21वी सदी में भी अन्धविश्वास ! : कब जागरूक होगा हमारा समाज ?

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पिछले दिनों झारखंड के धनबाद में बलि के लिए दो बच्चियों के अपहरण का मामला सामने आया. आरोप है कि आरपीएफ हवलदार मुनीलाल ने बलि के लिए दो सगी बहनों का अपहरण किया. वह बच्चियों के हाथ-पैर बांधकर काली की पूजा कर रहा था. कमरे में तंत्र-मंत्र की ध्वनि गूंज रही थी और बच्चियां खौफ  से कांप रही थीं. वह बच्चियों की बलि दे पाता, इससे पहले ही बच्चियों को तलाश करते हुए उनके परिवारीजन मौ़के पर पहुंच गए. बलि में नाकाम रहने पर ग़ुस्साए हवलदार ने उन पर हमला कर दिया, जिससे बच्चियों के दादा राजनाथ यादव और पिता उमेश यादव घायल हो गए, लेकिन परिवारीजनों ने हवलदार को पक़ड कर पुलिस के हवाले कर दिया. हवलदार के घर से 11 नरकंकाल बरामद हुए हैं, जिनमें खोप़िडयों और हाथ की हड्डियों की भरमार थी. बच्चियों का कहना है कि हवलदार ने उनके हाथ-पैर बांधे, उन्हें बिस्कुट खिलाए और फूल माला पहनाई. ग़ौरतलब है कि तक़रीबन 35 साल पहले बिहार के सीवान ज़िले के निवासी मुनीलाल के एक बेटे और एक बेटी की मौत हो गई थी. इससे वह बहुत परेशान रहने लगा था. उसी दौरान एक तांत्रिक से उसकी मुलाक़ात हुई. तांत्रिक ने उसे बताया कि उस पर भूत-प्रेत की छाया है. तांत्रिक के कहने पर उसने तंत्र विद्या सीखने का फैसला किया और कोलकाता चला गया.वहां उसे आरपीएफ में नौकरी मिल गई. मुनीलाल का कहना है कि वह काली का भक्त है और पिछले 30 सालों से काली की पूजा कर रहा है. दो साल पहले उसकी पत्नी की मौत हो गई. वह तीन बेटियों और दो बेटों के साथ रहता है. उसके बच्चों का कहना है कि वे बचपन से ही अपने पिता को काली की साधना करते हुए देख रहे हैं.

दरअसल, नरबलि का इतिहास बहुत पुराना है. दुनिया की विभिन्न पौराणिक संस्कृतियों में नरबलि का प्रचलन रहा है, लेकिन व़क्त के साथ यह कुप्रथा ख़त्म होती चली गई. धार्मिक अनुष्ठानों में नरबलि की जगह पशुओं की बलि दी जाने लगी. आज नरबलि एक ब़डा अपराध है, जिसकी चहुंओर निंदा की जाती है, लेकिन दु:ख की बात तो यह है कि आज भी नरबलि के मामले सामने आ रहे हैं. आज के आधुनिक युग में जहां इंसान अंतरिक्ष की सैर कर रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग प्राचीन काल की बर्बरता से अभी तक बाहर नहीं निकल पाए हैं. नरबलि के मामले यह बताने के लिए काफ़ी हैं कि आज भी अंधविश्‍वास में डूबे लोग कितनी बर्बरता से किसी की जान ले लेते हैं. हैरानी की बात तो यह भी है कि जिन लोगों पर जनता की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी होती है, वे भी ऐसे अमानवीय कार्य कर बैठते हैं कि जिसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि धनबाद में तांत्रिक के चंगुल से छु़डाई गई बच्चियां ख़ुशनसीब थीं, लेकिन कितने ही बच्चे ऐसे होते हैं, जिनकी बेरहमी से बलि च़ढा दी जाती है और उनके घरवाले रोते-बिलखते रह जाते हैं. बीती 25 अप्रैल को हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िले के निरमंड में चार साल के मासूम की बलि दे दी गई. सुमित नामक यह बच्चा तीन दिनों से ग़ायब था और बाद में उसका शव एक बोरी में मिला. जब बोरी खोली गई, तो बच्चे के माथे पर काला तिलक, मुंह और बाज़ू काले किए हुए थे. ये सारे संकेत इस ओर इशारा कर रहे थे कि किसी तांत्रिक अनुष्ठान के लिए बच्चे की बलि दी गई है. बीते 20 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के चंदौली ज़िले के गांव हिनौता में काली मंदिर के पास एक खेत मेंअज्ञात मासूम बच्चे का कटा हुआ सिर मिला. ग्रामीणों को पास के एक तालाब के किनारे ख़ून के छींटों के निशान और ज़मीन पर बलि के व़क्त लिखे जाने वाले मंत्र दिखे. ग्रामीणों का मानना है कि नवरात्रि में सिद्धि प्राप्त करने के उद्देश्य से ही किसी ने मासूम की बलि चढ़ाने के बाद उसका कटा सिर खेत में दबा दिया होगा. इससे पहले बीते 20 मार्च को राजधानी दिल्ली के भलस्वा इला़के में एक बच्चे की सिरकटी लाश मिली. पुलिस को शक है कि बच्चे की हत्या बलि के लिए की गई है. पिछले साल 20 फ़रवरी को छत्तीसग़ढ के रायग़ढ ज़िले के गांव बरपाली के सोमनाथ राठिया के दस साल के बेटे प्रवीण राठिया की सिरकटी लाश पूंजीपथरा के छर्राटांगर के जंगल में मिली. वह 15 दिनों से ग़ायब था. परिवारीजनों ने गांव के ही एक तांत्रिक पर बच्चे की बलि च़ढाने का आरोप लगाया था, जो जांच में सही निकला. पुलिस ने भी लाश मिलने के दो दिनों बाद बच्चे की बलि देने की पुष्टि कर दी. पूछताछ में तांत्रिक ने नरबलि देने की बात स्वीकार कर ली. उसके घर से एक तलवार, दो त्रिशूल और एक सब्बल बरामद किया गया. तांत्रिक ने बच्चे की बलि देने में इनका इस्तेमाल किया था.

