गोरे अंग्रेज गए, काले आ गए?

किसानो  का शोषण शुरू हुआ. साहूकारों के हाथ में बड़े-बड़े खेतों के चक आए. उधर कई किसान भूमिहीन हो जाने और किसान-मज़दूरों के ग्रामीण धंधे टूट जाने से इन साहूकारों या इंग्लैंड की राजस्व-नीति से पैदा हुए (नवनिर्मित) ज़मींदारों के खेतों में काम करने लगे. बचे हुए किसान-मज़दूर भारत के मुंबई जैसे नए औद्योगिक नगरों, असम के चाय-बगानों और सुदूर मॉरिशस या दक्षिण अफ्रीका के देशों में कुली बनकर जाने लगे. दरअसल, इस तरह सस्ता अनाज, सस्ता कच्चा माल और सस्ते मज़दूर की उपलब्धि इस नई औद्योगिक नीति के कारण सुलभ हो पाई.

गांवों के शोषण की दो सौ साल पुरानी नीति जारी रहे. गोरे अंग्रेज गए, लेकिन काले अंग्रेजों ने वही किया, जो गोरे अंग्रेज करते थे. 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना बनी और उसमें विचार रखा गया कि देश के विकास के लिए यह ज़रूरी है कि कृषि वस्तु मूल्य नीचे के स्तर पर स्थिर रखे जाने चाहिए, यानी गांधी जी ने अंग्रेजों के शोषण की जो बात कही थी और जिस शोषण को मिटाने के लिए हम स्वराज की लड़ाई लड़ रहे थे, वह शोषण फिर से जारी रहा.

दरअसल, यूरोप के अन्य देशों ने भी इसी शोषणकारी साम्राज्यवादी नीति को अपनाया. इतना ही नहीं, 1917 में क्रांति हो जाने पर रूस के सामने भी औद्योगीकरण के लिए पूंजी निर्माण का प्रश्‍न उठा. वहां के कम्युनिस्ट शासकों को भी किसानों पर ज़बरदस्ती करनी पड़ी और इसीलिए हज़ारों किसानों को मार डाला गया, लाखों को ज़बरदस्ती साइबेरिया के कॉन्सट्रेशन कैंप में भेजकर, उनके खेत छीनकर ज़बरदस्ती सहकारी बड़े-बड़े फार्म बनाए गए. इसके बाद अनाज की क़ीमतें भी घटाई गईं और कच्चा माल सस्ते में मिले, इसकी व्यवस्था की गई. कारखानों के लिए लगने वाली पूंजी का निर्माण कृषकों के शोषण से किया गया. अमेरिका के पास ढाई गुना ज़मीन है और जनसंख्या आधी से भी कम है, लेकिन उसे भी आधुनिक उद्योग में लगने वाली पूंजी, सस्ता कच्चा माल पाने और पक्का माल बेचने के लिए अंतत: विशाल मंडियों की ज़रूरत महसूस हुई. अत: अमेरिका ने दक्षिणी अमेरिका के देशों पर अपना आर्थिक साम्राज्य लादा. प्रख्यात समाजवादी रोजा लक्सेम्बुर्ग ने 20वीं सदी के प्रारंभ में यह भविष्यवाणी की थी कि जिस देश के पास गुलाम देश या उपनिवेश नहीं रहेंगे, वह देश अपने ही राष्ट्र के अंदर गांव के रूप में उपनिवेश पैदा करेगा, यानी अपने देश के अंदर गांवों के रूप में नव-उपनिवेश पैदा किए जाएंगे. अंतत: वैसा ही हुआ.

