उत्तर प्रदेश : अखिलेश सरकार को अदालत का झटका : सपा का खेल हो गया फेल

विधानसभा चुनाव के दौरान किए गए अपने वादे पूरे करने की धुंध में समाजवादी पार्टी की सरकार सारे नियम-क़ानून ही भूलती जा रही है. आतंकवाद फैलाने के आरोपियों को जेल से रिहा कराने की हड़बड़ी इसका जीता-जागता प्रमाण है. हालांकि, अदालत ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया है.

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भाजपा ने मंदिर, सपा ने आतंक के नाम पर ठगा

उत्तर प्रदेश कांगे्रस विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर कहते हैं कि आतंकवादियों के मुकदमे वापस लेने के मामले में सपा सरकार स़िर्फ कोरी राजनीति कर रही है. उसका मकसद निर्दोषों को छुड़ाना नहीं, बल्कि सियासी ड्रामा करना है. अगर ऐसा न होता, तो वह जेल में बंद बेगुनाह मुसलमानों को छुड़ाने के लिए पहले सभी क़ानूनी पहलुओं का अध्ययन करती और उसके बाद कोई निर्णय लेती, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. हाईकोर्ट का आदेश आए भी समय हो गया है. पूर्व में भी सपा सरकार को आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद मुस्लिम युवाओं के मुकदमे वापस लेने के मामले में दो बार अदालत में मुंह की खानी पड़ी है. सरकार अगर मुसलमानों के जख्मों पर वाकई मरहम लगाना चाहती है, तो उसे केंद्र से सलाह-मशविरा करके इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहिए, लेकिन वह ऐसा करेगी नहीं, क्योंकि उसे डर है कि केंद्र सरकार उसका चिट्ठा खोल देगी.

उत्तर प्रदेश कांगे्रस जनसंपर्क प्रकोष्ठ के चेयरमैन एवं पूर्व विधायक सिराज मेंहदी तो दो टूक कहते हैं कि अखिलेश सरकार अल्पसंख्यकों की हितैषी नहीं है, वह केवल दिखावा करती है. नीयत साफ़ न होने की वजह से उसने निर्दोषों को छुड़ाने के लिए क़ानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई. सिराज उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद मुजाहिद की पिछले दिनों पुलिस हिरासत में मौत हो गई. सरकार ने उसके परिवार को 6 लाख रुपये दिए और पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच कराने की घोषणा की, लेकिन आज तक सीबीआई जांच के लिए नियमानुसार पत्र ही नहीं लिखा जा सका है. एक पत्र सरकार ने सीबीआई को जांच के लिए भेजा ज़रूर था, परंतु उसमें कई खामियां थीं. मुजाहिद ग़रीब परिवार का लड़का था और उसके परिवार के लिए छह लाख रुपये की आर्थिक मदद मायने रखती थी, मगर परिवार को इस बात का दु:ख था कि मुजाहिद को फर्जी तरीके से पकड़ कर जेल में डाल दिया गया, जहां उसकी मौत हो गई. इसलिए उसके परिवार ने आर्थिक मदद वापस कर दी. इससे अच्छी तो कल्याण सिंह की सरकार थी, जिसे मुस्लिम विरोधी कहा जाता है, परंतु उसने भी सत्ता में आते ही उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया था. इसी तरह बसपा राज में भी इस काम में देरी नहीं हुई थी, लेकिन सपा राज में आज तक अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन की कुर्सी खाली पड़ी है. जिलाधिकारी एवं एसएसपी सुनते नहीं हैं और आयोग में कोई है नहीं. ऐसे में मुस्लिम अपना दर्द किससे बयां करें? इतना ही नहीं, शिया वक्फ बोर्ड भी भंग चल रहा है. मदरसा और उर्दू अकादमी में भी कई पद खाली पड़े हैं. फिर भी अखिलेश सरकार मुसलमानों का हितैषी होने का दावा करती है. उत्तर प्रदेश कांगे्रस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के चेयरमैन मारूफ खान के मुताबिक, अखिलेश सरकार मुसलमानों को ठग रही है, बेवकूफ बना रही है. उनके हित में काम करने की बजाय लालीपॉप थमाया जा रहा है. कांगे्रस सेवा दल के साकार जैदी कहते हैं कि जिस तरह भाजपा ने राम मंदिर के नाम हिंदुओं को मूर्ख बनाया, उसी तरह सपा आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों को ठग रही है, लेकिन 2014 में उसकी कोई चाल सफल नहीं होगी.