देश का सर्वोच्च न्यायालय नरबलि के मामले में बेहद सख्त है. अदालत ने उन लोगों के लिए सज़ा-ए-मौत और सख्त सज़ा के आदेश जारी किए हैं, जो मानव बलि देते हुए पकड़े जाएंगे या फिर इसमें किसी भी प्रकार से लिप्त होंगे. नरबलि के कई मामलों में दोषियों को सख्त सज़ाएं भी हुई हैं, लेकिन इसके बावजूद नरबलि के मामले सामने आ ही जाते हैं. बीते 13 अप्रैल को छत्तीसग़ढ के रायग़ढ के 11 साल के बच्चे प्रवीण राठिया की बलि देने के आरोप में ज़िला अदालत ने दिलीप राठिया नामक व्यक्ति को फांसी की सज़ा सुनाई. द्वितीय अपर ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश ए के साहू ने फैसला सुनाते हुए इसे दुर्लभतम से दुर्लभ मामला माना. दिलीप पर धारा 201 के तहत 7 साल की सज़ा और 15 हज़ार रुपये जुर्माना लगाया है, जबकि धारा 302 के तहत मौत की सज़ा सुनाई गई है. मामले के मुताबिक़, दिलीप ने 22 फ़रवरी, 2012 को गांव बड़गांव में प्रवीण का गला काटकर बलि चढ़ा दी थी. फिर उसके सिर को अपने आंगन स्थित पूजा कक्ष में गाड़ दिया था. संदिग्ध गतिविधियों के कारण उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने आरोपी के घर से बलि में इस्तेमाल की गई तलवार और त्रिशूल को बरामद किया था. चूंकि हादसे के पखवाड़े बाद बच्चे की खोपड़ी मिली थी, लिहाज़ा बच्चे की शिनाख्त के लिए डीएनए टेस्ट कराया गया था. इसी तरह पिछले साल मार्च में झारखंड के कोडरमा ज़िले की एक निचली अदालत ने भी गांव पूरनाडीह के छह साल के बच्चे अमन की बलि के मामले में सभी नौ अभियुक्तों को उम्ऱकैद की सज़ा सुनाई और उन पर जुर्माना भी लगाया. ग़ौरतलब है कि 20 मार्च, 2010 को गांव पूरनाडीह के छह साल के अमन के ग़ायब होने के मामले में अज्ञात लोगों केख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया था. बाद में 24 मार्च, 2010 को बच्चे का शव बरामद किया गया. दरअसल, गांव के देवी मंडप में बच्चे की बलि दी गई थी. अभियुक्तों ने स्वीकार किया था कि उन्होंने 20 मार्च को बच्चे की बलि दी थी.