दुनिया में आज ऐसा कोई देश नहीं है, जिसने औद्योगीकरण से निर्मित पूंजी के प्रश्‍न का, अपने देश के ग्रामीणों के शोषण या विदेशों के शोषण से भिन्न, दूसरा किसी प्रकार का हल निकाला हो. मार्क्स के ख्याल में भी औद्योगिक मज़दूरों के शोषण का प्रश्‍न आया था. यूरोप में ग्राहकों के शोषण का प्रश्‍न भी अन्यों के ख्याल में आया. इस पर समाजवाद एवं सहकारिता का हल निकाला गया, लेकिन ग्रामीणों या किसान-मज़दूरों के शोषण का सवाल उनके ख्याल में नहीं आया. अत: शोषण-मुक्त औद्योगीकरण की रीति क्या हो और पूंजी निर्माण के प्रश्‍न को हम कैसे हल कर सकते हैं, इसका उत्तर पूंजीवादी, समाजवादी, सहकारी या कल्याणकारी शासन-पद्धति में से किसी के पास नहीं है.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने महात्मा एवं राष्ट्रपिता बनाए जाने के अनेक वर्षों पूर्व इस शोषण को देखा और समझा था. साथ ही इस औद्योगीकरण से पैदा होने वाली बेरोज़गारी, विषमता एवं इससे निर्माण होने वाली भोगवादी संस्कृति यूरोप, अफ्रीका और भारत में अनुभव भी की थी. इसलिए उन्होंने इसका हल गांवों के कृषि औद्योगिक समाज के रूप में बताया. उत्पादन के औज़ारों में सुधार अवश्य हो, लेकिन उससे बेरोज़गारी न फैले और औज़ार को भारी- भरकम पूंजी न लगे. इस तरह से सुधार किया जाए, जिससे कि औज़ार उत्पादक के हाथ में ही रहे. उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच मधुर संबंध हों. जहां कच्चा माल पैदा होता हो, वहीं गांवों में उद्योग चलें आदि, औद्योगीकरण की दिशाएं उन्होंने बताईं. ऊपर की मर्यादाओं के अंदर चरखे में संशोधन सुझाने वाले को उन्होंने एक लाख रुपये का इनाम घोषित किया. किसान को अपना पेट काटकर, यानी भूखे रहकर बाज़ार में अनाज, दूध, घी, सब्जी एवं फल पैसों के लिए बेचने पड़े और उन पैसों से वह सरकार के भारी-भरकम कर और टाटा-बिड़ला का विलास चलाता रहे, इस पद्धति का उन्होंने जोरदार विरोध किया. गांधी की औद्योगीकरण की पद्धति का बाद में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री शुमाखर ने मध्यम या उचित तंत्र विद्या, यह नामकरण किया. इस पद्धति में बहुत बड़ी पूंजी की ज़रूरत नहीं है. इसलिए किसान का माल सस्ता ख़रीदने और उसे पक्का माल महंगा बेचने की बाध्यता नहीं है. पैसा गांवों में ही रहेगा और इसका उपयोग नए उद्योगों या औजार सुधार में लगने वाली पूंजी में ही करके गांवों में उद्योग चलेंगे.

1947 में भारत आज़ाद ज़रूर हुआ, लेकिन भारत के नेताओं ने गांधी जी के इस शोषण-मुक्त औद्योगीकरण के विचार पर ख्याल ही नहीं किया. हमारे नेता पश्‍चिम के विचारों में पले हुए थे. चूंकि उनके हृदय में गांधी और दिमाग में अंग्रेज था, इसलिए नव-स्वतंत्र भारत जल्द से जल्द पश्‍चिम की नकल पर अपने देश में बड़े-बड़े यंत्रों द्वारा नगरों में सब चीजें कैसे बनाए, इस पर चिंतन शुरू हुआ. इसके लिए लगने वाली विशाल पूंजी कहां से आए? देश के पश्‍चिमी विचारों से अनुप्राणित अर्थशास्त्रियों ने शासन को सलाह दी कि किसान का माल सस्ता खरीदा जाए. गांवों के शोषण की दो सौ साल पुरानी नीति जारी रहे. गोरे अंग्रेज गए, लेकिन काले अंग्रेजों ने वही किया, जो गोरे अंग्रेज करते थे. 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना बनी और उसमें विचार रखा गया कि देश के विकास के लिए यह ज़रूरी है कि कृषि वस्तु मूल्य नीचे के स्तर पर स्थिर रखे जाने चाहिए, यानी गांधी जी ने अंग्रेजों के शोषण की जो बात कही थी और जिस शोषण को मिटाने के लिए हम स्वराज की लड़ाई लड़ रहे थे, वह शोषण फिर से जारी रहा. अंग्रेजों के इस शोषण के विरुद्ध गांधी जी ने जो आंदोलन किया, उसका प्रतीक चरखा ज़रूर बन गया था, लेकिन वह सब बात आज़ादी के बाद पुरानी हो गई. विकास यानी नगरों में बड़े-बड़े कल-कारखाने, यह समीकरण बन गया.