भारतीय संविधान का सम्मान करते हुए दोषियों एवं निर्दोषों के बारे में फैसला करने का अधिकार अदालतों पर ही छोड़े रखना चाहिए. यही न्यायसंगत तरीका है, क्योंकि अदालतों का गठन इसीलिए हुआ है. लेकिन जिस तरह से अदालत के बाहर अखिलेश सरकार एवं उसके आजम खां जैसे कद्दावर नेता ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए लोगों को निर्दोष साबित करने की मुहिम चला रखी है, उससे न केवल समाज में द्वेष बढ़ रहा है, बल्कि संवैधानिक संकट भी खड़ा होता नज़र आ रहा है. यह सच है कि समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणा-पत्र में अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण की बात करते हुए कहा था कि दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की आड़ में उत्तर प्रदेश के जिन बेकसूर मुस्लिम नौजवानों को जेल में डाला गया है, वे न केवल फौरन रिहा होंगे, बल्कि उन्हें मुआवजे के साथ इंसाफ भी दिलाया जाएगा और दोषी अधिकारियों को दंडित भी किया जाएगा. इसका यह मतलब कतई नहीं है कि संविधान को ही ठेंगा दिखा दिया जाए, जैसा कि अखिलेश सरकार चाहती है. दरअसल, सपा सरकार ने आतंकवाद के आरोप में प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद 19 लोगों के मुकदमे वापस लेने की गुपचुप मुहिम चला रखी है. ये वे लोग हैं, जिनके ख़िलाफ़ चार्जशीट पेश हो चुकी है, लेकिन राज्य सरकार को इससे कोई वास्ता नहीं है. वह उक्त आतंकियों पर चल रहे मुकदमों को देश की सुरक्षा एवं न्याय की दृष्टि से नहीं, बल्कि राजनीति के चश्मे से देख रही है. इसीलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ को इस बारे में राज्य सरकार की मंशा के ख़िलाफ़ यह अहम फैसला सुनाना पड़ा, अन्यथा आतंकवाद के उक्त आरोपी जल्द ही सलाखों के बाहर घूमते दिखाई देते.

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि सपा सरकार एक तरफ़ आतंकवादियों को बेगुनाह साबित करके मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए अदालत को हाशिए पर डालने की साजिश रच रही है, तो वहीं दूसरी तरफ़ सारे क़ायदे-क़ानूनों की अनदेखी करते हुए उसने केंद्र से भी इस मामले में राय लेना उचित नहीं समझा. सपा की मुहिम परवान चढ़ भी जाती, लेकिन उसके इस खेल को एक जनहित याचिका ने चौपट कर दिया. अदालत ने उक्त जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए न केवल उक्त आतंकियों के मुकदमे वापस लेने की राज्य सरकार की मुहिम पर रोक लगा दी, बल्कि उसने इस संबंध में केंद्र से अनुमति न लेने के लिए जमकर फटकार भी लगाई. हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने भले ही केंद्र से अनुमति न लेने के राज्य सरकार के निर्णय के राजनीतिक निहितार्थ निकाले हों, लेकिन सच्चाई यही है कि अखिलेश सरकार को डर सता रहा था कि अगर केंद्र आतंकवादियों के मुकदमे वापस लेने की अनुमति दे देगा, तो उसका सारा श्रेय भी कांगे्रस ले उड़ेगी. यह बात भला आम चुनाव के लिए गोटें बिछा रही समाजवादी पार्टी और उसकी सरकार कैसे बर्दाश्त कर सकती थी.

खैर, सपा सरकार अदालत में भले ही हार गई हो, लेकिन उसने उन मुट्ठी भर लोगों का तो दिल जीत ही लिया, जिन्हें देश की न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है. अच्छा तो यह होता कि अखिलेश सरकार बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को न्याय दिलाने के लिए उनके मुकदमे वापस लेने की बजाय उन्हें फास्ट ट्रैक

अदालतों में लगवा कर निस्तारित कराती, लेकिन उसकी मंशा राजनीतिक फायदा उठाने की ज़्यादा थी और बेगुनाहों को छुड़ाने की कम. कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी तो यहां तक कहते हैं कि सपा सरकार ने जनहित याचिका के ख़िलाफ़ अदालत में कायदे से पैरवी नहीं की, अन्यथा फैसला कुछ और ही आता. उम्मीद यह भी जताई जा रही है कि राजनीतिक हित साधने के लिए सपा सरकार हाईकोर्ट के ़फैसले के ख़िलाफ़ ऊपरी अदालत में भी जा सकती है. राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री आजम खां का कहना है कि सरकार इस मामले में अपने क़दम पीछे नहीं खींचेगी और बेगुनाहों की रिहाई के लिए अदालत में तत्परता के साथ प्रभावी तरीके से अपना पक्ष रखेगी.

पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति महेंद्र दयाल ने रंजना अग्निहोत्री समेत छह स्थानीय अधिवक्ताओं की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान काफी तीखे तेवर अपनाए और उन्होंने राज्य सरकार के फैसले को पूरी तरह से पलट कर रख दिया. ग़ौरतलब है कि जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ताओं ने सीरियल कचहरी बम ब्लास्ट, आतंकवाद फैलाने के आरोपियों के ख़िलाफ़ लंबित केस वापसी संबंधी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 को चुनौती देते हुए उसे असंवैधानिक घोषित करके ख़त्म किए जाने का अनुरोध अदालत से किया था. उनका कहना था कि आतंकवादियों के मुकदमे वापस लेने से देश की आंतरिक सुरक्षा, संप्रभुता एवं अखंडता प्रभावित होगी. याचियों के वकील हरिशंकर जैन ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि आतंकवादी अधिनियम, शस्त्र अधिनियम एवं विस्फोटक अधिनियम के तहत पकड़े गए और जेल में बंद अभियुक्तों को केंद्र सरकार की अनुमति के बिना राज्य सरकार बरी नहीं कर सकती. याचियों का मत था कि पिछले कुछ सालों से देश लगातार आतंकी घटनाओं का दंश झेल रहा है. ऐसे में आरोपियों के मुकदमे वापस लिया जाना क़ानून की मंशा के ख़िलाफ़ होगा. वहीं अखिलेश सरकार के अपर महाधिवक्ता बुलबुल गोदियाल ने उक्त याचिका के सुनवाई योग्य न होने की बात कहते हुए विरोध किया. याचिका में केंद्र एवं राज्य सरकार के अलावा, लखनऊ, बाराबंकी, फैजाबाद एवं वाराणसी के जिलाधिकारियों को पक्षकार बनाया गया था.

दरअसल, अदालत में राज्य सरकार की यह पहली हार नहीं थी, बल्कि इससे पहले भी वह न्यायपालिका की नाराज़गी झेल चुकी है. दो याचिकाएं भी खारिज हो चुकी थीं. 22 नवंबर, 2012 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस आर के अग्रवाल एवं जस्टिस मौर्य की पीठ ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा था, आज आप मुकदमे वापस ले रहे हैं, कल पद्मश्री देंगे. कोई आरोपी आतंकी है या नहीं, यह तय करना अदालत का काम है, सरकार का नहीं. वहीं विशेष अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश बाराबंकी ने कचहरी बम ब्लास्ट मामले में केस वापसी की अर्जी खारिज करते हुए कहा था, आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहने वाले व्यक्ति किसी जाति या संप्रदाय से जुड़े नहीं होते. उनका एकमात्र मकसद जनमानस में आतंक पैदा करना होता है. अर्जी में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे जनहित, न्यायहित, सुरक्षा, सांप्रदायिक सौहार्द्र एवं न्यायिक व्यवस्था कायम रखने के मकसद से मुकदमा वापस लिया जा सके. इसी तरह चीफ जस्टिस शिव कीर्ति सिंह की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने बीते 28 मई को अपने आदेश में कहा था कि राज्य सरकार का ़फैसला (आतंकवादियों के मुकदमे वापस लेने का) ज़्यादा अहमियत नहीं रखता, क्योंकि आख़िरकार संबंधित फौजदारी अदालत को दंड प्रक्रिया की धारा 321 के तहत आपराधिक अभियोजन की वापसी की अर्जी पर गौर करना है.

हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने आतंकवादियों के मुकदमे वापस लेने की अखिलेश सरकार की मंशा पर रोक लगाकर न्यायविदों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है. वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव पांडेय को इस बात का मलाल है कि सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों का तो निर्वहन कर नहीं पा रही है, लेकिन अदालत के काम में बेजा दखलंदाजी करती है. आतंकवाद के मसले पर केंद्र एवं राज्य सरकार को व्यापक नज़रिए से सोचना चाहिए. आतंकवाद ख़त्म करने के लिए हमें उसकी जड़ें तलाशनी होंगी. अगर सरकार की नीयत साफ़ है, तो उसे मुकदमे वापस लेने की बजाय इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि मुकदमों को जल्द से जल्द निपटाया जाए, ताकि बेगुनाह जेल की सलाखों से छूट सकें और गुनहगारों को सजा मिले. समाजवादी पार्टी वोट बैंक की राजनीति में कितना गिर जाती है, इसकी बानगी कुछ दिनों पूर्व आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद खालिद की पुलिस हिरासत में मौत के बाद हुई सियासत में देखने को मिली. सरकार ने मुसलमानों को खुश करने के लिए उसके परिवार को मुआवजा देने में भी संकोच नहीं किया. पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ अनाप-शनाप मुकदमे ठोंक दिए. एक मुकदमा सेवानिवृत्त डीजीपी विक्रम सिंह के ख़िलाफ़ भी दर्ज कर दिया गया, जो खालिद की मौत के समय रुड़की के रामकृष्ण ट्रस्ट मिशन में व्याख्यान दे रहे थे. अपने ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज होने की बात सुनकर वह गुस्सा हो गए. उन्होंने कहा, यह सब सरकार के पैतरे हैं. खालिद की गिरफ्तारी मेरे ही कार्यकाल में हुई थी. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वह आतंकवादी था और रहेगा. पता नहीं, खालिद के परिवार को छह लाख रुपये की मदद देकर राज्य सरकार के नुमाइंदे क्या संदेश देना चाहते हैं. उन्होंने पुलिस का मनोबल बढ़ाते हुए कहा कि पुलिसकर्मियों को ऐसे मुकदमों से परेशान नहीं होना चाहिए.

पूर्व डीजीपी के एल गुप्ता ने भी आतंक फैलाने के आरोप में जेल में बंद लोगों के मुकदमे वापस लेने की सरकारी कोशिश को वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बताते हुए कहा कि सरकार के इस ़फैसले से पुलिस किसी को भी अब पकड़ने की कोशिश ही नहीं करेगी. अपने समय के तेजतर्रार डीजीपी प्रकाश सिंह का कहना था कि यह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा है. सरकारें भी जानती हैं कि अदालत अपना काम करती है और किसी आरोपी का मुकदमा वापस लेना आसान नहीं है, फिर भी वे अपने मतदाताओं को खुश करने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाती रहती हैं.

मुसलमानों को भ्रमित कर रही है सपा

बसपा के महासचिव सतीश मिश्र ने आतंकवाद से जुड़े मामलों में आरोपी मुसलमानों को रिहा करने की कोशिश को तमाशा करार देते हुए कहा कि सरकार क़ानून व्यवस्था तो संभाल नहीं पा रही है, उल्टे अपनी नाकामी छिपाने के लिए वह मुसलमानों को भ्रमित करने में लगी हुई है. जिसे भी न्याय प्रक्रिया की थोड़ी-बहुत जानकारी है, वह जानता है कि मुकदमे वापस लेना सरकार के हाथ में नहीं है. सपा यह भ्रम फैला रही है कि पूर्ववर्ती बसपा सरकार के कार्यकाल में बेकसूर मुसलमानों को आतंकी घटनाओं में फंसाया गया था. मिश्र ने कहा कि मुसलमान अखिलेश सरकार के झांसे में आने वाले नहीं हैं. सपा जब विपक्ष में होती है, तो वह मुसलमानों से तरह-तरह के वादे करती है, लेकिन सत्ता हासिल होते ही सब कुछ भूलकर लूट-खसोट में लग जाती है. सपा की गलत नीतियों के कारण मुसलमान परेशान हैं. दंगों में उनकी संपत्तियों का नुकसान हो रहा है, जानें जा रही हैं, लेकिन सपा के पास यह सब देखने का वक्त नहीं है. सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव एक-दो थके हुए मुस्लिम चेहरों के सहारे अल्पसंख्यकों का रहनुमा बनने का ख्वाब पाले हुए हैं.

उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह आर एम श्रीवास्तव ने बीते 7 जून को उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ को अपने प्रति शपथ-पत्र के साथ उन आतंकवादियों की सूची सौंपी, जिनके मुकदमे सरकार वापस लेना चाहती है. उक्त सूची में फैजाबाद कचहरी में हुए सीरियल बम ब्लास्ट के किसी भी आरोपी का नाम नहीं था.

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