क़ाबिले-ग़ौर है कि प्राचीनकाल में दुनिया भर की विभिन्न संस्कृतियों में नरबलि का प्रचलन था. लोगों का मानना था कि बलि देने से उनका देवता उनसे ख़ुश होगा और उनकी मनोकामना पूरी होगी. महाभारत में भी नरबलि का ज़िक्र आता है. इसके मुताबिक़, राक्षसी हिडिंबा अपने भाई हिडिंब के साथ वन में रहती थी. वह काली की भक्तथी और उसे हर रोज़ पूजा के दौरान एक मानव की बलि देनी होती थी. एक दिन हिडिंब मानव बलि के लिए भीम को पकड़ लाया, लेकिन हिडिंबा भीम को देखकर उस पर मोहित हो गई. इसलिए उसने भीम को बचाने की कोशिश की, लेकिन हिडिंब ने भीम को ललकारा और युद्ध में उसकी मौत हो गई. बाद में हिडिंबा ने भीम से गंधर्व विवाह कर लिया. उनका एक पुत्र हुआ, जिसका नाम घटोत्कच रखा गया. प्राचीन भारत में भी नरबलि से जुड़े कई क़िस्से हैं.कर्नाटक के कुकनूर क़स्बे में स्थित एक प्राचीन काली मंदिर में नरबलि दी जाती थी.

चीन की लोककथाओं में भी नरबलि की बातें कही गई हैं. एक पौराणिक लोककथा के मुताबिक़, चीन की महान दीवार के नीचे हज़ारों लोगों को ज़िंदा दफ़न कर दिया गया था. चीन में झोउ राजवंशों के दौरान प्राचीन चीनी नदी के देवताओं को नरबलि दी जाती थी. कहा जाता है कि दुष्ट प्रवृत्ति के पुरोहित धन के लालच में नदी के देवताओं को बलि दिया करते थे. क्विन राजवंश ने 384 ईसा पूर्व इस कुप्रभा को ख़त्म कर दिया, लेकिन मिंग राजवंश के सम्राट होंग्वु ने 1395 में इसे फिर से शुरू कर दिया. जब उसके बेटे की मौत हुई, तो उसके साथ उसकी क़रीबी दो महिलाओं को भी राजकुमार के साथ ज़िंदा दफ़न कर दिया गया. 1464 में सम्राट ज़्हेंगटोंग ने मिंग शासकों और राजकुमारों के लिए इसे वर्जित घोषित कर दिया. किंग राजवंश के दौरान 1673 में सम्राट कांगज़ी ने इस पर रोक लगा दी. मिस्र में भी राजा की मौत के बाद उसके सेवकों को शव के साथ ज़िंदा दफ़न कर दिया जाता था. तर्क था कि क़ब्र में राजा को सेवकों की ज़रूरत प़डेगी. जापान के मानव स्तंभ हीतोबशीरा के बारे में भी यही कहा जाता है कि इसके निर्माण के व़क्त कुंवारी कन्या को इसके नीचे दफ़न किया गया था, ताकि प्राकृतिक आपदाओं और दुश्मनों से इसकी रक्षा की जा सके. नरबलि के मामले में एज़्टेक लोग काफ़ी बदनाम रहे हैं. वे अपने देवता को नरबलि देते थे, ताकि उसे रक्त लगातार मिलता रहे. उनका मानना था कि उनके देवता हर रोज़ सूरज के साथ युद्ध में लीन रहते हैं. यह दुनिया हर 52 साल चक्र में ख़त्म हो सकती है और नरबलि इसे रोक सकती है. इसीलिए 1487 में मैक्सिको टेनोक्टिटलान के महान पिरामिड को पवित्र करने के लिए हज़ारों कैदियों की बलि दे दी गई.

रोमन में भी राजा की मौत के साथ उनके सेवकों को शव के साथ ज़िंदा आग के हवाले कर दिया जाता था. यहां 97 ईसा पूर्व में नरबलि की प्रथा ख़त्म कर दी गई. देवताओं को ख़ुश करने के लिए नरबलि की बजाय पशुओं की बलि दी जाने लगी, मगर जर्मनी में नरबलि आम नहीं थी. जब कभी किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से जान-माल पर बन आती थी, तभी यहां नरबलि दी जाती थी. ग्यारहवीं सदी में यहां कई मंदिरों में नरबलि दी जाती थी.

