं निकलतीं. यह एक पहलू है, जो एक गंभीर रूप ग्रहण कर चुका है, क्योंकि पिछले आम चुनाव में कई राज्यों से वह पार्टी ग़ायब हो गई, जो केंद्र में सत्ता में है. भारतीय परिदृश्य में राजनीति ने राजनीतिक नज़रिए के विकास में अहम भूमिका निभाई है. जहां एक ही पार्टी केंद्र व राज्य में है, वहां केंद्र-राज्य संबंधों के  संचालन के  लिए विकल्प और संविधानेत्तर उपाय(चैनल) उपलब्ध हो जाते हैं. व्यवहार में यह चैनल कांग्रेस पार्टी के  शासन के  दौरान बहुत सक्रिय रहा है और केंद्र-राज्य संबंधों के  अर्थ को शासित भी करता रहा है. केंद्र और राज्य के नेतृत्व से जुड़े राजनीतिक नेटवर्क का इस्तेमाल संघर्ष को हल करने, तनाव कम करने के  लिए या असुविधाजनक मुद्दों पर विचार स्थगित करने के  लिए किया गया था. इस प्रक्रिया में संविधान का उल्लंघन नहीं हुआ था. कम से कम जानबूझकर तो नहीं ही. हां, अक्सर इसे नज़रअंदाज़ ज़रूर किया गया. दरअसल, हुआ यह कि संवैधानिक प्रावधान के  नज़रअंदाज़ किए जाने के कारण विवादों का निपटारा संवैधानिक तंत्र के बजाए पार्टी में ही होने लगे थे. और इस तरह पार्टी प्रतिष्ठा और पार्टी अनुशासन ने सरकारी या संवैधानिक समाधान की जगह ले ली. (पी-1, पी-2).

संवैधानिक दृष्टिकोण से यह स्थिति असामान्य थी. राज्यों में ग़ैर-कांग्रेसी सरकारों के उद्भव ने समस्याओं को आगे ला दिया. ग़ौरतलब है कि संविधान स्पष्ट रूप से एक बहुदलीय स्थिति में काम करने के  लिए होती है, जिसे केंद्र-राज्य के  लिए एक समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए,  बल्कि उनके  परस्पर क्रिया के  लिए एक सामान्य पृष्ठभूमि के  रूप में देखा जाना चाहिए.(पी-2).

समुचित तैयारी का अभाव और एनडीसी बैठकों में मुख्य मंत्रियों के  लिए आवंटित समय की कमी के  बारे में अध्ययन दल ने कहा कि एनडीसी योजना आयोग को संकेत देता है कि राज्यों के लिए केंद्र जो प्राथमिकताएं निर्धारित करता है, उसे वेे राज्य किस हद तक स्वीकार करने को तैयार हैं. इसलिए परिषद उन नियोजन प्रक्रिया पर प्रभाव डालता है, जिनका सही तरी़के से योजना दस्तावेजों में ख़ुलासा नहीं किया जा सकता. परिषद एक या दो दिन के लिए मिलता है (बैठक होती है) और  एक नियम के  तहत इससे ज़्यादा समय के लिए बैठक नहीं हो सकती, क्योंकि मुख्यमंत्री अपने कामों में ज़्यादा व्यस्त होते हैं. इस छोटी अवधि में इस बैठक में महत्वपूर्ण और जटिल मुद्दे सामने आते हैं. इस तरह मुख्यमंत्रियों को शायद ही इतना समय मिल पाता है कि वे दस्तावेजों का उचित तरी़के से अध्ययन कर सकें और प्रत्येक समस्या के  विभिन्न पहलू को समझ सके, उस पर चर्चा कर
सकें. (पैरा 6.10).

(अगले अंक में पढ़ें, एनडीसी की भूमिका के बारे में और साथ ही यह भी पढ़िए कि अप्रैल 1984 से ले कर 31 अगस्त 1987 के बीच एनडीसी की कोई बैठक आयोजित नहीं हुई. क्यों?)

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