दक्षिण अमेरिका में भी नरबलि का लंबा इतिहास रहा है. शासकों की मौत और त्योहारों पर इंका लोग सेवकों की बलि दिया करते थे, ताकि वे मृतक के अगले जीवन में उसका साथ दे सकें. पेरू के इंका लोगों ने 1527 में इंका हुयना कापक की मौत होने पर तक़रीबन चार हज़ार अनुचरों, दरबार के अधिकारियों, मनपसंद व्यक्तियों और दासियों की बलि दी थी. इंका क्षेत्रों में बलि चढ़ाए गए बच्चों की बहुत-सी ममियां मिली हैं. दरअसल, यह एक प्राचीन प्रथा थी, जिसे कापाकोचा कहते थे. इसी तरह उत्तरी पेरू के मा़ेके लोग भी एक साथ बहुत से किशोरों की बलि देते थे. एक पुरातत्ववेत्ता स्टीव बौरगेट ने 1995 में 42 किशोरवय लड़कों की हड्डियां पाई थीं. ये लोग युद्ध बंदियों का पहले जुलूस निकालते थे, बाद में उनकी बलि देकर उनका रक्त अपने देवताओं को च़ढाते थे. इसी तरह उत्तरी अमेरिका के पॉनी लोग वार्षिक उषाकाल नक्षत्र प्रथा का अभ्यास करते व़क्त एक युवा कन्या की बलि देते थे. दक्षिण-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी संप्रदाय या माउंड बिल्डर्स द्वारा भी नरबलि दी जाती थी. पश्‍चिमी अफ्रीका में उन्नीसवीं सदी के आख़िर तक नरबलि दी जाती थी. राजा और रानी की मौत पर नरबलि आम थी. दहोमे में जब किसी शासक की मौत होती थी, तो हज़ारों ग़ुलामों की बलि च़ढा दी जाती थी. 1727 में तक़रीबन चार हज़ार लोगों की बलि दिए जाने की जानकारी मिलती है. इसके अलावा, एक अन्य सालाना समारोह में पांच सौ ग़ुलामों की बलि दी गई. मगर जैसे-जैसे इस्लाम धर्म फैलता गया, बलि पर भी रोक लगती रही. मुसलमानों के अलावा ब्रिटिश लोगों ने भी नरबलि का विरोध करते हुए इसके ख़ात्मे के लिए आवाज़ उठाई. नरबलि का अंतिम प्रमुख केंद्र आधुनिक नाइजीरिया स्थित बेनिन साम्राज्य था. बेनिन साम्राज्य 1890 में ब्रिटिश शासन के साथ नरबलि पर रोक लगाने के लिए सहमत हुआ. हालांकि इसके बाद भी वहां नरबलि जारी रही. नरबलि को रोकने की कोशिश में जब एक ब्रिटिश निरीक्षक की हत्या कर दी गई, तो ब्रिटिश शासन ने बेनिन पर क़ब्ज़ा करने के लिए सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी. नतीजतन, अपनी रक्षा के लिए बेनिन का शासक ज़्यादा से ज़्यादा नरबलि देकर देवता को ख़ुश करने में जुट गया. मगर जब ब्रिटेन ने जीत हासिल कर ली, तो वहां नरबलि कम हो गई. तिब्बत के कुछ इलाक़ों में भी नरबलि का ज़िक्र किया जाता है.

यह हैरानी की ही बात है कि इक्कीसवीं सदी में आज जब भारत विज्ञान के क्षेत्र में इतनी तरक्की कर चुका है कि वह दुनिया के विकसित देशों से मुक़ाबला कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यहां ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो अंधविश्‍वास में बुरी तरह जक़डे हुए हैं. दरअसल, जब तक समाज में रू़िढवादिता रहेगी, तब तक अंधविश्‍वास रहेगा. और जब तक अंधविश्‍वास क़ायम है, तब तक नरबलि जैसी अमानवीय प्रथा का पूरी तरह ख़ात्मा नहीं किया जा सकता. इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि समाज में जागरूकता फैलाई जाए और लोगों को यह समझाया जाए कि कोई भी देवी या देवता किसी की बलि लेकर ख़ुश नहीं होता, क्योंकि नर सेवा ही नारायण सेवा है.

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. आपने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में कई वर्षों तक सेवाएं दीं हैं. ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है. आपने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लिए लेखन. आपकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक किताब प्रकाशित हो चुकी है.

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फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. आपने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में कई वर्षों तक सेवाएं दीं हैं. ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है. आपने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लिए लेखन. आपकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक किताब प्रकाशित हो चुकी है.

One thought on “21वी सदी में भी अन्धविश्वास ! : कब जागरूक होगा हमारा समाज ?

  • June 12, 2013 at 11:19 PM
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    आधुनिक युग में भी हम इन सब वातों पर विशवास करते हैं शर्म आनी चाहिए हमें ।

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